पथिक-प्रबोध
यह
कविता जीवन-पथ के साधक के लिए एक सजग, साहसी और व्यवहारिक संदेश है। इसमें
संसार की असमतलता,
स्वार्थजनित अवरोध, आत्मबल, विवेक, संगठन, व्यवहार-कुशलता
और अंततः अंतः शांति—इन सबका सुंदर समन्वय है। कविता केवल संघर्ष का आवाहन नहीं
करती; वह यह
भी सिखाती है कि बाहरी जीत-हार से ऊपर मन की शांति, संयम और युक्तिपूर्ण आचरण ही स्थायी
कल्याण का आधार हैं।
ओ पथिक ! तुम डगमगा न जाना, अग्रिम पथ बहुत है असमतल,
नेत्र खोलकर ही चलना, वरन उलझाने को मिलेंगे अनेक भ्रामक।
माना तुझसे किसी को नहीं निजी विरोध, पर स्वार्थ तो रहते ही हैं,
यदि तुझे अपनी बाधा मान बैठें, तो
हटाने के यत्न भी होते ही हैं।
यह तंत्रों से अनबन भी है; अपनी प्राथमिकताएँ उन्हें अधिक प्रिय,
या उनके मनोरथों में सहयोगी बन जा, या हट
जा एक ओर स्वयं।
अपनी गली में श्वान भी शेर-समान, स्वामी मानते हैं अपने को,
पर क्यों निज दशा दयनीय करते, जबकि जानते हो परंतप हो।
तुझमें शक्ति है एक अप्रतिम विवेक की, कुंडलिनी तो जगे बस,
महावीर-सी चित्तशक्ति एकत्रित कर, जग बली
को ही देता पथ।
घबराने का नहीं कोई कारण, निज शक्ति का उचित प्रयोग करो,
माना साधन अल्प ही हों, किन्तु उन्हीं को एकमुष्ट कर श्रेष्ठ बनो।
अपनी प्रतिष्ठा हेतु महद् प्रयास करो, संगठन को सर्वोपरि रखो,
आत्मा को कभी दमित न होने देना, प्रयत्न
करो व अन्त्यज न बनो।
जब अवरोध आए तो कुछ बल लगा, पार हो जाएगा सहज ही,
जिनका अपना मन जीतने का होता, वे कुछ मार्ग लेते हैं ढूँढ़ ही।
सुहृद, स्मितमयी चित्त सर्वप्रिय होता, सब उसको पास हैं बुलाते,
भिन्न प्रकृति-जन यदि विरोधी लगें, हटें
शीघ्र तो भी अच्छा मानो।
सबको प्रसन्न करना दुष्कर है; ऐसा विचार प्रायः ही आत्मघाती,
पर युक्ति से अपरिहार्य विरोध टालना, है व्यवहारिक समझदारी।
किसी के अति अंदर नहीं घुसो, न बाहर ही फेंको उसे मक्खी-सा,
दादा छाजुराम ऐसा आचरण चाहे थे, सुना
बड़ों-परिजनों से ऐसा।
यह दुनियावी मध्यम मार्ग है, इससे कुछ गुज़ारा हो जाता बस,
किन्तु इस आर-पार की लड़ाई में तो हार-जीत दोनों हैं संग।
यदि विजयी हुआ तो पृथ्वी-सुख भोगेगा, लेकिन मिट भी सकता,
पर उससे बढ़कर मन को शांत रख; तेरा
कल्याण उसी में बसता।
पवन
कुमार,
21 मई, 2026, वीरवार, समय 11:37 रात्रि
(मेरी
महेंद्रगढ़ डायरी,
16 जुलाई, 2015, वीरवार, समय 8:58 प्रातः)
