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Wednesday, 15 July 2026

संभावना से साधना तक (एक प्रयासी का आत्मचिंतन)

संभावना से साधना तक 

(एक प्रयासी का आत्मचिंतन)


यह रचना एक मनुष्य की आत्मसंवादी यात्रा है—समय की क्षणभंगुरता से आरम्भ होकर आत्मचिंतन, पुरुषार्थ, संघर्ष, नागरिक उत्तरदायित्व, मानवता और लोकहित तक पहुँचती है। इसका मूल आग्रह है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी अंतर्निहित संभावनाओं को पहचानते हुए स्वयं को विकसित करे तथा अपने जीवन को व्यापक कल्याण से जोड़े।

आजकल सुबह कुछ विलंब से मेरी आँख खुल रही है,
प्रायः छह से सात बजे के मध्य ही जागरण हो पाता है।

हाँ, मनुष्य को कुछ तो अपनी भविष्य-चिंता होनी चाहिए,
सोना-जागना, खाना-नहाना तो साधारण नित्य-क्रियाएँ हैं।
दिन और रात बड़ी द्रुत गति से निःशब्द बीत ही जाते हैं,
समय हाथ में रहते उम्र कटती; कुछ अधिक न कमाया है।

यह जगत प्रत्येक मनुज के समक्ष कोई-न-कोई कर्म रखता है,
अनेक प्रस्तुत संभावनाओं में मन प्राथमिकताएँ चुन सकता है।
आवश्यक नहीं कि हम सदा किसी अन्य की ही अनुकृति करें,
अनेक मौलिक आयाम स्वतः उदित होते, बस आरंभ में देरी है।

मनुज को प्रकृति का दर्शन कर उससे सीखना आना चाहिए,
विश्व के सफल चरित्रों से प्रेरित होकर स्वयं को गढ़ना चाहिए।
अपना जीवन सँवारना प्रत्येक व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी है,
विपन्न और अविवेकी दशा में निष्क्रिय रहना भी एक त्रुटि है।

समस्त प्रगति की प्रथम चिंगारी अंतर्मन के चिंतन से उठती है—
क्या मेरी वर्तमान स्थिति से महत्तर भी एक अग्रगमन संभव है?
मेरे पास कितनी शक्तियाँ, कितने साधन और कितनी क्षमता है,
और इन सबका महत्तम लाभ लेने की मेरी समझ कितनी है?

देखो, प्रत्येक बीज में एक पूर्ण द्रुम बनने की संभावना होती है,
कम-से-कम निज प्रजाति, प्रकृति व गुणानुरूप दिशा होती है।
तथापि एक ही मनुष्य-जाति में अनेक विकास-स्तर दिखते हैं,
आर्थिक, सामाजिक, मानसिक व सांस्कृतिक विविध आयामों में।

अपने ही परिवेश, गाँव या कस्बे में अनेक जीवन-स्तर मिलते हैं,
एक ही धरती पर कुछ निम्न, कुछ मध्य और कुछ उच्च उठते हैं।
निश्चय ही अवसर, परिवेश, पुरुषार्थ और रोधक कारक रहे होंगे,
बुद्धि कहीं शिथिल या प्रखर, तो कहीं जागृत अथवा सुप्त होगी।

यह सत्य है कि कुछ जीव स्वभाव से अति महत्त्वाकांक्षी होते हैं,
कुछ मध्यम दशा में सामने उपलब्ध साधनों से निर्वाह करते हैं।
अपने वर्तमान से उन्नयन की प्रबल अभिलाषा ही वह ज्वाला है,
जो मनुष्य को स्व-कल्याण और विकास की दिशा दिखाती है।

मैं नहीं कहता कि हमारा विकास कभी अन्यों की कीमत पर हो,
न ऐसा उत्थान उचित है, जो किसी अन्य का अधिकार हर ले।
परन्तु क्या निष्क्रिय रहकर हम स्वयं-सुधार से विमुख हो जाएँ,
जबकि पुरुषार्थ और सदाचार दोनों साथ-साथ चल सकते हैं?

प्रकृति में वृहद संसाधन, अनेक युक्तियाँ व उदाहरण प्रस्तुत हैं,
एक प्रज्ञ पुरुष उन्हें पहचानकर सदुपयोग करना सीख लेता है।
कोई उपलब्धि तभी सार्थक है, जब दिशा लोकहितकारी भी हो,
और साध्य के साथ उसके साधन भी मर्यादित व शुभकारी हों।

तकनीकी प्रयासों द्वारा गुणों में निरंतर सुधार किया जा रहा है,
कुछ उत्तम गुण-जीन विधिपूर्वक प्रतिरोपित किए जा सकते हैं।
जहाँ कुछ अल्पता, वहाँ उसकी पूर्ति-उपाय खोजे जा सकते हैं,
रोग है तो उपचार भी है; कृत्रिम अंग जीवन-सहायक बनते हैं।

प्रकृति अपनी विविधता में अनेक उत्तमतर आयाम दिखाती है,
प्रश्न यही है कि उनसे महत्तम लाभ किस विधि से लिया जाए।
किंतु प्रगति का मूल्य मात्र सामर्थ्य और वेग से नहीं आँका जाए,
उसमें मनुजता, न्याय, प्रकृति व भावी पीढ़ियों के हित भी समाए।

तुम्हारी अपनी रचना ही तुम्हारी सबसे मूल्यवान कर्म-पूँजी है,
उसकी बाह्य प्रस्तुति एक नित्य प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति है।
दुनिया के अधिकांश लोग तो दूर खड़े बस दर्शक बने रहते हैं,
क्योंकि तुम्हारे संघर्ष में उन सबकी समान रुचि कहाँ रहती है?

अभिभावक, सहोदर व कुछ मित्र ही प्रायः निकट खड़े मिलते हैं,
अन्य लोगों की तुममें या तुम्हारे जीवन में अधिक रुचि नहीं होती।
पर छोटे-मोटे सहारों व सतत प्रयासों से जब कुछ पा ही जाओगे,
लोग श्लाघा करेंगे, पहचान मिलेगी और जीवन किंचित सुधरेगा।

ये सकल कष्ट, पीड़ा, थकन, उपेक्षा, संघर्ष, पराजय व विजय,
इस दीर्घ प्रक्रिया के अलग-अलग पड़ाव और बड़े संकेत हैं।
वे अपने समय पर उदित होंगे एवं युक्ति-प्रयासों से हटेंगे भी,
पर तुम्हें प्रत्येक दशा में आत्मविश्वास अडिग रखना ही होगा।

साथ ही संघर्षरत जनों के प्रति संवेदनशील बने रहना होगा,
क्योंकि प्रत्येक पराजय के पीछे केवल शिथिलता नहीं होती।
कहीं अभाव व अवसरहीनता, तो कहीं अदृश्य पीड़ा रहती है,
अतः सफलता में विनम्रता व दुर्बलों के प्रति करुणा चाहिए।

मेरी प्रखर इच्छा है कि ये राष्ट्र और शासन इतने सबल हों,
कि नागरिक-अधिकारों का आदर और संरक्षण सुनिश्चित हो।
नागरिक भी आत्म-कर्तव्यों के प्रति सजग एवं उत्तरदायी हों,
क्योंकि स्वतंत्रता उत्तरदायित्व संग ही दीर्घकालिक फलती है।

कम-से-कम किसी प्रयासी की अनावश्यक टाँग न खींची जाए,
क्योंकि वही आगे चलकर एक बड़ा प्रेरणा-स्रोत बन सकता है।
इन धृतिवान कर्मयोगियों एवं सबल व्यक्तित्वों ने विश्व बदला है,
मानव-चेतना को नवदिशाएँ देकर इतिहास की धाराएँ मोड़ी हैं।

देखो, परिवेशों में कुछ अदम्य साहसी नर अवश्य जन्म लेते हैं,
दमनकारी कारकों को ललकार, वे प्राण जोखिम में डालते हैं।
माना कि उपहास, द्वेष, घृणा व अन्यायपूर्ण व्यवस्थाएँ सर्वत्र हैं,
फिर भी वे अंतर्मन में पराजय को निकट फटकने नहीं देते हैं।

वृहद मनुजता हेतु समर्पित होकर वे गलत को गलत कहते हैं,
त्रुटिपूर्ण व्यवस्था के सम्मुख सत्य कहने का साहस रखते हैं।
उनके भीतर यह प्रबल विश्वास निरंतर उज्ज्वल बना रहता है—
कि मैं एक विराट और सुखद लोक-परिवर्तन का वाहक हूँ।

जब भी एक मनुज किसी सुदूर यात्रा में सम्मिलित होता है,
उसे स्वयं को एक विशाल श्रृंखला की कड़ी मानना चाहिए।
एक विचार कि मुझसे पूर्व भी अनेक थे, आज भी अनेक हैं,
मेरे गमन-पश्चात भी अनेक होंगे और यात्रा अनवरत रहेगी।

हमें मृदुल आयाम चिन्हन व उनका सहयोग करना चाहिए,
जो समस्त सृष्टि, मानवता और जीवन के लिए शुभकारी हों।
पृथ्वी पर आए हो, तो कुछ भला अपने हिस्से का भी कर लो,
अपना जीवन सूर्य की भाँति प्रकाश बाँटने वाला ही बनाओ।

सुखद है कि अवस्था-वृद्धि के संग ऐसा अनुभव होने लगता है,
मानो यह समस्त मानवता ही इस अंतर्मन में स्थान पा रही हो।
और हम उसी विराट चराचर ब्रह्मांड के अनेक संबद्ध अंश हैं,
साथ-साथ चलते-फिरते, सोचते-समझते व परस्पर जुड़े हुए।

देखिए, जब सुचिंतन जागता है, तो एक उदार धारा बहती है,
जो सहज भाव से सबको अपने साथ लेकर आगे बढ़ती है।
फिर हममें से ही कोई प्रेमचंद, प्लेटो या आइंस्टीन बनता है,
कोई गांधी, अंबेडकर या अन्य द्रष्टा बनकर जग बदलता है।

अब चिंतनार्थ कुछ ऊर्जा एवं समय तो निकालना ही पड़ेगा,
वास्तविक कर्म हेतु प्रतिबद्ध होकर आगे नित बढ़ना पड़ेगा।
समय-संसाधनों के सुप्रयोग की एक रूपरेखा बनानी होगी,
जीवन में अनुशासन व सदाचरण का विकास करना होगा।

यहाँ शर्त है कि जब तक स्वयं के प्रति ईमानदार नहीं बनेंगे,
कोई अन्य अधिक सहायता नहीं करेगा; समय बीत जाएगा।
अतः अपनी बात कहते रहो, कुछ लोग तो अवश्य उसे सुनेंगे,
और शनैः-शनैः तुम्हारे उदार चरित्र का भी कुछ आदर होगा।

जो भी समय व साधन मिले, उनका समुचित प्रयोग करो,
अचेत शिथिल हो स्वयं को गँवाना प्राण के प्रति अन्याय है।
यहाँ चिंतन, विश्राम और आत्म-संवर्धन भी सार्थक कर्म हैं,
इनसे शक्ति, संतुलन और दीर्घ पुरुषार्थ का उदय होता है।

विघ्नों को यथाशीघ्र दूर करने का सतत प्रयास करते रहो,
ताकि क्षमता बढ़े, पथ सुगम हो और तुम्हारा कल्याण हो।
अंतस की संभावनाओं को साधना में रूपांतरित करते चलो,
निष्क्रियता की धुंध हटाकर पुरुषार्थ का दीप जलाते चलो।

ऐसा जियो कि तुम्हारा प्रश्रम स्वयं तुम्हारी पहचान बन जाए,
तुम्हारे होने से यह जगत किंचित और अधिक सुंदर हो जाए।
इस जीवन का श्रेष्ठ प्रतिफल केवल एक उपलब्धि ही नहीं है,
अपितु वह प्रकाश है, जो अन्यों के पथ भी आलोकित करे।

नैतिक संदेश

पुरुषार्थ करो, पर करुणा और मर्यादा का साथ न छोड़ो।
विकास ऐसा हो, जिससे किसी अन्य का अधिकार न घटे।
ज्ञान, समय व सामर्थ्य का प्रयोग मानवता-कल्याण में हो।
सार्थक जीवन निज संग अन्यों के पथ भी आलोकन में है।

 

पवन कुमार,

15 जुलाई, 2026, बुद्धवार, समय 7:13 बजे सायं  

(मेरी चेन्नई डायरी 25 अप्रैल, 2023, मंगलवार, प्रातः 8:32 बजे से) 

Wednesday, 8 July 2026

नीरवता, चेतना एवं समरसता-आह्वान

 नीरवता, चेतना एवं समरसता-आह्वान



यह काव्य-चिंतन प्रकृति की नीरवता से आरंभ होकर अंतर्मंथन, सामाजिक संवेदना, समता, स्वाभिमान और चेतना-जागरण की ओर बढ़ता है। इसमें एक ओर एकांत, खग-कूजन, प्रकाश, हरितिमा और भीतर का स्पंदन है; दूसरी ओर दमित-जन, सामाजिक भेदभाव, संवाद, शिक्षा, समन्वय से प्रेरित मानवीय जागरण का स्वर है। रचना का मूल आग्रह यह है कि मनुष्य पहले स्वयं भीतर जागे, फिर समाज में प्रकाश, आदर और समरसता का विस्तार करे।

इस खगवृंद-कूजन से ही प्रारंभ करूँ, यही मधुर मनन जगाएगा।
बुद्धि-रश्मि प्रकाशित होगी, सकारात्मक आशा का सूर्योदय होगा।

आज अद्वितीय-सी परमानुभूति करना चाहता हूँ, जो समीप है।
पर दृष्टिगत नहीं हो रही, जैसे गूढ़ जीवन-तत्व छिपा रहता है।
जीवन दूध या दही-सा है, भीतर वसा रहती है, पर दिखती नहीं।
जब तक युक्ति न ज्ञात हो, तब तक उसका हल निकलता नहीं।

इसकी मंथन-आवश्यकता पड़ती है, तभी सार अलग होता है।
मलाई निकालने हेतु पहले दूध को ठंडा करना भी पड़ता है।
माना कि वसा महत्वपूर्ण, मूल्यवान व उपयोगी तत्व है इसमें।
पर अन्य तत्व भी हैं, और इनकी उपयुक्तता जानना चाहिए।

थोड़ा सोचना होगा कि पीढ़ियों में आशावादी मन कैसे उतरे।
ढोल-धमाके तो बहुत होते, पर सत्य जन-विकास कहाँ हो रहा?
दुनिया के दर्दों की चिंता है, पर मुक्ति-पथ कौन-कैसे होंगे?
व्यग्रता ज़रूरी है, किन्तु सत्य-चेष्टा ही मंज़िल तक पहुँचाएगी।

किंचित इस नीरव परिवेश में निःशब्दता का यत्न करता हूँ।
क्या इस कॉटेज के ड्राइंग रूम में बैठा मैं मात्र लुप्त-सा हूँ?
जब तक इस वातावरण में पूरा न रमूँ, अंतःस्पंदन जागता नहीं।
और तब तक यह लेखन भी कुछ अधूरा-सा लगता है मुझे।

दीवार पर लटका पंखा घूम रहा, और किंचित शोर स्पष्ट है।
मस्तिष्क थोड़ा भारी-सा है, फिर भी चेष्टा उत्तमार्थ बनी हुई।
यहाँ सागर-तीर की एक प्रातः-ग्रीष्म-उमस आभासित हो रही।
यद्यपि आँखें किंचित थकी-सी हैं, तथापि प्रयत्न तो सार्थक है।

यहाँ बाहर पेड़ों पर बैठे कौओं की काँव-काँव सुनाई दे रही है।
सड़क करीब ही है, उस पर चलते वाहनों का हल्का शोर भी है।
अभी थोड़ी देर पूर्व एक गिलहरी की पैनी किट-किट सुनाई दी।
और चिड़ियों का धीमा चीं-चीं स्वर ऊपर झलकते नभ में घुला।

सूर्य ऊपर से चमकता हुआ भवन व दीवारों पर झलकता-सा है।
वृक्ष-शाखाओं की हरितिमा व धूप के सुनहले रंगों में घुलता है।
गगन-नीलिमा व हरित-प्रकाश का अनुपम संयोग बना हुआ है।
यह सब दृश्य मुझे विभोर करने का शांत प्रयत्न करता रहता है।

चलो, उठी हूक पर विचार करें—दुनिया हेतु क्या दृष्टिकोण हो।?
और हम इसे सकारात्मक रूप से कैसे प्रभावित कर सकते हैं।?
देखो, मैं राजनैतिक तो नहीं होना चाहता अभी इस जीवन में।
पर मन में इतना दर्द रखना चाहूँ कि ठीक कदम उठा सकूँ।

इस स्थल-नीरवता में क्या अद्भुत संभव है, यही खोज रहा हूँ।
रिक्त मस्तिष्क को खंगाल कर कुछ तत्व जुटाने की चेष्टा है।
पर वह सामान-साधन कहाँ से लाऊँ, जो जीवंतता भर दे सबमें।
प्राणियों व जानकारों में एक उत्तम, मधुर स्मृति ही भर जाए।

मुझे लगता है कि यह संसार कुछ सिकुड़ा-सा और संकोची है।
लोग आपस में बधाई देने में भी सकुचाते-से प्रतीत होते हैं।
परस्पर एक अविश्वास-सा है, मन-ग्रंथियों में लोग बँधे हुए हैं।
फिर भी किंचित संवेदना व हर्ष दिखाना चाहिए मनुष्यों को।

ये अनेक पक्षी यहाँ कूक रहे हैं, और मुझे स्पष्ट सुनाई देते हैं।
किन्तु दूर बैठे लोगों को ये नहीं दिखते, और न सुनाई देते।
वे केवल एक कयास लगा सकते हैं, उससे अधिक कुछ नहीं।
बुद्धि-गतिविधियाँ स्वतः हैं, पर प्राथमिकताएँ आगे बढ़ाती हैं।

एक मनुज को बुद्धि-साधन प्रयोग अवश्य करना ही चाहिए।
कैसे वह अधिकतम जनों के जीवन में आशा फूँक सकता है।
जब लोग संगठित होकर निज दशा सुधारने को कटिबद्ध होंगे।
शिक्षा-आयुध ले समरसता-संग संघर्ष करेंगे, तो परिवर्तन होगा।

देखो, दुनिया में एक दमित क्रांति तो सदा ही विद्यमान रही है।
चाहे वह मुखर नहीं हुई हो, प्रतिक्रिया भीतर चलती रहती है।
जन अपने ऊपर हुए व्यवहारों का उत्तर अंतः-अग्नि से देते हैं।
कम-से-कम वे अनुभव तो करते हैं, और वही आगे बोलता है।

जनसंख्या का मुख्य भाग अब भी दमित-दलित-सा जीता है।
उपेक्षा, दीनता व भेदभाव से झूझता हुआ आगे बढ़ना चाहता।
तब क्यों न लोगों में एक सकारात्मकता उदित हो कि वे सुनें।
अन्यों के कुछ कटु मनोभाव भी धैर्य से ग्रहण ही कर सकें।

अतएव वे अपने मन की भी कह दें, और मन हल्का हो जाए।
एक-दूसरे को इस विश्व की आवश्यकता समझ में आने लगे।
जब लोग परस्पर-भावना को खुलकर समझेंगे, तो आदर करेंगे।
सब ओर के उत्तम साधन स्वयमेव निकट उपलब्ध होने लगेंगे।

अंतर्विरोधों से स्वयं को बाहर निकाल पाना थोड़ा कठिन है।
अपने को अभेद्य न कहूँ, पर कुछ सुदृढ़ अवश्य बनाना।
एक की अंतःशक्ति इतनी हो कि आदर स्वयं उपस्थित हो।
तब लोग स्वयं आगे आकर प्रेरणा लेंगे, यह भी आवश्यक है।

जीवन में सम्मान व बहुजन-हितार्थ बड़ा काम करना पड़ता है।
अपने को शंका-कटघरे से बाहर निकालना भी सीखना होगा।
लोग शीघ्र स्वीकार नहीं करेंगे—यह मानकर चलना चाहिए।
किन्तु जब तुम चमकोगे, तो स्वयमेव उजाला बढ़ता जाएगा।

देखिए, हर मनुष्य का अपना भी एक पक्ष अवश्य होता है।
जब तुम समर्थ हो, तो अन्यों को प्रेरणा देने की भी सोचो।
कुछ न कुछ को तो अवश्य लाभ होगा, यह मानकर चलो।
व्यक्तित्व सकारात्मक है, तो संदेश बहुत दूर तक जाएगा।

कलम कुछ ताकत देती है मनोद्गारों की अभिव्यक्ति हेतु।
उसका प्रयोग करो, लोगों को सम्यक् गति और जागरण दो।
अपने को कभी असहाय ही मत समझो, यह उचित नहीं।
संकीर्णताएँ स्वयं-स्थापित हैं, हटाओ, अधिक श्रेयस्कर बनोगे।

आज डॉ. अंबेडकर के जन्मदिन का यह स्मरणीय अवसर है।
वे स्वयमेव एक संपूर्ण चेतना-मूर्ति बनकर हमारे सम्मुख हैं।
उन्हें कैसे सर्वोत्तम स्मरण ही करें—यह प्रश्न भीतर उठता है।
जब हर समाज-अंश में स्वाभिमान-समन्वय का संगम होगा।

अशिक्षा, कुपोषण और भेदभाव से रहित समाज आगे बढ़ेगा।
सभी पूर्वाग्रह छोड़कर लोग एक विकास-पथ पर अग्रसर होंगे।
आरंभ में कुछ खिंचाव व समायोजन भी थोड़ा कठिन लगेगा।
किन्तु बिना विचलन के लक्ष्य-पथ पर चलना ही सच्चा होगा।

देखो, जमाना बड़ा बदल रहा; जनता के जेहन में हलचल है।
वह अपने ढंग से अपनी अवचेतन अपेक्षा व्यक्त कर रही है।
अनेक बुद्धिजीवी समाज में जागृत हैं, शिक्षित व सजग भी।
जो गहन तथ्यों की तह तक जाने की बड़ी क्षमता रखते हैं।

अब जैसी भी सबकी स्थिति शासन-तंत्रों के समक्ष प्रस्तुत है।
बहुजन भी अपनी बात कहते, शासन को सुनना पड़ता है।
माना कि व्यक्त-शैली निश्चय से अत्युत्तम ही न हो सकती।
तो भी विकास-चेतना अवश्य है, और यात्रा ठीक दिशा में है।

आओ, सब इस चेतन-समृद्धि को और विकसित-विस्तृत करें।
अपना सर्वोत्तम इस जगत में प्रस्तुत करना भी आवश्यक है।
यह जीवन इस विश्व की संपत्ति है, अतः इसका सुप्रयोग हो।
तभी अनेक जीवनों में इससे सकारात्मक प्रविष्टि संभव है।

नर-जन्म की सार्थकता स्व-जागरण व जग-उजास भरने में है।
तब समन्वय, संवेदना व शुभचिंतन से पथ अधिक प्रशस्त होगा।


शिक्षा : सच्ची चेतना वही है जो स्वयं को जाग्रत करे, दूसरों को आदर दे, और समाज में समरस उजाला फैलाए।


पवन कुमार,

8 जुलाई, 2026, मंगलवार, समय 1:55 बजे अपराह्न 

(मेरी चेन्नई डायरी 14 अप्रैल, 2023, शुक्रवार, 8.33 बजे प्रातः से )


Sunday, 5 July 2026

समय, स्वभाव और सत्कर्म

समय, स्वभाव और सत्कर्म


यह काव्य-रचना मनुष्य को समय-बोध, आवश्यक कर्म, सजगता, अनुकूलन, पात्रता, सेवा और विनम्र कर्मशीलता की दिशा में ले जाती है। जिव्हा, पानी, गरम लोहा और अक्षय पात्र जैसे बिंबों के माध्यम से यह बताती है कि जीवन में केवल विचार नहीं, बल्कि सही समय पर किया गया संतुलित कर्म ही सार्थकता देता है। रचना का मूल स्वर यह है कि मनुष्य को परिस्थिति के अनुसार लचीला, भीतर से पात्र, और बाहर से सतत प्रयत्नशील बनना चाहिए, ताकि वह अपने जीवन को और इस जगत को थोड़ा बेहतर बना सके।

एक मनुज को आवश्यक कर्म समय पर निबटा लेने चाहिए,
प्राथमिकता अनिवार्य और महत्त्वपूर्ण कार्यों की ही उचित है।

समय पर कर लिया काम सदा उत्तम और फलदायी होता है,
घटा-बढ़ाकर, नफ़ा-नुकसान भूल, आगे बढ़ जाना हितकर है।
दुनिया में सब भाँति के आयाम निरंतर चलते ही रहते हैं,
हर तरह का महँगा-सस्ता सामान भी बाज़ार में मिलता है।

अब आपकी समझ व जानकारी की भी एक सीमा होती है,
कहीं न कहीं ठहरकर मनुष्य को निर्णय लेना ही पड़ता है।
मैं कहता हूँ, यह होना भी चाहिए; अटके रहने से कुछ नहीं,
थोड़ा साहस भी दिखाना पड़ता है, तभी राह आगे है खुलती।

अन्य आपके हेतु स्वयं से न आएँगे, यह समझना होगा भी,
अपनी स्थिति पहचानकर पहले स्वयं ही पहल करनी होगी।
दूसरे लोग केवल कुछ सीमा तक सहायता भर कर सकते हैं,
जीवन का पथ और भार अंततः खुद ही सँभालना होता है।

सुबह विचार आया था कि लेखन-कर्म हर समय हो सकता,
पर व्यवहार में वह वैसा हो नहीं पाता, रुक-रुक है जाता।
चौबीसों घंटे कोई एक काम करता भी तो रह सकता नहीं,
समय मिले तो फिर कर लेना—यही है सच्ची जीवन रीति।

माना अभी न कर सके, फिर अवसर मिलने पर कर लेना,
माना दोनों समयों में विचारों का रंग कुछ अलग ही होगा।
जीवन का हर पृष्ठ अद्वितीय है, हर पल परिवर्तनशील है,
अतः रचना भी पृथक बनेगी, उसका स्वर भी नया होगा।

तो अपनी क्षमता समझकर, जो जिस समय संभव हो सके,
अत्युत्तम प्रयास संग अपना कार्य कर लेना ही उचित है।
पूर्णता की प्रतीक्षा में बैठकर अवसर व्यर्थ नहीं करने होते,
जो हाथ में है, उसी से आरंभ कर लेना अधिक हितकर है।

मनुष्य-स्वभाव जिव्हा-सा हो—लचीला, सजग और संयमी भी,
पैने, बलयुक्त, काटने-पीसने वाले दाँतों के निकट ही रहती।
कभी नहीं वह उनके कार्य-प्रवाह में आकर बाधा ही बनती है,
पीछे रह, अवसर पाकर, शांति से सब रस-अनुभव करती है।

बड़े लोग कहते हैं, कि कुदरत आपसे खुद काम करा लेती है,
तुम्हारे समय को सीधा करती, परेशानियों से भी बचाती है।
पर अपनी भीरुता, असमंजसता व निकलो आलस्य से बाहर,
यदि तुम एक कदम चलो, वह निभाती है दस कदम साथ।

बहुत बार परिस्थितियाँ अपने आप ही सुधर रही होती हैं,
बस तुम एक मृदुल स्वभाव रखो, लोग सहयोग भी करेंगे।
अपने भीतर पहले पात्रता व ग्राह्यता रोपण करनी है पड़ती,
निज लोहा गरम रखना पड़ता, चोट से आकार बनता तभी

ताओ-ते-तिंग में लाओत्से पुरुष को पानी सा बनने कहते हैं,
जो अपना रास्ता स्वयं बनाता है, रुककर भी रुकता नहीं।
जिस भी पात्र में रखो, वह वैसी ही आकृति अपना लेता है,
छोटी-छोटी दरारों में से भी अपनी एक राह बना लेता है।

वरना वह बाहर बह निकलता, ढलान ओर स्वयं बढ़ जाता,
और नदी से जुड़कर अंततः समुद्र तक पहुँच ही जाता है।
अन्यथा वाष्प बन कभी ओस का सूक्ष्म रूप धारण करता,
कभी बादल बनकर फिर वर्षा-रूप जमीं पर उतर है आता।

असली अर्थ, आदमी को समय-चिन्ह पहचानने आने चाहिए,
जब समय सीधा हो रहा, तो प्रभु का नाम लेकर शांत रहें।
अपने से जो भी अन्य की सेवा हो सके, न झिझकें कदापि,
आज अक्षय तृतीया है, कहते हैं पात्र रिक्त होता न कभी।

जब लेना जानते हो, तो देना भी अवश्य जानो इस जग में,
लेना-देना भी एक उत्तम और एक संतुलित विश्व-नियम है।
प्रसन्नता से किए गए काम की महत्ता दुगुनी हो जाती है,
और जितना भी श्रेष्ठ कर सको, नम्र होकर करते ही रहो।

इस मन-देह से महत्तम संभव कर्म करते रहना ही उचित है,
विश्व को बेहतर स्थल बनाने को सतत प्रयत्नशील रहना है।
यहाँ जीवन का सार यही है —कर्म, विनय, सेवा और सजगता,
इन्हीं से मनुष्य अपना वजूद होने को सच में सार्थक करता।

 

नैतिक शिक्षा : जो मनुष्य समय को पहचानकर, विनय, सेवा और सजग कर्म के साथ चलता है, वही अपने जीवन को सार्थक और जगत को थोड़ा बेहतर बना पाता है।


पवन कुमार, 

5 जुलाई, 2026, रविवार, समय 9:44 बजे रात्रि   

(मेरी चेन्नई डायरी दि० 22 अप्रैल, 2023, शनिवार, 7:49 बजे प्रातः से)

Wednesday, 24 June 2026

कर्तव्य की साधना

कर्तव्य की साधना 


यह गद्यांश जीवन-निर्वाह, दायित्व, प्रशासनिक जटिलताओं और मानवीय संवेदनशीलता के बीच उत्पन्न तनाव का गंभीर चित्र प्रस्तुत करता है। इसमें लेखक यह दिखाता है कि जीवन अनेक प्रकार की बाध्यताओं, निर्भरताओं और अवरोधों से भरा है, फिर भी मनुष्य—विशेषतः एक उत्तरदायी अधिकारी—को सकारात्मक रहते हुए, निरीक्षण, प्रेरणा, अनुशासन और धैर्य के सहारे कार्यों को आगे बढ़ाना होता है। यह केवल व्यक्तिगत व्यथा नहीं, बल्कि कर्तव्य-बोध, नेतृत्व और व्यावहारिक जीवन-दर्शन का लेख है।

जीवन-निर्वाह के क्रम में चलते-चलते कभी-कभी किंचित मायूसी भी छा जाती है। मन किसी एक विषय से जुड़ना चाहता है, किंतु अनेक बातें मनुष्य को जकड़े रखती हैं और आगे बढ़ने से रोकती हैं। लगता है जैसे जीवन कुछ ठहर-सा गया हो, विशेषतः तब, जब संबंधित लोग अपनी जिम्मेदारियों के प्रति उदासीन दिखाई देते हैं, पूछने पर भी कोई स्पष्ट उत्तर नहीं देते, अपने अपेक्षित संसाधन नहीं सजाते, सब वायदे खटाई में डाल देते हैं, अपने और अन्यों की प्रतिष्ठा की परवाह नहीं करते। अपने से संबंधित कार्यों के दोषों को भी नहीं देखते, केवल वित्तीय प्रबंधन और लाभ-हानि की योजनाओं में ही व्यस्त रहते हैं, आदेश के पालन में भी विश्वास नहीं रखते, और अनेक प्रकार की चेष्टाएँ पालते हुए भी काम में वैसी रुचि नहीं दिखाते।

यह जीवन भी अजीब खिंचाव में रखता है; आप जितने चाहे संवेदनशील हो लें, कहीं-न-कहीं यह आपको पकड़ने के लिए हाथ बढ़ा ही देता है। किसी भी क्षण आपकी अस्मिता को ललकार देता है, जब चाहे आपको धकेल देता है, और कर्त्तव्य-निर्वाह में ढील बरतने का दोषी भी ठहरा देता है। आप कहें, समझाएँ, अपनी बात रखें, फिर भी यह अपनी बाध्यता प्रकट कर ही देता है। इसलिए जीवन एक चक्रव्यूह-सा प्रतीत होता है, जो सामने और परोक्ष, दोनों प्रकार की गुत्थियों को सुलझाने के लिए पूरी ताकत चाहता है।

किंतु पंछी को उड़ने के लिए पंख फड़फड़ाने ही पड़ते हैं, मछली को तैरना ही होता है, हिरण को जान बचाने के लिए दौड़ना ही पड़ता है। ड्राइवर को संकरे और भयानक रास्तों से भी गुजरना पड़ता है, लोगों को भीषण सर्दी-गर्मी में भी काम-धंधे पर निकलना ही होता है। माँ को बच्चे को छोड़कर, चाहे उसी के लिए ही, बाहर जाना पड़ता है, और एक पिता को संतान-निर्वाह के लिए दिन-रात खटना ही होता है।

एक अधिकारी के रूप में संवेदनशील होना उत्तम गुण है, क्योंकि इसी से आप अन्य लोगों को झकझोर सकते हैं, उन्हें चलायमान कर सकते हैं, कुछ शुभ करना सिखा सकते हैं, लापरवाही से हटा सकते हैं। आजीविका के उपाय बता सकते हैं, समय पर परियोजनाएँ पूरी करवा सकते हैं, अन्यों की शुभाकांक्षा प्राप्त कर सकते हैं, और उन्हें व्यर्थ के गर्व-भाव से दूर रख सकते हैं।

सरकारें हमें पद व वेतन सुविधा के लिए नहीं, बल्कि कर्तव्य-समर्पण और संभावित समस्याओं के समाधान के लिए देती हैं। यदि समय पर उत्तम निरीक्षण हो जाए, तो आगे की दिक्कतें कम हो सकती हैं; अन्यथा बाद में पछतावा ही शेष रहता है।

मैं मानता हूँ कि परियोजना-कार्यों के निष्पादन हेतु अनेक आगम जुटाने पड़ते हैं। वित्त एकत्र करना पड़ता है, बाहर वाले नकद माँगते हैं, सामान समय पर नहीं भेजते, और कोई सहज विश्वास नहीं करता। संभव है, उन्हें भी आगे से कुछ जुगाड़ करना पड़ जाए। इस जगत में परस्पर निर्भरता इतनी अधिक है कि कोई भी काम समय से और ठीक प्रकार से हो नहीं पाता।

जीवन हमें सिखाना चाहता है, पर हम अनेक बार जड़त्व में पड़े रहते हैं; तब कोई बाहरी बल हमें धक्का देता है। जैसे न्यूटन के द्वितीय नियम में होता है, वैसे ही जीवन भी हमें चलाता है; अपना कोई स्थायित्व नहीं है, अतः जैसे धकेल दिया जाता है, वैसे ही चल पड़ते हैं।

तथापि, अपने को सकारात्मक रखना है; एक वरिष्ठ होने के नाते सबमें विश्वास भरना है, कृपा से अपना मस्तक भी ऊँचा रखना है। काम आगे बढ़ाने हैं, रुके हुओं को आगे करना है, अपने को काम का बनाना है, नुकसान कम करना है, और यथासंभव शांति बनाए रखते हुए आयाम संपन्न करा लेने हैं।

अतः, कृपया अपने विषयों को संभालते हुए कुछ करके दिखाइए; बीच की अवस्थाएँ आती ही हैं, पर आशा है कि प्रेम, धैर्य और संतुलन से आप इन सबसे निकल जाएँगे।

मर्म-पंक्ति : जीवन की जटिलताओं के बीच भी जो व्यक्ति धैर्य, संवेदनशीलता और कर्तव्य-बोध बनाए रखता है, वही अंततः अपने काम को सार्थकता और अपने जीवन को गरिमा दे पाता है।


पवन कुमार,

24 जून, 2026, बुधवार, समय 11:29 रात्रि  
(
मेरी ब्रह्मपुर डायरी दि०  24 सितंबर, 2024, मंगलवार, समय  10.10 प्रातः से)


Saturday, 13 June 2026

संध्या-वेला में स्वान्वेषण

संध्या-वेला में स्वान्वेषण


यह कविता एक साधारण संध्या-क्षण से आरम्भ होकर आत्ममंथन, बोरियत, प्रेरणा, सामाजिक चेतना, आध्यात्मिक प्रवृत्ति और सकारात्मक परिवर्तन की आकांक्षा तक पहुँचती है। इसमें निजी मनोदशा धीरे-धीरे लोकचिन्ता में रूपान्तरित होती है, और कवि अपने सीमित अस्तित्व के भीतर भी कुछ सार्थक, जाग्रत और उपयोगी करने की इच्छा व्यक्त करता है।

 मनुज-सृजनशीलता सदैव तो एक सम नहीं, हमें सकल क्षीणताऐं दिखती हैं समक्ष

भिन्न प्रक्रिया-तापों से गुजर, अग्रचरण हो विचारित-लक्ष्य चूमने में लगता है समय। 

 

लेखन-शैली पटरी पर आने में समय लेती, मनुज-मस्तिष्क कभी उबाऊ सा दिखता

गुणवत्ता-उत्पादकता अति न दर्शित, समय काटना मजबूरी व सब निरर्थक लगता।

आत्म-श्रेष्ठता के वहम भग्न होते, हस्तप्राप्य परियोजना में प्रगति होती नहीं दिखती 

अंततः मन को समझाना ही पड़ता है, एकांतता-स्थिति की कीमत चुकानी पड़ती। 

 

पर नर को अमुक समय बिताना पड़ेगा, हाँ श्रेष्ठता चिन्हित कर सकता क्षणों में 

'भागते चोर की लंगोटी सही', यानि यथासंभव महत्तम लाभ लेने की ही सोच लो। 

मैं भी अति उत्पादक न वर्तमान सायं-क्षणों में, मात्र बोरियत-क्षण पाटने का यत्न 

बालकॉनी में कुछ देर खड़ा होकर आया, दूर कहीं वर्षा हुई है, यहाँ भी हो शायद।

 

मनुज को सत्य-शुभ विचारना चाहिए, गुणवत्ता देगा प्रक्रिया से कुछ उत्तम निकल

अब बारिश शुरू, बालकॉनी-द्वार खुला, मैं बेड पर लेटा, देह-भार है कुहनियों पर।  

फर्श पर बिछी चादर पर डायरी रखी, दृष्टि पृष्ठ पर, व पीछे-दाएँ रोशन हैं दो बल्ब 

एक उत्तम मनन जँच जाए व कलम कर्म करने लगे, तो कुछ कालजयी हो रचित।

 

हाँ, शुभेच्छा तो सदा उत्तम, संसार चलता स्वयं व विश्व प्रति सकारात्मकता रखने से 

एक अक्षुण्ण सत्य कि वातावरण-अनुरूप ही मन-बुद्धि के भी मौसम बदलते रहते हैं।

एक काल भिन्न जग-स्थलों पर सब समय, धूप-छाँव, रात-दिवस, प्रातः-शाम हैं होते 

सब तरह के विषय-संदर्भ लोगों के समक्ष होते, अच्छे-बुरे काम सब होते ही हैं रहते। 

 

अब बारिश बंद किंतु अँधेरा, मन जमाने हेतु इस संध्या-वेला में स्वान्वेषण-प्रयास है   

दायित्व तो निभाना, चाहे आगे का कुछ पता नहीं, पर चलेंगे तो कुछ दिखने लगेगा।

कोई भी समस्या अंतिम न, बीच में अन्य आ जाती, सुलझाने में लगता है कुछ समय  

हल तो प्रायः जटिल ही, तब मात्र प्रतीक्षा कर सकते, या मूड बदलने हेतु करते कुछ।

 

मैं भी विरला न, पर कुछ योजना समर्थ, सुंदर जग-निर्माण में मेरा भी हो कुछ हाथ 

चाहे अतिलघु तत्व, 'ऊँट के मुँह में जीरा' कर्त्तव्य ही, माना कि नितांत है अपर्याप्त। 

सुस्त न रहना चाहता, ढोल बजाते रहना, निकट परिवेश में गूंज चाहे अल्प ही प्रभाव  

'डूबते को तिनके का सहारा' भी बन सको तो उत्तम, नित्य अनेक सुलझते हैं आयाम।

 

उत्तम बुद्धि-सेटिंग एक स्वाभाविक वरदान, बलात न किंतु प्रयास तो पथ दिखाएगा ही

प्रथमतया जड़त्व से लड़ना होता, आगे तो खुद सहारा देकर कुछ उम्दा करवा लेती। 

बीच में आ कुछ प्रेरणा दे जाती, स्मरण करा देती, एक अप्रतिम करवा देती साक्षात्कार

'मन चंगा तो कठौती में गंगा' जैसा दृष्टांत बनाती, मन में उदित होने लगते हैं शुद्ध भाव।

 

पहले ऋषि-मुनि वनों में प्राय: एकांत वासी थे, पर सदैव मनन में तो नहीं सकते रह 

आज भी अनेक लोग एकस्थ हो ध्यान लगाते, भीड़भाड़ से कहीं दूर एकाकी होकर।

पर उनके अंतः में भी बोरियत-क्षण आते होंगें, पाटन हेतु कुछ उपाय करते ही होंगे

माना अनेक जुझारू देश-दुनिया के संदर्भ ढूँढकर समस्या-पाटन में व्यस्त हैं रहते।

 

शांत कविचित्त तो न बहुमुखर हैं, प्रायः गृह-निवास ही जबतक न अत्यावश्यक 

तो वे करें भी क्या, जब प्रसन्नता हेतु, पर्याप्त सामग्री मिल जाती हैं अपने निकट।

यह भी कि हम पूर्वजों को सुमर सकते, वे कभी हमारी भाँति चलते-फिरते पुर्जे थे

किंतु काल ने उनको सब भाँति ग्रास बना लिया, अब मात्र शेष स्मृति अंतः में है।

 

क्या जीवन मात्र स्वयं में व्यतीत करने हेतु है, अथवा इसे चलायमान भी करें कुछ

क्या इसे कुछ योजनाबद्ध कर सकते, अभ्यास से देह सौष्ठव-स्वस्थ सकती है बन।

मस्तिष्क माना शरीर का ही एक भाग, किंतु मुख्यतया विचार में ही बीतता काल   

अब उनसे कैसे पूरा काम  लिया जाए, पूर्णतः तंदरुस्त होंगे तो करेंगे ही शुभ काम।

 

प्राचीन व वर्तमान में भी लोग संध्या-उपासना करते, मन-साधन का करते प्रयास 

शाम को मंदिरों में पूजा-प्रार्थना, लोग आँखें मूंदकर निज ईश में लगाते हैं ध्यान।  

मन को कुछ शांति सी भी मिलती, परिवेश एक ध्यान लगाने हेतु होता है उपयुक्त 

मनुष्य ईश-सान्निध्य से गौरवान्वित होते, वे अपनी मन की इच्छाएँ भी लेते हैं कह।

 

भारत में बहु मंदिर-मस्जिद, चर्च-गुरुद्वारे, धार्मिक अनुष्ठान-प्रार्थना वहाँ पूरी होती 

सेना, पुलिस पैरा-मिलिट्री बलों के कैंपों में लोग पूजा-गृह बना लेते, प्रार्थना चलती।  

लोग प्रातः-शाम मंदिर जाते दिखते, हाथ में पूजा की थाली लिए कुछ अर्पित करने। 

 

लोग स्वयं में पुण्य भाव लिए हो सकते, किंतु पूर्वाग्रह रहता समाज-घटकों के प्रति  

काल संग सोच भी परिवर्तन, सर्व-प्रतिनिधित्व की बात होती, किंतु सबको न जँचती।

सहस्र वर्षों के दुराभाव लेकर हम डोल रहे हैं, मात्र कुछ जन-विभिन्नताओं के चलते 

आज के वैज्ञानिक युग में भी क्यों मनुष्यों में भेदभाव, यही बड़ा सबसे विरोधभास है।

 

दुनिया एक अद्भुत परिवेश, नेताओं द्वारा अनेक समता-आंदोलन चलाए जाने जरूरी 

समाज-सुधार की तो प्रतिकोण होना चाहिए, क्यों अंत्योदय-वार्ता हों बस चुनावों में ही। 

हर जीवन-क्षेत्र में सबसे गरिमापूर्ण व्यवहार हो, और सबसे एक सहोदर सम व्यवहार  

सब नर ससम्मान रहे, लोक सोच सकारात्मक, उत्तम-समतापरक शिक्षा पाएं बालक। 

 

मात्र मन में विचारता, बाह्य तो नहीं अति प्रसारण, कुछ धरातल पर भी बदलाव हों  

इतनी शक्ति-साहस देह-बुद्धि में कि बाहर निकलकर कुछ आयाम उचित कर दो। 

साहसी पुरुष ही धरातल पर सत्य समाज सेवा करते, निज बात बेबाकी से कह देते  

संबंधित तंत्रों से वार्ता करते हैं, अन्य-अपेक्षाऐं भी ध्यानते, और कुछ लाभ भी ले लेते।

 

कुछ कवि-लेखक, पत्रकार-विचारक तंत्रों से डरे रहते, सत्य कथन कहने से घबराते     

किंतु कई तो स्पष्ट कह देते, मनुष्यों में साहस-प्रेरणा भरते, किंचित बदलाव होता भी। 

सब डर-छुपकर न बैठते, सशक्त तंत्रों से नित संघर्ष करते, अंततः विजय पा लेते ही   

लेकिन पीछे सशक्त संगठन बनाना होता, धन-बल जुटाना व प्रखर सोच बनानी होती।

 

जो भी सकारात्मक परिवर्तन इस जगत में दर्शित हैं, वे घर से बाहर निकलकर ही हुए   

स्वयं में जितने भी अच्छे हों, लाभ देश व समाज को भी मिलना चाहिए, सार्थकता तभी। 

घर में बोर रहना निश्चितेव अकर्मण्यता-परिणाम है, कुछ व्यस्तता भले उद्देश्यों हेतु हो  

आपसे कुछ अपेक्षाऐं हैं: देह-क्रिया बढ़ाओ और यदि जरूरी हो तो समस्याओं से जूझो।

 

सब परिस्थितियों से निपट, समाज में एकता बनाकर आत्म-सशक्तिकरण करना चाहिए

सब समाजों में सबल नेतृत्व उदित हो, सबके साथ बैठकर महत्वपूर्ण  मुद्दों पर बात करें 

यहाँ ऐसे आर्थिक-सामाजिक-ऐतिहासिक-धार्मिक, क्षेत्रीय, प्रकृति आदि अनेक संदर्भ हैं।  

विकासवाद में मानव एक इकाई है, जैसे बंदर-रीछ-शेर-मगर-जिराफ़-हिप्पो और गेंडे हैं 

पुराणों की अद्य वैज्ञानिक सोच अनुरूप पुनर्भाषण-अनिवार्य है, लोग परस्पर पास आएंगे।

 

फिर जैसा समझ में आया, लिख दिया, किंतु एक बड़ी सोच से अनेक अधूरे कार्य पूरे करने 

निज समय-सदुपयोग से जीवन विराट होना चाहता, आत्मा-बुद्धि का सहयोग अपेक्षित है। 

आशा है ऐसा ही होगा।  

  

पवन कुमार,

13 जून, 2026, शनिवार, समय 3:45 बजे अपराह्न 

मेरी ब्रह्मपुर (ओडिशा) डायरी दि० 22.09.2024, रविवार, समय 5.05 बजे अपराह्न