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Thursday, 21 May 2026

पथिक-प्रबोध

पथिक-प्रबोध


यह कविता जीवन-पथ के साधक के लिए एक सजग, साहसी और व्यवहारिक संदेश है। इसमें संसार की असमतलता, स्वार्थजनित अवरोध, आत्मबल, विवेक, संगठन, व्यवहार-कुशलता और अंततः अंतः शांति—इन सबका सुंदर समन्वय है। कविता केवल संघर्ष का आवाहन नहीं करती; वह यह भी सिखाती है कि बाहरी जीत-हार से ऊपर मन की शांति, संयम और युक्तिपूर्ण आचरण ही स्थायी कल्याण का आधार हैं।

ओ पथिक ! तुम डगमगा न जाना, अग्रिम पथ बहुत है असमतल

नेत्र खोलकर ही चलना, वरन उलझाने को मिलेंगे अनेक भ्रामक।

 

माना तुझसे किसी को नहीं निजी विरोध, पर स्वार्थ तो रहते ही हैं,

यदि तुझे अपनी बाधा मान बैठें, तो हटाने के यत्न भी होते ही हैं। 

यह तंत्रों से अनबन भी है; अपनी प्राथमिकताएँ उन्हें अधिक प्रिय

या उनके मनोरथों में सहयोगी बन जा, या हट जा एक ओर स्वयं।


अपनी गली में श्वान भी शेर-समान, स्वामी मानते हैं अपने को

पर क्यों निज दशा दयनीय करते, जबकि जानते हो परंतप हो। 

तुझमें शक्ति है एक अप्रतिम विवेक की, कुंडलिनी तो जगे बस

महावीर-सी चित्तशक्ति एकत्रित कर, जग बली को ही देता पथ।

 

घबराने का नहीं कोई कारण, निज शक्ति का उचित प्रयोग करो

माना साधन अल्प ही हों, किन्तु उन्हीं को एकमुष्ट कर श्रेष्ठ बनो। 

अपनी प्रतिष्ठा हेतु महद् प्रयास करो, संगठन को सर्वोपरि रखो

आत्मा को कभी दमित न होने देना, प्रयत्न करो व अन्त्यज न बनो।

 

जब अवरोध आए तो कुछ बल लगा, पार हो जाएगा सहज ही

जिनका अपना मन जीतने का होता, वे कुछ मार्ग लेते हैं ढूँढ़ ही। 

सुहृद, स्मितमयी चित्त सर्वप्रिय होता, सब उसको पास हैं बुलाते

भिन्न प्रकृति-जन यदि विरोधी लगें, हटें शीघ्र तो भी अच्छा मानो।

 

सबको प्रसन्न करना दुष्कर है; ऐसा विचार प्रायः ही आत्मघाती

पर युक्ति से अपरिहार्य विरोध टालना, है व्यवहारिक समझदारी। 

किसी के अति अंदर नहीं घुसो, न बाहर ही फेंको उसे मक्खी-सा

दादा छाजुराम ऐसा आचरण चाहे थे, सुना बड़ों-परिजनों से ऐसा।

 

यह दुनियावी मध्यम मार्ग है, इससे कुछ गुज़ारा हो जाता बस

किन्तु इस आर-पार की लड़ाई में तो हार-जीत दोनों हैं संग। 

यदि विजयी हुआ तो पृथ्वी-सुख भोगेगा, लेकिन मिट भी सकता,

पर उससे बढ़कर मन को शांत रख; तेरा कल्याण उसी में बसता।

 

पवन कुमार,

21 मई, 2026, वीरवारसमय 11:37 रात्रि

(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी, 16 जुलाई, 2015, वीरवारसमय 8:58 प्रातः)


Tuesday, 27 January 2026

शाश्वत निरुपण- लोकार्पण

प्रिय मित्रवृंद, 

अति हर्ष का विषय है कि 23 जनवरी, 2026 के वसंत पंचमी के पावन दिवस पर मेरी चतुर्थ पुस्तक 'शाश्वत निरूपण - एक समन्वित स्पन्दन', 'M/s Big Foot Publications, Gurugram' के माध्यम से लोकार्पण हो गई है। 134 कृतियों का यह रूचिकर काव्य-संग्रह अनंत संभावनाऐँ लिए, स्वयं को सज्जित करने और आत्म को सदा नवीन रखने की उद्घोषणा लिए है। आशा है कि यह प्रबुद्ध पाठकों के आत्मिक उत्थान में सहभागी बनेगी, तथा साथ में हिंदी साहित्य की समृद्धि में भी यथोचित योगदान करेंगी l इससे पूर्व मेरी तीन पुस्तकें ‘महाकवि कालिदास विरचित', 'कादंबरी', तथा 'अन्वेषी यायावर - एक सतत प्राण प्रवाह' सफल व लोकप्रिय प्रकाशन हैं। अनुरोध है कि वे स्वयं पढ़ें, कमेन्ट करें, और अन्यों में परिचालित करें I 🙏🙏🙏

सादर - पवन कुमार, लेखक। 🙏🙏

पुस्तक निम्न लिंक पर उपलब्ध है l

https://amzn.in/d/hywBUIr

Wednesday, 24 September 2025

मनुवा पथिक

मनुवा पथिक


यह कविता बाहरी दुनिया की भाग-दौड़ में उलझे मन और आत्मा से एक गहरा संवाद है। इसमें पथिक के रूप में जीवन की जटिल भूल-भुलैया में भटके हुए हर उस व्यक्ति को संबोधित किया गया है, जो अपने भीतर के प्रकाश की तलाश में है। यह रचना हमें याद दिलाती है कि जीवन एक बेशकीमती हीरा है, जिसे व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए, बल्कि आत्म-विकास और कृतज्ञता के साथ आगे बढ़ना चाहिए। यह हमें स्वयं को सुघड़ने और ज्ञान का वाहक बनने की प्रेरणा देती है ताकि हम न सिर्फ अपनी बल्कि दूसरों की दुनिया भी बेहतर बना सकें।


ओ पथिक, देख इन जग की भूल-भुलैया में ही न बस उलझे रहना, 

यहाँ बहुत से बेहतर गुणी आयाम हैं, उनसे भी परिचित होते रहना।


देखो ये जीवन-समस्याएँ तो हमारे रोज का अंग हैं, वे आती ही रहेंगी, 

तू अपना भी कुछ मूल्य बचा कर रखना, इन्हीं में सकल न गँवा देना। 

मन को तू उच्चतम अध्ययन में लगाना, कुछ आत्म-विकास हो सके, 

किंचित निकट प्रकाश हो जाए, अतः तू अपना बल्ब रखना जला के।


ओ पथिक, बावरा क्यों है, दिन-रात संवादों में उलझा रहता बस एक से? 

बाहर तो आओ, सूर्य का उजाला मिलेगा, उपवन-कुसुम मुस्काते मिलेंगे। 

नभ में खग-वृंद उन्मुक्त विचरते हैं, तरु-डालों पर चिरैया गाती मिलेंगी, 

जल में मीन साम्राज्य बनाए तैरती, वन्य-जीव स्वच्छंदता से रहते मिलेंगे।


ओ राही, गगन में मेघ-समूहों का सौंदर्य देख, विभिन्न वर्णों में वलय बनाए, 

कार्य पृथ्वी को सिंचित करने का मिला, अतः सबकी आकर प्यास बुझाए। 

निराश न हो बस चलते रहते, मुस्काते-इठलाते, हल्का या भारी भार उठाए, 

जैसी स्थिति बरत ली, गाते-गरजते, तड़ित चमकाते, शाश्वतता संजोए सी है।


ओ मनुवा, दुनिया इतनी निराश न, सब थपेड़े खाकर भी चलती ही रहती, 

एक हानि को भूल सहज हो जाती है, जानती कि सब कुछ निज हाथ नहीं। 

फिर अनेकों तो परवाह भी नहीं करते हैं, चाहे सारी दुनिया ही हिल जाए, 

बस उनकी अपनी त्वचा बचनी चाहिए, फिर चाहे जगत भाड़े में ही जाए।


पर तू इतना कठोर भी न बनना, जग को सुघड़ चलाने में सहायक बनना, 

कुछ वजन तो तूने भी सहन करना, आखिर यहीं का तो सब कुछ है खाता। 

कुछ कृतज्ञता तो एक सज्जन में होनी चाहिए, चाहे हो तनिक तकलीफ भी, 

देखो कष्टों से ही तो शक्ति आती है, कब तक झूलोगे माँ के पालने में ही।


ओ पथिक, कुछ तो मुस्कुरा तू, उत्तम छवि बना, पर-निंदा करनी छोड़ दे, 

देखो, हम सभी कहीं न कहीं दोषी हैं, कोई भी तो यहाँ दूध से धुला न है। 

मैं कोई आत्महंता ग्लानि न चाहता तुमसे, अपने को सामान्य मान ही लो, 

सब झंझटों से गुजरते, गिरते-पड़ते, ठोकर खाते, सीखते ही काम के बनो।


ओ पथिक, जीवन बेशकीमती हीरा है, कौड़ियों के मोल न इसे बिकने देना, 

कबीर-एपिक्टेटस, रैदास-नानक, बुल्लेशाह, शाहबाद कलंदर सा निखारना। 

व्यर्थ गर्व व ढकोसलों में कुछ नहीं रखा है, कुछ तो सत्यता खोजो जीवन की, 

कोई न जाने कहाँ कब मिलेगी, किंतु प्रयास करोगे तो शायद मिल सकती।


यह एक कस्तूरी मृग सी हालत है, कि बच्चा बगल में और ढिंढोरा शहर में, 

मृग-तृष्णा में जीव मारा-मारा भटकता, पर पानी तो कहीं मिलता ही नहीं। 

यहाँ फिर किससे जीतना, सब तो पूर्ववत ही हारे, परेशान अपने दुख में ही, 

वे विरले ही मिलेंगे जो गुरु बन सकते, जिन्होंने स्वयं पर कुछ विजय पा ली।


ओ, कभी सहज होकर विचारा करो, संजीदा होने से भी लाभ न कुछ बड़ा, 

माना शुरू में कुछ अधिक चेष्टा लगती, फिर धीरे-२ एक ढर्रा सा बन जाता। 

पर समझ तू बस वहीं ठहर मत जाना, तेरी चेष्टा ही अति सहज रूप में रहे, 

लेकिन वह भी सहायक हो सकती, ध्यान रहे जब तक प्राण तभी तक ज्ञान।


देह-स्वास्थ्य एक अत्यावश्यक नियम है, इसके चलते ही पहुँचोगे मूल तक, 

जितने अधिक अध्ययन-घंटे संग ही बिताओगे, उतनी ही तो आएगी समझ। 

सिख कहते हैं, जो खा लिया वही अपना, जो छूट गया पता न खाएगा कौन, 

अतः तेरा रब तूने ही खोजना है, तुम कहीं भी पड़े रहो, मतलब किसी को न।


ओ पथिक, ज्ञान-वाहक बनकर देख, तेरे सुधरने से ही यह जग भी सुधरेगा, 

कम से कम स्वयं तो लाभान्वित होवोगे ही, प्रयास बस आगे तक ले जाएगा।


पवन कुमार ,

२४ सितंबर, २०२५, मंगलवार, समय १२.४० बजे मध्य रात्रि 

(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी १७ जुलाई, २०१५, शुक्रवार, ९:०४ प्रातः से )  


Sunday, 10 August 2025

जीवन-यात्रा: एक मधुर प्रवाह

                                                      जीवन-यात्रा: एक मधुर प्रवाह


 

जीवन में नर को अनेकों ज़रूरतों से गुज़रना पड़ता, निज कर्म तो अंततः पूरे करने ही होते 

यह संसार मात्र कल्पना नहीं, इसे सत्य धरातल पर बहु आवश्यकताओं के संग जीना होता।

 

हर किसी को हर्ष-शोक, जन्म-मरण, मिलन-विदा, उन्नति-अवनति, जय-पराजय से गुज़रना पड़ता।

जीवन है एक मिश्रित सा खेल ही, पग-2 पर पराजय, हाँ, बीच में कुछ सफलता-किरणें भी दिखतीं।

अनेक समझौते नित करने पड़ते, बीते पर कोई दबाव , ज़रूरी नहीं हर निर्णय अपने हाथ में हो।

बस हमें अपनी कुछ ज़रूरत रुचि अनुसार चुनना पड़ता है, और ज़िंदगी हौले-हौले चलती रहती।

 

अब आदमी को बहु अनुभवों से गुज़रना ही पड़ता, चाहकर भी सब कारक निज अनुरूप कर पाता।

जैसी भी लाभ-हानि की समझ से जीवन निबाहना पड़ता, हाँ, प्रयत्नों से कुछ कारक ठीक भी संवर जाते।

फिर भी कोई अंतिम विधि-न्याय से बच पाता, और कुदरत धीरे-2 बहुत चीज़ें समतल करती रहती।

क्षुद्र चालाकियाँ खेल में बचकानी ही, वह चंचल बालक सा समझ डाँट देती या खिलौना दे बहला देती।

 

हमारा सारा प्रयत्न कोई भी अनहोनी रोकना है, प्राण-स्वास्थ्य सँवारना, आत्म को लाभ में रखना।

कभी समय मिले तो बाह्य वृहद विश्व की भी सोच लेते, लेकिन मुख्य कार्यक्षेत्र अपना अंतःस्थल ही।

निकट विषयों में ही अधिक व्यस्त रहते, चाहे जटिल, उबाऊ, ऊर्जा-नाशक,  धैर्य की परीक्षा लेते हों।

शिकायत भी कर सकते, सकारात्मक हो आशा संजोते, मुस्कुराते से जीवन जी लेते, जो उत्तम ही है।

 

एक क्रीड़ा-स्थल सा यह जीवन प्रकृति-नियमों से चलता, खेल के कुछ पेंच हैं, कभी दाँव ठीक लग जाते।

ये संयोग का ही नहीं मनन-प्रसंग भी, एक को ख़ूब मेहनती, कुशल, खेल-नियम का ज्ञाता होना पड़ता है।

ये सत्य कि कोई व्यक्ति सब आयामों में सदा सफल  होता, उम्र के साथ लचीलापन अल्प पड़ने लगता।

माना अनुभवानुरूप बुद्धि भी बढ़ती, तथापि दैहिक बल कम, अंत में तो तन-मन दोनों क्षीण पड़ने लगते।

 

तथापि अन्यों की चालाकी-युक्ति समझनी पड़ती, कदाचित दूजा हितैषी भी हो, आप जिसे अन्यथा ले रहे थे।

धैर्य नित्य काम आता, निर्णायक काल में तो और भी प्रासंगिक, ज़रा सी सावधानी भी सफलता दिला देती।

कभी लगे कि हमारे साथ कुछ अवांछित ज़बरन हो रहा, किंतु वहाँ आपके स्वागतार्थ बड़े द्वार खुल रहे हैं।

माना एक सीट के कई ग्राहक, पर ज़िंदगी में सबको देर-सवेर कुछ अच्छा प्राप्त, मुस्कान-कारण बनता।

 

चलो सकारात्मकता की कोशिश करो, बीता तो वापस होगा, किंतु जो हस्त-प्राप्य का पूर्ण उपयोग करो।

भविष्य हेतु उत्तम सोचो-करो, हर भाँति के परिणाम, ऊँच-नीच हेतु तैयार रहो, जीवन यात्रा शुभ पूरी होगी।

उपलब्ध का शुक्रिया करो, वो असीम प्रभु-कृपा या प्रकृति माता के विपुल-स्नेह के कारण ही हमें उपलब्ध है।

और समय निज हिसाब से हमें समझाता, आगे बढ़ाता, मानकर चलो अतिशीघ्र नया मुकाम हासिल करोगे।


पवन कुमार,

10 अगस्त, 2025, रविवार, समय 9:50 बजे प्रातः, ब्रह्मपुर, ओडिशा   

(मेरी डायरी 4 मई, 2023, गुरुवार, 8:21 प्रातः, नई दिल्ली से)