संभावना से साधना तक
(एक प्रयासी का आत्मचिंतन)
हाँ, मनुष्य को कुछ तो अपनी भविष्य-चिंता होनी चाहिए,
सोना-जागना, खाना-नहाना तो साधारण नित्य-क्रियाएँ हैं।
दिन और रात बड़ी द्रुत गति से निःशब्द बीत ही जाते हैं,
समय हाथ में रहते उम्र कटती; कुछ अधिक न कमाया है।
यह जगत प्रत्येक मनुज के समक्ष कोई-न-कोई कर्म रखता है,
अनेक प्रस्तुत संभावनाओं में मन प्राथमिकताएँ चुन सकता है।
आवश्यक नहीं कि हम सदा किसी अन्य की ही अनुकृति करें,
अनेक मौलिक आयाम स्वतः उदित होते, बस आरंभ में देरी है।
मनुज को प्रकृति का दर्शन कर उससे सीखना आना चाहिए,
विश्व के सफल चरित्रों से प्रेरित होकर स्वयं को गढ़ना चाहिए।
अपना जीवन सँवारना प्रत्येक व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी है,
विपन्न और अविवेकी दशा में निष्क्रिय रहना भी एक त्रुटि है।
समस्त प्रगति की प्रथम चिंगारी अंतर्मन के चिंतन से उठती है—
क्या मेरी वर्तमान स्थिति से महत्तर भी एक अग्रगमन संभव है?
मेरे पास कितनी शक्तियाँ, कितने साधन और कितनी क्षमता है,
और इन सबका महत्तम लाभ लेने की मेरी समझ कितनी है?
देखो, प्रत्येक बीज में एक पूर्ण द्रुम बनने की संभावना होती है,
कम-से-कम निज प्रजाति, प्रकृति व गुणानुरूप दिशा होती है।
तथापि एक ही मनुष्य-जाति में अनेक विकास-स्तर दिखते हैं,
आर्थिक, सामाजिक, मानसिक व सांस्कृतिक विविध आयामों में।
अपने ही परिवेश, गाँव या कस्बे में अनेक जीवन-स्तर मिलते हैं,
एक ही धरती पर कुछ निम्न, कुछ मध्य और कुछ उच्च उठते हैं।
निश्चय ही अवसर, परिवेश, पुरुषार्थ और रोधक कारक रहे होंगे,
बुद्धि कहीं शिथिल या प्रखर, तो कहीं जागृत अथवा सुप्त होगी।
यह सत्य है कि कुछ जीव स्वभाव से अति महत्त्वाकांक्षी होते हैं,
कुछ मध्यम दशा में सामने उपलब्ध साधनों से निर्वाह करते हैं।
अपने वर्तमान से उन्नयन की प्रबल अभिलाषा ही वह ज्वाला है,
जो मनुष्य को स्व-कल्याण और विकास की दिशा दिखाती है।
मैं नहीं कहता कि हमारा विकास कभी अन्यों की कीमत पर हो,
न ऐसा उत्थान उचित है, जो किसी अन्य का अधिकार हर ले।
परन्तु क्या निष्क्रिय रहकर हम स्वयं-सुधार से विमुख हो जाएँ,
जबकि पुरुषार्थ और सदाचार दोनों साथ-साथ चल सकते हैं?
प्रकृति में वृहद संसाधन, अनेक युक्तियाँ व उदाहरण प्रस्तुत हैं,
एक प्रज्ञ पुरुष उन्हें पहचानकर सदुपयोग करना सीख लेता है।
कोई उपलब्धि तभी सार्थक है, जब दिशा लोकहितकारी भी हो,
और साध्य के साथ उसके साधन भी मर्यादित व शुभकारी हों।
तकनीकी प्रयासों द्वारा गुणों में निरंतर सुधार किया जा रहा है,
कुछ उत्तम गुण-जीन विधिपूर्वक प्रतिरोपित किए जा सकते हैं।
जहाँ कुछ अल्पता, वहाँ उसकी पूर्ति-उपाय खोजे जा सकते हैं,
रोग है तो उपचार भी है; कृत्रिम अंग जीवन-सहायक बनते हैं।
प्रकृति अपनी विविधता में अनेक उत्तमतर आयाम दिखाती है,
प्रश्न यही है कि उनसे महत्तम लाभ किस विधि से लिया जाए।
किंतु प्रगति का मूल्य मात्र सामर्थ्य और वेग से नहीं आँका जाए,
उसमें मनुजता, न्याय, प्रकृति व भावी पीढ़ियों के हित भी समाए।
तुम्हारी अपनी रचना ही तुम्हारी सबसे मूल्यवान कर्म-पूँजी है,
उसकी बाह्य प्रस्तुति एक नित्य प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति है।
दुनिया के अधिकांश लोग तो दूर खड़े बस दर्शक बने रहते हैं,
क्योंकि तुम्हारे संघर्ष में उन सबकी समान रुचि कहाँ रहती है?
अभिभावक, सहोदर व कुछ मित्र ही प्रायः निकट खड़े मिलते हैं,
अन्य लोगों की तुममें या तुम्हारे जीवन में अधिक रुचि नहीं होती।
पर छोटे-मोटे सहारों व सतत प्रयासों से जब कुछ पा ही जाओगे,
लोग श्लाघा करेंगे, पहचान मिलेगी और जीवन किंचित सुधरेगा।
ये सकल कष्ट, पीड़ा, थकन, उपेक्षा, संघर्ष, पराजय व विजय,
इस दीर्घ प्रक्रिया के अलग-अलग पड़ाव और बड़े संकेत हैं।
वे अपने समय पर उदित होंगे एवं युक्ति-प्रयासों से हटेंगे भी,
पर तुम्हें प्रत्येक दशा में आत्मविश्वास अडिग रखना ही होगा।
साथ ही संघर्षरत जनों के प्रति संवेदनशील बने रहना होगा,
क्योंकि प्रत्येक पराजय के पीछे केवल शिथिलता नहीं होती।
कहीं अभाव व अवसरहीनता, तो कहीं अदृश्य पीड़ा रहती है,
अतः सफलता में विनम्रता व दुर्बलों के प्रति करुणा चाहिए।
मेरी प्रखर इच्छा है कि ये राष्ट्र और शासन इतने सबल हों,
कि नागरिक-अधिकारों का आदर और संरक्षण सुनिश्चित हो।
नागरिक भी आत्म-कर्तव्यों के प्रति सजग एवं उत्तरदायी हों,
क्योंकि स्वतंत्रता उत्तरदायित्व संग ही दीर्घकालिक फलती है।
कम-से-कम किसी प्रयासी की अनावश्यक टाँग न खींची जाए,
क्योंकि वही आगे चलकर एक बड़ा प्रेरणा-स्रोत बन सकता है।
इन धृतिवान कर्मयोगियों एवं सबल व्यक्तित्वों ने विश्व बदला है,
मानव-चेतना को नवदिशाएँ देकर इतिहास की धाराएँ मोड़ी हैं।
देखो, परिवेशों में कुछ अदम्य साहसी नर अवश्य जन्म लेते हैं,
दमनकारी कारकों को ललकार, वे प्राण जोखिम में डालते हैं।
माना कि उपहास, द्वेष, घृणा व अन्यायपूर्ण व्यवस्थाएँ सर्वत्र हैं,
फिर भी वे अंतर्मन में पराजय को निकट फटकने नहीं देते हैं।
वृहद मनुजता हेतु समर्पित होकर वे गलत को गलत कहते हैं,
त्रुटिपूर्ण व्यवस्था के सम्मुख सत्य कहने का साहस रखते हैं।
उनके भीतर यह प्रबल विश्वास निरंतर उज्ज्वल बना रहता है—
कि मैं एक विराट और सुखद लोक-परिवर्तन का वाहक हूँ।
जब भी एक मनुज किसी सुदूर यात्रा में सम्मिलित होता है,
उसे स्वयं को एक विशाल श्रृंखला की कड़ी मानना चाहिए।
एक विचार कि मुझसे पूर्व भी अनेक थे, आज भी अनेक हैं,
मेरे गमन-पश्चात भी अनेक होंगे और यात्रा अनवरत रहेगी।
हमें मृदुल आयाम चिन्हन व उनका सहयोग करना चाहिए,
जो समस्त सृष्टि, मानवता और जीवन के लिए शुभकारी हों।
पृथ्वी पर आए हो, तो कुछ भला अपने हिस्से का भी कर लो,
अपना जीवन सूर्य की भाँति प्रकाश बाँटने वाला ही बनाओ।
सुखद है कि अवस्था-वृद्धि के संग ऐसा अनुभव होने लगता है,
मानो यह समस्त मानवता ही इस अंतर्मन में स्थान पा रही हो।
और हम उसी विराट चराचर ब्रह्मांड के अनेक संबद्ध अंश हैं,
साथ-साथ चलते-फिरते, सोचते-समझते व परस्पर जुड़े हुए।
देखिए, जब सुचिंतन जागता है, तो एक उदार धारा बहती है,
जो सहज भाव से सबको अपने साथ लेकर आगे बढ़ती है।
फिर हममें से ही कोई प्रेमचंद, प्लेटो या आइंस्टीन बनता है,
कोई गांधी, अंबेडकर या अन्य द्रष्टा बनकर जग बदलता है।
अब चिंतनार्थ कुछ ऊर्जा एवं समय तो निकालना ही पड़ेगा,
वास्तविक कर्म हेतु प्रतिबद्ध होकर आगे नित बढ़ना पड़ेगा।
समय-संसाधनों के सुप्रयोग की एक रूपरेखा बनानी होगी,
जीवन में अनुशासन व सदाचरण का विकास करना होगा।
यहाँ शर्त है कि जब तक स्वयं के प्रति ईमानदार नहीं बनेंगे,
कोई अन्य अधिक सहायता नहीं करेगा; समय बीत जाएगा।
अतः अपनी बात कहते रहो, कुछ लोग तो अवश्य उसे सुनेंगे,
और शनैः-शनैः तुम्हारे उदार चरित्र का भी कुछ आदर होगा।
जो भी समय व साधन मिले, उनका समुचित प्रयोग करो,
अचेत शिथिल हो स्वयं को गँवाना प्राण के प्रति अन्याय है।
यहाँ चिंतन, विश्राम और आत्म-संवर्धन भी सार्थक कर्म हैं,
इनसे शक्ति, संतुलन और दीर्घ पुरुषार्थ का उदय होता है।
विघ्नों को यथाशीघ्र दूर करने का सतत प्रयास करते रहो,
ताकि क्षमता बढ़े, पथ सुगम हो और तुम्हारा कल्याण हो।
अंतस की संभावनाओं को साधना में रूपांतरित करते चलो,
निष्क्रियता की धुंध हटाकर पुरुषार्थ का दीप जलाते चलो।
ऐसा जियो कि तुम्हारा प्रश्रम स्वयं तुम्हारी पहचान बन जाए,
तुम्हारे होने से यह जगत किंचित और अधिक सुंदर हो जाए।
इस जीवन का श्रेष्ठ प्रतिफल केवल एक उपलब्धि ही नहीं है,
अपितु वह प्रकाश है, जो अन्यों के पथ भी आलोकित करे।
नैतिक संदेश
पुरुषार्थ
करो, पर करुणा और मर्यादा का साथ न छोड़ो।
विकास ऐसा हो, जिससे किसी अन्य का अधिकार न घटे।
ज्ञान, समय व सामर्थ्य का प्रयोग मानवता-कल्याण में हो।
सार्थक जीवन निज संग अन्यों के पथ भी आलोकन में है।
पवन कुमार,
15 जुलाई, 2026, बुद्धवार, समय 7:13 बजे सायं
(मेरी चेन्नई डायरी 25 अप्रैल, 2023, मंगलवार, प्रातः 8:32 बजे से)