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Sunday, 20 September 2026

भाई-भाई

 भाई-भाई

(रूठने-मनाने और साथ निभाने का रिश्ता)


यह रचना किसी एक परिवार या दो विशेष भाइयों का निजी वृत्तांत मात्र नहीं, बल्कि हमारे पारिवारिक जीवन में प्रायः दिखाई देने वाले भाई-भाई के रिश्ते की सामूहिक छवि है। एक ही घर-आँगन में पले भाइयों का रिश्ता केवल रक्त का नहीं होता। माँ का दुलार, पिता की घुड़की, बहन का बीच-बचाव, साझे कपड़े-पुस्तकें, अभावों में त्याग, आपसी तकरार और संकट में साथ खड़े रहने की भावना इसे गढ़ती है। समय के साथ राहें और स्वभाव बदल सकते हैं, पर मन के किसी कोने में भाई के सुख-दुःख की चिंता बनी रहती है।

एक ही माँ के उदर से जन्मे, एक-सा पालन-परिवेश,
एक-सी बोली, साँझे विचार-विमर्श और ‘हम’ का भाव।

परस्पर पूरक, संग रहना, रूठना और फिर मनाना,
लड़ाई, गुस्सा-प्यार और एक-जैसे कितने भ्रम।
एक ही माता-पिता के अंशों से निकले दो जीवन,
एक ही माँ की कोख में दोनों ने आकार लिया।

वंश के सारे ही तो सूत्र दोनों की देहों में साँझे,
हाँ, कुछ गुण दोनों में अलग-अलग भी मुखरित।
एक-सा रंग-रूप, बाल व मिलती-जुलती कद-काठी,
संग-संग पले-बढ़े, जैसे आपस में गहरे दोस्त।

वह माँ का दुलार और पिता की कड़ी घुड़की,
भाई से तकरार, बहन द्वारा बचाव के उपाय।
एक-दूसरे की कमियाँ भी खूब सहन कर लेते,
कभी-कभी गुस्सा भी तो प्यार का प्रतिबिंब है।

अपनी छोटी-बड़ी चीजें आपस में बाँट लेते,
छोटा बड़े के कपड़े बड़े चाव से पहन लेता।
पुरानी पुस्तकें भी उसके खूब काम हैं आतीं,
घर की हर चीज में दोनों की साँझ बनी रहती।

बड़ा छोटे को पढ़ाता, समझाता है और डाँटता,
प्यार-डाँट से उसे योग्य बनाने की कोशिश करता।
मन में एक त्याग—भाई को भी सब मिल जाए,
उसकी बड़ाई में मुँह से शुभ शब्द ही निकलें।

अरे, तुम उसको मत छेड़ना; उसके बड़े भाई को
यदि पता लग गया, तो वह बहुत गुस्सा होगा।
हो सकता है, तुम्हारी बड़ी धुनाई भी कर दे”—
छोटे के पीछे बड़े की ऐसी धाक रहती थी।

बड़े भाई ने छोटे को धूम्रपान करते देख लिया,
तो उसे खूब डाँटा—कभी दो हाथ भी लगा दिए।
तुझे पता नहीं, इससे कितना नुकसान होगा?
गंदी आदत छोड़, अपनी जिंदगी मत बिगाड़।”

अरे, तू सारा दिन इधर-उधर घूमता रहता है,
पढ़ाई कौन करेगा—ऐसे तो तू फेल हो जाएगा।
अब थोड़ा संजीदा हो जा, किताब उठाकर पढ़;
तेरा समय निकल गया, तो लौटकर न आएगा।”

हम आपस में चाहे वे कितना ही लड़-मर लें,
पर दूसरों की मध्यस्थता बर्दाश्त नहीं होती।
आखिर इसी घर में तो संग-संग रहना है हमें,
आपसी झगड़े से अपना रिश्ता कहाँ टूटता है!

कभी दूसरे की हानि की सोच भी न होती,
सदा उसके लाभ और भलाई की चिंता रहती।
कुछ हो जाए, घर की इज्जत बचनी चाहिए—
यही बात मन में सबसे ऊपर बनी रहती है।

आपस का लगाव, नाज-नखरे भी सह लेते,
परस्पर की भलाई हेतु अनेक कवायदें करते।
ऊपर से चाहे कितने वे कड़े शब्द बोल दें,
भीतर भाई के लिए मन नरम ही रहता।

दूसरे की खातिर समस्त जग से लड़ पड़ते,
कभी भाई के लिए जान की बाजी लगा देते।
कितना प्रेम और कितनी जिम्मेवारी एक-दूजे की,
उसके दुःख को अपना और सुख साझा समझते।

तू अगर अमीर है, तो वह भी हमारा ही है;
वह अपना भाई है, उसका सब कुछ अपना है।
पानी में लाठी मारने से पानी टूटा न करता;
हम लड़ेंगे व भिड़ेंगे, पर फिर भी संग रहेंगे।”

परिवार की इज्जत मिटने नहीं देंगे कभी,
पीठ पीछे भी एक-दूसरे का पूरा पक्ष लेते।
आपस में भले कई दिनों से बोलचाल न हो,
पर बाहर आलोचना बिल्कुल सहन न करते।

कोई भाई के खिलाफ दो शब्द भी बोल देता,
तो सारी नाराज़गी छोड़ उससे लड़ है बैठते।
चाहे मुँह फेरकर चल रहे होते एक-दूसरे से,
पर संकट में सबसे पहले वही सामने आता।

अपनी चीजें उसके लिए सहज छोड़ दीं—
तू यह मिठाई खा ले, मुझे अभी भूख न है।
तू आराम कर ले, मैं यह काम कर दूँगा;
तू दुःखी मत हो, सब ठीक हो जाएगा।”

कभी भाई को बचाने हेतु झूठ भी बोल दिया,
यह नई कमीज पहन ले, मेरा तो चल जाएगा।
अपने भाई को पढ़ाना है, कमाना तो पड़ेगा ही;
वह पढ़-लिख जाएगा, तो घर का नाम करेगा।”

देख, तू अपनी जिंदगी में तरक्की कर ले,
हम तो जैसे-तैसे अपना गुजर कर ही लेंगे।
तू ऐश और इज्जत से रहे—बस यही इच्छा है;
तेरा जीवन बन जाएगा, तो हम भी खुश होंगे।”

अपने जूते फटे, पर भाई के लिए नए ले आए,
उसकी बुराई किसी के मुँह से सहन न हुई।
उससे जुड़ी हर बात अपनी ही लगती थी—
उसकी चोट जैसे सीधे अपने मन पर लगती।

हर पल एक-दूसरे की भलाई की सदा इच्छा—
कोई युक्ति मिले तू धनवान और ज्ञानी बने।
अरे, तू छोटा है, मुझसे आगे जाना चाहिए;
हाँ, बड़े को कुछ अधिक सहना ही पड़ता है।”

भाई, तू छाया में बैठ, मैं काम कर देता हूँ;
मुझे कुछ न होगा, भीतर से बड़ा तगड़ा हूँ।
अपना गुजर अच्छे से कर, हमारी चिंता छोड़;
यह सब ठीक है, हम अपना काम चला लेंगे।”

कितनी ऊँची आकांक्षा अपने भाई के लिए—
तू अफसर, नेता, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बने।
तू खूब अमीर हो, सबसे बुद्धिमान कहलाए;
अरे, क्या हुआ यदि हम अनपढ़ ही रह गए!”

साथ-साथ बचपन से अब दोनों युवा हो गए,
सबसे गहरा परिचय तो अपने भाई से ही रहा।
उसकी अच्छाई, कमजोरी और मन की चाल—
भाई से भला कितने दिनों तक छिप सकती है?

उसकी तरक्की में अपना ही फायदा लगता,
आखिर अपना भाई है, सब कुछ अपना है।
कभी नाराज़गी हुई भी, तो सतह पर ही रही—
हाँ, अब वह बदल गया है, समय नहीं देता।”

कभी-कभी मन में एक बड़ी कसक भी उठती—
मेरा भाई पीछे रह गया, आगे नहीं बढ़ पाया।
वह कमजोर है, तो उसे सहारा देना ही होगा;
भला अपने भाई को बीच रास्ते कौन छोड़ता है?”

भाई, यह अपने घर की बात है, किससे कहें?
बाहर वालों को इसका पता नहीं लगना चाहिए।
चलो, पहले आपस में बैठकर कोई रास्ता निकालें;
अपने घर का दुःख अपना ही अधिक समझता है।”

कभी-कभी मन हारकर यह भी कहना पड़ता—
उसे समझाने-बुझाने का कोई फायदा नहीं।
वह अपनी मर्जी से चलता, किसी की नहीं सुनता;
अब कितना लड़ें—खुद ठोकर खाकर समझेगा।”

वह अब बच्चा तो नहीं, अपना अच्छा-बुरा जाने;
आदमी अपनी ही ठोकरों से बहुत कुछ सीखता है।”
पर मुँह से यह सब कुछ कह देने के बाद भी,
मन चुपके-चुपके उसी की चिंता करता रहता।

कभी शिकायत कटु होकर बाहर आ जाती—
मेरा भाई रूठ गया है, बड़ा लोभी हो गया।
देखो, उसे तो हमारी कोई चिंता ही नहीं रही,
चाहे हम परेशान हों या कष्ट में पड़े रहें।”

उधर दूजा भाई भी अपनी विवशता कह देता—
मुझसे अपना ही गुजर मुश्किल से हो रहा है।
मैं आखिर कहाँ से लाऊँ और कितना बाँटूँ?
सबको अपना गुजर करना भी तो आना चाहिए।”

भाई, अब तुम अपने पैरों पर खड़े हो जाओ,
दूसरों का बहुत सहारा भी अच्छा नहीं होता।
आदत बिगड़ जाती है, हाथ दूजों की ओर रहता;
अपना जोर लगाए बिना आदमी कहाँ बढ़ता है?”

देखो, जब पता हो मुफ्त में सब मिल जाएगा,
तो आदमी पुरुषार्थ छोड़कर बैठने सा लगता है।
बस थोड़े में गुजर करके मन को समझा लेता,
फिर आगे बढ़ने की इच्छा भी मंद पड़ जाती है।”

पता चला, भाई पीछे से अब ऐब करने लगा है,
वह दारू पीता है, और गलत संगति में बैठता है।
उसे इस हालत में देखकर बड़ा दुःख है होता;
क्यों अपना बना-बनाया जीवन बिगाड़ रहा है?”

भाई उसकी बुरी आदत छुड़ाने को लड़ पड़ता—
तू समझ क्यों नहीं रहा, बड़ा नुकसान होगा।
भाई, सँभल जा और अपनी जिंदगी बना ले;
बिगाड़ने वाले अनेक, भलाई चाहने वाले कम हैं।”

कभी छोटा भी तैश में आकर उत्तर दे देता—
चल, तू करता है, तो मैं भी करके दिखाऊँगा;
मैं भी देखता हूँ, मुझे आखिर कौन रोकता है!”
उस पल गुस्सा समझ से कहीं आगे निकल जाता।

फिर भी भाई अपने मन को थामकर कहता—
देख, तूने नुकसान किया, आगे ऐसा मत करना।
तेरी इज्जत करता हूँ, इसलिए इस बार छोड़ता हूँ;
तू समझकर चलेगा, तो सभी तेरा साथ देंगे।”

भाई रूठ गया, उसे मनाने की कोशिश की है,
पर नहीं मान रहा—कोई उपाय करना चाहिए।
चलो, तुम ही उसको मेरी ओर से मना दो;
मानता हूँ, गलती मेरी है—वह माफ कर दे।”

समय बीतता रहा, राहें और घर अलग होते गए,
अपने-अपने परिवार और जिम्मेवारियाँ बढ़ती गईं।
अब पहले जैसी रोज की बैठकी कहाँ रह पाई,
परंतु भीतर बचपन का वह आँगन बना रहा।

कभी दोनों के बीच महीनों बोलचाल न होती,
फिर किसी खबर पर मन बेचैन हो उठता है।
किसी दूसरे से चुपचाप उसका हाल पूछ लेते—
वह ठीक तो है? कोई बड़ी परेशानी तो नहीं?”

भाई, मैं कमजोर हूँ—तेरा ही तो सहारा है;
मिल-बाँटकर हम दोनों का गुजर हो जाएगा।
माँ-बाप तो अब इस दुनिया में नहीं रह गए;
तू ही सब कुछ है—आ, कुछ बातचीत कर ले।”

माँ की गोद नहीं रही, पिता की घुड़की नहीं,
बहन का वह बीच-बचाव भी पीछे छूट गया।
वह पुराना घर और आँगन कितना बदल गया,
पर भाई में उस पूरे घर का अक्स बचा रहा।

ऐसे ही मनोरथों, भरोसों और लघु लड़ाइयों में,
प्यार, दुराव, त्याग और अनेक कष्टों के बीच,
भाई-भाई की जिंदगियाँ आपस में लिपटी पड़ी हैं—
एक की यादों में दूसरे का हिस्सा बसा हुआ है।

हम रूठते रहे, लड़ते रहे, और दूर भी होते रहे,
पर एक-दूसरे से सचमुच अलग ही कहाँ हुए?
अरे, पानी में लाठी मारने से पानी टूटा न करता—
भाई आखिर भाई है, कभी पराया हुआ न करता।

नैतिक संदेश: भाई का रिश्ता केवल एक ही रक्त से जन्म लेने का नहीं; एक-दूसरे के सुख-दुःख, अभाव, डाँट, त्याग, नाराज़गी और चिंता को जीवन भर अपने भीतर सँभालने का रिश्ता है।

 

पवन कुमार,

19 सितंबर, 2026, शनिवार, समय 11:56 मध्य रात्रि  

(मेरी महेंद्रगढ़ (हरि०) डायरी 22 फरवरी 2019, शुक्रवार, प्रातः 9:18 बजे से)


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— पवन कुमार

Saturday, 5 September 2026

उनींदी कलम

उनींदी कलम

फरवरी 2007 की मध्यरात्रि में लिखी यह कविता कलम से किया गया आत्मीय संवाद है। जीवन की अनिश्चितताओं के बीच कवि उद्देश्य, आत्म-परिचय और साधना की राह खोजते हुए धीरे-धीरे संकल्प और जागरण की ओर बढ़ता है।

तेरी गहराइयों से रूबरू होने की चाहत है;
ऐ उनींदी कलम, इस यात्रा में साथ तो देना।

मैं तो यूँ ही जीवन को तमाम करता रहा,
समय की गति में स्वयं को भी भूलता रहा।
मन में क्या कसक थी, यह मैं कह न सका,
नासमझ की मानिंद यूँ उनींदा ही पड़ा रहा।

कुछ हसरतें बना पाऊँ, कुछ बड़े ख्वाब ले लूँ,
वरना ज़िंदगी तो यूँ ही निकलती चली जाएगी।
बिना किसी उद्देश्य के जीकर मैं करूँगा भी क्या—
साधना का मोल ज़िंदगी शायद न लगा पाएगी।

क्या करूँ मैं इस जीवन में, ज़रा समझा जाना;
रोने के अलावा हँसना भी है, ज़रा बतला जाना।
कुछ करने की कसक लेकर दुनिया में आ गया;
अब कोई काम सामने रख दे, उसमें लगा जाना।

मेरे मन का महद् इतिहास यूँ ही बन्द पड़ा है,
इसे कुरेदने की कभी मुझे फुरसत ही न मिली।
कैसे झकझोरूँ इसे, कैसे चलायमान करूँ—
मेरे मन की उम्मीदों को फिर नया जीवन मिले।

पल-पल साँस लेते हुए मैं भीतर सिमटता रहा,
क्षण-क्षण उठकर अपने को फिर सँभालता रहा।
मन में कुछ करने की हसरतें बहुत अधिक थीं,
पर समय के साथ उनका गुनगुनाना भूल गया।

मेरे मन की थाह क्या है—यह जानना अभी शेष;
इस दुनिया में मैं क्या सामान हूँ—उत्तर अभी शेष।
क्यों आया हूँ यहाँ और क्या मेरा मकसद है—
क्या मेरी इबादत है और मेरे रास्ते क्या हैं?

मेरे जीने की सूरत में रोम-रोम का संचालन है,
जगत में रहने की चाहत, साँसों में विचलन है।
कुछ करने की इच्छा जगे तो इसे जीवन कहूँ,
वरना बिना समझे ही यह जीवन बीत जाएगा।

मेरी बर्बादियों और उन्नति का वह रब साक्षी है;
मैं उसकी इबादत फिर निरन्तर करता रहूँ।
माना, अभी पूरा शऊर नहीं, न उसका ढंग ही—
उसी की कृपा से सीखते हुए आगे बढ़ता रहूँ।

अपने मन का मीत आखिर बनाऊँ किसको,
जब स्वयं से पूरा परिचय अभी कर न पाया?
बहुत कुछ पाया है मैंने बाहर की दुनिया से,
फिर भी अपने भीतर कुछ अनजाना-सा हूँ।

मेरे मन की तसल्लियों की कोई महफ़िल हो,
उसी में शायद मैं भी अपने फ़साने कह सकूँ।
कहने की कला को अभी धीरे-धीरे साध रहा हूँ,
लड़खड़ाते शब्दों में भी अपना मन खोल रहा हूँ।

मुझ पर तू कृपा कर, मुझे आगे बढ़ाओ ना;
जीवन को जीने के कुछ नए ढंग सिखाओ ना।
गुज़ारिश है—कुछ मकसद देना इस ज़िंदगी को,
ताकि अंत में कुछ न करने का मलाल न हो।

मेरी तरक्कियों का रास्ता तूने ही सुझाया है;
तेरी ही राह पर अब मुझे आगे बढ़ते जाना है।
तेरा साथ और तेरी प्रेरणा मुझे सदैव चाहिए ही—
क्योंकि देख, तू बड़ा गुरु है और मैं तेरा चेला हूँ।

मुझे समझ नहीं आता कि प्रेम का रंग कैसा है;
कैसे तुझमें आत्मसात होकर गौरवान्वित होऊँ?
मुझ पर अपनी कृपा की चादर तू ओढ़ा देना,
जमाने की तमाम गर्मी-सर्दी से मुझे बचा लेना।

जीवन में निरन्तर चलते रहने का चिंतन देना,
मेरे भीतर विश्वास और विवेक बनाए रखना।
ऐ कलम, अपने अक्षरों से राह दिखाती रहना—
मैं उस राह पर जागृत होकर चलता रहूँगा।

 नैतिक संदेश: आत्मप्रश्न जब संकल्प से जुड़ते हैं, तो उनींदी चेतना भी जीवन की राह पहचानने लगती है।

 

पवन कुमार,

5 सितंबर 2026, सायं 6:22 बजे

(मेरी डायरी 6 फरवरी 2007, मध्यरात्रि 1:00 बजे से)


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यदि यह रचना आपको रुचिकर लगी हो, तो मेरी अन्य प्रकाशित कृतियों को भी देख सकते हैं।
— पवन कुमार