नीरवता, चेतना एवं समरसता-आह्वान
इस खगवृंद-कूजन से ही प्रारंभ करूँ, यही मधुर मनन जगाएगा।
बुद्धि-रश्मि प्रकाशित होगी, सकारात्मक आशा का सूर्योदय होगा।
आज अद्वितीय-सी परमानुभूति करना चाहता हूँ, जो समीप है।
पर दृष्टिगत नहीं हो रही, जैसे गूढ़ जीवन-तत्व छिपा रहता है।
जीवन दूध या दही-सा है, भीतर वसा रहती है, पर दिखती नहीं।
जब तक युक्ति न ज्ञात हो, तब तक उसका हल निकलता नहीं।
इसकी मंथन-आवश्यकता पड़ती है, तभी सार अलग होता है।
मलाई निकालने हेतु पहले दूध को ठंडा करना भी पड़ता है।
माना कि वसा महत्वपूर्ण, मूल्यवान व उपयोगी तत्व है इसमें।
पर अन्य तत्व भी हैं, और इनकी उपयुक्तता जानना चाहिए।
थोड़ा सोचना होगा कि पीढ़ियों में आशावादी मन कैसे उतरे।
ढोल-धमाके तो बहुत होते, पर सत्य जन-विकास कहाँ हो रहा?
दुनिया के दर्दों की चिंता है, पर मुक्ति-पथ कौन-कैसे होंगे?
व्यग्रता ज़रूरी है, किन्तु सत्य-चेष्टा ही मंज़िल तक पहुँचाएगी।
किंचित इस नीरव परिवेश में निःशब्दता का यत्न करता हूँ।
क्या इस कॉटेज के ड्राइंग रूम में बैठा मैं मात्र लुप्त-सा हूँ?
जब तक इस वातावरण में पूरा न रमूँ, अंतःस्पंदन जागता नहीं।
और तब तक यह लेखन भी कुछ अधूरा-सा लगता है मुझे।
दीवार पर लटका पंखा घूम रहा, और किंचित शोर स्पष्ट है।
मस्तिष्क थोड़ा भारी-सा है, फिर भी चेष्टा उत्तमार्थ बनी हुई।
यहाँ सागर-तीर की एक प्रातः-ग्रीष्म-उमस आभासित हो रही।
यद्यपि आँखें किंचित थकी-सी हैं, तथापि प्रयत्न तो सार्थक है।
यहाँ बाहर पेड़ों पर बैठे कौओं की काँव-काँव सुनाई दे रही है।
सड़क करीब ही है, उस पर चलते वाहनों का हल्का शोर भी है।
अभी थोड़ी देर पूर्व एक गिलहरी की पैनी किट-किट सुनाई दी।
और चिड़ियों का धीमा चीं-चीं स्वर ऊपर झलकते नभ में घुला।
सूर्य ऊपर से चमकता हुआ भवन व दीवारों पर झलकता-सा है।
वृक्ष-शाखाओं की हरितिमा व धूप के सुनहले रंगों में घुलता है।
गगन-नीलिमा व हरित-प्रकाश का अनुपम संयोग बना हुआ है।
यह सब दृश्य मुझे विभोर करने का शांत प्रयत्न करता रहता है।
चलो, उठी हूक पर विचार करें—दुनिया हेतु क्या दृष्टिकोण हो।?
और हम इसे सकारात्मक रूप से कैसे प्रभावित कर सकते हैं।?
देखो, मैं राजनैतिक तो नहीं होना चाहता अभी इस जीवन में।
पर मन में इतना दर्द रखना चाहूँ कि ठीक कदम उठा सकूँ।
इस स्थल-नीरवता में क्या अद्भुत संभव है, यही खोज रहा हूँ।
रिक्त मस्तिष्क को खंगाल कर कुछ तत्व जुटाने की चेष्टा है।
पर वह सामान-साधन कहाँ से लाऊँ, जो जीवंतता भर दे सबमें।
प्राणियों व जानकारों में एक उत्तम, मधुर स्मृति ही भर जाए।
मुझे लगता है कि यह संसार कुछ सिकुड़ा-सा और संकोची है।
लोग आपस में बधाई देने में भी सकुचाते-से प्रतीत होते हैं।
परस्पर एक अविश्वास-सा है, मन-ग्रंथियों में लोग बँधे हुए हैं।
फिर भी किंचित संवेदना व हर्ष दिखाना चाहिए मनुष्यों को।
ये अनेक पक्षी यहाँ कूक रहे हैं, और मुझे स्पष्ट सुनाई देते हैं।
किन्तु दूर बैठे लोगों को ये नहीं दिखते, और न सुनाई देते।
वे केवल एक कयास लगा सकते हैं, उससे अधिक कुछ नहीं।
बुद्धि-गतिविधियाँ स्वतः हैं, पर प्राथमिकताएँ आगे बढ़ाती हैं।
एक मनुज को बुद्धि-साधन प्रयोग अवश्य करना ही चाहिए।
कैसे वह अधिकतम जनों के जीवन में आशा फूँक सकता है।
जब लोग संगठित होकर निज दशा सुधारने को कटिबद्ध होंगे।
शिक्षा-आयुध ले समरसता-संग संघर्ष करेंगे, तो परिवर्तन होगा।
देखो, दुनिया में एक दमित क्रांति तो सदा ही विद्यमान रही है।
चाहे वह मुखर नहीं हुई हो, प्रतिक्रिया भीतर चलती रहती है।
जन अपने ऊपर हुए व्यवहारों का उत्तर अंतः-अग्नि से देते हैं।
कम-से-कम वे अनुभव तो करते हैं, और वही आगे बोलता है।
जनसंख्या का मुख्य भाग अब भी दमित-दलित-सा जीता है।
उपेक्षा, दीनता व भेदभाव से झूझता हुआ आगे बढ़ना चाहता।
तब क्यों न लोगों में एक सकारात्मकता उदित हो कि वे सुनें।
अन्यों के कुछ कटु मनोभाव भी धैर्य से ग्रहण ही कर सकें।
अतएव वे अपने मन की भी कह दें, और मन हल्का हो जाए।
एक-दूसरे को इस विश्व की आवश्यकता समझ में आने लगे।
जब लोग परस्पर-भावना को खुलकर समझेंगे, तो आदर करेंगे।
सब ओर के उत्तम साधन स्वयमेव निकट उपलब्ध होने लगेंगे।
अंतर्विरोधों से स्वयं को बाहर निकाल पाना थोड़ा कठिन है।
अपने को अभेद्य न कहूँ, पर कुछ सुदृढ़ अवश्य बनाना।
एक की अंतःशक्ति इतनी हो कि आदर स्वयं उपस्थित हो।
तब लोग स्वयं आगे आकर प्रेरणा लेंगे, यह भी आवश्यक है।
जीवन में सम्मान व बहुजन-हितार्थ बड़ा काम करना पड़ता है।
अपने को शंका-कटघरे से बाहर निकालना भी सीखना होगा।
लोग शीघ्र स्वीकार नहीं करेंगे—यह मानकर चलना चाहिए।
किन्तु जब तुम चमकोगे, तो स्वयमेव उजाला बढ़ता जाएगा।
देखिए, हर मनुष्य का अपना भी एक पक्ष अवश्य होता है।
जब तुम समर्थ हो, तो अन्यों को प्रेरणा देने की भी सोचो।
कुछ न कुछ को तो अवश्य लाभ होगा, यह मानकर चलो।
व्यक्तित्व सकारात्मक है, तो संदेश बहुत दूर तक जाएगा।
कलम कुछ ताकत देती है मनोद्गारों की अभिव्यक्ति हेतु।
उसका प्रयोग करो, लोगों को सम्यक् गति और जागरण दो।
अपने को कभी असहाय ही मत समझो, यह उचित नहीं।
संकीर्णताएँ स्वयं-स्थापित हैं, हटाओ, अधिक श्रेयस्कर बनोगे।
आज डॉ. अंबेडकर के जन्मदिन का यह स्मरणीय अवसर है।
वे स्वयमेव एक संपूर्ण चेतना-मूर्ति बनकर हमारे सम्मुख हैं।
उन्हें कैसे सर्वोत्तम स्मरण ही करें—यह प्रश्न भीतर उठता है।
जब हर समाज-अंश में स्वाभिमान-समन्वय का संगम होगा।
अशिक्षा, कुपोषण और भेदभाव से रहित समाज आगे बढ़ेगा।
सभी पूर्वाग्रह छोड़कर लोग एक विकास-पथ पर अग्रसर होंगे।
आरंभ में कुछ खिंचाव व समायोजन भी थोड़ा कठिन लगेगा।
किन्तु बिना विचलन के लक्ष्य-पथ पर चलना ही सच्चा होगा।
देखो, जमाना बड़ा बदल रहा; जनता के जेहन में हलचल है।
वह अपने ढंग से अपनी अवचेतन अपेक्षा व्यक्त कर रही है।
अनेक बुद्धिजीवी समाज में जागृत हैं, शिक्षित व सजग भी।
जो गहन तथ्यों की तह तक जाने की बड़ी क्षमता रखते हैं।
अब जैसी भी सबकी स्थिति शासन-तंत्रों के समक्ष प्रस्तुत है।
बहुजन भी अपनी बात कहते, शासन को सुनना पड़ता है।
माना कि व्यक्त-शैली निश्चय से अत्युत्तम ही न हो सकती।
तो भी विकास-चेतना अवश्य है, और यात्रा ठीक दिशा में है।
आओ, सब इस चेतन-समृद्धि को और विकसित-विस्तृत करें।
अपना सर्वोत्तम इस जगत में प्रस्तुत करना भी आवश्यक है।
यह जीवन इस विश्व की संपत्ति है, अतः इसका सुप्रयोग हो।
तभी अनेक जीवनों में इससे सकारात्मक प्रविष्टि संभव है।
नर-जन्म की सार्थकता स्व-जागरण व जग-उजास भरने में है।
तब समन्वय, संवेदना व शुभचिंतन से पथ अधिक प्रशस्त होगा।
पवन कुमार,
8 जुलाई, 2026, मंगलवार, समय 1:55 बजे अपराह्न
(मेरी चेन्नई डायरी 14 अप्रैल, 2023, शुक्रवार, 8.33 बजे प्रातः से )