इस
भूमि की जीवनगाथा
एक स्थान के
बदलते रूप
जैसे हम सब मानवों की अपनी एक जीवनगाथा होती है,
तथैव जानवरों, पक्षियों, स्थलों, पहाड़ों और पेड़ों की भी होती है।
मानव कुछ संज्ञानी है, अपने वातावरण को सहेज लेता है,
अन्य प्राणी व स्थान समय के साथ मौन बदल जाते हैं।
उनकी कहानी लिखने वाला शायद ही कोई मिल पाता है,
फिर भी उनके भीतर बीते युगों के चिह्न बने रहते हैं।
मेरे मन में अभी एक अजीब-सी जिज्ञासा उठ रही है—
मैं जिस घर में बैठा हूँ, इस भूमि का परिचय क्या है?
कह सकता हूँ यह सेक्टर-7, द्वारका, नई दिल्ली में है;
पर क्या इसका परिचय केवल इतना संक्षिप्त ही है?
क्या यही पहचान आज से पच्चीस-तीस वर्ष पूर्व भी थी,
जब ये ऊँचे सोसाइटी-ब्लॉक बनकर तैयार नहीं हुए थे?
उससे पहले तो घर, फ्लैट और वर्तमान पता ही न था,
यह भूखंड किसी अन्य परिचय से जाना जाता रहा होगा।
तब ये निकट गाँव वालों के खेत रहे होंगे अथवा संभव है,
कि यह गोचर, जोहड़ या खाली पंचायत की भूमि रही हो।
किसी किसान का खेत या पशुओं की चरागाह रही होगी,
भूमि-परिचय खेत और किसान के नाम से होता होगा।
निकट ही पालम गाँव है; पीछे एक कॉलोनी विकसित हुई,
जहाँ वंचित वर्ग के कुछ परिवारों को सरकारी प्लॉट मिले।
समय के साथ कई लोगों के पुराने प्लॉट बिकते चले गए,
और वहाँ नए निवासियों के घर व दुकानें बनती गईं।
शहीद रामफल चौक अब द्वारका का लोकप्रिय बाजार है,
यहाँ की दुकानें और सड़कें प्रायः खचाखच भरी रहती हैं।
घर-दुकानों से लोगों को पर्याप्त किराया मिलने लगा है,
और देखते-देखते अनेक परिवार सम्पन्न भी हो गए हैं।
दिल्ली विकास प्राधिकरण ने द्वारका नगरी के विकास हेतु
आसपास के अनेक गाँवों की खेत-भूमि का अधिग्रहण किया।
यहाँ खेतों, पगडंडियों और गाँव के पुराने रास्तों के बीच से
नए सेक्टर, उनकी सड़कें, पार्क और आवासीय परिसर बने।
पालम के निकट प्रहलादपुर, बागडोला, शाहबाद मोहम्मदपुर,
भरथल, पोचनपुर, धूलसिरस, अम्बरहाई और डाबड़ी गाँव हैं।
इसके अलावा नसीरपुर, ककरोला, बिंदापुर व अन्य गाँव भी हैं,
जिनकी सीमाओं और भूमि के बीच आधुनिक द्वारका उभरी।
मैं स्वयं भी एक ग्राम्य पृष्ठभूमि से आया हुआ व्यक्ति हूँ,
इसीलिए किंचित सोचता हूँ—यह वर्तमान आवासीय स्थान
कभी किसी किसान का खेत या पशुओं की चरागाह होगा,
कोई जरूरी तो नहीं कि यहाँ सदा खेती ही होती रही हो।
यहाँ के खेत, गोंडे, रास्ते, खाल, कुएँ, पेड़ और ट्यूबवैल—
इन्हीं से इस भूमि की अलग-अलग पहचान होती होगी।
कहीं कोई पुराना बड़ा पेड़ दिशा और सीमा बताता होगा,
कहीं मेड़ व खाल से दो किसानों के खेत अलग होते होंगे।
निकट पालम गाँव वालों से जानकारी ली जा सकती है,
कि यह भूमि पहले किस खेत या परिवार का हिस्सा थी।
संभव है, खेत जोतने वाला कोई पुराना व्यक्ति मिल जाए,
जो इसके पहले वाले स्वरूप के विषय में कुछ बता सके।
पर उससे भी शायद हमें केवल कोई नाम ही मिलेगा—
भरत सिंह, पूर्ण, रिसाला, भोला अथवा कोई दूसरा व्यक्ति।
पर मालिक के नाम मिल जाने से पूरी कथा कहाँ मिलेगी,
धरती तो उससे पहले भी न जाने कितनों से जुड़ी होगी।
पालम निश्चय ही आधुनिक द्वारका से बहुत पुराना गाँव है,
मुगलकालीन स्थापत्य इसके प्राचीन अस्तित्व की गवाही देता है।
सन् 1528–29 की पालम की जुमा मस्जिद जैसे पुराने निर्माण
इस क्षेत्र की एक लम्बी ऐतिहासिक यात्रा का संकेत देते हैं।
स्थानीय परंपरा दादा देव महाराज—संत जयदेव—की स्मृति को
तत्कालीन राजस्थान के टोंक अंचल से जोड़कर देखती है।
इन मान्यताओं के भीतर इतिहास और आस्था दोनों हैं,
जिन्हें स्थानीय समाज ने कई पीढ़ियों से सँजोकर रखा है।
बहुत पुरानी बात नहीं, जब द्वारका के बड़े हिस्से को
पप्पनकलाँ नाम से भी पहचाना और पुकारा जाता था।
सरकारी अभिलेखों तथा स्थानीय बोलचाल में यह नाम
आज भी इस क्षेत्र की पुरानी पहचान के रूप में मिलता है।
पप्पनकलाँ के नाम को लेकर कई लोककथाएँ प्रचलित हैं,
कुछ कथाएँ इसे पृथ्वीराज चौहान के वंश से जोड़ती हैं।
कथन है कि उनके पुत्र हरया हरपाल ने पराजित होकर
किसी सुनसान वन में जाकर कुछ समय हेतु शरण ली।
लोककथा में उनके पुत्र का नाम धाधीज बताया जाता है,
जो एक दिन शिकार करते हुए किसी तालाब के पास पहुँचा।
वहाँ एक जाटणी सिर पर दो घड़े रखे पानी भर रही थी,
उसने पैर से रस्सी दबाकर भागते बछड़े को रोक लिया।
कहते हैं, महिला की शक्ति और साहस से प्रभावित होकर
राजा ने उससे विवाह किया और परिवार को आगे बढ़ाया।
उनके पुत्रों के नाम तेजा, सहजा और जैसा बताए जाते हैं,
जिनसे दिल्ली-हरियाणा की कुछ वंश-कथाएँ जोड़ी जाती हैं।
कुछ लोगों के अनुसार जैसा नामक वंशज ने बाद में
पप्पनकलाँ व आसपास के किसी भाग पर शासन किया।
इतिहास में इन कथाओं की अलग से पुष्टि अपेक्षित है,
पर लोकस्मृति इन्हें पीढ़ियों से अपने साथ लिए चलती है।
एक अन्य कथा में पप्पन व कक्कन दो भाई बताए जाते हैं,
जो इस इलाके में अपना अधिकार स्थापित करना चाहते थे।
दोनों के बीच लड़ाई हुई, कक्कन मारा गया और आगे चलकर
पप्पन के नाम से यह इलाका प्रसिद्ध पप्पनकलाँ कहलाया।
कुछ लोग इसका संबंध पप्पन खान के नाम से जोड़ते हैं,
जिसकी किसी पुरानी रियासत का यह हिस्सा रहा होगा।
इन कथाओं में कितना इतिहास और कितनी कल्पना है—
यह प्रश्न भी इस भूमि के रहस्य को और गहरा करता है।
बाद में श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका का प्रतिष्ठित नाम
दिल्ली के इस विकसित होते उपनगर को दे दिया गया।
प्राचीन द्वारका यहाँ से सैकड़ों किलोमीटर पश्चिम में है,
पर उसके नाम ने इस नई नगरी को अलग पहचान दी।
यह वर्तमान आवासीय क्षेत्र पालम गाँव से अधिक दूर नहीं,
अतः स्वाभाविक है कि यह भूमि पहले खेत ही रही होगी।
आसपास अनेक गाँव थे; उनके लोग इन्हीं रास्तों से चलकर
एक-दूसरे के घर, खेत, चौपाल, मंदिर और बाजार जाते होंगे।
बीच-बीच में बड़े वृक्षों के झुंड और पुराने कुएँ होंगे,
लोग पेड़ों की छाया में बैठकर कुछ देर सुस्ताते होंगे।
किसान और मजदूर मिलकर खेत जोतते-काटते होंगे,
ऋतुओं के साथ धरती भी अपना रंग बदलती होगी।
दुपहरी में प्याज-चटनी, रोटी, गुड़, मक्खन और लस्सी—
उस सादे ग्रामीण भोजन का स्वाद अलग ही होता होगा।
परिश्रम से थका शरीर पेड़ की घनी छाया में विश्राम करता,
फिर किसान दोबारा अपने खेत के काम में लग जाता होगा।
तब आसपास कोई बड़ा आधुनिक शहर तो बिल्कुल न था,
घर-परिवार की जरूरतें निकट के गाँवों से पूरी होती होंगी।
लोग सीधे-सादे स्वभाव के थे और परस्पर आश्रित होते,
हाँ, उनके बीच छोटी-मोटी लड़ाइयाँ भी अवश्य होती होंगी।
गाँवों के अपने सरल रिवाज और सामाजिक मर्यादाएँ थीं,
तीज-त्योहार सब लोग मिलकर अपने ढंग से मना लेते थे।
अधिकांश घरों की वित्तीय स्थिति प्रायः एक-जैसी रहती थी,
हाँ, कुछ जमींदार और साहूकार अपेक्षाकृत सम्पन्न होते थे।
ऋण, ब्याज और लोभ ने तब भी अनेक जीवन कठिन बनाए,
कई किसान और मजदूर साहूकारों के कर्ज में दबे रहते होंगे।
सादगी का यह अर्थ तो नहीं कि दुःख या विषमता नहीं थी,
पर जीवन की गति और आवश्यकताएँ आज से भिन्न थीं।
समय में कुछ और पीछे जाएँ, तो सारे गाँव बसे भी न होंगे,
किसी ने खेत की रखवाली हेतु एक छोटा घर बनाया होगा।
फिर धीरे-धीरे उसका परिवार और कुटुम्ब निकट आ बसे,
कुछ परिवारों से एक छोटी बस्ती का निर्माण हुआ होगा।
बस्ती के साथ कुआँ, चौपाल और पूजा-स्थल बने होंगे,
आवागमन से पगडंडियाँ और फिर रास्ते निकले होंगे।
परिवार बढ़े, खेती फैली और नए संबंध बनते ही गए,
इसी क्रम में छोटी बस्ती ने गाँव का रूप लिया होगा।
और खेतों व गाँवों से भी पूर्व यहाँ घने जंगल रहे होंगे,
झाड़ियाँ, वनस्पति, पेड़-पौधे और अनेक जंगली जीव-जंतु।
मोर, लोमड़ी, हिरण, नीलगाय, भेड़िए, नेवले व गीदड़ तो
कुछ दशक पूर्व तक भी ग्रामीण अंचलों में मिल जाते थे।
और पुराने काल में विस्तृत उत्तर भारतीय भूभाग में
शेर, बाघ, भालू, जंगली बिल्लियाँ और बड़े पशु भी रहे।
संभव है, इस पूरे अंचल में कभी उनका विचरण रहा हो,
जब मानव बस्तियाँ विरल और जंगल अधिक विस्तृत थे।
मनुष्य उन प्राणियों के साथ किसी प्रकार रह लेता था,
कभी बचता, कभी लड़ता और कभी रास्ता बदल लेता।
रात्रि में बाड़े बनाकर आग जलाए रखनी पड़ती होगी,
ताकि पशु और मनुष्य जंगली जानवरों से बच सकें।
पहले जनसंख्या आज की तुलना में तो बहुत कम थी,
बच्चे अधिक जन्मते, पर अनेक शैशव में ही मर जाते थे।
चिकित्सा, यातायात व अन्य साधन तो बहुत सीमित थे,
पर उपलब्ध प्रकृति पर मानवीय दबाव अपेक्षाकृत कम था।
वर्ष 1800 में विश्व की जनसंख्या लगभग एक अरब थी,
वर्ष 1900 में भी यह लगभग एक अरब साठ करोड़ थी।
वर्ष 2000 तक यह लगभग छह सौ दस करोड़ तक पहुँची,
और वर्ष 2019 में लगभग सात अरब सत्तर करोड़ हो गई।
पहले इसी वसुंधरा पर हम मानवों की संख्या अत्यल्प थी,
खेत, गाँव, शहर, भवन व सड़कें भी बहुत कम संख्या में थे।
परंतु जंगल, वनस्पति, पशु-पक्षी, पहाड़, नदी-नाले, खाइयाँ,
तालाब, झीलें और अपेक्षाकृत स्वच्छ वातावरण अधिक थे।
द्वारका की जिस भूमि पर आज यह आवास खड़ा है,
इतिहास में वह कई अलग व्यवस्थाओं का भाग रही होगी।
पहले गाँवों में किसान प्रायः काश्तकार अथवा मजदूर ही थे,
भूमि पर सत्ता-अधिकार राजा, जमींदार का माना जाता था।
इसी धरती पर अनेक राजा, मंत्री और बादशाह आए व गए,
कुछ युद्ध और षड्यंत्र में मारे गए, कुछ सहज मृत्यु मरे।
जमींदारों और शासकों में अधिकार को लेकर संघर्ष चलता,
किसान-मजदूर अपनी आजीविका हेतु श्रम करते रहते थे।
यह केवल आज या कल की बात नहीं, बहुत पुराना सच है;
भूमि एवं सत्ता का संघर्ष हजारों वर्षों से चलता आया है।
राजाओं ने खेतों के साथ जंगलों को भी निज जागीर माना,
वन, पशु और प्राकृतिक साधनों पर अपना अधिकार समझा।
देखो, जंगल जीवनदायी थे, किंतु कई बार भयावह भी होते,
रास्तों के निकट दस्यु छिपकर कई राहगीरों को लूट लेते।
यात्रा जोखिमभरी थी; सुरक्षा का कोई पक्का भरोसा न था,
लोग समूह में चलते अथवा अँधेरा होने से पहले ठहर जाते।
देश के अनेक वनांचलों में भील, शबर और अन्य समुदाय
प्रकृति-निकट अपनी छोटी-छोटी बस्तियाँ बनाकर रहते थे।
कंदमूल, फल, शिकार व खेती से मिले कुछ अन्न के सहारे
उन्होंने कठिन परिस्थितियों में जीवन का संतुलन साधा।
कहीं-कहीं यात्रियों की सुविधा हेतु सराय बनवाई जाती थी,
वहाँ कुओं पर बाल्टी-रस्सी और निकट छायादार पेड़ होते।
लोग पानी पीते, पशुओं को पानी पिलाते और सुस्ताते थे,
फिर अपने लंबे पैदल या पशु-संचालित सफर पर निकलते।
राजा अपनी सेना और हरकारों सहित शिकार पर जाते,
जंगल को घेरकर हिंसक जानवरों को मार दिया जाता।
जो पड़ोसी राजा को हरा दे या खूंखार सिंह को मार दे,
उसे अपने समय में बड़ा वीर और बहादुर कहा जाता था।
देखो, वह बाण, तलवार व बाद में बंदूकों का जमाना था,
राजा लोग घोड़े, हाथी, ऊँट अथवा रथ लेकर चलते थे।
यात्रा तो धीमी थी और दूरियाँ बहुत अधिक लगती थीं,
एक स्थान से दूसरे तक पहुँचने में कई दिन लग जाते।
विश्व में मानव और नगरों का आज जितना विस्तार न था,
साधारण लोगों के घर-आवास भी बहुत छोटे हुआ करते थे।
राजाओं, जमींदारों और कुछ सेठों को छोड़कर अधिकांश लोग
घास-फूस, मिट्टी और कच्ची ईंटों के मकानों में रहते थे।
लोगों के पास एक-दूसरे हेतु कुछ अधिक समय होता,
गाँव में परस्पर चाचा-ताऊ, भतीजा-बेटी के रिश्ते बनते।
रक्त-संबंध न होते हुए भी रिश्तों से संबोधन किया जाता,
और पूरा गाँव ही एक बड़े परिवार जैसा दिखाई देता था।
पूरे गाँव की अपनी एक सामूहिक इज्जत मानी जाती,
बाहरी संकट में लोग मिलकर गाँव की रक्षा करते थे।
आपसी मनमुटाव और विवाद अपनी जगह बने रहते,
पर बाहर वाले के सामने लोग प्रायः एक हो जाते थे।
खेतों की भूमि भी हर स्थान पर समतल न रही होगी,
यद्यपि यह क्षेत्र मुख्यतः विस्तृत मैदानी भूभाग ही है।
दिल्ली के दक्षिण-पश्चिम में अरावली का प्रभाव भी रहा,
अतः पास के ऊबड़-खाबड़ भागों से जीव इधर आते होंगे।
पहले विवाह भी अधिकांशतः आसपास के गाँवों में होते थे,
इससे कई परिवारों के वंश-सूत्र आपस में जुड़ते चले गए।
बहुत बार दो भाइयों का विवाह दो बहनों से हो जाता था,
और दोनों परिवारों के बच्चे भी एक जैसे दिखाई देते थे।
किसी एक भाई की असमय मृत्यु हो जाने पर कभी-कभी
उसकी पत्नी का देवर या जेठ से पुनर्विवाह करा दिया जाता।
इसके पीछे स्त्री और बच्चों को परिवार में सहारा देने की
तत्कालीन सामाजिक सोच व पारिवारिक व्यवस्था रही होगी।
चाहे पुरुष की पहली पत्नी पहले से ही क्यों नहीं हो,
परिवार दूसरी स्त्री और बच्चों को भी अपना लेता था।
इसे परिवार को बिखरने से सुरक्षा का उपाय माना जाता,
यद्यपि हर परिवार और स्त्री का अनुभव अलग रहा होगा।
भाई के बच्चों को अपने बच्चों जैसा ही माना जाता था,
खाने-पहनने की वस्तुओं में अधिक भेद नहीं रखा जाता।
मायके से त्योहारों पर सीधा और कोथली की भेंटें आती,
जो घर-पड़ोस के सदस्यों में स्नेह संग बाँट दी जाती थीं।
गाँवों में जाति-प्रथा थी और उससे भेदभाव भी उपजा,
इतिहास में इस कुप्रथा के अनेक कठोर उदाहरण मिलते हैं।
फिर भी खेती, पशुपालन, दस्तकारी और दैनिक जीवन ने
अलग समुदायों के बीच सहयोग के घने संबंध बनाए रखें।
समय के साथ सत्ता-संपत्ति व सामाजिक व्यवस्थाओं ने
मनुष्यों के बीच अनेक श्रेणियाँ और दूरियाँ बना दीं।
धर्म की उदार भावना ने बहुत लोगों को जोड़कर रखा,
किंतु उसकी कठोर व्याख्याओं ने कहीं भेद भी बढ़ाए।
शिक्षा और सम्पन्नता ने जीवन के अनेक द्वार खोले,
यद्यपि कुछ लोग अपनी पुरानी जड़ों से दूर भी हुए।
अब नए समुदाय आगे बढ़ें, व पुरानी दूरियाँ टूट रही हैं;
पर यही बदलाव एक समतामूलक समाज बना सकता है।
समाज का कोई भी मनुष्य जन्म से बड़ा या छोटा नहीं,
अवसर और शिक्षा से प्रत्येक व्यक्ति आगे बढ़ सकता है।
मनुष्य की क्षमता किसी जाति या वर्ग की जागीर नहीं,
परिश्रम और उचित अवसर से अनेक रास्ते खुल सकते हैं।
देखो, लोग मानें या नहीं मानें, संसार में निरन्तर स्पर्धा है,
मनुष्य को कई बार निज शक्ति व योग्यता दिखानी पड़ती।
तो भी सहयोग एवं सह-अस्तित्व के बिना समाज अधूरा है,
यहाँ प्रतिस्पर्धा के साथ परस्पर सम्मान भी आवश्यक है।
देखो, कहीं शारीरिक शक्ति ने शासन और अधिकार पाया,
कहीं ज्ञान, विश्वास व वाणी-बल ने सामाजिक प्रभाव डाला।
इन शक्तियों ने कभी समाज को व्यवस्था और दिशा दी,
तो कभी स्वार्थवश असमानता और भय को भी बढ़ाया।
विश्व में मनुष्य का इतिहास केवल संघर्ष की कहानी नहीं है,
उसमें सहयोग, त्याग व परस्पर संरक्षण भी सम्मिलित हैं।
किसी ने यहाँ शासन किया, किसी ने खेतों में अन्न उगाया,
किसी ने ज्ञान, कला और विश्वास की परंपरा को आगे बढ़ाया।
तो आज जहाँ इन सोसाइटियों के बहुमंजिला भवन खड़े हैं,
वहीं कभी गेहूँ, बाजरा या सरसों की फसलें लहलहाती होंगी।
जहाँ इस पार्किंग में वाहन खड़े हैं, वहाँ पशु बाँधे जाते होंगे,
और जहाँ वह लिफ्ट है, वहाँ से कोई पगडंडी निकलती होगी।
अवश्य ही इसी भूमि पर किसी किसान ने हल चलाया होगा,
किसी बच्चे ने गेहूँ की बालियाँ चुनकर अपनी मुट्ठी भरी हो।
किसी मजदूर ने वृक्ष की छाया में बैठकर सूखी रोटी खाई हो,
और किसी राहगीर ने यहाँ रुककर कुएं से पानी पिया होगा।
किंतु फिर खेत अधिगृहीत हुए; नक्शे बने, और सेक्टर कटे,
उपनगर की सड़कें निकलीं, सेवाएँ बिछीं और भवन खड़े हुए।
निकट के पुराने किसान व निवासी भी परिवर्तनों से गुजरे,
और समय के साथ नए निवासी भी यहाँ आते व बसते गए।
किसी के लिए भूमि आजीविका व पुरखों की निशानी थी,
तो किसी के लिए वही भविष्य की नगरी का आधार बनी।
विकास अपने साथ सुविधा और नए अवसर लेकर आया,
किंतु पुराना परिवेश और अनेक स्मृतियाँ पीछे छूट गईं।
मेरी दृष्टि इस वर्तमान निवास से बहुत पीछे जाती है—
इस भूमि में समय की अनेकानेक परतें समाई हुई हैं।
कुछ संकेत तो अभिलेखों और लोकस्मृतियों में बचे हैं,
और कुछ रिक्त स्थानों को बस कल्पना भरती जाती है।
इसका पूरा इतिहास शायद कभी पता नहीं चल पाए,
फिर भी यह जिज्ञासा स्वयं में कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।
वर्तमान के नीचे छिपे अतीत को अनुभव करना भी
मनुष्य को अपनी क्षणभंगुर स्थिति का बोध कराता है।
देखो, मनुष्य आता है, किसी भूमि को अपना कहता है,
सीमा बनाता, मकान खड़ा करता और नाम लिखता है।
कुछ समय बाद वह चला जाता और नाम बदल जाता,
पर भूमि अगली पीढ़ी को फिर अपना आधार देती है।
ये जंगल, खेत, गाँव, जागीर और अब आधुनिक नगर—
इस भूमि ने प्रत्येक रूप को अपने भीतर स्थान दिया।
राजाओं, किसानों, मजदूरों और नए निवासियों सहित,
हम सब इसकी अनवरत जीवनगाथा के लघु अध्याय हैं।
किसी स्थान का वर्तमान पता उसका पूरा परिचय नहीं,
उसके नीचे प्रकृति, श्रम और स्मृतियों की कई तहें हैं।
घर हमारा हो सकता है, पर धरती केवल हमारी नहीं—
हमसे पहले भी उसकी गाथा थी, हमारे बाद भी रहेगी।
स्रोत-संबंधी टिप्पणी: इस रचना में उपलब्ध ऐतिहासिक संकेतों के साथ स्थानीय स्मृतियाँ, लोककथाएँ, ग्रामीण अनुभव और लेखक की कल्पना भी सम्मिलित हैं। अप्रमाणित कथाओं को ऐतिहासिक तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की लोकस्मृति और बदलते सांस्कृतिक परिचय के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
पवन कुमार,
29 सितंबर, 2026, मंगलवार, समय 4:55 बजे अपराह्न
(मेरी डायरी दि० 5 मई 2019, रविवार, अपराह्न 4:48 बजे, द्वारका, नई दिल्ली से)