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Wednesday, 1 January 2025

नववर्ष-संदेश : एक स्मृति

नववर्ष-संदेश : एक स्मृति 

नए वर्ष में एक बार फिर लिखने का प्रयास कर रहा हूँ। समय सीमित है, और कार्यालय के लिए तैयार भी होना है, किंतु इस नववर्ष के आगमन पर विचारों को शब्दों में बाँधने का मन हुआ। नववर्ष हमेशा नई उम्मीदों और ऊर्जा का संचार करता है। कल तक जो भविष्य था, वह अब वर्तमान बनकर हमारे सामने खड़ा है। हम सभी इस नए साल का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। लेकिन अब, जब यह आ गया है, तो यह प्रश्न उठता है—क्या हमने इसे विशेष बनाने के लिए कुछ सोचा है? क्या इसके लिए कोई ठोस उम्मीदें हैं? और क्या इसे सार्थक बनाने का कोई संकल्प लिया है?

नूतन वर्ष असीम संभावनाएँ लेकर आता है। लेकिन यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसे कितना सार्थक बना पाते हैं। जो बीत गया, वह हमारा था। वर्तमान भी हमारा है। और भविष्य भी हमारा होगा—इस विश्वास के साथ हमें आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन भविष्य का स्वरूप इस बात पर निर्भर करेगा कि हम अपने आज को कैसे जीते हैं। वास्तव में, भविष्य जैसी कोई वस्तु नहीं होती। यह सब कुछ वर्तमान ही है। यदि हम वर्तमान को उसकी संपूर्णता और जीवंतता से भर दें, तो कोई कारण नहीं कि भविष्य उज्ज्वल न हो।

हर क्षण को, उसके भूत बनने से पहले, चेतना और ऊर्जा से भर दें। जब प्रत्येक क्षण पूर्णता से भरा होगा, तो जीवन भी उसी पूर्णता का अंश बन जाएगा। यही जीवन की कला है। इसे समझना और आंतरिक द्वंद्व या हिचकिचाहट को शांत करना सरल नहीं है, लेकिन समय और अवसर को गहराई से समझने का प्रयास करना चाहिए। दूसरों के समक्ष दार्शनिक दिखने के बजाय, मनन-प्रवृत्ति अपनानी चाहिए। अपनी शक्तियों को संगठित करें और सार्थक उद्देश्यों में लगाएँ।

जीवन की योजना बनाना और इसके आयामों को सुंदर बनाना हमारी जिम्मेदारी है। संसार के शुभतर निर्माण हेतु विचार करें और इसे क्रियाशीलता का भाग बनाएं। पूर्णता के ज्ञानार्थ आत्म को भी पूर्ण बनाना होगा। प्रभु के सब गुणों का वर्णन करना सरल नहीं है, लेकिन हर किया गया प्रयास हमें उनके समीप ले जाता है। एक पूर्णता का अहसास, कुछ उत्तम कर दिखाने का अरमान, सभी की बेहतरी की उत्सुकता, और एक शैली जो चारों ओर मुस्कान बिखेरे—यही जीवन को सार्थक बनाता है।

एक ऐसा मनोचरित्र जो गहन विचारशीलता को जन्म दे, और एक उद्देश्य जो जीवन-मौलिकता को समझने का मार्ग प्रशस्त करे—यही हमारे प्रयासों का सार होना चाहिए। जो भी कार्य हमें सौंपा गया, उसे उत्कृष्टता के साथ पूरा करना ही हमारा धर्म है। इन विचारों के साथ, नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ। मन सदा सकारात्मक विचारमय हों, और प्रयास कभी अल्प न हों। शीघ्र चिर-प्रतीक्षित लक्ष्य मिले, और स्वजनों से पुनः जुड़ सको। माता-पिता, भाई-बहन, एवं सभी प्रियजन सदा प्रसन्न रहें। मित्रों में समझदारी, खुशहाली एवं आनंद बना रहे।

पुनः एक बार नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ। धन्यवाद।

 

पवन कुमार,

ब्रह्मपुर, ०१ जनवरी २०२५,  बुधवार समय ९:०२ बजे प्रातः 

(मेरी शिलोंग डायरी ३ जनवरी २००२, समय ९:१५ बजे प्रातः से)

 

Sunday, 5 May 2024

कुछ उलझन

                                                                   कुछ उलझन

                                                                                                                                      



फिर कुछ सुस्ताने के पलों को, अपना बनाने हूँ आया 

देह सोने की कह रही, पर हिम्मत जागने की करता। 

 

मेरे मन की अभिलाषा का, गूढ़ तात्पर्य तू समझा देना 

बता क्या वो अनूठी पहली है, कुछ छोर नहीं जिसका।

फिर तड़पन तो देती है, जैसे किसी कमी को दिखाती

पर अपने को उजागर नहीं करती, यह दुविधा है बड़ी।

 

तड़पन है किंतु मर्ज अबोध, मूर्ख रोगी सा ही सुबकता  

कैसी यह विचित्र परिस्थिति, जो कुछ समझ न आ रहा।

बस जीवन की कशमकशों में, अबूझ ही भटका करता 

कभी नहीं उनका विश्लेषण-विचार, मस्तिष्क में आया।

 

बस जैसे आया, वैसे ही जी लिया, और हो गया विश्रांत 

 फिर आए-गए का क्या अर्थ हुआ, शून्य हैं सब स्थान। 

कब सुलझेंगी मन-पहेलियाँ, कभी ज्ञात हो कैसे रहा जी

कुछ बोल, खीझ- झुँझला कर, कभी मुस्कुरा कर भी।  

 

समय गँवाया, न कुछ कमाया और न रोतों का हँसाया 

न नालायक योग्य बनाए, खुद को भी न समर्थ बनाया।  

 

बस खुद में साथी बनने की, तमन्ना रखता एक कीमती 

सोचता जब स्वयं से न्याय करूँगा, तो जाएगा सबसे ही 

सब मम सम, मैं उनका व वे मेरे, न कोई भेद ही कहीं। 

 

जब खड़ा होऊँगा अपने पैरों पर, व सक्षम पैर जमाऊँगा

मानवता के प्रति सजग होकर ही, चरण आगे बढ़ाऊँगा। 

करूँगा स्थापित पहचान स्वयं की, अच्छा कमाकर कर्म 

 कुछ होगा मेरा भी कल्याण, औरों को भी है उसी के संग। 

 

 

पवन कुमार,

५ मई, २०२४, रविवार, समय १ : १३ मध्य रात्रि 

(मेरी नई दिल्ली डायरी 21 मार्च, 2011, सोमवार, समय 12.35 बजे म० रा० से)

 

Tuesday, 4 October 2022

जीवन-छोर

 जीवन-छोर

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क्या निज में बाकी रह जाता मृत्यु-बाद, मन-देह तो सब समाप्त हो गए 

स्वयं अज्ञात, हाँ क्षणिक काल हेतु कुछ स्मृति-चिन्ह धरोहर छोड़ गए। 

 

यह जिंदगी ही क्या-कैसी है, जब तक हम जीवित हैं विचरती हमारे संग 

पर प्राण-पखेरू उड़ते ही  नदारद हो जाती, जीते-जी का है खेल सब। 

जब तक जीवित खूब कूद-फाँद सकते थे, मन की अच्छी-बुरी लेते कह 

लड़ना-भिड़ना भी था तभी संभव, पर मौत-आगोश में जा धूमिल सब। 

 

माँ के गर्भधारण-समय से अंतिम श्वास का मध्य-सफर, कह सकते है जीवन 

स्पंदन प्रतिक्षण चाहे न अनुभव, दिल धड़कता, वहनियों में दौड़ रहा रक्त। 

अब हमारा मस्तिष्क भी शून्य-अचेतन, कोई घटनाऐं रिकॉर्ड न कर सकता 

उसकी कार्य-प्रणाली अद्भुत, हाँ जीवन विकसन से पूर्व ही शुरू हो जाता। 

 

कुछ सूक्ष्म दृष्टि तो अदृश्यों की परत खुलें, अनेक तथ्यों से सदा अज्ञात हम 

विज्ञान कुछ उपकरण देता, प्रयोगशाला में विशेष ज्ञान भी प्राप्त सकते कर। 

चिकित्सा-विज्ञान में प्रगति, विशेष ज्ञान से मानव ने पता किए आयाम अनेक  

पर कितने ही अनसुलझे रहस्य, न प्रश्न कर पा रहें, स्वयमेव तो कुछ लब्ध न। 

 

हमारा जीवन-काल अति लघु, मानव-मस्तिष्क भी एक सीमा तक ही निपुण 

फिर प्रशिक्षण भी न है अत्युत्तम, उपलब्ध उपकरण का प्रयोग न पाते कर। 

देखो कलाकार निज देह-अंग के प्रयोग से, अनेक सुभीति मुद्राऐं बना लेते 

अनेक जादूगर, दार्शनिक-वैज्ञानिक, वेध-वेत्ता, सुख्यात मति-प्रयोग से हैं। 

 

कैसी दुविधा लब्ध तो सर्वस्व, पर मार्ग-अदर्शन, अमूल्य अनुपयोगी गया रह 

महँगे फोन-कम्प्यूटर खरीदे पर चलाना न आता, कई फंक्शन का प्रयोग न। 

धनी लोग बड़े भव्य महल -आवास बना लेते, पर रहना तो ही एक कमरे में 

ढंग से उनकी साफ़-सफ़ाई भी न हो पाती, हाँ कुछ समय हेतु खुश हो लेते। 

 

हम अनेक पुस्तकें खरीद लेते, फुरसत निकाल कभी ढंग से नाम भी न देखते 

घर में कई समाचार - पत्र आते, खोलकर मुख्य पृष्ठ-सुर्खियाँ भी न पढ़ पाते। 

अनावश्यक बर्तन-वस्त्र क्रय करते, पर अल्मारियों-बेड में ही सजे रहते बस 

प्रथम दिवस से ही उपयोगिता एक ओर, फिर किस हेतु है ऊर्जा-धन व्यय। 

 

दिन-रात श्रम से धन कमाते, कभी सोचा न एकत्रित का अत्युत्तम प्रयोग संभव 

बैंकों में पड़ा धन रहे अनोपयोजित, किसके काम आएगा किसी को न ज्ञात। 

बैंक उसी के प्रयोग से अति अमीर हो जाते, निज दशा तो पूर्व-कंगालों वाली 

कभी मस्तिष्क में श्रेष्ठ न अनुभव ही करते, परहित से बाँट सकते थे  खुशी। 

 

बहुत पढ़ता-लिखता पर क्या अन्यों में भी प्रसारित, वे भी लाभान्वित हो सकें 

क्या ज्ञान स्वयं तक ही सीमित हो, या बाँटकर अन्यों को भी योग्य बना सकें। 

एक सोच हो वृहद मानवता हेतु, या मैं पैदा होकर दुनिया से यूँ ही चला गया 

या पूर्ण ब्रह्मांड मन-आत्मसात कर लिया, निज को सबमें विस्तृत कर दिया। 

 

कैसा वीर निर्बल-दीनों की सहायता में न उतरे, यूँ ही जुल्म होते देखता रहता 

न समझाने का हुनर, न सख़्ती से लोगों को गलत रोकने का पाया साहस जुटा। 

कदापि अन्य-कष्ट में शामिल होने के प्रति, स्वयं में विशेष उत्सुकता ही न दिखी 

अति उदासीन जग के निर्बल पहलूओं प्रति, बहुत कुछ कर सकता था जबकि। 

 

चहुँ ओर भिक्षुक-अपढ़-अज्ञानी-मूर्खों का रेला, मैं निज में मस्त अमीर-विद्वान 

किसी अन्य की न खबर या चिंता, दुर्भाग्य कि कोई भी जिम्मेवारी समझता न। 

किसी या अनेकों ने मेरे प्रति भी सुभीता सोचा था, आज सुस्थिति में हूँ तभी तो 

अहसान-फरामोश से अपने प्रति भलाई तुरंत भुला देते, बहुत दूर चुकाना तो। 

 

कैसे हो यह जीवन विस्तृत, अप्रत्यक्ष में तो है किंचित, प्रत्यक्ष में भी माँगता होना 

बिना श्लाघा-आशा के प्रति रोम से कुछ लोक-भला हो सके, जीवन सुफल तो। 

कितना अपना व अन्यों प्रति ईमानदार हो सकता, चरित्र की कसौटी होगी क्या 

जीवन तो बस वर्तमान, यदि पुनर्जन्म जैसी कोई धारणा भी तो निज को अज्ञात। 

 

क्यों न हो सबका मानव-एकता का प्रयास, शासन प्रति तो प्रजा को न विश्वास  

क्यों न एक बड़ी समझदारी उदित हो, क्यों छीने-झपटने में ही चलता ज्ञान। 

क्यों गुमराहों को बस बहला -फुसला कर, हिंसा-बेहाली पथ पर छोड़ देते 

पद-दशा भी न निम्नतर, प्रभाव से कुछ सकारात्मक-परिवेश सहेज सकते। 

 

जीवन-छोर तो पाना लोग महाकर्म कर रहे, तुम भी कोटर से आओ बाहर 

ठीक कहो लोग सुनेंगे भी, जब जीवन औरों में प्रत्यारोपित तो बनोगे अमर। 

 

 

पवन कुमार,

४ अक्टूबर, २०२२ बुधवार, समय १८:३१ बजे सायं 

( मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दि० २६ अप्रैल, २०१७ समय ७:३८ से )