समय, स्वभाव और सत्कर्म
यह काव्य-रचना मनुष्य को समय-बोध, आवश्यक कर्म, सजगता,
अनुकूलन, पात्रता, सेवा और विनम्र कर्मशीलता की दिशा में ले जाती है। जिव्हा, पानी, गरम लोहा और अक्षय पात्र जैसे बिंबों के माध्यम से यह बताती है कि
जीवन में केवल विचार नहीं, बल्कि
सही समय पर किया गया संतुलित कर्म ही सार्थकता देता है। रचना का मूल स्वर यह है कि
मनुष्य को परिस्थिति के अनुसार लचीला, भीतर से पात्र, और
बाहर से सतत प्रयत्नशील बनना चाहिए, ताकि वह अपने जीवन को और इस जगत को थोड़ा बेहतर बना सके।
एक मनुज को आवश्यक कर्म समय पर निबटा
लेने चाहिए,
प्राथमिकता अनिवार्य और महत्त्वपूर्ण कार्यों की
ही उचित है।
समय पर कर लिया काम सदा उत्तम और
फलदायी होता है,
घटा-बढ़ाकर, नफ़ा-नुकसान भूल, आगे
बढ़ जाना हितकर है।
दुनिया में सब भाँति के आयाम निरंतर चलते ही रहते हैं,
हर तरह का महँगा-सस्ता सामान भी बाज़ार में
मिलता है।
अब आपकी समझ व जानकारी की भी एक सीमा
होती है,
कहीं न कहीं ठहरकर मनुष्य को निर्णय लेना ही
पड़ता है।
मैं कहता हूँ, यह होना भी चाहिए; अटके
रहने से कुछ नहीं,
थोड़ा साहस भी दिखाना पड़ता है, तभी राह आगे है खुलती।
अन्य आपके हेतु स्वयं से न आएँगे,
यह समझना होगा भी,
अपनी स्थिति पहचानकर पहले स्वयं ही पहल करनी
होगी।
दूसरे लोग केवल कुछ सीमा तक सहायता भर कर सकते
हैं,
जीवन का पथ और भार अंततः खुद ही सँभालना होता है।
सुबह विचार आया था कि लेखन-कर्म हर
समय हो सकता,
पर व्यवहार में वह वैसा हो नहीं पाता, रुक-रुक है जाता।
चौबीसों घंटे कोई एक काम करता भी तो रह सकता नहीं,
समय मिले तो फिर कर लेना—यही है सच्ची जीवन रीति।
माना अभी न कर सके, फिर अवसर मिलने पर कर लेना,
माना दोनों समयों में विचारों का रंग कुछ अलग ही
होगा।
जीवन का हर पृष्ठ अद्वितीय है, हर पल परिवर्तनशील है,
अतः रचना भी पृथक बनेगी, उसका स्वर भी नया होगा।
तो अपनी क्षमता समझकर, जो जिस समय संभव हो सके,
अत्युत्तम प्रयास संग अपना कार्य कर लेना ही उचित
है।
पूर्णता की प्रतीक्षा में बैठकर अवसर व्यर्थ नहीं
करने होते,
जो हाथ में है, उसी से आरंभ कर लेना अधिक हितकर है।
मनुष्य-स्वभाव जिव्हा-सा हो—लचीला,
सजग और संयमी भी,
पैने, बलयुक्त,
काटने-पीसने वाले दाँतों के निकट ही रहती।
कभी नहीं वह उनके कार्य-प्रवाह में आकर बाधा ही बनती
है,
पीछे रह, अवसर
पाकर, शांति से सब रस-अनुभव करती है।
बड़े लोग कहते हैं, कि कुदरत आपसे खुद काम करा लेती है,
तुम्हारे समय को सीधा करती, परेशानियों से भी बचाती है।
पर अपनी भीरुता, असमंजसता व निकलो आलस्य से बाहर,
यदि तुम एक कदम चलो, वह निभाती है दस कदम साथ।
बहुत बार परिस्थितियाँ अपने आप ही
सुधर रही होती हैं,
बस तुम एक मृदुल स्वभाव रखो, लोग सहयोग भी करेंगे।
अपने भीतर पहले पात्रता व ग्राह्यता रोपण करनी है पड़ती,
निज लोहा गरम रखना पड़ता, चोट से आकार बनता तभी।
ताओ-ते-तिंग में लाओत्से पुरुष को
पानी सा बनने कहते हैं,
जो अपना रास्ता स्वयं बनाता है, रुककर भी रुकता नहीं।
जिस भी पात्र में रखो, वह वैसी ही आकृति अपना लेता है,
छोटी-छोटी दरारों में से भी अपनी एक राह बना लेता
है।
वरना वह बाहर बह निकलता, ढलान ओर स्वयं बढ़ जाता,
और नदी से जुड़कर अंततः समुद्र तक पहुँच ही जाता है।
अन्यथा वाष्प बन कभी ओस का सूक्ष्म रूप धारण करता,
कभी बादल बनकर फिर वर्षा-रूप जमीं पर उतर है आता।
असली अर्थ, आदमी को समय-चिन्ह
पहचानने आने चाहिए,
जब समय सीधा हो रहा, तो प्रभु का नाम लेकर शांत रहें।
अपने से जो भी अन्य की सेवा हो सके, न झिझकें कदापि,
आज अक्षय तृतीया है, कहते हैं पात्र रिक्त होता न कभी।
जब लेना जानते हो, तो देना भी अवश्य जानो इस जग में,
लेना-देना भी एक उत्तम और एक संतुलित विश्व-नियम है।
प्रसन्नता से किए गए काम की महत्ता दुगुनी हो
जाती है,
और जितना भी श्रेष्ठ कर सको, नम्र होकर करते ही रहो।
इस मन-देह से महत्तम संभव कर्म करते रहना
ही उचित है,
विश्व को बेहतर स्थल बनाने को सतत प्रयत्नशील
रहना है।
यहाँ जीवन का सार यही है —कर्म, विनय, सेवा और सजगता,
इन्हीं से मनुष्य अपना वजूद होने को सच में सार्थक
करता।
नैतिक शिक्षा : जो मनुष्य समय को पहचानकर, विनय, सेवा और सजग कर्म के साथ चलता है, वही अपने जीवन को सार्थक और जगत को थोड़ा बेहतर बना पाता है।
पवन कुमार,
5 जुलाई, 2026, रविवार, समय 9:44 बजे रात्रि
(मेरी चेन्नई डायरी दि० 22 अप्रैल, 2023, शनिवार, 7:49 बजे प्रातः से)