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Sunday, 21 July 2019

एकाकीपन

एकाकीपन 
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विशाल विश्व नर अकेला, बाह्य-शरण भी अल्प-अवधि तक
तन्हाईयों में खुद ही डूबना, बहुदा प्रश्न कैसे काटें समय। 

कदाचित बोरियत-सीमा तक यह नितांत एकाकी पाता स्वयं
किसके पास जाकर व्यथा बाँटें, अपने में संसार जी रहें सब। 
अंतः-स्थिति सबकी एक सी, कुछ कह लेते पर पड़ता सहना 
एक क्षीणता सी अंतः-गृह, तन-बली होकर भी नर दुर्बल सा। 

बहुदा दर्शन नरमुख सड़क पर चलते, कार्यालय में अकेले बैठे 
खेती-मजदूरी करते, बूढ़े प्रतीक्षा में, बेरोजगार खाली भटकते। 
सब कुछ ढूँढ़ते से, बस कह न पाते, मस्तिष्क तो सदा कार्यरत 
बहुदा व्याज बनाता, मात्र कयास जबकि पता सिद्धि न निकट।  

यह क्या छुपा जो सदा-आविष्कृत, शायद निज कष्टों का उद्धरण
या ग्रन्थित प्रहेलिकाओं का हल-ढूँढ़न प्रयत्न, चाहे हस्त में या न।  
बस भ्रांत-दशा कभी यत्र-तत्र है अटके, जीवन शांति से न निर्वाह 
बस कुछ सुनो-कहो किसी से, नजरिया भी सदा बदलता रहता। 

मानव एक विवेकी जीव, सदैव मनन में चाहे अन्यों को न हो रास 
निज-शैलियाँ में एक गुमशुदा सा, अंदर से सुबकता-उबलता सा। 
कभी प्रतिक्रिया, ध्यानाकर्षण हेतु शोर भी, पर ज्ञान अंतः-अबल 
कभी दंबंग-स्थिति भी बनाता, पर प्रायः अपने से ही नहीं फुरसत। 

नर-समूहों में सहयोग भी दिखता, एकजुटता सी पंक्तियों में चलते
पर जमघट हटते ही फिर अकेले, लोकोक्ति कि अकेले आए - गए। 
जीवन में कुछ मेल-जोल रहता बात कर लेते, मन कुछ बहल जाता 
अंततः स्व में ही लौटना, बहु-नर चहुँ ओर तथापि तन्हा से ही रहता। 

 एकाकीपन-उबरन हेतु परस्पर संवाद की अनेक विधियाँ मानव-कृत 
सामान्यतया एक लौकिक, अतः जब भी अकेला बेचैनी सी अद्भुत।  
कला-संगीत, प्रदर्शनी-गोष्ठियाँ, कार्यस्थल-प्रगल्भ, कलह-युद्ध, प्रवचन 
मित्र-सौहार्द, आदर-रक्षा, मान-मनुहार, हाट शोर-गुल व विभिन्न ग्रंथ। 

लेखन भी अंतरंगता हेतु, एकाकी छटपटाहट, तब उपायान्वेषण 
कोई बने मूर्ति-चित्रकार, रंगकर्मी, कोई दार्शनिक या  वैज्ञानिक। 
सब अंतः से एक तरंगता चाहते, रिक्त क्षणों में जीवन कैसे पूरित 
'दिमाग खाली तो शैतानी घर', बल-समन्वय से मूर्त-निर्माण कुछ। 

मेरे मन की भी एक दुःख-सहन सीमा, अधिकता पर छटपटाहट 
ढूँढने लगता पठन-सामग्री, कुछ देर होता मस्तिष्क और व्यस्त।  
ज्वलंत समस्या यदि मन में तो उपाय भी, किसी-२ को भी छेड़ता 
सदा निज व अन्यों को चुनौती, परस्पर संवाद से ही जग चलता। 

क्या हम जो बहिर्प्रतीत वैसे ही, या अंतः का भी कोई अस्तित्व 
कौन सदा सुलगाता-ललकारता, करता भी उदास-व्यग्र-उग्र। 
कौन यंत्र पूर्ण-विवह्लित है कर जाता, नितांत निराश्रय से हम  
छटपटाते औरों को हैं कष्ट देते, कर्म- संनिरीक्षा, स्व पर प्रश्न। 

प्राणी एक महासमुद्र सम पर थाह अज्ञात, किसी कोण दुबका 
 भला यावत अन्यों से एकजुटता, पश्चात विशाल-लुप्त निर्बल सा। 
किञ्चित अज्ञात वृहद-स्वप्न से, बुद्ध-महावीर से खोज हेतु प्रस्थान 
प्रश्नों के उत्तर यहीं पर गोता लगा रत्न चिन्ह व उठाने का साहस। 

सब मानवेतर जीवों में भी एक मस्तिष्क, आत्मसम कोई मनन 
चाहे हमें पूर्ण समझ नहीं , कुछ तो सदा उनमें भी घटित पर। 
अंतर्युद्ध का मात्र किञ्चित ही मुखरित, गह्वर विपुल सागर सम 
सर्व चिंतन-चुनौती आत्मसातार्थ, सिद्धि कितना उत्तम संभव। 

जीव एकाकी जन्म से आमरण, स्वयं ही झेलने सब कष्ट-व्याधि 
यश-तर्जना, स्वीकृति-मूढ़ता, दृष्टिमान सब प्रयत्न-अभिव्यक्ति। 
'आत्म निखरण-परिष्कार'  उत्तम शब्द, उलझनों से जाना पार
संयुक्त-प्रयास व जग-साधनों से एकाकीपन का कुछ उपाय। 

अतः न क्षोभ-स्थिति, सर्व स्ववत, मिल-बैठ बना मधुर-परिवेश 
जब रिक्त-ऋतु एकांत सताऐ, कुछ कलाप्रेमी सा संवारो निज। 


पवन कुमार,
२१ जुलाई, २०१९ समय ८:३२ संध्या 
(मेरी डायरी १४ फरवरी २०१९ समय १०:२३ बजे प्रातः से) 

Monday, 1 October 2018

आत्म-परिष्कार

आत्म-परिष्कार
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कौन उत्कृष्ट रूप स्व से संभव, मार्ग निज-उज्ज्वल करें दर्शित
कैसे देह-मानस कायांतरित ही, क्या वृद्धि की सीमा किञ्चित? 

कैसे 'सुंदरतम मन' प्राप्ति, धरा भाँति सम-असम धारण सक्षम 
कैसे प्रमाद त्याग सुवृति हेतु, जीव  चेष्टा पराकाष्टा करें ग्रहण। 
कैसे मन निर्मल चिंतन कर सकता, अनुपम रूप संभव विचार 
किन उत्तम गुणों का हृदय प्रवेश, सहज बन सकें निज-धाम। 

कौन सिखा सकते, मात्र न समक्ष मन-देह अपितु दिव्य स्वरूप 
भिज्ञ न तो निज क्षीणता-दीनता से उठ, भव्य ओर करें प्रस्थान।  
कब वह समय निकलेगा स्वयं हेतु, होगा सर्वश्रेष्ठ से साक्षात्कार 
अप्रतिम कृति समक्ष जब निज से युग्म, उस क्षण का ही इंतजार। 

मानव की वे कौन सी श्रेणियाँ, जिनको कह सकते हम उत्तम 
उत्तम वर्ण-जन्म, रंग-रूप, रहन-सहन, उत्तम कर्म-विचार।  
उत्तम परिवेश, साध-संगति, खान-पान, गुणी-जन का सानिध्य 
उत्तम मनन-चिंतन, उत्तम व्यवहार-आजीविका व आचरण। 

इसी उत्तम पर चिंतन अद्य, क्या है प्रचलित 'उत्तम' व अन्यों का 
दस्यु हेतु चोरी व्यवसाय ही उत्तम, उससे ही चलती आजीविका। 
क्या मात्र सतही आदर्श - नाम उत्तम, या प्राणी निर्वाह करते भी 
जग में सब भाँति जीव, सर्वत्र जन्में, कार्य-सोच विचार करते ही। 

क्या जन्म हमारे निज-कर, अभिभावक चयन भी न अधिकार में  
पुनर्जन्म वाद छोड़ दें, कैसे जन्म विशेष परिवेश, रूप-काल में। 
चलो मान लो नर-नारी मिलन से, कुछ संतान  जन्म तो होंगे  ही 
लेकिन तुम कहाँ अवतरित है अज्ञात, बस एक में चेतना फलित। 

जग में कोटिशः योनियाँ, सतत प्राणी जन्म, किंचित काल में नष्ट भी 
स्वतः प्रक्रियाधीन अनवरत, प्रजातियाँ भिन्न कारणों से विलुप्त भी।  
कैसे जीव निर्माण, यहाँ नहीं तो वहाँ कहीं, पर कुछ तो बड़ा पचड़ा 
वैज्ञानिकों की भी अपूर्ण-व्याख्या, धार्मिकों में प्रचलित कई कल्पना। 

पौराणिक ग्रंथों में जीव-जंतु बातें करते, जैसे भाषा समझते परस्पर 
संवाद सम से स्तर का, कोई विभेद न, कमसकम विचार-स्तर पर।  
उसको छोड़ दें आज भी अनेक प्राणियों में परस्पर संवाद विद्यमान 
पालतु पशु-पक्षी  शब्द समझ लेते, हम भी हाव-भाव से लेते जान।  

वनचर-व्यवहार देख हमारी प्रतिक्रिया, प्रकृति में हैं वे अति-बुद्धिमान 
यह और बात भिन्न-प्रकटीकरण, पर किस स्तर पर उन्हें आँकते कम। 
माना नर में  गुरु-बुद्धिबल, संचय-सभ्यता-उपकरण से बदला परिवेश 
प्रक्रिया में बहु मानसिक-संरचनाऐं जनित, निज ढंग बजाते ढोल सब।  

विविधता प्रकृति-जातियों में, यहाँ तक कि एक-अभिभावक संतानों में  
सभी की रुचि में विविधता, क्यों न हो प्रकृति में तो रस -भाव है अनेक। 
सबकी दृष्टि अपनी, घर से बाहर निकलते ही मिलते प्राकृतिक रूप नव 
भाँति-२ अनुभव-संसर्ग, निज सम आँकन, प्रतिक्रिया के भी बहु रूप।  

निर्माण-विविधता सदा अवश्य ही, चाहे एक ही अभिभावक-युग्म द्वारा  
कालक्रम में खानपान, सोच-विचार व मानसिक-शारीरिक परिस्थितियाँ
इसके अतिरिक्त गर्भाधान में भिन्न वंशाणु-प्रकटीकरण व भ्रूण-विकास। 
एक अभिभावक-युग्म में निश्चित जीन-पूल, पर संतानों में विलग स्थापित 
यही भेद रूप-गुणों में, अन्य-अभिभावकों, भिन्न प्रजातियों में अधिक ही।  

मेरा प्रश्न कि सब निज में पूर्ण, यहाँ यह वहाँ वह, इसमें कैसा उत्तम-निम्न 
जन्म पर तो न अधिकार, हाँ कुछ संपन्न जगह जन्में तो समझ लेते सुभग।  
इसमें भी न अपुण्य, क्योंकि कुछ जीवन तो अपेक्षाकृत सरलता से चलते 
जब बहु जीव अति-संघर्ष में, यदि बेहतर परिवेश तो  उत्तम कह सकते। 

क्या मानें प्राणी-मङ्गल या पूर्व-जन्म फल, या मात्र पेरमुटेशन-कंबीनेशन 
प्रोबेबिलिटी (अनुमान)  सिद्धांत सर्वत्र लागू, पर जन्म-श्रृंखला पृथक न। 
न मानता वहाँ स्वर्ग में जीवन हेतु, एक लंबी पंक्ति लगी देहों में प्रवेशार्थ 
तथापि विशेष देह कैसे प्रवेशित, पहेली अद्भुत, हल किसी के पास न। 

चलो मान लेते हैं विज्ञान का सिद्धांत, चेतना भी जन्म का ही एक पर्याय 
जब जन्म मिलता है, उसी संग जुड़ जाता यथोचित मस्तिष्क विचारार्थ।  
मस्तिष्क हमारा देह-नियंत्रक, सोच-विचार अनुभव का रखता विवरण 
इस बिन हम अप्राण, इसके अवसान पर ही तो हो जाता हमारा मरण। 

मान लें देह-प्राण-चेतना ही पूर्ण-जीवन प्रारूप, हम इन सबसे ही पूर्ण 
एक बिन दूजा अधूरा है, सब मिलकर ही बनाते हमारा पृथक वजूद।  
हम एक व्यक्तित्व  बन जाते हैं, स्व-संप्रभुता बनाते पृथक नाम लेकर 
सबमें निज भाँति धातु पृथक रूप से जुड़ी, विविधता में न निम्न-उत्तम।  

प्रकृति में अति-विचारित आचार न दर्शित, योजना क्रम ही सर्व-गति पर  
यह नैसर्गिक गुण-प्राधिक्य, निज वंशाणुक्रमानुसार करते सब आचरण।  
माना एक प्रजाति विशेष में किंचित भेद भी, पर सब अपने में आनंदित  
हाँ दैनंदिन जीवनार्थ पेट-भरण सतत संघर्ष, पर तारतम्य सा भी निर्मित। 

मात्र आवश्यक ही लेना, अनावश्यक न मारा-मारी अन्यथा विश्व-ध्वंस 
'जियो और जीने दो' सिद्धांत स्वतः प्रचलित, प्रकृति में यहीं रहते सब।  
प्रकृति वक्ष-स्थल से ही सबको भोजन-प्राप्ति, सबकी ही यह बड़ी मातृ 
चाहे न समझे इस व्यवहार को, सबको देती, संततियों से न विगलाव।  

जब प्रकृति माँ से ही सब भरण-पोषण, मनुज ही क्यों स्व -घोषित श्रेष्ठ 
हाँ यदा-कदा पशु-शील से क्षुब्ध, प्रज्ञा-निर्मित  किए सब भाँति नियम। 
पर यदि हम पशु-योनि में होते तो क्या चरित, क्या संभव था उनसे श्रेष्ठ 
स्वयं में तो हिंस्र सब जंतुओं को मार रहें, व कहते  सबसे धीमान हम।  

 नर रूप में अन्य प्राणियों प्रति क्रूरता, अन्य  ओर धर्म-विज्ञान प्रवचन  
अनेक उपासना-ढंग, सृष्टि-माता पूजन, पर भिन्न रूपों का असम्मान। 
लोगों ने गोष्टी से कुछ आदर्श बना दिए,  जिससे सुलभ सबका निर्वाह 
लेकिन दबंग निज भाँति ही आँकते, जो   ठीक लगता वैसा आचरण।  

कथित उच्चों के निज-नियम, खाने के और दिखाने के और हाथी-दंत  
पर आदर्श तो सर्व-हितैषी, यदि सुचिता से प्रयोग तो बड़ा भला संभव। 
यह भी मनुजों का चलन, कुछ दबंग अन्यों पर प्रभुत्व हेतु बनाते नियम 
हम श्रेष्ठों का ऐसा ही चलन, निम्न हो, दबकर रहो, जो कहें करों पालन।  

'दमन आदेश' उनका उत्तम, चूँकि दबंग - मजे लेते, अनाचार भी श्रेष्ठ 
तुम बौद्धिक दृष्टि से अति  पीछे हो, मान लिया करो  जो हम कह रहें।
अनुकरण  न करो तुम हमारी श्रेष्ठता का, जो नियम बनाऐं, मौन  सहो
   तुम सम न हमसे किसी भी श्रेणी में, बेहतर होगा स्व-औकात में रहो।  

हम हैं समस्त ब्रह्मण्ड-स्वामी, ईश -अवतार, तुम अधम-जन्म चर 
हम पूर्वेव विद्वान, इतिहास-गौरव, तुम अपढ़-गँवार व गर्त-काल।
हम सुयोग्य, तुमको न चिंतन-आलोचना-प्रतिकार का अधिकार। 

सब आदेश जग-निर्वाह में हैं, निर्बल को चोट भी अधिक ही लगती 
ऊपर से उत्तम-निम्न विशेषण, जीव करें भी तो क्या, कैसे हो प्रगति। 
जब कुछ दमित रखे जाऐंगे, कैसे होगा विकास उनका पूर्ण देह-मन 
वाँछित उचित परिवेश पूर्ण-पनपन को, दुत्कार तो रखेगी अल्पतर। 

तथापि प्रकृति प्रदत्त सब श्रेणियों को निज भाँति विकास कर्तुम मार्ग  
अपनी  रुचियों से वे प्रगति कर सकते, क्षीणताओं से पा सकते पार।  
माना  संघर्ष है  यहाँ जानमाल का, पर और भी तो आगे बढ़े हैं बहुत 
फिर क्यों अटके अपने ही दाँव-पेंचों में, उठ खड़े हो प्रगति लो कर।  

यह जग विशेषकर मानव अति-स्वार्थी, तुम भी आत्म-परिष्कार  करो 
अति-ज्ञान प्रस्तुत आम नर हेतु भी, हाथ-पैर मारकर सीमाऐं बढ़ा लो।  
ज्ञान ऐसे न, 'बहुत कठिन है डगर पनघट की', चेष्टा से निश्चय ही वृद्धि
पनपन संभव, उत्तमता से योग तब कह सकोगे प्राण को परिभाषा दी।  

सब समय बिताकर जा रहें, पर कुछ पद-चिन्ह दीर्घ-काल हेतु छोड़ते  
सीखो उन महाजनों से चेष्टा-वृद्धि, अनेक निर्मल-जन सहायतार्थ हैं बैठे। 
उत्तमता तो निस्संदेह प्रवेश जब निर्मल-चिंतन शुरू,  सर्व-हित में नीयत
तव सानिध्य से यदि कुछ जीवन सकारात्मक संभव, फिर तुम भी धन्य।  

उत्तम-मस्तिष्क सबके विषय में सोचे, विशाल-अंश सब हेतु काम करता 
सबसे जुड़ा अपृथक भाव से, परम-जीव-प्रकृति-ब्रह्माण्ड का नित-वासी।  
सबके लाभ में उसका हित, प्रेरणामय मार्ग, कुछ  जीवन निश्चय ही मृदुल 
बस चल पड़ो बहु-उद्देश्यार्थ पथ में, उत्तम-चिंतन भी जाओगे ही विदित।  


पवन कुमार,
१ अक्टूबर, २०१८ समय २२:२९ रात्रि  
(मेरी डायरी १२ दिसंबर, २०१६ समय ११:४५ प्रातः से)

Saturday, 14 July 2018

वय-वृद्धि क्रम

वय-वृद्धि क्रम 
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कालक्रम में जीव भोला न रहता, बाल्य के शौख-अंदाज उम्र संग लुप्त 
मुस्काता, खिलता-हँसता मुख, आयु की वीभत्स युद्ध-छाया में जाता छुप। 

'भूल गए तानमान भूल गए जकड़ी, याद रह गई नून-तेल-लकड़ी' तीन
प्रातः-जाग बाद दिवस संघर्ष में धकेले हैं, सर्व-दिन सुलझाने में लीन। 
उसकी त्रुटि कभी निजी, स्व पे क्रोध कभी उसपे, दर्शित कुछ तो कमी 
कभी विलंब,  अनुचित-निर्वाह, उपेक्षा, अवहेलना-असावधानी कभी। 

कभी दूजा सुस्त, पूर्ण न रूचि, डॉँट-फटकार, मनुहार का न लाभ भी 
बहु-विषय समक्ष फिर भी निश्चिंत, बस निज काम की बात में ही रुचि। 
विभाग का पूर्ण-दायित्व तो न व्यवहार-लक्षित, बस सुनो और रहो चुप 
नर अति-चतुर, संबंध भी अनुज्ञा, क्या अपेक्षा करें - मूल्य पहचान न। 

वय-वृद्धि संग मानव सठिया जाता, प्रचंड अग्नि अदर्शित नव-यौवन की 
बस जैसे चल रहा चलने दो, संसार हमसे भी पहले था, रहेगा आगे भी। 
आज कहीं पढ़ा कि 'बचपन की ख्वाहिशें आज भी मुझे खत हैं लिखती 
शायद बेखबर इस बात से कि वो जिंदगी अब इस पते पर नहीं रहती।'

बहुतों को बेफ़िकरा सा भी देखता, जो कुछ सामने आ जाएगा कर लेंगे 
कुछ तो जिंदगी की भागदौड़ न समझते, बस समय कट जाए जैसे तैसे। 
जितने प्राणी उतने चरित्र, सब अपनी भाँति विचित्र सा कर रहे आचरण 
कब वे भला तेरे ढाँचे में समाऐंगे, समन्वय न तो विरोध होगा आभासित। 

लोग प्रातः ही गुजर हेतु बहिर्गमन, चाहे संजीदा भी पृथक भाव से देखते 
लोग भूखे मर रहें, अपढ़-सुविधाहीन, पर धनियों को मतलब मुनाफे से। 
कार्य में एक उत्तम कर रहा, सभी तो उसकी प्रतिभा न पहचानते पर  
सबने निज उपनेत्र* पहने, तेरी प्राथमिकताओं से उनको न कोई अर्थ।

उपनेत्र* - चश्मा  

जीवन तो निश्चित ही संघर्षमय, इहलोक को समझाना इतना भी न सरल
सब विषय-तत्व सबकी प्रज्ञा में न आता, न ही किसी की चाहत  समझ। 
तेरे सरोकार तुम तक सीमित, हम करेंगे जितने से आजीविका अबाधित 
अधिक दबाओगे तो विद्रोह भी संभावी, इतने न दुर्बल हैं करें सब सहन। 

एक छद्म-युद्ध प्राणियों मध्य सदा निरत, चाहे बाह्य मुस्कान, जी-हुजूरी 
कौन सुनना चाहता प्रगीत पीड़ितों का, दर्द से बिलबिलाते रहते हैं ही। 
किसी ने काम बोला  तो है शत्रु लगता, चाहे स्व-कर्तव्य का ही हो अंग 
कुछ नर ही दायित्व सहर्ष लेते मन में क्या सोचते देखना अति-कठिन। 

स्व-दायित्व में कुछ करते भी दिखे, पर सच में उपस्थिति का अप्रभाव
त्रुटि सदा रहती, इधर-उधर देखते रहो, जैसे सीधा मुझसे न सरोकार। 
क्या तुम भाषण सुनने हेतु ही आते, बंधु निज-व्यक्तित्व की छोड़ो छाप 
कोई बलात न किसी से कर्म करा सकता, कहे-सुने से ही लो संकेत। 

वरिष्ठ-अवर सहयोगियों की समीक्षा, कुल मिला तव व्यक्तित्व-कसौटी 
संसार भी निज नेत्रों से देख रहा, सभी अरि न कुछ निर्मल-निष्पक्ष भी। 
आदर-प्राप्ति तो निज कर्म-काज से ही, सुलभ न मेहनत करनी पड़ेगी 
सफल जीवन-निर्वाह भी एक कला, यथा-शीघ्र सीखो उतना भला ही। 

प्रतिदिन-संघर्ष थकाता पर सुदृढ़ीकरण, यहीं कुछ हँसी भी सीखनी 
मूल स्वरूप को न भुला देना, सहज रहने से ही गुणवत्ता बनी रहेगी। 
एक स्मित वदन पर बनाए रखनी, आत्म व दूजों का भी करो सम्मान 
कर्कशता त्यागो संघर्ष एक सहज-नियम, मृदु भाव संजोए रखो अंतः। 


पवन कुमार,
१४ जुलाई, २०१८ समय २२:१० बजे रात्रि
(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दि० २५ अप्रैल, २०१८ समय ९:५९ प्रातः से )     


Sunday, 20 May 2018

निकटस्थ - हित

निकटस्थ - हित 
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सभी निज संगठनों से जुड़े रहते, शांत रह समाज हेतु करते काम 
घर-कार्यालय माना प्रधान, पर यहीं नागरिक-दायित्व रूकता न। 

जिस परिवेश में हम जन्म लेते, उसके प्रति लगाव एक प्रवृत्ति सहज 
माना संपूर्ण ब्रह्मण्ड एक कुटुंब ही, निकटस्थों को समझते अधिक। 
हर परिवेश सदस्यों का श्रम-श्वेद माँगता, सुप्रबंधन तो सर्वत्र वाँछित 
जब अपने निर्धन-दुर्बल-दुःखी तो, निस्संदेह अति  त्याग आवश्यक। 

लोगों का अपनों से कुछ विशेष स्नेह ही, जितना हो सके आगे दो बढ़ा 
वृहद-जग की न्यूनतम अपेक्षाऐं भूलते, बंधुओं में ही खोए चाहते रहना। 
घर-संबंधी व कार्यालय को एक सा, अपनों को चाहिए अधिकतम लाभ
अन्य भाग्य कोसते, वह उच्च पदासीन है अपनों को ही फायदा दे रहा। 

चलो कुछ भाई-भतीजावाद भी, अधिक ही दया-दृष्टि क्षेत्र-जाति-धर्म पर 
 पर सार्वजनिक नर को न लोभ उचित, संविधान प्रदत्त कर्त्तव्य यह एक। 
निजों का ध्यान भी न अति बुरा, स्वास्थ्य-शिक्षा-विकास हेतु कमसकम 
यदि सक्षम तो स्वयं पथ ढूँढ़ लेंगे, तेरी  भूमिका मुख्यतया मार्गदर्शक। 

जीवन का सत्य-लक्ष्य अधिकतमों में  सकारात्मक परिवर्तन करने का 
लोग पढ़-लिखकर सुयोग्य बनें तो अपनी जिम्मेवारी खुद सकेंगे उठा। 
कब तक रहेंगे वे वैसाखियों पर, खड़ा ही होना सिखला दो सहारे-निज
 जन-स्थापित कई संगठन हैं पर-सहायतार्थ, अधिकतम कर्त्तव्य-पालन। 

माना घर-जीविकार्थ पूर्वेव अपेक्षित, तथापि कुछ ऊर्जा वाँछित अन्यार्थ 
लघु उपकार से भी महद-हित, डूबते को तिनके का सहारा है वरदान। 
जितना संभव हो उतना कर दो, तुम भी अनेक सहायताओं से ही वर्धित 
कुछ समन्वय कर चलो जहाँ संभव, अन्यों  संग अपने भी प्रगति-पथ।   

हर स्तर पर सदा न्यूनाधिक राजनीति, तुमको काम करना चाहिए आना 
कमसकम नियमानुसार लाभ भी दोगे तो अति जन-कल्याण हो सकता। 
मात्र रुदन-शिकायतों से न हल, सकारात्मक कर्म-परिणाम से ही श्लाघा 
एक समय मिला महादान हेतु, थोड़ा सोचो व सहायतार्थ चरण दो बढ़ा। 


पवन कुमार,
२० मई, २०१८ समय 00:0७ मध्य रात्रि 
(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी १४ जून, २०१७ समय ९:४६ प्रातः से ) 

Saturday, 28 April 2018

निज-निर्णय

निज-निर्णय 
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लोगों से सीखना ही होगा, निर्भीकता से निज बात कहना   
लोग चाहे पसंद करें या नहीं, जो जँचता प्रस्तुत कर देना।  

उक्ति है  'Always Take Sides', जो एक को मनानुरूप लगे 
हम सदा उचित न सोच पाते, पूर्वाग्रह-आवरण ओढ़े रहते। 
बहुदा एक मन बनाते, परिस्थिति-परिवेश-शिक्षण अनुसार 
वही सर्वोचित, परिणत भी न चाहे यावत लगे न बड़ा झटका। 

कौन उचित देख सकता, भावुक होकर विषयों में जुड़े रहते 
पता न क्या सोच रहें, किसी ने मन की कह दी, साथ हो लिए। 
सदृश-संपर्क सदा सुखद, कोई किञ्चित हटे रिपु सम प्रतीत  
विषम विचार-धाराओं से छद्म युद्ध, हर स्व में उचित घोषित।  

अद्यतन भारत में गुरु-वाद, विमुद्रीकरण ५००-१००० रु० के नोटों का
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कोई ठीक कहे समझकर, या यूँ ही हाँ।  
नेता जनों को बहुदा प्रलोभन देते, सत्य में क्या लाभ हो सब अज्ञात 
कुछ समय हेतु मन प्रसन्न, सत्य भी कि सदैव न रह सकते निराश। 

आम जनता को तो सब्जबाग दिखाए जाते, चुनावों में जुमले सुनते  
नितांत असंभव बात को भी लोग प्रायः सत्य मान विश्वास कर लेते। 
वक्ता भी जाने न हाथ उसके, तथापि अभी तो बस निर्वाचन-जीत   
आगे का देखा जाएगा, लोग भूलेंगे, आ जाऐंगे जीवन में वास्तविक। 

पर क्या अग्रिम संभावना न अन्वेषण, विरोध तो होता हर विषय का 
नेता बड़े फैसले ले लेते हैं, कुछ स्वार्थ भी, सरल भी है मिथ्या संभव। 
वे भी तो एक मानव ही, उनसे भी होती सब तरह की भूले-अपराध  
पर क्या हाथ धरे बैठे, शक्ति में हो कुछ परियोजनाऐं करो साकार। 

जग ने कुछ तो कहना है पर करो जो सार्वजनिक हित में लगे उचित
जरूरी न सहयोगी-प्रशंसक सदा ही खुश, उनकी भी तो सोच-निज। 
विरोधी-वार्ता को तो छोड़ दो, हर कदम पर है स्वार्थ-कुचक्र ही दर्शन 
कुछ उचित तर्क भी संभव, अतः समझना, अपने से भी उठना ऊपर। 

क्या सक्षम उचित-जाँचन में, जबकि विषयों का अति अल्प-ज्ञान है
फिर जिंदगी में कुछ जोखिम तो लेना होगा, होने के लिए उठ खड़े। 
हर पहलू में है अच्छाई-बुराई, हर महद प्रयोग का सदा मूल्य एक  
वह अहम को भी देना पड़ता, दुनिया भूलों का हिसाब लेगी माँग। 

किसको छोड़ता जग, अति-पूर्व मृत को भी तंजों से जिलाए रखता 
हर महान पर भी चरित्र-दोषारोपण, सामान्यों की तो करें बात क्या। 
इतिहास-पुराणों, महाकाव्य-ग्रंथों में, सब तरह के चरित्रों का बखान 
माना लेखक का भी एक मंतव्य, पर प्रजा भी का निज-ढ़ंग विचार।  

माना स्वार्थ एक सीमा, बहुदा क्षीणता से बाहर आने का यत्न  
जरूरी न गृहकार्य पूर्ण ही, सलाहकारों पर भी अति-निर्भर। 
वे भी सब अपूर्ण, ज्ञान-अनुभव-विवेक सीमा में उपदेश करते 
जीवन तो सब भाँति, अपूर्णता हुए भी सब कार्य करने पड़ते। 

देश में एक महा बौद्धिक युद्ध, सबका विषय पर निज-मंतव्य 
पक्ष-विपक्ष में भक्तों-विरोधियों के सब संवाद हो रहें प्रचलित। 
न जाना चाहूँ गुण-अवगुण , पर निर्णय तो शासन द्वारा ले गया 
नकारात्मकता क्षीण हो, भविष्य मोदी को समेकित आँकेगा।

माना विशेषज्ञ उनके पास भी, पर विद्वानों की शिक्षा श्रेयस्कर
आस्था लेना जरूरी जबकि ज्ञात प्रबल वेग, हानि विफलता पर।
आपकी मंशा है पवित्र संभव, आमजन-सुविधा हेतु कुछ छूट थी
पर विशाल १२५ करोड़ जन, बहु अभाव-कष्टों में रहा देश जी।

तुलना अनुचित संपन्नों की निर्धनों से, जो अति-अभाव में जीते
लोगों का हक़ मार अनेक अमीर, कोई कहे तो दुश्मन लगते।
कहाँ से वैभव-साम्राज्य फूटता, क्या नेकी से ही कमाया पैसा
लाभ की भी हो सीमा, सच-झूठ बोल ही न उल्लू करे सीधा।

देश में विधि-राज्य होना आवश्यक, न्याय मिले खुशहाल सब
उत्तम नृप का तो निर्बल-हित मन, निस्संदेह समता वृद्धि कुछ।
यह न दानवीरता या अनुकंपा, सबको सम हक़ जो ईश भी चाहे
छोटे दड़बों में निर्धन-निरीह, कुछ प्रकाश हो तो सुकून मिले।

क्या मत कवायद में, लुब्ध-चाटुकार-पूर्वाग्रहियों की बात छोड़
सब निज ढंग से स्थिति-लाभ लेंगे, किंचित लाभ आम प्रजा को।
यह 'ऊँट के मुँह में जीरा', या अनावश्यक कष्ट में देना धकेल
समृद्धों पास तो सब उपकरण, निर्बलों को ही परेशानी महद।

चलो अल्प-कालिक दुःख भी झेलेंगे, यदि अग्र सुख-संभावना
पर जरूरी कि लूट-खसोट संस्कृति पर चाहिए विराम लगना।
 फिर बाँटना सभी में यथोचित, देश की खुशहाली सभी में बँटे
न्याय बड़ा शब्द यदि प्रयोगित, इससे विश्व-चित्र बदल सके।

मेरी मंशा ठीक चाहे तरीका न, न ही उस पर पूर्ण-विचार
जो किया जैसे बना, भाई सहयोग से ठीक करना आकर।
आँको जो उचित लगे, मंशा पर प्रश्न न हो, ठगा जा सकता हूँ
इतना बुरा न, दारिद्रय देखा, आज स्थिति में तो क्यूँ न सोचूँ।

मत तुलना करो अन्य पूर्वजों से, इस काल में हूँ काम दो करने
टाँग-खिंचाई प्रजातंत्र में जरूरी, तंज-तर्क उचित दिशा देते।
चाटुकार तो मरवा ही देंगे, प्रजा तुम सहारे सहयोग देना पूर्ति
प्रतिबध्दता समरस समाज प्रति, लोकहित में ही निज-उन्नति।

पवन कुमार,
२८ अप्रैल, २१०८ समय ११:२३ म० रा०
(मेरी डायरी दि० ३० नवंबर, २०१६ समय ९:२० प्रातः से)

Saturday, 24 February 2018

कर्त्तव्य-परायणता

  कर्त्तव्य-परायणता 

कितने दिन का चुग्गा-पानी नर का, न कोई कथन-शक्यता 
अति-दूरी होंठ एवं प्याले मध्य, जो खा लिया वही है अपना। 

स्थल-विरक्तता, व्यक्ति-त्यक्ता, प्रायः सबसे निर्लेपता  भाव 
मानव छूटता जाता बंधनों से, या स्व-जिम्मेवारियों से दुराव। 
जगत के रासें इतने क्षीण भी नहीं, कि बैठे-२ हल  हो  जाऐं  
कहाँ के पाप कहाँ भोगने पड़ेंगे, न पिंड छूटे चाहे भाग जाए।

कुछ अनिकृष्ट हाथ पर हाथ धरे बैठते, पूर्व-चिंतित बुरा ही 
स्थिति ऐसी पैदा कि कलमुँही जुबान निज-प्रभाव लाएगी ही। 
 चेष्टा तंत्र पंगु करने की, न खुद करें औरों को भी करने देंगे न 
अवरों  पर पूर्ण-प्रभाव, वरिष्ठों की फटकार से भी अपरवाह। 

पलायनवादी प्रवृत्ति जग-कर्त्तव्यों से, पर स्वार्थों में न अल्पता 
दो दिवस भी विलंब यदि वेतन, गगन सिर पर सही उठाना। 
निज विभ्रम ज्ञान-अहंकार में विमूढ़, मनन एक हठी सा बस 
हम तो मरे तुम भी न बचोगे, ऐसों को बनाया प्रतिष्ठान-अंग। 

कर्त्तव्य-विमूढ़ता, शासन-विरोध, उत्तम अश्रव्य व स्व-मदांध 
न कोई परम का ज्ञान, स्व-अविश्वास और तर्क जैसे हैं सगर्व। 
घोर-नर्क स्थिति पर स्व-घोषित ज्ञानी, न किसी के योग्य-विश्वास
दुर्जन-मित्रता, सज्जन-दुराभाव, प्रकृति ऐसी कि अभी दे त्याग। 

यदि ज्ञान तो भी अकर्मण्य, कर्म वे जिनका फल नकारात्मक
बस निष्प्रयोजन कागज कृष्ण करते, समझते हम ही सक्षम। 
पर-दुरालाप न है उत्तम प्रवृत्ति, पर कष्ट होता जब आए बाधा 
क्या मात्र हो वेतन-ग्रहण माध्यम, संस्था-आदर क्यों न चिंता ? 

क्यों अपुण्य सोच सदा, क्यों ऐसी तुम्हारी तामसिक प्रवृत्ति  
क्यों न रचनात्मक, कुछ सुकर्म से छोड़ते निज-सुनाम ही ? 
क्या जीवन में सर्व-वंचना ही लेनी, या सुयशार्थ भी कुछ कर्म 
मत गँवा हीरक-जन्म को, जब जाँचा जाएगा तो बड़ा दुःख।  

निर्मोहीपन एक गुण, पर जहाँ से भृत्ति उस हेतु न चिंतन 
प्राथमिकता भय-वश की, पर रणछोड़ से तो कहाँ सिद्ध? 
हर समय शंका सब पर, माना सर्व-जग तेरे विरोध में ही  
कर्म-शील अधम, मन व्यस्त पर-निंदा काना-फूसी में भी। 

क्यों बुरा सोच सबका व निज-अहित, एक शैली सी गठन 
न तू आदर्श-प्रतीक, गजदंत खाने को और दर्शन के अन्य। 
बस यूँही जीवन-आयु बिता रहें, उस पार भी ठौर न मिलेगा 
संसार से सदा भागे फिरते हो, परलोक में भी पाओगे क्या ? 

 कुछ कर्मठता-प्रतीक बनो, सकारात्मकता का जीवन प्रवेश 
करो संचार अन्यों से जहाँ जरूरी, स्व-कर्त्तव्यों प्रति सचेत। 
क्यों अन्य कहें कार्य न करते, अपनी सुध तेरी  प्रतिबद्धता  
सम-स्थिति स्थापना तो  कर्म से ही, न कि से अकर्मण्यता। 

धीर-मन स्वामी बनो, किञ्चित अन्य आऐंगे श्लाघा हेतु तव
जग सत्य परिवर्तन चाहता, माना परोक्ष भी अनेक षडयंत्र।  
चुगली-स्वार्थ, सज्जन-विरोध, चलते कामों में रोड़े अटकाना 
सोचते हटाने हेतु, जबकि उचित वातावरण दायित्व उनका। 

तेरा क्षेत्र किञ्चित अल्प-संख्यित, वे डराते-धमकाते बाहुबल से 
हम जैसे चाहे तुमसे व्यवहार करे, हम स्वामी क्यों नहीं सुनते। 
घुड़कियों से भय-प्रसारण मंशा, अन्य भी तो सेवा करते हमारी 
क्यों शासन-नाम से हमारी बात न मानते, यह तो बड़ी हेंकड़ी। 

हम मारे भी तुम न चीखो, जैसे कहा जा रहा मौन जाओ सुने 
मेरा प्रांगण मेरी न मानोगे, तुमको छोड़कर अन्य को ले लेंगे। 
अन्य की सब विसंगतियाँ सहन, तुमको सिखा देंगे कार्य-निर्वाह 
    हम चाहे मिथ्या-कर्म करें, तुम बस रखो अपने काम से काम।     

कैसा विरोधाभास जनमात्र में, चरम स्वार्थपरता भारी आदर्श पर 
असत्य वचन न लज्जा, मुक्ति हेतु उल्टी-सीधी युक्ति लगाए बस। 
पर-लाँछन पर स्वयं न सुकरणीय दान, बंधु तेरा भी अहित होगा 
मानो अति-हानि उठानी पड़ेगी, स्वयं रोपित तो काटना पड़ेगा। 

पवन कुमार,
२४ फरवरी, २०१८ समय १७:२४ अपराह्न 
(मेरी डायरी ३ जुलाई, २०१५ समय ९:४८ प्रातः से)   

Sunday, 10 December 2017

मन-दृढ़ता

मन-दृढ़ता
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कौन हैं वे चेष्टाओं में प्रेरक, मूढ़ को भी प्रोत्साहन से बढाते अग्र 
निश्चितेव कर्मठ-सचेत, वृहद-दृष्टिकोण, तभी विश्व में नाम कुछ। 

क्या होती महापुरुष-दिनचर्या, एक दिन में कर लेते काम महद 
प्रत्येक पल सकारात्मक क्रियान्वित, तभी तो कर जाते अनुपम।
 किया निज ऊर्जाओं को संग्रहण, मात्र वार्तालाप में न व्यर्थ समय 
श्रम-कर्त्तव्य संग ही समय-व्यापन, शनै योग से निर्माण बेहतर। 

महाजन-परियोजना भी विपुल, एक साथ ही अनेक विषय-मनन 
जटिल विषयों पर भी विशेषज्ञों संग, विचार बना निर्णय में समर्थ। 
सशक्त बहु-आयामी निवेशों से, व्यक्ति-अस्मिता का स्पष्ट-दर्शन 
 स्व की  कर्मों से सार्थक-रचना, लोगों को हैं काम, करते सम्पर्क। 

क्या स्व-प्रति पूर्ण-समर्पण, निज से  ही महायुद्ध - कुप्रवृत्ति-विजय 
स्व देह-मन ही कुरुक्षेत्र, पक्ष-विपक्ष सेना भी स्वतः ही रही जनित। 
एक हूँक सी उठती स्व-जयश्री की, कैसे महत्तम निज ही से उदित 
पूर्ण समावेश मन-आँचल में, कंदर्प (कूर्म) सम स्व में ही सिकुड़न। 

प्रथम बनो निज- कार्यक्षेत्र, जब  अंतः-शक्त होंगे तो बाह्य भी सरल 
बाह्य भी अंतः से न अति-विलग, संवेदनशील चेष्टा को लेंगे पहचान। 
जग-पथ सुगम जब निज-संतुष्टि, वरन पर-छिद्रान्वेषण में ही व्यस्त  
बाह्य युद्ध-प्रहार तो सहन शक्य, अंदर से तेजस्विता अत्यावश्यक। 

कोई महद-उद्देश्य पकड़ लिया मन ने, समस्त-चेष्टाऐं वहीं समर्पित 
लोगों ने जीवन-विचार की धाराऐं बदल दी, मन की दृढ़ता थी महद। 
उनको निज व्रत-दर्शन पर श्रद्धा, मन बनाकर जोर कार्यान्वयन पर 
उपदेश की भी वाँछित शैली, एक नर ने ही रच दिया गुरु राज-धर्म। 

एक मनुज में अति-बल संभव, जब और बढ़े क्या न कर सकते तुम 
 स्तुति-ग्रंथ बाद या जीवन-काल में लिखित, जीते-जी दिया काज कर। 
पुरुष में जीवनी-शक्ति चाहिए, एक अदम्य साहस-चेष्टा का प्रार्दुभाव 
मानव-संकल्प एक प्रबल उपकरण, ऊर्जा समेकन से सर्वस्व संभव। 

कैसे परियोजनाऐं प्राप्त हैं निष्ठावानों को, लोग कर सकते विश्वास 
कार्यान्वयन  में सफल भी हो जाते, लघु-२ जोड़  बना लेते महान। 
अवसर हाथ से न जाने देते, जरूरत होती तो जाकर बात कह देते 
स्वीकारोक्ति भी एक गुण, संजीदा देख तो लोग प्रतिक्रिया ही देते। 

जीवन-दर्शन विवेचन अति-कठिन, निज-पथ गठन और भी दुष्कर 
पर जो समर्पित  परमोद्देश्य में, किञ्चित हो जाएगा ध्रुव के भी पार। 
लेखन-भाषण-ज्ञान-कर्म व प्रत्यक्ष व्यवहार, श्रद्धा-संभरण में समर्थ 
पार्थिव-सुविधा में अल्प-रूचि, उचित जग-परिणति ही चेष्टा-समस्त। 

बहु-रूढ़िवादिताऐं जग-व्याप्त, प्राण परम-सत्य जान सकते ही कम 
अल्पतर जो पुरा-भ्रामक रूढ़ियों पर, निष्पक्ष  टिप्पण-कर्तुम समर्थ। 
लोगों को निज-सोच का अंग बनाना हुनर, जुड़े तो ही बलयुत बनेगा 
इतिहास हटा नव-नियम निर्माण-साहस, बीज में वृक्ष-दर्शन-कला। 

चाणक्य सी प्रतिज्ञा कर ली कि नंद-वंश को मिटाकर ही हूँगा प्रसन्न 
बुद्ध का समाज-धर्म कुरीतियों पर घात, रचा एक निर्मल-मानव धर्म। 
मुहम्मद ने देख अनेकों की दुर्दशा, पहुँचाया वसुधैव-कुटुंबकम नियम 
सर्व-नर सम भू-संसाधन सबके, क्यूँ कुछ ही कर लें अधिकार-पूर्ण।  

डा० अंबेडकर ने जाति-मूलक समाज-अपुण्यों को किया जग समक्ष 
एक नूतन मानवता-दर्शन, विधि-सहायता से किया आमूल परिवर्तन। 
सर्व हेतु सम मूल-अधिकार, धर्म-जाति-स्थान नाम से कोई भेदभाव न 
अति साहस कि दबंग-तंत्र से भी संघर्ष, अंतः-शक्त थे सब गए सहन। 

उत्तम  परिवेश दान वर्तमान-भावी संतानों को, व्यक्तित्व की कसौटी  
मात्र खाने-सोने से मनुज-प्राण क्षय, श्रम से ही संभव श्रेयस-परिणति।  
क्रांतिकारी आऐ धरा पर, धारा ही बदल दी, निज-हेतु भी सोचो नाम
जब सोच की नर-जीवन में स्थली, अमर होवोगे, यही है जीवन-पाठ। 

लोगों ने हर काल में श्रम किया, महत्तम हेतु होवों समर्पित लगा मन
     जीवन-आविष्कार को मूर्त रूप दो, प्रयास से आते परिणाम महान।    


पवन कुमार,
१० दिसंबर, २०१७ समय १९:५५ सायं  
   (मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दि० २८ मार्च, २०१७ समय ८:२२ प्रातः से )
    

Monday, 31 July 2017

रक्त-रिश्ते

रक्त-रिश्ते


रिश्तें हैं प्राण- वाहक, हम निकले उनसे, रक्त-संपर्क से युजित

कह सकते हैं सीधे जुड़े, किसी औपचारिकता की न जरूरत॥

 

कुछ रिश्तें अति-प्रगाढ़ जैसे माँ-पिता, दादी-दादा, नानी-नाना

भाई-बहन, मामा-मौसी, चाचा-बुआ, चचेरा-फुफेरा, ममेरा-मौसेरा।

रक्त से अभिभावक-कुलों से सीधे जुड़ते, शृंखला-गमन दूर तक

माना दूर तक ढूँढ़ना-निबाहना कठिन, तथापि प्रयास से संभव॥

 

कितनी गहराई तक हैं रक्त-मूलें, हम अधिक ध्यान न दे पाते

इस अल्प- जिंदगी में इतने मशगूल, भूलते कोई और भी हैं।

अति- सुलभ अन्वेषण यदि चाहें, गहन योग देह-आत्माओं में

प्रेम-भाषा बोलकर देख, सब आऐंगे बाह पसारे गले मिलने॥

 

रिश्तें हमारा उद्गम-स्थल, रक्त-वीर्य प्रवाह होता अति-दूर तक

एक-दूजे के गुण परस्पर बाँटते, शक्लें-व्यवहार जाते से मिल।

अति स्थल-दूरी से संपर्क बाधित, कुछ समय पूर्व था स्नेह-अति

विवाह-उत्सवों में मिलन-रीत, परस्पर देख होती अति-ख़ुशी॥

 

हम आपस के सुख-दुःख बाँटते, जानते अपना है हानि न करे

जैसे निज आत्मा का एक रूप, कुछ न दुराव अपने भीतर है।

ख़ुशी- नाराजगी तो वहाँ भी हैं, कह-सुनकर हल्का होता मन

सभी मनोभावों से हम गुजरते, हर परिस्थिति नहीं निज-रूप॥

 

अनुवांशिक- गुण तो अति- विस्तृत, विज्ञान से विस्तार-विवरण

माता-पिता, भाई-बहनें निकटतम, रिश्तें हैं सुदूर तक वाहक।

हममें-उनमें अभिभावक-गुण साँझे, अटूट योग है नित-सुदृढ़

अनेक ही उसमें युजित हो सकते, जितना चाहे उतने संभव॥

 

रक्त- रिश्तें अति-महत्त्वपूर्ण, माना सिमट जाते कुछ दूरी पर

जानते हैं अपने ही, संसाधन-समय अभाव से दे पाते न ध्यान।

कुनबा-अवधारणा ज्ञान, माना कि सदस्य भी आपस में लड़ते

तथापि न्यूनतम सदाश्यता, अन्य- विरुद्ध सब हैं एक-जुटते॥

 

प्रेम की चहुँ ओर जरूरत है, स्वार्थ से किंचित कृत-संकुचित

निज-कोटरों में ही दुबके, बाहर आ अन्यों को न लगाते कंठ।

स्व-दामन सिकोड़ अनावश्यक, जब अनेक जन समा सकते

मन को जब स्नेह-शून्य किया, विश्व-बंधुत्व राह खुलेगी कैसे?

 

संबंधी सब आर्थिक-सामाजिक स्थिति में, निर्धन से दूरी अग्रों में

जब समुचित जानते अपने ही, तटस्थता-भाव दिखाते स्वार्थ में।

ज्ञान का क्या लाभ यदि न व्यवहार-दर्शित है, किए दूर निज भी

संबंधियों को तज अन्यों से संपर्क बढ़ाते, धीरे दूरी बढ़ती जाती॥

 

स्व-रुचियाँ हैं महत्त्वपूर्ण, न आवश्यक रिश्तेदारों से पूर्ण-मेल

अपने-२ गुट बना लेते, समय आने पर यह या वह पक्ष है लेत।

स्पर्धा-स्पृहा अधिक परस्पर में, आगे-पीछे टाँग भी खींच देते

एक-दूजे का मज़ाक भी बनाते, जैसा उचित जँचे निभा लेते॥

 

मित्रता एक वृहद-अध्याय, इस पर विस्तार से चिंतन कभी

अभी विषय रक्त-रिश्ता, कैसे मिठास है डाली जा सकती?

उसके अतिरिक्त संबंधी भी, भले प्रत्यक्ष रूप से नहीं जुड़ते

मेल-जोल से ही निज बनते, अपनापन सा हो जाता शनै-२॥

 

जहाँ हृदय-समीप वहाँ माधुर्य, प्रेम से परस्पर वर्धन-उत्साह

सभी कुछ सहन चाहे कत्ल भी हो, प्रेम सर्वोपरि लेगा स्थान।

अभिभावक-संतानों में न है स्पर्धा, झेल लेते उच्छृंखलता भी

बंधु-भगिनियों में आदर, अति-गुणवत्ता संभव अस्वार्थ यदि॥

 

एकत्रित करें संबंधी-कुटुंबियों को, घर जाकर दिखाऐं स्नेह भी

वे भी हमारे प्रेम के भूखें, मिलने-जुलने से तो निकटता बढ़ेगी।

यदि परस्पर स्नेह-समझदारी, एकजुटता से तो शक्ति-विश्वास

एक-दूजे को सहना भी श्रेष्ठ गुण, जीवंतता से है वर्धन-सौहार्द॥

 

सबमें सब भाँति के गुण, उत्तम को अपनाऐं क्षीणता को तज

सहनशीलता निज-पालक, आगे बढ़ो, सबको लगाओ कंठ॥



पवन कुमार,
३१ जुलाई, २०१७ समय १३:५१ दोपहर 
(मेरी डायरी दि० २५ जुलाई, २०१६ समय १०:२७ प्रातः से) 
    

Sunday, 25 December 2016

दर्शन-यथार्थता

दर्शन-यथार्थता



कैसा जहाँ हम बनाना चाहते, सोच का ही है खेल

जो भी यहाँ अच्छा-बुरा जैसा, सब है मानव-कृत॥

 

क्या सोचते हम परिवेश हेतु, जो हमारा आवास है

कितनों को व क्या सबको, उसमें सम्मिलित करते?

अपने जैसों से सम्पर्क साधते, अन्यों को बाहर रखते

स्वार्थ निज, साधन सबके, व फिर अधिकार जमाते॥

 

कैसे संग्रह कुछ ही द्वारा, जब सब कुछ है प्रकृति-दत्त

पृथ्वी पर जन्म लेने का अर्थ तो, भागीदारी है समस्त।

कैसे कुछ वैभवशाली बनते, अन्य अनेक पिछड़ जाते

भौतिक-दशा में अति-अंतर, यदा-कदा संग्राम होते॥

 

यह मेरा और तूने उठाया, निश्चित ही है अपराध महद

मेहनत का यह परिणाम है, तू मुफ्त में चाहता मगर।

एक बड़े ध्यान से कार्य करे, दूजा काम से दिल चुराऐ

ईर्ष्या करें या भाग्य कोसें, या अपराध- प्रवृत्ति है पाले॥

 

शरीर- मन स्थिति में असल, सबका पृथक है व्यवहार

कुछ की रूचि इसमें या उसमें, अन्यों का और विचार।

कुछ निज-प्रेरणा से इंगित, अन्य तो रास्तों पर चिन्हित

अलग श्रम व ईनाम भिन्न, लाभ भी होता तथैव वितरित॥

 

फिर किसी के पास, अधिक उपलब्ध संसाधन-वस्तुऐं

अनेक किन्हीं अल्प से ही, अपना जीवन यापन करते।

शनै वर्धित है अंतर उनमें, भौतिक -स्थितियाँ होती भिन्न

प्रयोग तब प्रासंगिक-वस्तुओं का, अन्यों से और पृथक॥

 

अभिमान प्रकट नव-धनाढ्यों में, अन्यों को समझें निम्न

कुछ यदि उन्नति भी चाहें, उसमें बाधा करते हैं उत्पन्न।

समकक्ष जन अपने दल बनाते, और अन्यों से है स्पर्धा

निर्बल मात्र निज-दैव कोसते, व करते लाचार गुजारा॥

 

तब सुख-तृप्ति हेतु, उनको होती सेवक-आवश्यकता

कुछ निरीह पकड़ काम हेतु, बनाते हैं दास-सेविका।

संघर्ष अल्प करणार्थ, कुछ मृदु- भाषी चतुरों के साथ

वाक-पटुता से, करते अन्य-दलों की सन्तुष्टि-प्रयास॥

 

सकल कलाप आरम्भ, सामान्यों की स्थिति रखने निम्न

युग्म मधु-सोम, नशे में रहें, चाहे कहीं और फँसाकर।

वे अल्पज्ञ भ्रमित होते, तथाकथित ज्ञान के व्यूह-पाशित

सम्मिलित कर्म-कांड, अंध-विश्वासों में, व्यर्थ प्राण फिर॥

 

समस्त दर्शन व ज्ञान उपलब्ध की हैं, निज प्राथमिकताऐं

कुछ सज्जन समदर्शी भी, पर अन्य स्वार्थों को ही बढ़ाऐं।

कुछ का हित-साधन, स्वयं को परितोषिक, यही है दर्शन

बाह्य वेष-आभास मृदुता से, अन्यों को भी लाभ है कुछ॥

 

किनको रखना किनको हटाना, किसको क्या देना ज्ञान

इसका निर्धारण चतुर करते, अल्पज्ञ रहते हैं जन-आम।

बड़े-संगठन, बड़ी-चर्चाऐं हैं, निश्चित ही समर्थ बल-वर्धन

अच्छा होता यदि सर्व-हित, लाभ भी बँटता सार्वजनिक॥

 

जीवन- विस्तार को, एक ज्ञान ही प्रेरणा-वाहक, संवर्धक

अगर वह भी उचित न, तो कैसे विकास-सुदर्शन संभव?

मृदु-चित्त समझते सब, षडयन्त्र-स्थापन का घोर-विरोध

झंडेवाले आते झुठलाने को, यथा-स्थिति रखने पर जोर॥

 

दार्शनिक हित साधते समर्थों का, तभी तो पाते हैं सम्मान

आमजन की क्या चर्चा हो, अल्पज्ञान से व्यूह न पाते फाँद।

यदि उन्हें भला भी लगता, तो भी न है निम्न- स्थिति उबार

आध्यात्मिक ज्ञान- विकास से, कुछ तो अवश्य ही बाहर॥

 

चिंतक चिंतन करें यदि सर्वहित-सुख, तो निश्चितेव श्लाघ्य

यदि वह नितांत भ्रामक-स्वार्थी, तो कितना विकास समग्र?

आधुनिक शिक्षा-प्रणाली ने, बहु-आयाम लाने की एक पहल

सुविद्या-ज्ञान उपलब्ध सबको, तथापि प्रचलित कुछ प्रपंच॥



पवन कुमार, 
२५ दिसम्बर' २०१६, समय १८:४० सायं  
(मेरी डायरी दि० ५ जुलाई, २०१४ समय ११:५५ मध्याह्न से)

Thursday, 14 April 2016

नवयुग तारक

नवयुग तारक


एक महापुरुष भारत-धरा पर अवतरित हुआ, बाबाओं के देश

छाप छोड़ी स्व-व्यक्तित्व की, मानवता कृतज्ञ-उऋण है निर्लेष॥

 

भारतवासी तो सदा मननशील, चराचर विश्व के जीवन-मरण प्रश्न

स्व- भाँति परिभाषा देते रहें, कुछ को सुहाता अन्यों को अनुचित।

'वसुधैव कुटुंबकम' सिद्धांत पुरातन, प्राणी समन्वय से ही जी पाता

'आत्मवत सर्व-भूतेषु' सर्व-भेद निर्मूल-सक्षम, यदि आचरण में होता॥

 

मनुज सुविज्ञ मानव-जाति एक-स्वरूप का, तभी तो प्रतिदिन निर्वाह

आम नर को निज कुल-गर्व पूर्वाग्रह भूल, सर्व-सहयोग का है आग्रह।

जीवात्मा एक परम-पुञ्ज का ही बिंदु, सब में दीप्त अंतः-बाह्य प्रकाश

परस्परता अनिवार्य प्रति-पग, जीव समाज-वासी - एकांत मात्र ह्रास॥

 

सर्व-भाव सर्व-प्राणी स्वतः निहित, प्रयोग उपयुक्त आवश्यक काल में

दुर्गुण - सुगुण हमसे चिपके हैं सदा, अपनी भाँति से व्यक्त विचार में।

उत्तम-विकृत एक स्थिति-प्रयुत परिभाषा, मूल्यांकन स्व-रूचि अनुसार

प्रत्येक विवेचन कर्म-स्वभाव का, निष्पक्ष ही सक्षम व्यक्तित्व परिणाम॥

 

सदैव असंख्य-कोटि जीव धरा पर विचरण करते हैं, लें लघु मन गान

गीत गाते स्व-धुन में, अनेक कर्ण-प्रिय तो कुछ अनर्गल-बेसुरी तान।

अनुलोम- विलोम समगुण अनुरूप समूह, प्रत्येक न सब हेतु हितकर

स्वार्थ एक प्रमुख जीव-विकार, मनुज बह जाता है लघु-तृष्णाओं पर॥

 

तथापि मानव एक ही जाति, यह सत्य भुलाकर कुछ स्वार्थ-आचरण

सर्व-प्राकृतिक संसाधन हों स्व-कर, हर जीव-अजीव पर आधिपत्य।

कुछ प्रयास से आगे बढ़ गए, भौतिक-सांस्कृतिक प्रतिभा विकसित

जीविका के निर्मल-नियम निर्माण, निज-जीवन तो न्यूनतम ललित॥

 

भागम-दौड़ परस्पर प्रतिस्पर्धा-आकांक्षा, स्व-कुल का ही पूर्ण-उत्कर्ष

अन्य छूटें न पीछे- न प्राथमिकता, निज संसाधन वृद्धि में बुद्धि प्रयुक्त।

निज एक विचारधारा सी बनाई, हमीं श्रेष्ठ अन्य निकृष्ट ही अतः त्याज्य

कुछ नियम स्व-हित ही निर्मित, सम्मुख-थोप दिए वृहद मनुजता पर॥

 

विश्व-क्रीड़ा ऊर्जा-सदुपयोग की, क्या उपकरण निकट प्रयोग भरपूर

विशाल पृथ्वी है धन-धान्य बाँट रही, उठ-खड़ा हो कर निर्धनता दूर।

है संघर्ष विचार-धाराओं का स्वाभाविक, प्रत्येक का स्व-विधि प्रज्ञान

क्यों हार मान जाते मन सस्ते में, आवश्यक नहीं तुम ही हों अनजान॥

 

वृहद-कोष प्रकृति द्वारा प्रस्तुत, निवेदन सभी से शिक्षित बन पढ़ लो

नर को विश्लेषण की योग्यता प्राप्त, प्रयास कर अनुपम निकाल लो।

जब विवेकी बने यदि जीवन में, सर्व-मनुजता हित-तत्व निकाल लोगे

महापुरुष स्वार्थ से अग्र-कदम, सर्वोत्तम-अनुसंधान का यत्न रखते॥

 

हर देश-काल में हैं युग-पुरुष अवतरण, गीता-महावाक्य उद्घोषित

जब-२ धर्म की ग्लानि है, प्राणी कष्ट-त्राण हेतु जन्म होगा स्वाभाविक।

नर कदापि न है विपत्ति-मुक्त, सदा एक साँसत हटी तो दूजी सम्मुख

रामबाण है `संकट कटें मिटे सब पीरा -जो सुमिरे हनुमत बलबीर'॥

 

मनुज ज्ञान-प्रमाद स्वरूप अंधकूप-पतित, बहुदा उचित पथ न सूझे

तब सक्षमों का मुख ताकते, विडंबना से बाहर करो - हम भी उबरें।

ये कौन बनते सुयोग्य या पैदा होते, कौन शक्ति यत्न कराती अक्षुण्ण

तन-मन क्षीणता त्याग सफल रूपांतरण, न अन्य लेंगे सतही पतन॥

 

नर शिशु क्षीण ही होता, गृह-कुल-समाज परिवेश सहायक घड़न में

पर सबको नहीं सम परिस्थितियाँ उपलब्ध, उतने में ही संतोष करते।

कुछ न संतुष्ट मात्र बहलावे से, क्या सत्य-सम्पदा- ज्ञानार्थ यत्न करते

दुर्दिन निवारण महद प्रयास से, न थक-हार बैठ जाना विपदाओं से॥

 

क्या मार्ग सौभाग्य-निर्माण का, मात्र देव-स्तुति या निरत स्व-प्रयास

सदुपयोग हर क्षण मनोरथ- प्रयोग का, न भ्रान्तियों का ही कयास।

समस्त शक्तियाँ मुष्टि-बद्ध करके, वे पथिक दूर आकाश- मार्ग के

स्व-संग विकास बृहदतर मानवता का, कर यत्न निकलो दुर्दिन से॥

 

जिसने स्व को योग्य-कर्मठ बनाया, होंगे सक्षम ध्रुव-पार गमन के

अध्येता मन-निग्रहों के, क्या सार्वजनिक हित - अपना दम लगाते।

विद्या-ग्राही खुला मन-मस्तिष्क धारण, हर पहलू पर मनन-सक्षम

न कुंठा-रोष निम्न परिवेश से, वर्धन अग्र-पंक्ति, अंतिम-असहन॥

 

कौन सकल मनुजता एक-जुट देखता, सब प्रश्नों का हल-निदान

नर स्वतः सक्षम अति-काष्टा, निर्मल नाथ मिले तो और बलवान।

चिरकाल से पुरुष भयभीत निज-विद्रूप से, बंधुओं से अधम-भाव

उनसा न दिख-बन सकता या नियम क्रूर प्रयासरत रखने बाहर॥

 

क्यों अधो मनो-वृत्ति पनपी काल में, स्व-दुर्बलता या बाह्य-शोषण

स्व मृदुल-गुण क्यों न देखते, क्षीणता भी तो करो प्रयास से बाहर।

व्यर्थ विकार मन में न रखना, अन्य बढ़े हैं मनोभाव द्वारा ही प्रबल

 सब में वही है परमात्मांश, दुर्बल मानकर निज को न करो विव्हल॥

 

त्वरित अपेक्षा है तन-मन सामर्थ्य, हँसी- उपहास स्थिति से उबार

जग देता मान सबलों को ही, निर्बल को परिहास या दयनीय भाव।

कब तक मुख ताकते रहोगे अन्यों का, अपनी भी लो स्थिति सुधार

बनो शक्तिवान मयूख-विकरित सूर्य-सम, तेज का सब लेंगे लाभ॥

 

बालक भीम बना महामानव धरा पर, सर्व-मनुजता सम-अधिकार

बुद्ध सम कल्याणक जीव- प्रकृति विकास, सब बढ़ें पूर्ण-साकार।

सामान्य नर-सहायक, पीड़ा देखी-समझी चिंतन कैसे हो परित्राण

निज विवेक-ज्ञान से संविधान समावेश, मनुजता पर बड़ा उपकार॥

 

शिक्षा सबकी प्राथमिकता, अंध-कूप से निकास का बड़ा हथियार

स्व-संघर्ष से ज्ञात होगी वाँछित गति, तुच्छ-वर्तमान तो न स्वीकार।

संगठन एक प्रबल योग शक्ति, लोहा ले सकते विपदा किसी से भी

समाज समरसता-प्रेम प्रादुर्भाव हो, लड़ने से मात्र स्व का ह्रास ही॥

 

दिव्यता तुम्हारे तन-मन पूर्वेव ही, क्यों व्यथित व्यर्थ-प्रताड़नाओं से

दक्ष शिक्षक सर्व-मनुजता हितैषी समक्ष, क्यों न प्रयास मुक्ति जैसे?

बंधन समस्त टूटने को तत्पर, तुम बस खड़े हों - दिखेगी परम राह

बाबा यह नवयुग तारक है, तंत्र-शक्ति दी सबको -नहीं शब्द मात्र॥


पवन कुमार,
दि० १४ अप्रैल, २०१६ समय १०:३३ प्रातः
(मेरी डायरी दि ० 9 मार्च, 2016 समय 8:40 प्रातः से)