या ग्रन्थित प्रहेलिकाओं का हल-ढूँढ़न प्रयत्न, चाहे हस्त में या न।
Every human being starts his life's journey with perplexed, enchanted sight of world. He uses his intellect to understand life's complexities with his fears, frustrations, joys, meditations, actions or so. He evolves from very simple stage to maturity throughout this journey. Every day to him is a challenge facing hard facts of life and merging into its numerous realms. My whole invigoration is to understand self and make it useful to the vast humanity.
Kind Attention:
Sunday, 21 July 2019
एकाकीपन
या ग्रन्थित प्रहेलिकाओं का हल-ढूँढ़न प्रयत्न, चाहे हस्त में या न।
Monday, 1 October 2018
आत्म-परिष्कार
इसके अतिरिक्त गर्भाधान में भिन्न वंशाणु-प्रकटीकरण व भ्रूण-विकास।
अनुकरण न करो तुम हमारी श्रेष्ठता का, जो नियम बनाऐं, मौन सहो
तुम सम न हमसे किसी भी श्रेणी में, बेहतर होगा स्व-औकात में रहो।
हम सुयोग्य, तुमको न चिंतन-आलोचना-प्रतिकार का अधिकार।
Saturday, 14 July 2018
वय-वृद्धि क्रम
उपनेत्र* - चश्मा
Sunday, 20 May 2018
निकटस्थ - हित
Saturday, 28 April 2018
निज-निर्णय
---------------
लोगों से सीखना ही होगा, निर्भीकता से निज बात कहना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कोई ठीक कहे समझकर, या यूँ ही हाँ।
माना विशेषज्ञ उनके पास भी, पर विद्वानों की शिक्षा श्रेयस्कर
आस्था लेना जरूरी जबकि ज्ञात प्रबल वेग, हानि विफलता पर।
आपकी मंशा है पवित्र संभव, आमजन-सुविधा हेतु कुछ छूट थी
पर विशाल १२५ करोड़ जन, बहु अभाव-कष्टों में रहा देश जी।
तुलना अनुचित संपन्नों की निर्धनों से, जो अति-अभाव में जीते
लोगों का हक़ मार अनेक अमीर, कोई कहे तो दुश्मन लगते।
कहाँ से वैभव-साम्राज्य फूटता, क्या नेकी से ही कमाया पैसा
लाभ की भी हो सीमा, सच-झूठ बोल ही न उल्लू करे सीधा।
देश में विधि-राज्य होना आवश्यक, न्याय मिले खुशहाल सब
उत्तम नृप का तो निर्बल-हित मन, निस्संदेह समता वृद्धि कुछ।
यह न दानवीरता या अनुकंपा, सबको सम हक़ जो ईश भी चाहे
छोटे दड़बों में निर्धन-निरीह, कुछ प्रकाश हो तो सुकून मिले।
क्या मत कवायद में, लुब्ध-चाटुकार-पूर्वाग्रहियों की बात छोड़
सब निज ढंग से स्थिति-लाभ लेंगे, किंचित लाभ आम प्रजा को।
यह 'ऊँट के मुँह में जीरा', या अनावश्यक कष्ट में देना धकेल
समृद्धों पास तो सब उपकरण, निर्बलों को ही परेशानी महद।
चलो अल्प-कालिक दुःख भी झेलेंगे, यदि अग्र सुख-संभावना
पर जरूरी कि लूट-खसोट संस्कृति पर चाहिए विराम लगना।
फिर बाँटना सभी में यथोचित, देश की खुशहाली सभी में बँटे
न्याय बड़ा शब्द यदि प्रयोगित, इससे विश्व-चित्र बदल सके।
मेरी मंशा ठीक चाहे तरीका न, न ही उस पर पूर्ण-विचार
जो किया जैसे बना, भाई सहयोग से ठीक करना आकर।
आँको जो उचित लगे, मंशा पर प्रश्न न हो, ठगा जा सकता हूँ
इतना बुरा न, दारिद्रय देखा, आज स्थिति में तो क्यूँ न सोचूँ।
मत तुलना करो अन्य पूर्वजों से, इस काल में हूँ काम दो करने
टाँग-खिंचाई प्रजातंत्र में जरूरी, तंज-तर्क उचित दिशा देते।
चाटुकार तो मरवा ही देंगे, प्रजा तुम सहारे सहयोग देना पूर्ति
प्रतिबध्दता समरस समाज प्रति, लोकहित में ही निज-उन्नति।
पवन कुमार,
२८ अप्रैल, २१०८ समय ११:२३ म० रा०
(मेरी डायरी दि० ३० नवंबर, २०१६ समय ९:२० प्रातः से)
Saturday, 24 February 2018
कर्त्तव्य-परायणता
कुछ अनिकृष्ट हाथ पर हाथ धरे बैठते, पूर्व-चिंतित बुरा ही
बस निष्प्रयोजन कागज कृष्ण करते, समझते हम ही सक्षम।
Sunday, 10 December 2017
मन-दृढ़ता
---------------
Monday, 31 July 2017
रक्त-रिश्ते
रिश्तें हैं प्राण- वाहक, हम
निकले उनसे, रक्त-संपर्क से युजित
कह सकते हैं सीधे जुड़े, किसी
औपचारिकता की न जरूरत॥
कुछ रिश्तें अति-प्रगाढ़ जैसे
माँ-पिता, दादी-दादा, नानी-नाना
भाई-बहन,
मामा-मौसी, चाचा-बुआ, चचेरा-फुफेरा, ममेरा-मौसेरा।
रक्त से अभिभावक-कुलों से
सीधे जुड़ते, शृंखला-गमन दूर तक
माना दूर तक ढूँढ़ना-निबाहना
कठिन, तथापि प्रयास से संभव॥
कितनी गहराई तक हैं
रक्त-मूलें, हम अधिक ध्यान न दे पाते
इस अल्प- जिंदगी में इतने
मशगूल, भूलते कोई और भी हैं।
अति- सुलभ अन्वेषण यदि
चाहें, गहन योग देह-आत्माओं में
प्रेम-भाषा बोलकर देख, सब
आऐंगे बाह पसारे गले मिलने॥
रिश्तें हमारा उद्गम-स्थल,
रक्त-वीर्य प्रवाह होता अति-दूर तक
एक-दूजे के गुण परस्पर
बाँटते, शक्लें-व्यवहार जाते से मिल।
अति स्थल-दूरी से संपर्क
बाधित, कुछ समय पूर्व था स्नेह-अति
विवाह-उत्सवों में मिलन-रीत,
परस्पर देख होती अति-ख़ुशी॥
हम आपस के सुख-दुःख बाँटते,
जानते अपना है हानि न करे
जैसे निज आत्मा का एक रूप,
कुछ न दुराव अपने भीतर है।
ख़ुशी- नाराजगी तो वहाँ भी
हैं, कह-सुनकर हल्का होता मन
सभी मनोभावों से हम गुजरते,
हर परिस्थिति नहीं निज-रूप॥
अनुवांशिक- गुण तो अति-
विस्तृत, विज्ञान से विस्तार-विवरण
माता-पिता, भाई-बहनें
निकटतम, रिश्तें हैं सुदूर तक वाहक।
हममें-उनमें अभिभावक-गुण
साँझे, अटूट योग है नित-सुदृढ़
अनेक ही उसमें युजित हो
सकते, जितना चाहे उतने संभव॥
रक्त- रिश्तें
अति-महत्त्वपूर्ण, माना सिमट जाते कुछ दूरी पर
जानते हैं अपने ही,
संसाधन-समय अभाव से दे पाते न ध्यान।
कुनबा-अवधारणा ज्ञान, माना
कि सदस्य भी आपस में लड़ते
तथापि न्यूनतम सदाश्यता,
अन्य- विरुद्ध सब हैं एक-जुटते॥
प्रेम की चहुँ ओर जरूरत है,
स्वार्थ से किंचित कृत-संकुचित
निज-कोटरों में ही दुबके,
बाहर आ अन्यों को न लगाते कंठ।
स्व-दामन सिकोड़ अनावश्यक, जब
अनेक जन समा सकते
मन को जब स्नेह-शून्य किया,
विश्व-बंधुत्व राह खुलेगी कैसे?
संबंधी सब आर्थिक-सामाजिक
स्थिति में, निर्धन से दूरी अग्रों में
जब समुचित जानते अपने ही,
तटस्थता-भाव दिखाते स्वार्थ में।
ज्ञान का क्या लाभ यदि न
व्यवहार-दर्शित है, किए दूर निज भी
संबंधियों को तज अन्यों से
संपर्क बढ़ाते, धीरे दूरी बढ़ती जाती॥
स्व-रुचियाँ हैं
महत्त्वपूर्ण, न आवश्यक रिश्तेदारों से पूर्ण-मेल
अपने-२ गुट बना लेते, समय
आने पर यह या वह पक्ष है लेत।
स्पर्धा-स्पृहा अधिक परस्पर
में, आगे-पीछे टाँग भी खींच देते
एक-दूजे का मज़ाक भी बनाते,
जैसा उचित जँचे निभा लेते॥
मित्रता एक वृहद-अध्याय, इस
पर विस्तार से चिंतन कभी
अभी विषय रक्त-रिश्ता, कैसे
मिठास है डाली जा सकती?
उसके अतिरिक्त संबंधी भी,
भले प्रत्यक्ष रूप से नहीं जुड़ते
मेल-जोल से ही निज बनते,
अपनापन सा हो जाता शनै-२॥
जहाँ हृदय-समीप वहाँ
माधुर्य, प्रेम से परस्पर वर्धन-उत्साह
सभी कुछ सहन चाहे कत्ल भी
हो, प्रेम सर्वोपरि लेगा स्थान।
अभिभावक-संतानों में न है
स्पर्धा, झेल लेते उच्छृंखलता भी
बंधु-भगिनियों में आदर,
अति-गुणवत्ता संभव अस्वार्थ यदि॥
एकत्रित करें
संबंधी-कुटुंबियों को, घर जाकर दिखाऐं स्नेह भी
वे भी हमारे प्रेम के भूखें,
मिलने-जुलने से तो निकटता बढ़ेगी।
यदि परस्पर स्नेह-समझदारी,
एकजुटता से तो शक्ति-विश्वास
एक-दूजे को सहना भी श्रेष्ठ
गुण, जीवंतता से है वर्धन-सौहार्द॥
सबमें सब भाँति के गुण,
उत्तम को अपनाऐं क्षीणता को तज
सहनशीलता निज-पालक, आगे बढ़ो,
सबको लगाओ कंठ॥
Sunday, 25 December 2016
दर्शन-यथार्थता
कैसा जहाँ हम बनाना चाहते,
सोच का ही है खेल
जो भी यहाँ अच्छा-बुरा जैसा,
सब है मानव-कृत॥
क्या सोचते हम परिवेश हेतु,
जो हमारा आवास है
कितनों को व क्या सबको,
उसमें सम्मिलित करते?
अपने जैसों से सम्पर्क
साधते, अन्यों को बाहर रखते
स्वार्थ निज, साधन सबके, व
फिर अधिकार जमाते॥
कैसे संग्रह कुछ ही द्वारा,
जब सब कुछ है प्रकृति-दत्त
पृथ्वी पर जन्म लेने का अर्थ
तो, भागीदारी है समस्त।
कैसे कुछ वैभवशाली बनते,
अन्य अनेक पिछड़ जाते
भौतिक-दशा में अति-अंतर,
यदा-कदा संग्राम होते॥
यह मेरा और तूने उठाया,
निश्चित ही है अपराध महद
मेहनत का यह परिणाम है, तू
मुफ्त में चाहता मगर।
एक बड़े ध्यान से कार्य करे,
दूजा काम से दिल चुराऐ
ईर्ष्या करें या भाग्य
कोसें, या अपराध- प्रवृत्ति है पाले॥
शरीर- मन स्थिति में असल,
सबका पृथक है व्यवहार
कुछ की रूचि इसमें या उसमें,
अन्यों का और विचार।
कुछ निज-प्रेरणा से इंगित,
अन्य तो रास्तों पर चिन्हित
अलग श्रम व ईनाम भिन्न, लाभ
भी होता तथैव वितरित॥
फिर किसी के पास, अधिक
उपलब्ध संसाधन-वस्तुऐं
अनेक किन्हीं अल्प से ही,
अपना जीवन यापन करते।
शनै वर्धित है अंतर उनमें,
भौतिक -स्थितियाँ होती भिन्न
प्रयोग तब प्रासंगिक-वस्तुओं
का, अन्यों से और पृथक॥
अभिमान प्रकट नव-धनाढ्यों
में, अन्यों को समझें निम्न
कुछ यदि उन्नति भी चाहें,
उसमें बाधा करते हैं उत्पन्न।
समकक्ष जन अपने दल बनाते, और
अन्यों से है स्पर्धा
निर्बल मात्र निज-दैव कोसते,
व करते लाचार गुजारा॥
तब सुख-तृप्ति हेतु, उनको
होती सेवक-आवश्यकता
कुछ निरीह पकड़ काम हेतु,
बनाते हैं दास-सेविका।
संघर्ष अल्प करणार्थ, कुछ
मृदु- भाषी चतुरों के साथ
वाक-पटुता से, करते
अन्य-दलों की सन्तुष्टि-प्रयास॥
सकल कलाप आरम्भ, सामान्यों
की स्थिति रखने निम्न
युग्म मधु-सोम, नशे में
रहें, चाहे कहीं और फँसाकर।
वे अल्पज्ञ भ्रमित होते,
तथाकथित ज्ञान के व्यूह-पाशित
सम्मिलित कर्म-कांड,
अंध-विश्वासों में, व्यर्थ प्राण फिर॥
समस्त दर्शन व ज्ञान उपलब्ध
की हैं, निज प्राथमिकताऐं
कुछ सज्जन समदर्शी भी, पर
अन्य स्वार्थों को ही बढ़ाऐं।
कुछ का हित-साधन, स्वयं को
परितोषिक, यही है दर्शन
बाह्य वेष-आभास मृदुता से,
अन्यों को भी लाभ है कुछ॥
किनको रखना किनको हटाना,
किसको क्या देना ज्ञान
इसका निर्धारण चतुर करते,
अल्पज्ञ रहते हैं जन-आम।
बड़े-संगठन, बड़ी-चर्चाऐं हैं,
निश्चित ही समर्थ बल-वर्धन
अच्छा होता यदि सर्व-हित,
लाभ भी बँटता सार्वजनिक॥
जीवन- विस्तार को, एक ज्ञान
ही प्रेरणा-वाहक, संवर्धक
अगर वह भी उचित न, तो कैसे
विकास-सुदर्शन संभव?
मृदु-चित्त समझते सब,
षडयन्त्र-स्थापन का घोर-विरोध
झंडेवाले आते झुठलाने को,
यथा-स्थिति रखने पर जोर॥
दार्शनिक हित साधते समर्थों
का, तभी तो पाते हैं सम्मान
आमजन की क्या चर्चा हो,
अल्पज्ञान से व्यूह न पाते फाँद।
यदि उन्हें भला भी लगता, तो
भी न है निम्न- स्थिति उबार
आध्यात्मिक ज्ञान- विकास से,
कुछ तो अवश्य ही बाहर॥
चिंतक चिंतन करें यदि
सर्वहित-सुख, तो निश्चितेव श्लाघ्य
यदि वह नितांत
भ्रामक-स्वार्थी, तो कितना विकास समग्र?
आधुनिक शिक्षा-प्रणाली ने,
बहु-आयाम लाने की एक पहल
सुविद्या-ज्ञान उपलब्ध सबको,
तथापि प्रचलित कुछ प्रपंच॥
Thursday, 14 April 2016
नवयुग तारक
एक महापुरुष भारत-धरा पर
अवतरित हुआ, बाबाओं के देश
छाप छोड़ी स्व-व्यक्तित्व की,
मानवता कृतज्ञ-उऋण है निर्लेष॥
भारतवासी तो सदा मननशील,
चराचर विश्व के जीवन-मरण प्रश्न
स्व- भाँति परिभाषा देते
रहें, कुछ को सुहाता अन्यों को अनुचित।
'वसुधैव कुटुंबकम' सिद्धांत पुरातन, प्राणी
समन्वय से ही जी पाता
'आत्मवत सर्व-भूतेषु' सर्व-भेद निर्मूल-सक्षम, यदि
आचरण में होता॥
मनुज सुविज्ञ मानव-जाति
एक-स्वरूप का, तभी तो प्रतिदिन निर्वाह
आम नर को निज कुल-गर्व पूर्वाग्रह
भूल, सर्व-सहयोग का है आग्रह।
जीवात्मा एक परम-पुञ्ज का ही
बिंदु, सब में दीप्त अंतः-बाह्य प्रकाश
परस्परता अनिवार्य प्रति-पग,
जीव समाज-वासी - एकांत मात्र ह्रास॥
सर्व-भाव सर्व-प्राणी स्वतः
निहित, प्रयोग उपयुक्त आवश्यक काल में
दुर्गुण - सुगुण हमसे चिपके
हैं सदा, अपनी भाँति से व्यक्त विचार में।
उत्तम-विकृत एक
स्थिति-प्रयुत परिभाषा, मूल्यांकन स्व-रूचि अनुसार
प्रत्येक विवेचन कर्म-स्वभाव
का, निष्पक्ष ही सक्षम व्यक्तित्व परिणाम॥
सदैव असंख्य-कोटि जीव धरा पर
विचरण करते हैं, लें लघु मन गान
गीत गाते स्व-धुन में, अनेक
कर्ण-प्रिय तो कुछ अनर्गल-बेसुरी तान।
अनुलोम- विलोम समगुण अनुरूप
समूह, प्रत्येक न सब हेतु हितकर
स्वार्थ एक प्रमुख
जीव-विकार, मनुज बह जाता है लघु-तृष्णाओं पर॥
तथापि मानव एक ही जाति, यह
सत्य भुलाकर कुछ स्वार्थ-आचरण
सर्व-प्राकृतिक संसाधन हों स्व-कर,
हर जीव-अजीव पर आधिपत्य।
कुछ प्रयास से आगे बढ़ गए,
भौतिक-सांस्कृतिक प्रतिभा विकसित
जीविका के निर्मल-नियम
निर्माण, निज-जीवन तो न्यूनतम ललित॥
भागम-दौड़ परस्पर
प्रतिस्पर्धा-आकांक्षा, स्व-कुल का ही पूर्ण-उत्कर्ष
अन्य छूटें न पीछे- न
प्राथमिकता, निज संसाधन वृद्धि में बुद्धि प्रयुक्त।
निज एक विचारधारा सी बनाई,
हमीं श्रेष्ठ अन्य निकृष्ट ही अतः त्याज्य
कुछ नियम स्व-हित ही
निर्मित, सम्मुख-थोप दिए वृहद मनुजता पर॥
विश्व-क्रीड़ा ऊर्जा-सदुपयोग
की, क्या उपकरण निकट प्रयोग भरपूर
विशाल पृथ्वी है धन-धान्य
बाँट रही, उठ-खड़ा हो कर निर्धनता दूर।
है संघर्ष विचार-धाराओं का
स्वाभाविक, प्रत्येक का स्व-विधि प्रज्ञान
क्यों हार मान जाते मन सस्ते
में, आवश्यक नहीं तुम ही हों अनजान॥
वृहद-कोष प्रकृति द्वारा
प्रस्तुत, निवेदन सभी से शिक्षित बन पढ़ लो
नर को विश्लेषण की योग्यता
प्राप्त, प्रयास कर अनुपम निकाल लो।
जब विवेकी बने यदि जीवन में,
सर्व-मनुजता हित-तत्व निकाल लोगे
महापुरुष स्वार्थ से
अग्र-कदम, सर्वोत्तम-अनुसंधान का यत्न रखते॥
हर देश-काल में हैं
युग-पुरुष अवतरण, गीता-महावाक्य उद्घोषित
जब-२ धर्म की ग्लानि है,
प्राणी कष्ट-त्राण हेतु जन्म होगा स्वाभाविक।
नर कदापि न है
विपत्ति-मुक्त, सदा एक साँसत हटी तो दूजी सम्मुख
रामबाण है `संकट कटें
मिटे सब पीरा -जो सुमिरे हनुमत बलबीर'॥
मनुज ज्ञान-प्रमाद स्वरूप
अंधकूप-पतित, बहुदा उचित पथ न सूझे
तब सक्षमों का मुख ताकते,
विडंबना से बाहर करो - हम भी उबरें।
ये कौन बनते सुयोग्य या पैदा
होते, कौन शक्ति यत्न कराती अक्षुण्ण
तन-मन क्षीणता त्याग सफल
रूपांतरण, न अन्य लेंगे सतही पतन॥
नर शिशु क्षीण ही होता,
गृह-कुल-समाज परिवेश सहायक घड़न में
पर सबको नहीं सम
परिस्थितियाँ उपलब्ध, उतने में ही संतोष करते।
कुछ न संतुष्ट मात्र बहलावे
से, क्या सत्य-सम्पदा- ज्ञानार्थ यत्न करते
दुर्दिन निवारण महद प्रयास
से, न थक-हार बैठ जाना विपदाओं से॥
क्या मार्ग सौभाग्य-निर्माण
का, मात्र देव-स्तुति या निरत स्व-प्रयास
सदुपयोग हर क्षण मनोरथ-
प्रयोग का, न भ्रान्तियों का ही कयास।
समस्त शक्तियाँ मुष्टि-बद्ध
करके, वे पथिक दूर आकाश- मार्ग के
स्व-संग विकास बृहदतर मानवता
का, कर यत्न निकलो दुर्दिन से॥
जिसने स्व को योग्य-कर्मठ
बनाया, होंगे सक्षम ध्रुव-पार गमन के
अध्येता मन-निग्रहों के,
क्या सार्वजनिक हित - अपना दम लगाते।
विद्या-ग्राही खुला मन-मस्तिष्क
धारण, हर पहलू पर मनन-सक्षम
न कुंठा-रोष निम्न परिवेश
से, वर्धन अग्र-पंक्ति, अंतिम-असहन॥
कौन सकल मनुजता एक-जुट
देखता, सब प्रश्नों का हल-निदान
नर स्वतः सक्षम अति-काष्टा,
निर्मल नाथ मिले तो और बलवान।
चिरकाल से पुरुष भयभीत
निज-विद्रूप से, बंधुओं से अधम-भाव
उनसा न दिख-बन सकता या नियम
क्रूर प्रयासरत रखने बाहर॥
क्यों अधो मनो-वृत्ति पनपी
काल में, स्व-दुर्बलता या बाह्य-शोषण
स्व मृदुल-गुण क्यों न
देखते, क्षीणता भी तो करो प्रयास से बाहर।
व्यर्थ विकार मन में न रखना,
अन्य बढ़े हैं मनोभाव द्वारा ही प्रबल
सब में वही है परमात्मांश, दुर्बल मानकर निज को
न करो विव्हल॥
त्वरित अपेक्षा है तन-मन
सामर्थ्य, हँसी- उपहास स्थिति से उबार
जग देता मान सबलों को ही,
निर्बल को परिहास या दयनीय भाव।
कब तक मुख ताकते रहोगे
अन्यों का, अपनी भी लो स्थिति सुधार
बनो शक्तिवान मयूख-विकरित
सूर्य-सम, तेज का सब लेंगे लाभ॥
बालक भीम बना महामानव धरा
पर, सर्व-मनुजता सम-अधिकार
बुद्ध सम कल्याणक जीव-
प्रकृति विकास, सब बढ़ें पूर्ण-साकार।
सामान्य नर-सहायक, पीड़ा
देखी-समझी चिंतन कैसे हो परित्राण
निज विवेक-ज्ञान से संविधान
समावेश, मनुजता पर बड़ा उपकार॥
शिक्षा सबकी प्राथमिकता,
अंध-कूप से निकास का बड़ा हथियार
स्व-संघर्ष से ज्ञात होगी
वाँछित गति, तुच्छ-वर्तमान तो न स्वीकार।
संगठन एक प्रबल योग शक्ति,
लोहा ले सकते विपदा किसी से भी
समाज समरसता-प्रेम
प्रादुर्भाव हो, लड़ने से मात्र स्व का ह्रास ही॥
दिव्यता तुम्हारे तन-मन
पूर्वेव ही, क्यों व्यथित व्यर्थ-प्रताड़नाओं से
दक्ष शिक्षक सर्व-मनुजता
हितैषी समक्ष, क्यों न प्रयास मुक्ति जैसे?
बंधन समस्त टूटने को तत्पर,
तुम बस खड़े हों - दिखेगी परम राह
बाबा यह नवयुग तारक है,
तंत्र-शक्ति दी सबको -नहीं शब्द मात्र॥
दि० १४ अप्रैल, २०१६ समय १०:३३ प्रातः
(मेरी डायरी दि ० 9 मार्च, 2016 समय 8:40 प्रातः से)



