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Wednesday, 24 June 2026

कर्तव्य की साधना

कर्तव्य की साधना 


यह गद्यांश जीवन-निर्वाह, दायित्व, प्रशासनिक जटिलताओं और मानवीय संवेदनशीलता के बीच उत्पन्न तनाव का गंभीर चित्र प्रस्तुत करता है। इसमें लेखक यह दिखाता है कि जीवन अनेक प्रकार की बाध्यताओं, निर्भरताओं और अवरोधों से भरा है, फिर भी मनुष्य—विशेषतः एक उत्तरदायी अधिकारी—को सकारात्मक रहते हुए, निरीक्षण, प्रेरणा, अनुशासन और धैर्य के सहारे कार्यों को आगे बढ़ाना होता है। यह केवल व्यक्तिगत व्यथा नहीं, बल्कि कर्तव्य-बोध, नेतृत्व और व्यावहारिक जीवन-दर्शन का लेख है।

जीवन-निर्वाह के क्रम में चलते-चलते कभी-कभी किंचित मायूसी भी छा जाती है। मन किसी एक विषय से जुड़ना चाहता है, किंतु अनेक बातें मनुष्य को जकड़े रखती हैं और आगे बढ़ने से रोकती हैं। लगता है जैसे जीवन कुछ ठहर-सा गया हो, विशेषतः तब, जब संबंधित लोग अपनी जिम्मेदारियों के प्रति उदासीन दिखाई देते हैं, पूछने पर भी कोई स्पष्ट उत्तर नहीं देते, अपने अपेक्षित संसाधन नहीं सजाते, सब वायदे खटाई में डाल देते हैं, अपने और अन्यों की प्रतिष्ठा की परवाह नहीं करते। अपने से संबंधित कार्यों के दोषों को भी नहीं देखते, केवल वित्तीय प्रबंधन और लाभ-हानि की योजनाओं में ही व्यस्त रहते हैं, आदेश के पालन में भी विश्वास नहीं रखते, और अनेक प्रकार की चेष्टाएँ पालते हुए भी काम में वैसी रुचि नहीं दिखाते।

यह जीवन भी अजीब खिंचाव में रखता है; आप जितने चाहे संवेदनशील हो लें, कहीं-न-कहीं यह आपको पकड़ने के लिए हाथ बढ़ा ही देता है। किसी भी क्षण आपकी अस्मिता को ललकार देता है, जब चाहे आपको धकेल देता है, और कर्त्तव्य-निर्वाह में ढील बरतने का दोषी भी ठहरा देता है। आप कहें, समझाएँ, अपनी बात रखें, फिर भी यह अपनी बाध्यता प्रकट कर ही देता है। इसलिए जीवन एक चक्रव्यूह-सा प्रतीत होता है, जो सामने और परोक्ष, दोनों प्रकार की गुत्थियों को सुलझाने के लिए पूरी ताकत चाहता है।

किंतु पंछी को उड़ने के लिए पंख फड़फड़ाने ही पड़ते हैं, मछली को तैरना ही होता है, हिरण को जान बचाने के लिए दौड़ना ही पड़ता है। ड्राइवर को संकरे और भयानक रास्तों से भी गुजरना पड़ता है, लोगों को भीषण सर्दी-गर्मी में भी काम-धंधे पर निकलना ही होता है। माँ को बच्चे को छोड़कर, चाहे उसी के लिए ही, बाहर जाना पड़ता है, और एक पिता को संतान-निर्वाह के लिए दिन-रात खटना ही होता है।

एक अधिकारी के रूप में संवेदनशील होना उत्तम गुण है, क्योंकि इसी से आप अन्य लोगों को झकझोर सकते हैं, उन्हें चलायमान कर सकते हैं, कुछ शुभ करना सिखा सकते हैं, लापरवाही से हटा सकते हैं। आजीविका के उपाय बता सकते हैं, समय पर परियोजनाएँ पूरी करवा सकते हैं, अन्यों की शुभाकांक्षा प्राप्त कर सकते हैं, और उन्हें व्यर्थ के गर्व-भाव से दूर रख सकते हैं।

सरकारें हमें पद व वेतन सुविधा के लिए नहीं, बल्कि कर्तव्य-समर्पण और संभावित समस्याओं के समाधान के लिए देती हैं। यदि समय पर उत्तम निरीक्षण हो जाए, तो आगे की दिक्कतें कम हो सकती हैं; अन्यथा बाद में पछतावा ही शेष रहता है।

मैं मानता हूँ कि परियोजना-कार्यों के निष्पादन हेतु अनेक आगम जुटाने पड़ते हैं। वित्त एकत्र करना पड़ता है, बाहर वाले नकद माँगते हैं, सामान समय पर नहीं भेजते, और कोई सहज विश्वास नहीं करता। संभव है, उन्हें भी आगे से कुछ जुगाड़ करना पड़ जाए। इस जगत में परस्पर निर्भरता इतनी अधिक है कि कोई भी काम समय से और ठीक प्रकार से हो नहीं पाता।

जीवन हमें सिखाना चाहता है, पर हम अनेक बार जड़त्व में पड़े रहते हैं; तब कोई बाहरी बल हमें धक्का देता है। जैसे न्यूटन के द्वितीय नियम में होता है, वैसे ही जीवन भी हमें चलाता है; अपना कोई स्थायित्व नहीं है, अतः जैसे धकेल दिया जाता है, वैसे ही चल पड़ते हैं।

तथापि, अपने को सकारात्मक रखना है; एक वरिष्ठ होने के नाते सबमें विश्वास भरना है, कृपा से अपना मस्तक भी ऊँचा रखना है। काम आगे बढ़ाने हैं, रुके हुओं को आगे करना है, अपने को काम का बनाना है, नुकसान कम करना है, और यथासंभव शांति बनाए रखते हुए आयाम संपन्न करा लेने हैं।

अतः, कृपया अपने विषयों को संभालते हुए कुछ करके दिखाइए; बीच की अवस्थाएँ आती ही हैं, पर आशा है कि प्रेम, धैर्य और संतुलन से आप इन सबसे निकल जाएँगे।

मर्म-पंक्ति : जीवन की जटिलताओं के बीच भी जो व्यक्ति धैर्य, संवेदनशीलता और कर्तव्य-बोध बनाए रखता है, वही अंततः अपने काम को सार्थकता और अपने जीवन को गरिमा दे पाता है।


पवन कुमार,

24 जून, 2026, बुधवार, समय 11:29 रात्रि  
(
मेरी ब्रह्मपुर डायरी दि०  24 सितंबर, 2024, मंगलवार, समय  10.10 प्रातः से)


Friday, 10 January 2025

मरुधरा के अनुभव: जीवन-सौंदर्य

मरुधरा के अनुभव: जीवन-सौंदर्य


उच्च प्रज्ञान से प्रकृति-रमणीयता का बोध, यदि मन करे गहन चिंतन।
कालिदास एवं बाणभट्ट सम निरूपण हेतु, सरस्वती माता को है वंदन।
 
वे तो उच्चतम श्रेणी के कवि थे, पवित्र दृष्टि से निरंतर निहार सके विश्व,
तज कर मन-कलुष, पवित्र भावों से ही भरते हैं हर चरित्र का अंतर्मन।
शारदा मातृ की कृपा से उनका सौंदर्य लेख-वाणी से होता प्रस्फुटित,
आश्चर्य, नर से अत्युत्तम निर्माण संभव जो साधारणतया विलय प्रतीत।
 
प्रकृति-सौंदर्य, सूर्य-चंद्र, व्योम, नदी, मेघ, पृथ्वी-मरुत एवं द्रुम-पादप,
शुक-सारिका, चक्रवाक, सारस, कालहंस, वकुल और क्रोञ्च-कोकिल।
उनके काव्य में बहु वन्य जीवन, अद्भुत पुष्प-वृक्षों का सजीव चित्रण,
प्रत्येक युग्म से जीवन झलकता, पहुँचता सौंदर्य की चरम सीमा तक।
 
गज-सिंह, वराह-गो, मृग-अश्व, वृषभ-कपि, मीन व अनेक जलथल चर,
उनके कर-लेखनी से शोभित होकर, पाठक-गण को कर देते हैं मुग्ध।
मन में पवित्रतम भाव संजोते, उनकी उपमाओं में महेश जाते हैं उतर,
कुमार-संभव में निर्मल उमा-चरित्र का विवरण, परं-भाव से हृदयांगम
उनकी उपमाएँ, मनोभाव व शिल्प, मानवता को देते हैं परम उद्देश्य। 
 
यह दर्शन केवल सृजन नहीं, अपितु जीवन-दर्शन का एक गहन भाव,
जहाँ आत्मा प्रकृति संग एकाकार होती, एवं सृजन का दिखता आधार।
 
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की 'बाणभट्ट की आत्मकथा' का अध्ययन,
अति मृदुल चरित्र-चित्रण, सजीव मानव भावनाओं का उच्चतम प्रयोग।
वर्तमान मनुज तो अल्प-सोच में उलझा, सार्वभौमिक भावों से अनभिज्ञ,
यदि निज दृष्टि को उच्च पटल पर रखे, तो सौम्यता- विस्तार भी संभव।
 
उज्ज्वल चरित्रों का तपस्या करना भी, सामान्य- जन हितार्थ ही आदर्श,
कैसे स्वयं को वे निर्मल रख सकें, ऋषि- सम जीवन से मिलता आनंद।
यदि चरित्रों में कहीं कटुता-कलुषता है, तो भी उद्देश्य तो है ऊर्ध्वगामी,
हर पात्र के मस्तिष्क की उच्च सोच, सौंदर्य-बोध व दिशा है प्रेरणामयी।
 
तुच्छ-बिंदुओं से समय-ऊर्जा रक्षा, अवलोकन बस अन्य का पवित्र मानस,
अमुक का उद्देश्य सुधारवादी हो, विवेचना-समीक्षा का हो वही मूल एक।
मनन नर-दुर्बलताओं में नहीं अटके, प्रयोगे निहित कुंडलिनी शक्ति सुप्त,
उसे विकसित करना वृहद-कल्याणार्थ, अमापनीय है प्रत्येक जीव-मूल्य।
 
मरीचिमाली-रश्मि का पीत सौंदर्य, हरित वृक्ष पर पड़कर अति प्रकाशित,
भिन्न पल्ल्वों पर प्रभावों से अन्यान्य विकिरण, उर हो जाता बहु पुलकित।
नीले गगन में श्वेतिमा-मिलन से उदित व्यापकता, मन-वृद्धि करे अद्भुत,
वे प्रकृति-मातृ के आगोश में, अतः स्वतंत्र होकर ही रच सकते समेकित।
 
जैसलमेर की मरुधरा में मेरा है यह प्रथम आगमन और परिचय समक्ष,
अबतक मात्र दूरदर्शन, इंटरनेट, पुस्तक, समाचारों से ही था ज्ञान अल्प।
दैव कब वास्तविक मिलन ही करेगा, प्रायः तो नहीं होता है यह चिन्हित,
यदि संपर्क तो आदान-प्रदान होता प्रारंभ, अनुभव स्व-भाग में परिणत।
 
कल सायं रेत टिब्बों का दर्शन हुआ, सुवर्ण भास्कर-मरीची से प्रभासित,
वामन कद की ही अल्प-वनस्पति, वर्षाजल का अभाव है मुख्य कारण।
यह मात्र एक भूमि नहीं है, अपितु दर्शित संघर्ष-सुंदरता का प्रकृति-मेल,
यहाँ हर कण में जीवन की सच्चाई है, जो बन जाती है बड़ा प्रतीक एक।
 
ऊँट के कुब्ज-भाग में सवारी-अनुभव, संकोच-भीत त्याग किया स्वीकार,
हिचकोलों में छिपा नया साहसिक अनुभव, अबल-पक्षों को करता प्रबल।
 
जैसलमेर से धनाना तक का सड़क मार्ग, ले जाता पाकिस्तान-सीमा तक,
सीमा तो कुछ 135 कि० मी०, किंतु हम गए लगभग 50 कि०मी० ही तक।
अधीशासी एम.पी. सिंह और सहायक अभियंता बचन व कालूराम थे संग,
एक अन्य सज्जन दीपक राठी थे, सायं का रोचक अनुभव था स्मृतिबद्ध।
 
'डेसर्ट स्प्रिंग'-एक साहसी मरुधरा-योजना, पर्यटन-कैंप व मनोरंजन प्रबंध,
कुछ व्यय कर लोग सुविधाओं का लुत्फ उठाते, यहाँ सुख है महत्त्वपूर्ण।
मन तो सदैव चरम नव अनुभव का चाही है, उसी हेतु करता सतत प्रयत्न,
एक स्थिति में तो असहज हो जाता, सर्व भ्रमण-प्रयास अनुपम हेतु ही कृत।
 
एक नारी-रूप में पुरुष नृत्यांगना, परिचय क्वीन हरीश की नृत्य-अदाओं से,
सहज चरित्रों को निपुणता में ढाल, कला समाज को नया दृष्टिकोण देती है।
अपने नृत्यों में सबको सम्मिलित करना, एक शिक्षक सी लगती है भूमिका,
केरल के मोहिनीयट्टम चरित्र सा मनोहारी रूप, सबके मन में स्मित भरता।
 
कलाकारों की नृत्य-गायन प्रस्तुति संग था, रात्रिभोज का एक रोचक अनुभव,
पर सकल लक्ष्य तो एक लयबद्ध हो, निकले कुछ कालि-बाण सा अद्भुत।
प्रकृति और संस्कृति का यह मधुर मिलन, मात्र नहीं है एक बाहरी अनुभव,
मन को पूरा झकझोर देता है यह, पर जीवन को नई दिशा देने का अवसर।
 
यह मरुधरा, जो बाहर से मात्र स्थिर प्रतीत होती, समय-प्रवाह है दिखाती,
प्रकृति, कला और आत्मचिंतन का संगम है, जो प्रेरणा का स्रोत बन जाती।
यह राजस्थानी-मरुधरा, मात्र रेत-भूमि नहीं, बल्कि है शुभ जीवन-प्रतीक,
हर मन में एक नई उमंग और ऊर्जा का जगेगा इससे अति मधुर संदेश।
 
 
पवन कुमार, 
ब्रह्मपुर (ओडिशा), 10 जनवरी 2025, शुक्रवार, समय 11:40 बजे रात्रि 
(लेखन, केलोनिवि अथिति गृह, जैसलमेर (राज.), दि० 22 जनवरी 2016, शुक्रवार, 7:20 बजे प्रातः से)
 

Saturday, 4 January 2025

तमसो मा ज्योतिर्गमय

तमसो मा ज्योतिर्गमय

प्रभु से प्रार्थना है कि सबको सद्बुद्धि दें और हृदय में एकता व विशालता का भाव जगाएं। माना कि इस लघु जीवन में हम साधारण प्राणियों के लिए इसे पूरी तरह समझ पाना असंभव है। बहुआयामी जीवन-रूपों को उनकी संपूर्णता में देख पाने में भी हम अक्सर असफल रहते हैं। जीवन की अनेक परतें इतनी गहरी हैं कि उनका आभास तक नहीं हो पाता। फिर भी, समय की धारा यह सतत प्रवाहमान जीवन हमें हर पल, हर क्षण अपने साथ बहाए लिए जा रही है। माना कि हम तट-दृश्यों को देखने में भी असमर्थ रहते हैं। यह विचार आता है कि जीवन से हमारी अपेक्षाएँ क्या हैं और क्या यह हमारे लिए सार्थक हो सका है? क्या हम अपनी प्राथमिकताओं को समझ सके हैं या मात्र एक स्वप्निल अवस्था में जी रहे हैं?

पुस्तकें तो ज्ञान से भरी हैं, लेकिन क्या वह हमारा जीवन-अंश बन पाई हैं? जब हम लिखने बैठते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे शून्य-अवस्था में प्रवेश कर रहे हों। लेखनी अपने आप रास्ता बना लेती है और ऐसा प्रतीत होता है कि हम महज एक माध्यम हैं। यह तभी चलती है जब स्वयं चलना चाहती है। हमारे हाथ और कागज दोनों उसकी प्रतीक्षा करते रहते हैं। जैसे कोई सागर के किनारे बैठकर उसके प्रवाह में अनंतता का अनुभव करना चाहता है, वैसे ही यह कागज भी संभावना-अन्वेषण के लिए व्याकुल रहता है।

हम सभी जीवन को विस्तृत करना चाहते हैं—चाहे वह ज्ञान, सामर्थ्य, या रूप में हो। हर कोई सर्वशक्तिमान बनने की आकांक्षा रखता है। जीवन-तत्व बहुत सूक्ष्म है। जितना इसे समझने का प्रयास किया जाए, यह उतना ही गहन और रहस्यमय हो जाता है। सर्वत्र समानता-भाव दिखाई देता है। सजीव और निर्जीव का भेद भी तुच्छ लगने लगता है। यही समानता-भाव हमें सिखाता है कि हर जीव-तत्व अपने भीतर एक ही ऊर्जा संजोए हुए है।

हमारी साधना प्रायः सतही होती है, क्योंकि गहराई तक जाने के लिए साहस और शक्ति की आवश्यकता होती है। जैसे गहरे समुद्र में छिपे मोती तक पहुँचने के लिए लहरों से संघर्ष करना पड़ता है, अंधेरे का सामना करना होता है और सटीक दिशा का पता लगाना पड़ता है, वैसे ही जीवन की गहराई में उतरने के लिए हमें अपनी ऊर्जा और इच्छाशक्ति को संगठित करना होता है। यह विचार उपनिषद की पंक्ति 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' की याद दिलाता है। अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रयास ही तो जीवन का सार है। यह सभी के लिए प्रासंगिक है, क्योंकि प्रकाश की ओर बढ़ना आत्मा की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। दिशाहीन और बिखरी जीवन-ऊर्जा को संगठित करना 'समाधि' का सार है। यह विकिरित किरणों को एक लेंस के माध्यम से अग्निपुंज में बदलने जैसा है। इस संगठित ऊर्जा से जीवन में नए आयाम प्राप्त हो सकते हैं।

प्रत्येक जीवन-पहलू में सुधार की संभावना है। यह हम पर निर्भर करता है कि अपने प्रयासों को कितना सार्थक बना पाते हैं। भले ही हमारे प्रयास टकराएँ या विरोधाभासी लगें, 'पूर्णता' की ओर बढ़ने का प्रयास हर किसी के भीतर होता है। हर दिन एक नई संभावना लेकर आता है—जैसे सूरज का उगना, जो हर अंधकार को मिटाने का वादा करता है। जब हम इस वादे को अपने जीवन में अपनाते हैं, तो हर दिन नए अवसरों से भर जाता है।

इसके लिए हमें कुछ प्रयास करने होंगे। एक सरल उपाय है—हर दिन थोड़ी देर ध्यान करें, अपनी प्राथमिकताओं को लिखें और उन पर विचार करें। एक अन्य प्रभावी उपाय है—प्रातः अपने प्रति आभार व्यक्त करें और उन छोटी-छोटी सफलताओं को याद करें जो हमें प्रेरित करती हैं। यह छोटा-सा अभ्यास हमें अपनी ऊर्जा को सही दिशा में केंद्रित करने में सहायक बन सकता है। जब मानव अपनी अज्ञानताओं को स्वीकार करता है और सुधार के प्रयास करता है, तो वह सामर्थ्य-वर्धन में सक्षम होता है। जब ऊर्जा सही दिशा में लगती है, तो यह न केवल हमें बल्कि हमारे आसपास के लोगों को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।

यह सत्य है कि मानव-जीवन में अपार संभावनाएँ छिपी हैं। यदि सुप्त शक्तियाँ जागृत हों और उचित दिशा में केंद्रित हों, तो जीवन न केवल सार्थक बल्कि सुंदर और प्रेरणादायक हो सकता है। हर दिन अपनी ऊर्जा को जागृत कर, उद्देश्य की ओर बढ़ने का प्रयास ही जीवन का सर्वोत्तम अर्थ हो सकता है। जीवन की सबसे बड़ी सौगात उसकी अनंत संभावनाएँ हैं। जब हम इन्हें पहचानते हैं और उनका उपयोग करते हैं, तो न केवल हमारा जीवन बल्कि पूरा समाज भी उज्ज्वल बनता है। जब हर व्यक्ति अपनी ऊर्जा सकारात्मक दिशा में लगाएगा, तभी समाज और संसार में वास्तविक परिवर्तन संभव होगा। यह प्रयास ही हमारे संसार को और बेहतर बनाएगा।

इन्हीं शुभकामनाओं के साथ। 


पवन कुमार, 

ब्रह्मपुर (ओडिशा), 4 जनवरी 2025, शनिवार, समय 9:08 बजे सायं  

(मेरी नई दिल्ली डायरी दि० 21 जनवरी 2007, रविवार, समय: 7:10 सायं से)


Saturday, 7 December 2024

सत्य उच्चता-प्रतिभागी

सत्य उच्चता-प्रतिभागी

क्यूँ रह-रह कर मन वहीं पहुँच जाता, जीवन में दूजे विषय भी हैं,

अनावश्यक को मत अति तूल दो, ऊर्जा-समय दोनों अनमोल हैं।

 

अति घटित होता दिन-प्रतिदिन, जो हो चुका उसमें तुम सहभागी,

क्रिया-प्रतिक्रिया से वार्तालाप चलता, प्रश्नों ने खींची है जिम्मेदारी।

वे गठित करते बैठक की रूपरेखा, पूछें कितना, क्यों व  किससे,

पूर्वाग्रह से पूरे भरे रहते फिर भी, हमें सभ्यता का धैर्य रखना है।

 

जो बीत चुका उसकी पुनरावृत्ति क्यों, प्रतिक्रिया बस उपयुक्त ही,

एक समय बाद भूलना ही अच्छा, सेहत व मन दोनों के लिए ही।

प्रतिबद्धताएँ समय माँगती हैं, पर क्या जीवन जोड़-तोड़ में बीते?

स्वार्थ के स्वर बदलते रहते हैं, रह-रह कर अपना रूप दिखाते।

 

एक सीमा तक छोड़ना आवश्यक, देखो क्या समाधान संभव है,

कार्यालय ही तो सब कुछ न, घर-परिवार और स्व-चिंतन भी हैं।

प्रतिष्ठा हेतु प्रतिबद्ध रहो, पर जीवन-संतुलन भी है अति जरूरी,

अपनों को संभालो, आपकी व्यस्तता से कहीं वे बिखर न जाएं।

 

एक आयाम में सिमटे ही रहना, अन्य आयामों से बनाता है दूरी,

वे तुम्हारी उपयोगिता बिसराते, जानते कि तुम उनके लिए नहीं।

जहाँ जन्मे, वहाँ का फर्ज निभाना है, मूल्य तो चुकाना ही होगा,

चेतना क्षेत्र एक श्रेष्ठ आयाम है, उसमें सबके लिए जगह बनाओ।

 

सारी ऊर्जा एक जगह झोंकना, कभी समय की माँग सकती हो,

पर स्वयं को भी सहेजना सीखो, स्वास्थ्य नियम सदा अपनाओ।

इस विश्व को अति गंभीर न लो, वे अधिकांशतः स्वार्थ में उलझे,

कर्त्तव्य पहचान निर्वाह करो, पर अन्य को दैव-विधाता न मानें।

 

यहाँ नए-नए लोग उभरते हैं,  बुद्धिमता का लोहा मनवाने निज,

जैसा समझ में आए, वैसा करो, पर उचित परिप्रेक्ष्य में दो उत्तर।

निकट नेताओं से सीखो, वे लड़ते-झगड़ते भी संग खाते-पीते हैं,

आलोचनाऐं दिल से नहीं लेते रोज़ की बातें, सहजता से निभाते।

 

लघु विषयों पर तुनकमिजाजी न उत्तम, धैर्य का फल मीठा होगा,

सत्य रंग समय बाद दिखता है, नए लोगों का सच सामने आएगा।

लोग पहले स्वपक्ष में विश्वास कराते, जोड़-तोड़ का खेल चलता है,

परिणाम का पता नहीं, किंतु वर्तमान का आनंद तो ले सकते हैं।

 

विषय जो हो, भुलाओ भी, घर-कुटुंब को समय देना आवश्यक है,

लोगों के पीछे न भागो, जब आवश्यकता होगी तो वे स्वयं आयेंगे।

देखो यह युग प्रयास करने वालों का है, बड़ा लाभ-अंश वे ही पाते,

जो बिना प्रयास किए मात्र सोचते ही, प्रायः भाग्य को दोष हैं देते।

 

तुम्हारी चेष्ठा रंग लाएगी, यदि मंशा होगी ईमानदार एवं सर्वहित

परंतप शक्तिवान बनो, किंतु धैर्य से करना भी सीखो निवारण।

बंधुओं के संपर्क में रहो, संवाद तुम्हें देगा शांति, सम्बल एवं वेग

जगत के कार्य बहुत पेचीदा हैं, अतः प्रयास करो सुबुद्धि ही संग।

 

मत उलझो बहु रहस्यों में, दर्पण-चेहरे दोनों होना मांगते स्वच्छ

निज दृष्टि को दूरदर्शी बनाओ, सब जुड़े अवयव करो ही स्वस्थ।

उच्चता के तुम सत्य ही प्रतिभागी, किंतु प्रयास का न छोड़ो संग 

काल तो बलियों की भी परखता, अतः चलना धैर्य-विवेक संग। 



पवन कुमार, 
7 दिसंबर 2024 शनिवार, समय 10:54 बजे प्रातः 
(मेरी डायरी दि० 30 मई,2024, शनिवार समय 8:41 बजे प्रातः से)  


Sunday, 17 November 2024

मनोबल महिमा

मनोबल महिमा 



 हे उच्च मनोबल के नायक, संस्थानों के प्रणेता अपने, 

आत्मा को दबने न देना, चाहे कैसी भी वेदना हो गहरी।

 

जीवन रणक्षेत्र में विजयी होना, हर रूप में सक्षम बनाना, 

निज प्रेरणा पथ पार कराती है, पहले स्वयं से विजय पाना।

 अपनी हार में जो विशाल आनंद है, वह स्वयं से मिलने में है, 

सब दंभ हटते, सच्चा रूप दिखता, अंधकार भी जाता हट।

 

माना कुछ क्षीण हम, किंतु सब बाधाऐं हटाता मनोबल,

ज्ञान-चक्षु कराते दर्शन, घावों पर प्रेरणा लगाती मरहम।

हर क्षण घायल होतें, तथापि सशक्त से संघर्ष में डटे रहते,

माना संघर्ष थकाऊ ही, परंतु सबसे बड़ा जीवन-धर्म है।

 

मूर्खताजनक मुग्धता न श्लाघ्य, पर आशा करना दोष नहीं, 

अबतक न घटित तो आगे भी न होगा, ऐसा मानना न सही।

क्षमताएँ बढ़ सकती हैं, यदि प्रयास हो निरंतर व स्वाभाविक, 

मनुज सीमाओं से बाहर आया, तभी लब्ध सफलता अद्भुत।

 

मरकर जी उठेंगे, धैर्य नहीं छोडेंगे, बाधाएँ नहीं रोकेंगी पथ 

ठोकरें लगेंगी, काँटे चुभेंगे, मजाक भी होगा, कभी गर्व मर्दन।

अपनी असली दशा जानकर, गंतव्य की दूरी भी पहचान लेंगे,

कौन से उपकरण आवश्यक हैं, जुटाकर उन्हें बलवान बनेंगे।

 

अपना स्तर जान दूसरों की शक्ति आँकेंगे, रण-नीति बनाएंगे, 

न स्वयं को कभी दुर्बल आँकेंगे, परिवेश को सशक्त बनाएंगे।

सब लगें अपने को स्थापित करने में यहाँ, होड़ एक जबरदस्त,

क्षीण पीछे छूट जाता, कमसकम प्रतियोगिता में तो हो चयन।

 

माना अब तक संपर्क अपने जैसों से, पर अब महा-मुकाबला,

सब आयुध सहेजो, शस्त्र पैने करो, समर तो अब शुरू हुआ।

यहाँ कृष्ण-वचन सत्य हैं, 'युद्ध कर', जो बहुतों को देते प्रेरणा,

विशाल सेना तत्पर झपटने को, पर मनोबल है महान प्रणेता।

 

अनीति पर सुनीति की विजय, अंधकार को चीर डालता प्रकाश,

असत्य पर सच्चाई की जयश्री है, मृत्यु भी अमृत से जाती हार।

लुब्ध-प्रवृत्तियों पर ईमानदारी की जीत, परिश्रम से विद्या मिलती, 

सुयश प्राप्त है योग्य कर्मों से, चाटुकारिता कभी काम न आती।

 

मेहंदी का रंग चढ़े धीरे-धीरे, सहज पककर ही तब मीठा होए, 

सुगुण-सुगंध तो स्वतः फैलते हैं, अच्छे-बुरे सभी लाभान्वित होते।

आत्म प्रयासों का ही अधिक सहारा, अन्य भी योग्य का साथ देंगे, 

उत्तम बुद्धि में ज्ञानमय होकर, अपनी प्रतिभा हम मनवा ही लेंगे। 

 

कर्मठता का यश दूर तक फैलेगा, यदि मन में होंगे सच्चे प्रयास,

माना जग में कुछ भेदभाव है, प्रतिभा को भी करने में स्वीकार।

एक दिन मेहनत रंग लाएगी, परम श्लाघ्य को न झुठलाता कोई

देखो कहाँ से कहाँ पहुँच गए हो, घबराने का कोई कारण नहीं।

 

आत्मसम्मान के योग्य बनो, कह सको, "निर्मल प्रयास किया", 

संस्तुति परम-आराध्य की होगी तो सरस्वती-लक्ष्मी भी चलेगी।

मन में हों बहु सकारात्मक भाव, सुकथन का बनाओ संकल्प, 

किसी को रुष्ट करना अनावश्यक, छोटी-मोटी बातें लो सह।  

 

सदैव प्रतिक्रिया अनावश्यक, शांतभाव उच्च-मन का प्रतीक, 

जल में रहकर मगर से शत्रुता मारक, सत्य क्षेम में बहु उन्नति।

वरिष्ठों का आशीर्वाद आवश्यक, सब योग्यों से गुण ग्रहण करो, 

उजले मानव-पक्षों को अपनाओ, बात-बात पर न उद्विग्न ही हों।

 

सभी उद्योग बढ़ाओ सकारात्मक दिशा में, स्थिति को सुदृढ़ करो, 

संपर्क करो कुछ योग्यों से, सुसंवाद से आत्म परिवेश शुद्ध करो।

जहाँ सूई काम कर सकती अनावश्यक तलवार, ऊर्जा हो संचित,

बहु कर्म अति-बल मांगेंगे, अतः सीमित ऊर्जा को न करो व्यर्थ।

 

लाभान्वित हों सहकर्मी भी, राष्ट्र-विभाग का नाम करो उज्ज्वल, 

बनकर नियमित प्रदत्त शुभ कर्त्तव्यों में, आधार खूब करो सुदृढ़।



पवन कुमार,

17 नवंबर, 2024 रविवार समय 11:33 बजे प्रातः 

(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दिनांक 4 जून, 2015 वीरवार समय 8:15 बजे प्रातः से)  


Saturday, 31 August 2024

स्वतंत्रता-अर्थ

स्वतंत्रता-अर्थ



स्वयं-सहायता महत्तम संबल, मानव इस दुर्धष जगत-जंजाल से मुक्ति पा सकते
सर्वत्र महालोलुप-दृष्टि है, कब सावधानी-च्युत हुए व बाज द्वारा लपक लिए गए। 

तुम कैसे यहाँ निज जीवन-घड़न चाहते, पूर्व-स्वतंत्रता तो नहीं, कोई तो है स्वामी
पर मौलिक महत्त्वपूर्ण, जितने उच्च को बनाओगे, कुछ निज-गुणवत्ता भी बढ़ेगी। 
जगत में ठग को पहचानना बड़ा कठिन है, फिर कौन निर्मल कल्याणक ही नित 
आरंभ में कुछ भद्र-चेतस संभव, पर सत्ता प्राप्ति कैसा ही रूप, जानना है कठिन। 

सत्य कि बहु संघर्षशील नर मृदुल-मानस ही, पर सत्ता-वैभव शनै कर देता गर्वित 
अच्छा-भला शक्त-प्राणी असहाय हो जाता, जगत-तष्णाऐं कर लेती पूर्ण पाशित। 
समय संग हमें मृदुतर होना चाहिए, किन्तु जरा सम्मान मिलते ही फूल से हैं जाते 
और पूर्व भले-समर्थकों को दास समझ लेते, जैसे मात्र हमारी सेवा हेतु यहाँ आए।

पर क्या मानव-कुसूर, वह सब बालपन-युवा-व्यस्क-प्रौढ़ आदि श्रेणियों से गुजरता
सबकी निज परवरिश होती जैसी संगति-विद्या-ज्ञान मिला, वैसे ही परिवर्तित होता। 
स्वयं को तो सोचते अति-बुद्धिमान, किंतु वास्तविकता में हैं विशेष परिस्थिति-रचना 
थोड़ा-बहुत विवेक मिला है हाथ-पैर मारने हेतु, व अति साहसी पार कर लेते बाधा।

चलो मदारी का खेल देखते हैं, वह अपने बंदरों से जो चाहे, वही काम करवा लेता
मदारी की रज्जु से बंधा वानर तो सेवक, स्वामी के हाथ में डंडा, खाना-पीना देता।
जरा सी शरारत की तो मार खानी पड़ती है, गुस्सा हो गया तो खाना भी नहीं प्राप्त 
अब बंदर का अल्प बुद्धि-साहस, अपने से बलशाली के चंगुल से मुक्ति है कठिन। 

जगत में सतत बहु प्रयोग, आखेटक वीभत्स-खूँखारु सिंह को पिंजरे में फाँस लेता 
महाकाय हाथी, गैंडा, जिराफ, मगर तक को फँसा लेता है, स्थायी ही अब उनका। 
माना ताकतवर किंतु नर युक्ति उनसे ऊपर की होती, बेबस जाल में फँस ही जाते 
तात्पर्य है कि चालक कब्जा जमा लेते निरीहों पर, चाहे देह-बल में कमतर उनसे।

अब एक काल तो मनुज-विशेष भी किसी स्तर, एक के ऊपर अनेक चढ़ी हैं परतें 
किंचित दुर्बलों से स्वयं को सुभग मानने लगता, मद में पाश में लेना चाहता उन्हें। 
प्राचीन काल में राजा बेगारी करवाते थे, सारे नर प्रस्तुति को बाध्य उनकी सेवा में 
न कोई प्रश्न, विरोध-स्वर ही, कभी कोई बोले तो कड़ाई से कुचलवा जाता सेना से। 

लोगों ने बड़े किले बनवा लिए, बड़बोलापन इतना अधिक कि गगन-छेद कर देगा 
विश्व की सकल-वैभव इच्छा-समक्ष कर लिए, अन्य-श्रम से फल चोखा है मिल रहा।
ऊपर से काम-प्रवृत्ति में पाशित, विश्वामित्र से तुलना सी जो मेनका से थे गए उलझ 
फिर रूपसी-संसर्ग को ही कुछ स्वर्ग सोचते, जीते-जी जो भोग सकते हो, लो भोग।

अब ताकत-नशा, दूजे को तुच्छ समझते, बात-2 पर औकात दिखाने की बात करते 
निज व्यवहार तो स्वयं से बली समक्ष कभी देखो, भीगी बिल्ली से कोने में दुबकते। 
युक्ति-व्यवहार तुम भी सीख जाते, निज जैसों से मिल महत्तम संभव लाभ लो उठा
यहाँ तुम उसकी सहायता करो और वह तुम्हारी, चोर-चोर तो मौसेरे ही होते भ्राता।

सब दमितों में से कुछ दुर्धष निकल जाते, साहस करके तंत्र समक्ष करतूतें कर देते
फिर सिकंजा धीरे-2 खिचना शुरू होता, विरोधी गुट अपना समस्त जोर लगा देते। 
कानून का पेंच तो बड़ा ही शक्त-पेचीदा है, चाहे तो किसी को भी फँसा देता कहीं 
सहायक-सहारा व निज बल भी अति काम न करते हैं, चक्रव्यूह निश्चित जटिल ही।

खैर ये बातें तो बलशालियों की, किंतु कुदरत समक्ष तो कभी पहाड़ भी है हिलता 
परंतु ये आमजन कहाँ जाऐं, उन पर तो सदा यह नहीं तो वह दबंग काबिज रहता।
स्वावलंबन की उसको कितनी स्वतंत्रता मिल रही है, उस देश-समाज के देन यही
लोकतंत्र ने बहुत आजादी दी, तथापि स्व-मतिमंदता व बली-युक्ति फँसाए रखती। 

चिंता यहाँ आम नर की, कैसे विमुक्त हो सकल सुलभ सुख-आस्वादन कर सकता
तब क्या स्वतंत्रता-अर्थ भी लेगा, क्या प्रज्ञाशील भाँति संयम से आचरण ही करेगा।  
क्या चरित्र-कसौटी, सब योगी-भोगी, राजा-गृहस्थ, साधु-पादरी पृथक आचार करते 
अब असंभव तो है समान प्रशिक्षित , किसको नायक मानें और पद-चिन्हों पर चलें। 

थोड़ा सरल करते हैं नर पूर्व पूर्ण-मुक्त होवे, तब स्वेच्छित पक्ष चिंतन कर ले अपना
यदि देश का शासन-तंत्र निर्मल, अवश्यमेव हरेक को पूर्ण-पनपन अवसर मिलेगा।  
वहाँ परिवेश शिक्षा-परक व मानव के उबार वाला होगा, ताकि ले सके उचित निर्णय 
विषमता भी शनै से मिट ही जाऐंगी, एक साहस होगा, करने को बुराई का प्रतिकार। 

ये धार्मिक तो यूँ ही मोक्ष-नाम लेते, स्वतंत्रता ही चरम उपलब्धि दिशा दिखा सकती 
साम्यवाद भी उत्तम चेतना है, मानव अन्य  का ग्रास न बने, व सुख से रहें दोनों ही। 



पवन कुमार,
ब्रह्मपुर (ओडिशा), ३१ अगस्त, २०२४, शनिवार, समय १०:२३ बजे प्रातः 
(मेरी महेंद्रगढ़ (हरि०)  डायरी ३१ अगस्त, २०१७, वीरवार समय ७:५३ बजे प्रातः से )