उनींदी कलम
फरवरी
2007 की मध्यरात्रि में
लिखी यह कविता कलम से किया गया आत्मीय संवाद है। जीवन की अनिश्चितताओं के बीच कवि
उद्देश्य, आत्म-परिचय और साधना की राह खोजते हुए धीरे-धीरे
संकल्प और जागरण की ओर बढ़ता है।
तेरी गहराइयों से रूबरू होने की चाहत
है;
ऐ उनींदी कलम, इस यात्रा में साथ तो देना।
मैं तो यूँ ही जीवन को तमाम करता रहा,
समय की गति में स्वयं को भी भूलता रहा।
मन में क्या कसक थी, यह मैं कह न सका,
नासमझ की मानिंद यूँ उनींदा ही पड़ा रहा।
कुछ हसरतें बना पाऊँ,
कुछ बड़े ख्वाब ले लूँ,
वरना ज़िंदगी तो यूँ ही निकलती चली जाएगी।
बिना किसी उद्देश्य के जीकर मैं करूँगा भी क्या—
साधना का मोल ज़िंदगी शायद न लगा पाएगी।
क्या करूँ मैं इस जीवन में,
ज़रा समझा जाना;
रोने के अलावा हँसना भी है, ज़रा बतला जाना।
कुछ करने की कसक लेकर दुनिया में आ गया;
अब कोई काम सामने रख दे, उसमें लगा जाना।
मेरे मन का महद् इतिहास यूँ ही बन्द
पड़ा है,
इसे कुरेदने की कभी मुझे फुरसत ही न मिली।
कैसे झकझोरूँ इसे, कैसे चलायमान करूँ—
मेरे मन की उम्मीदों को फिर नया जीवन मिले।
पल-पल साँस लेते हुए मैं भीतर सिमटता
रहा,
क्षण-क्षण उठकर अपने को फिर सँभालता रहा।
मन में कुछ करने की हसरतें बहुत अधिक थीं,
पर समय के साथ उनका गुनगुनाना भूल गया।
मेरे मन की थाह क्या है—यह जानना अभी
शेष;
इस दुनिया में मैं क्या सामान हूँ—उत्तर अभी शेष।
क्यों आया हूँ यहाँ और क्या मेरा मकसद है—
क्या मेरी इबादत है और मेरे रास्ते क्या हैं?
मेरे जीने की सूरत में रोम-रोम का
संचालन है,
जगत में रहने की चाहत, साँसों में विचलन है।
कुछ करने की इच्छा जगे तो इसे जीवन कहूँ,
वरना बिना समझे ही यह जीवन बीत जाएगा।
मेरी बर्बादियों और उन्नति का वह रब
साक्षी है;
मैं उसकी इबादत फिर निरन्तर करता रहूँ।
माना, अभी पूरा शऊर नहीं, न उसका ढंग ही—
उसी की कृपा से सीखते हुए आगे बढ़ता रहूँ।
अपने मन का मीत आखिर बनाऊँ किसको,
जब स्वयं से पूरा परिचय अभी कर न पाया?
बहुत कुछ पाया है मैंने बाहर की दुनिया से,
फिर भी अपने भीतर कुछ अनजाना-सा हूँ।
मेरे मन की तसल्लियों की कोई महफ़िल
हो,
उसी में शायद मैं भी अपने फ़साने कह सकूँ।
कहने की कला को अभी धीरे-धीरे साध रहा हूँ,
लड़खड़ाते शब्दों में भी अपना मन खोल रहा हूँ।
मुझ पर तू कृपा कर,
मुझे आगे बढ़ाओ ना;
जीवन को जीने के कुछ नए ढंग सिखाओ ना।
गुज़ारिश है—कुछ मकसद देना इस ज़िंदगी को,
ताकि अंत में कुछ न करने का मलाल न हो।
मेरी तरक्कियों का रास्ता तूने ही
सुझाया है;
तेरी ही राह पर अब मुझे आगे बढ़ते जाना है।
तेरा साथ और तेरी प्रेरणा मुझे सदैव चाहिए ही—
क्योंकि देख, तू बड़ा गुरु है और मैं तेरा चेला
हूँ।
मुझे समझ नहीं आता कि प्रेम का रंग
कैसा है;
कैसे तुझमें आत्मसात होकर गौरवान्वित होऊँ?
मुझ पर अपनी कृपा की चादर तू ओढ़ा देना,
जमाने की तमाम गर्मी-सर्दी से मुझे बचा लेना।
जीवन में निरन्तर चलते रहने का चिंतन
देना,
मेरे भीतर विश्वास और विवेक बनाए रखना।
ऐ कलम, अपने अक्षरों से राह दिखाती रहना—
मैं उस राह पर जागृत होकर चलता रहूँगा।
नैतिक संदेश:
आत्मप्रश्न जब संकल्प से जुड़ते हैं, तो
उनींदी चेतना भी जीवन की राह पहचानने लगती है।
पवन कुमार,
5 सितंबर 2026, सायं
6:22 बजे
(मेरी डायरी 6 फरवरी 2007, मध्यरात्रि 1:00 बजे से)