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Saturday, 4 January 2025

तमसो मा ज्योतिर्गमय

तमसो मा ज्योतिर्गमय

प्रभु से प्रार्थना है कि सबको सद्बुद्धि दें और हृदय में एकता व विशालता का भाव जगाएं। माना कि इस लघु जीवन में हम साधारण प्राणियों के लिए इसे पूरी तरह समझ पाना असंभव है। बहुआयामी जीवन-रूपों को उनकी संपूर्णता में देख पाने में भी हम अक्सर असफल रहते हैं। जीवन की अनेक परतें इतनी गहरी हैं कि उनका आभास तक नहीं हो पाता। फिर भी, समय की धारा यह सतत प्रवाहमान जीवन हमें हर पल, हर क्षण अपने साथ बहाए लिए जा रही है। माना कि हम तट-दृश्यों को देखने में भी असमर्थ रहते हैं। यह विचार आता है कि जीवन से हमारी अपेक्षाएँ क्या हैं और क्या यह हमारे लिए सार्थक हो सका है? क्या हम अपनी प्राथमिकताओं को समझ सके हैं या मात्र एक स्वप्निल अवस्था में जी रहे हैं?

पुस्तकें तो ज्ञान से भरी हैं, लेकिन क्या वह हमारा जीवन-अंश बन पाई हैं? जब हम लिखने बैठते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे शून्य-अवस्था में प्रवेश कर रहे हों। लेखनी अपने आप रास्ता बना लेती है और ऐसा प्रतीत होता है कि हम महज एक माध्यम हैं। यह तभी चलती है जब स्वयं चलना चाहती है। हमारे हाथ और कागज दोनों उसकी प्रतीक्षा करते रहते हैं। जैसे कोई सागर के किनारे बैठकर उसके प्रवाह में अनंतता का अनुभव करना चाहता है, वैसे ही यह कागज भी संभावना-अन्वेषण के लिए व्याकुल रहता है।

हम सभी जीवन को विस्तृत करना चाहते हैं—चाहे वह ज्ञान, सामर्थ्य, या रूप में हो। हर कोई सर्वशक्तिमान बनने की आकांक्षा रखता है। जीवन-तत्व बहुत सूक्ष्म है। जितना इसे समझने का प्रयास किया जाए, यह उतना ही गहन और रहस्यमय हो जाता है। सर्वत्र समानता-भाव दिखाई देता है। सजीव और निर्जीव का भेद भी तुच्छ लगने लगता है। यही समानता-भाव हमें सिखाता है कि हर जीव-तत्व अपने भीतर एक ही ऊर्जा संजोए हुए है।

हमारी साधना प्रायः सतही होती है, क्योंकि गहराई तक जाने के लिए साहस और शक्ति की आवश्यकता होती है। जैसे गहरे समुद्र में छिपे मोती तक पहुँचने के लिए लहरों से संघर्ष करना पड़ता है, अंधेरे का सामना करना होता है और सटीक दिशा का पता लगाना पड़ता है, वैसे ही जीवन की गहराई में उतरने के लिए हमें अपनी ऊर्जा और इच्छाशक्ति को संगठित करना होता है। यह विचार उपनिषद की पंक्ति 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' की याद दिलाता है। अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रयास ही तो जीवन का सार है। यह सभी के लिए प्रासंगिक है, क्योंकि प्रकाश की ओर बढ़ना आत्मा की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। दिशाहीन और बिखरी जीवन-ऊर्जा को संगठित करना 'समाधि' का सार है। यह विकिरित किरणों को एक लेंस के माध्यम से अग्निपुंज में बदलने जैसा है। इस संगठित ऊर्जा से जीवन में नए आयाम प्राप्त हो सकते हैं।

प्रत्येक जीवन-पहलू में सुधार की संभावना है। यह हम पर निर्भर करता है कि अपने प्रयासों को कितना सार्थक बना पाते हैं। भले ही हमारे प्रयास टकराएँ या विरोधाभासी लगें, 'पूर्णता' की ओर बढ़ने का प्रयास हर किसी के भीतर होता है। हर दिन एक नई संभावना लेकर आता है—जैसे सूरज का उगना, जो हर अंधकार को मिटाने का वादा करता है। जब हम इस वादे को अपने जीवन में अपनाते हैं, तो हर दिन नए अवसरों से भर जाता है।

इसके लिए हमें कुछ प्रयास करने होंगे। एक सरल उपाय है—हर दिन थोड़ी देर ध्यान करें, अपनी प्राथमिकताओं को लिखें और उन पर विचार करें। एक अन्य प्रभावी उपाय है—प्रातः अपने प्रति आभार व्यक्त करें और उन छोटी-छोटी सफलताओं को याद करें जो हमें प्रेरित करती हैं। यह छोटा-सा अभ्यास हमें अपनी ऊर्जा को सही दिशा में केंद्रित करने में सहायक बन सकता है। जब मानव अपनी अज्ञानताओं को स्वीकार करता है और सुधार के प्रयास करता है, तो वह सामर्थ्य-वर्धन में सक्षम होता है। जब ऊर्जा सही दिशा में लगती है, तो यह न केवल हमें बल्कि हमारे आसपास के लोगों को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।

यह सत्य है कि मानव-जीवन में अपार संभावनाएँ छिपी हैं। यदि सुप्त शक्तियाँ जागृत हों और उचित दिशा में केंद्रित हों, तो जीवन न केवल सार्थक बल्कि सुंदर और प्रेरणादायक हो सकता है। हर दिन अपनी ऊर्जा को जागृत कर, उद्देश्य की ओर बढ़ने का प्रयास ही जीवन का सर्वोत्तम अर्थ हो सकता है। जीवन की सबसे बड़ी सौगात उसकी अनंत संभावनाएँ हैं। जब हम इन्हें पहचानते हैं और उनका उपयोग करते हैं, तो न केवल हमारा जीवन बल्कि पूरा समाज भी उज्ज्वल बनता है। जब हर व्यक्ति अपनी ऊर्जा सकारात्मक दिशा में लगाएगा, तभी समाज और संसार में वास्तविक परिवर्तन संभव होगा। यह प्रयास ही हमारे संसार को और बेहतर बनाएगा।

इन्हीं शुभकामनाओं के साथ। 


पवन कुमार, 

ब्रह्मपुर (ओडिशा), 4 जनवरी 2025, शनिवार, समय 9:08 बजे सायं  

(मेरी नई दिल्ली डायरी दि० 21 जनवरी 2007, रविवार, समय: 7:10 सायं से)


Thursday, 14 November 2024

पूर्व दिशा चिंतन


पूर्व दिशा चिंतन  

 

पूर्व दिशा में दृष्टि करना, योग का है एक मुख्य नियम,

यदि पूर्ण उचित नहीं भी लगे, तो भी प्रयास हो अनुपम।

 

सूर्य प्रातः उदित होता, पूर्व से भू को देता ऊर्जा अपार,

शुभ दिशा मानी जाती, भास्कर से सीधा संबंध साकार।

मस्तिष्क का संयोग उचित ही, ध्यान का होता है संगम,

महद चिंतन हो जाता, शरीर की क्रियाएँ होतीं संगठित।

 

वास्तु-शास्त्र है दिशा-आधारित, शुभ-अशुभ करे इंगित,

मंदिर-मुख पूर्व को, आजकल किए जाते भवन-द्वार भी।

सारे योगासन पूर्व दिशा ओर ही मुख करके किए जाते,

कारण तो अधिक न मालूम, बस शुभ-अशुभ से जुड़ते।

 

भारतवर्ष उत्तरी-पूर्वी गोलार्ध में, सूर्य यहीं उगता पहले,

यूरोप-अमेरिका को पश्चिम कहते हैं, वे पश्चिम में बसते।

हम पूर्वी, हमारी संस्कृति उनसे विलग ही बताई जाती,

दक्षिण-पूर्व का क्षेत्र कमोबेश सम विचारधारा अपनाता।

 

मस्जिद-प्रवेश पश्चिम में निर्मित, मक्का-मदीना हैं उधर,

मुस्लिम  हिन्दू संस्कृतियों में बताई जाती है भिन्नता कुछ।

शैली अनगिनत बना लेते, मनुज इन्हें जीवन में अपनाता,

जो अन्य किंचित भिन्न होते, उनमें सहज विरोध हो जाता।

 

भोजन समय पूर्व को मुख करते, पूर्व-दक्षिण को सोते सिर 

दक्षिण ओर पैर न करते, दिशाओं का भी कहा जाता चरित्र।

पर कहते हैं गुरु नानक के पैर, पूर्व व पश्चिम में रख दिए थे,

किंतु वह योगी थे, जिधर देखें, मक्का की मस्जिद ही दिखे।

 

पूर्व दिशा की ओर मुख करके, मनन-चिंतन लगाया जाता,

लेखनी से कुछ बेहतर ही निकालेगा, ऐसा माना है जाता।

पृथ्वी की उत्तर-दक्षिण ध्रुवीय चुंबकीय किरणें हैं निर्धारक,

उत्तर सिर करने से सिर भारी किरणें सीधी होती हैं प्रवेश। 

                                                                 

दक्षिण में ऐसा दुष्प्रभाव न, नियम भी बनें आधार पर इसी,

दक्षिण दिशा में सिर करके सोना, प्राणी को देता है शांति।

इसलिए ध्यान-योग विषयों में, दिशाओं का विशेष स्थान,

प्राचीन नियमों में यह छिपा है, समझो इसको महा ज्ञान।

 

                                      

पवन कुमार,

14 नवंबर, २०२४, गुरुवार समय 7. 37 बजे

(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दिनांक 1 अप्रैल, 2015, बुधवार, समय 8.30 बजे प्रातः से)



Sunday, 4 August 2024

अनिश्चित आगामी

अनिश्चित आगामी



जीवन का यादगार दिन, अपनी छाप छोड़ जाएगा ही 

एक यात्रा पूरी हो रही, व कुछ अनिश्चित है आगामी। 


लिखकर इसको जी लूँ, फिर चिंतन कर सँवार ही लूँ 

हरेक पल को सार्थक ही बनाकर, पूर्ण-दिशा इसे दूँ। 

बीत गया है जो हँसी-खुशी में, उसको अनन्त बना दूँ 

नित आगामी दिन हेतु सदेच्छा ही, इसे मधुर बना दूँ। 


बहुत हो गया हँसी-खेलना, अब कुछ गंभीर हो जाऊँ 

मस्तिष्क की कर्कशता त्यागकर, कुछ कोमल जाऊँ। 

बीत गया जैसे बहुत कुछ ही, व अंतः में गया अति दूर 

कुछ मृदुल मनन फिर से कर, स्वयं के आऊँ निकट। 


कुछ खोना और अनुपम पाना है, चेष्ठा उधर इंगित करो 

चलाओ सुमार्ग पर ओ प्रभु, सकल उचित चिन्हित करो। 

प्राण-वायु दो श्वसन-तंत्र को, ज्ञानेंद्रियाँ संचालित ही करो 

छुड़वा व्यर्थ बचकाना, किंचित सार्थक में संवाहित करो। 


कुछ कर्त्तव्य बोध कराकर, प्रदत्त कर्मों हेतु सुप्रेरित करो 

अनुभव बताता कितने साथ ही हैं, तथापि तो उद्यत करो। 

नहीं चाह किसी यश-स्तुति की, करो विदूर मिथ्या श्लाघा 

किंतु प्रबलेच्छा कुछ समुचित हो, साक्षी बनूँ अनुपम का। 


आह्लादित करो मन-प्राण ही, एक करूँ मन-वचन-कर्म 

चिंतन हो कुछ विरल सा, जिससे हो आत्म-साक्षात्कार। 

छूटते जा रहे हैं व्यर्थ बहु बंधन, एक अच्छी बात यह तो 

किंतु मोह स्वजनों से बिछड़ने का, कैसे संभालूँ खुद को। 


स्वावलंबन अपनाने की ही शक्ति, मुझको ईश्वर दे देना 

मनुजता प्रति क्या हो दायित्व, उसको भला समझा देना। 

बना कलम को कुछ अंतः-साक्षी, किंचित जीवंत बनाऊँ 

व सार्थक चिंतन-व्याख्यान से, इसको निर्मोहित बनाऊँ। 



पवन कुमार, 

४ अगस्त, २०२४, रविवार, समय ५:४४ बजे अपराह्न 

(मेरी नई दिल्ली डायरी २५ जून, २०१४ बुधवार, ८:५३ बजे प्रातः से )

Thursday, 14 March 2024

जीवन वरदान

जीवन वरदान



हर दिवस एक नव-अनुभव लेकर आता, इस जीवन पर चढ़ाऐ एक लेप सा 

सब कुछ तो देह-आत्मा सराबोर हो जाते, अनेक संज्ञानों का मिश्रण होता। 


हम जब कोई सरोवर-तल देखते, कई मृदा-परतें एक के ऊपर चढ़ती जाती 

शनै: निचलियों पर अति-भार हो जाता, हाँ खोदे-कुरेदे तो पता चल जाता भी। 

समय संग प्रायः उनमें स्थायी बदलाव आ जाता , दबाव-ताप काम करते निज 

कायांतरण भी नित घटित, एक मामूली कोयला, हीरक में हो जाता परिवर्तित। 


रसायन विज्ञान क्रिया-प्रतिक्रिया है समझाती, परिवर्तनीय या अपरिवर्तनीय कुछ 

जल में लवण घोलो तो अदर्शित, सूख जाने पर उसके रवें दिखने हैं लगते पुन:। 

किंतु आटे की रोटी चूल्हे पर सिंकने के बाद पूर्व-स्वरूप यानि आटे में आती न 

हाँ सुखाकर पीस लो तो किंचित चूर्ण बन सकती है, गुण तो पूर्ववत न रहते पर। 


काठ की हाँडी बार-2 आग पर न चढ़ती, प्रथम बार में ही जलकर हो जाती भस्म 

प्लास्टिक-रबर को एक बार जला दिया, गैस व काला कार्बन ही शेष रहते बस।

गैस तो वायुमंडल में मिल है जाती, कार्बन भी शनै मिट्टी का एक अंग बन जाता

 अतएव सारी वस्तुऐं अन्य स्वरूप लेती रहती, कुछ भी जगत में नहीं है अछूता।


बृहद प्रकृति-प्रक्रिया में पुनरावरण भी, पर अनेक प्रक्रियाओं पश्चात दीर्घावधि में 

अति-विचित्र हैं ये समस्त जग-कवायदें, कुछ अंदाजा लगा लेता नर निरीक्षण से।  

किंतु विशेष वस्तु-स्वरूप में जो स्थायी परिवर्तन हो जाते, उनसे लौटना असंभव 

हाँ वैसी अन्य वस्तुऐं भी अन्य प्रक्रिया से गुजरती होती, किंतु आप मरे जग प्रलय।


तो जीवन भी अतएव एक वस्तु सम, उसके मुख्य दो अवयव, देह व आत्मा-प्राण  

माँ में गर्भाधारण से लेकर मृत्यु पर्यन्त यात्रा अति-दीर्घ, वे नहीं जो पूर्व में थे हम। 

विभिन्न दर्शित अवस्थाओं से गुजरते, कुछ समरूपता कारण उन्हें दिया नाम एक

किंतु जीवन-अवययों में सतत प्रभाव होने से, स्थायी परिवर्तन होते रहते हैं निरत। 


कुछ लचक भी, बीमार होकर कृष होते, स्वस्थ होकर पुनः बल-भार धारण कर लेते 

जैसे डाँट-फटकार का बुरा मानते हुए भी, कुछ देर बाद समझकर सामान्य हो जाते।

पर जो भी हम पर घटित उसका प्रभाव तो स्थायी, चाहे अति-सूक्ष्म मात्रा में ही होता 

शनैः हम इतने दृढ़-ढ़ीठ हो जाते हैं, खुद भी नहीं समझ पाते यह क्या-क्यों हो रहा। 


कुछ ऐसा मेरे या सबके संग हो रहा, पर अन्य-विषय में क्या बोलू, स्वयं को जानता 

हाँ और भी निज भाँति से अनुभव करते होंगे, वे ही जानें उनके मन आँगन में है क्या।

कितना चाहा-अचाहा निज इच्छा से या थोपा गया, बलात भी बहुत कार्य करने पड़ते 

मानव स्वच्छंद तो न अपनी कसरतों में, सब अन्य अपनी भाँति से प्रभाव जमाऐ हुए।


पर मैं क्यूँ कर्कश सा बनता हूँ जाता, कुछ सोच समझ कर कुप्रभावों को करूँ अल्प

हाँ कभी बार गुस्सा आता जो निकट-अव्यवस्था से, बोलना भी हो जाता स्वाभाविक।

पर ऐसा कब होता क्रिया तो करे व प्रतिक्रिया न होवे, यह दुनिया की रिवाज है नहीं 

वृद्ध का बालावस्था-प्रवेश असंभव, कपोत आँखें बंद कर ले तो क्या बिल्ली न आती। 


अब जीवन किसको कहें इसमें तो न अधिक मर्जी, परिस्थितियाँ अपनी भाँति ढ़ालती 

हाँ सिर पर जब पड़ती तो जैसे-तैसे बजाने लगते, स्वतंत्रता तो आत्म-निकट न अति।  

एक कूप मिला, उसी में हाथ-पैर हिला लो, प्रयास करते हो तो कुछ देर रहोगे जीवित

कुछ साथियों से लड़-भिड़ते भी, स्वयं से या अन्य-डर से सब भाँति के भय रहें दिख। 


सबके अपने कूप बस कारक बदल जाते, भिन्न परिस्थितियों से बनते विशेष व्यक्तित्व 

अच्छा-बुरा कुछ मैं यहाँ नहीं विचारता, मेरा विषय वर्तमान में इस मानव का है घड़न। 

किंतु प्रक्रिया समझना तो एक बात, क्या हम स्वयं पर होने वाले प्रभाव सकते हैं आंक

कुछ समझ-बूझ कर सुघड़ शैली बना लें, जिससे विलोम कारकों का कम हो प्रभाव।

 

हाँ किंचित ये धर्म-प्रवचन-संगोष्ठी-तर्क-मनन, नर के कटु-अनुभवों से त्राणार्थ के यत्न 

कितने सफल हो पाते हैं सिलसिले में, हाँ कुछ देर तो जादू को असर रहता अवश्य। 

फिर पुनः हम अपने वास्तविक रूप में आ जाते, वही भला-बुरा सा लगने लगता है

 हाँ जीवन-काल के कुछ भाग निर्मित, कुछ में तो यथासंभव सुकून अनुभव कर लें।  


मुझे भी निश्चय ही एक सुशैली अपनानी चाहिए, व्यर्थ कष्ट नहीं दूँ देह-आत्मा को इस

अपने परिवेश में किञ्चित सकारात्मक परिवर्तन कर लूँ, सुवास हो इर्द-गिर्द भी एक। 

यह जीवन वरदान उत्तम प्रकार से जीने हेतु, फिर न मिलेंगे ये अमूल्य वर्तमान पल  

तो कुछ व्यय करके भी उत्तमता ग्रहण कर लो, अच्छे अनुभव का कोई सानी है न।


तो प्रखरता से विचारो कहाँ सुधार आवश्यक है, ताकि अनुभव भी तथानुरूप लब्ध 

जितना बस में है उतना तो करो, शेष का भी कोई न कोई मिल जाएगा उत्तम हल।



पवन  कुमार,

14 मार्च, 2024 वीरवार, समय 9:28 बजे प्रातः 

(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दि० 3 मार्च, 2017 प्रातः 5:07 बजे से )



Saturday, 26 August 2023

नित्य-समस्याऐं


नित्य-समस्याऐं

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समस्याऐं हमारी नित्य जिंदगी-प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग 

हम चाहे माने या न माने, वे हैं हमारी हितैषी-शिक्षक-प्रेरक। 

 

अवश्यमेव बुरा प्रतीत, पीड़ा तन-मन अवयवों से टकराती जब 

प्रत्येक गर्व को भग्न करती, व बताती कितने कमजोर हो तुम। 

समस्त प्रकृति के इस चलन में, एक क्षुद्र पुर्जा ही है मानव-मन 

उससे अपेक्षित तो बहुत कुछ है, लेकिन सीमाऐं बस निज तक। 

 

नित्य अनेक कारक जाने-अनजाने, चाहे-अचाहे हैं स्व कार्यरत 

बेशक हम पूर्ण तैयार ही न हों, आकर प्रहार तो देते ही हैं कर। 

हमें ललकारते हैं, कि यदि हिम्मत हो तो मैदान में आओ समक्ष 

और हम निज अल्प-शक्ति के अनुसार ही, किया करते हैं कर्म। 

 

अनेक जन मानव-कृत व बहु प्रकृति नियमानुरूप, कह देते पक्ष 

हम आत्म-मुग्ध से यूँ कुछ सोचते रहते, हम्हीं हैं सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर।  

क्या यह न है स्व का अधिक-आँकन ही, जबकि मालूम तो सत्य 

क्यों न ईमानदार-मूल्यांकन आत्म का, व प्रवाह हेतु छोड़ते पथ। 

 

विरोधाभास तो आत्म-सँवारण की अपेक्षा, औरों को उलाहना ही 

'नाच न जाने आँगन टेढ़ा', मूर्ख तो कुछ कहने हेतु चंचल-भ्रमित। 

माना अन्य  गलत हैं, हो सकते, निज-क्षेत्र भी तो देखना होगा पर

बस न औरों से ही सदाशयता-आशा, पहचानने होंगे स्व-कर्त्तव्य।  

 

मैं मुदित कुछ अल्प-उपलब्धियों से ही, न जानता पूर्ण जगत-चक्र 

हर जगह की स्व विसंगतियाँ, और उन हेतु वाँछित प्रयोग हैं भिन्न। 

माना तुम सौभाग्यशाली हो, विभिन्न प्रकार के संपर्क पाते हो कर 

मन को ललकारता, विश्रांत मन-कोष्ठकों को करती चलायमान। 

 

अंततः प्राण-संपूर्णता भी तो हर अंग-प्रत्यंग से पूर्णादय कराना ही 

तुम जब आए हो तो, क्यों छोड़ना चाहते हो स्व को अधखिला ही ?

पूर्ण प्रयोगित हों तन-मन व दत्त साधन, अंततः खाक में ही मिलना 

घिसकर अंत तो सदाशुभ, बजाय सड़कर मरना व दुर्गंध फैलाना। 

 

अपने को सुवासित करो न, कुछ उत्तम गुलदावरी-कमल खिलाओ 

क्यों स्व और अन्यों को, अपने वाक-कंटकों के नश्तर चुभोते हो ?  

अनावश्यक लड़ना परस्पर ही, प्रकृति से सामंजस्य सुस्थापित करो 

जब कुछ कर्म सुधरेंगे, तभी तो औरों से कुछ आशा कर सकते हो। 

 

अनेक ही विडंबनाऐं इस मन में स्व-चलित हैं, नर को उद्वेलित करती 

उसे नित झझकोरती हैं, व्यर्थ अभिमानों को चुनौती दे चूर-२ करती। 

माना वे स्वयं को वीर कहते हैं, पर अनेक जगह खुद को निर्बल पाते 

एक लघु कैंसर-कोशिका से तो मुक्त न हो सकते, व यथार्थ समझते। 

 

पर हमारा क्या दृष्टिकोण समस्याओं प्रति, कितनी तैयारी निबटने की 

सुव्यवस्थित-अनुशासित व हर व्यूह-प्रशिक्षित सेना रण-उपयुक्त ही। 

प्रतिद्वंद्वी को क्षीण न समझो, यावत पूरा तंत्र-प्रबंधन न जान लो उसका 

अन्योपरि प्राकृतिक नियमों से खिलवाड़ न करो, जो तुम्हें सकते बचा। 

 

जब कार्य हो रहा हो तो संपूर्ण ही झोंक दो, त्रुटि-रहित रचनार्थ समुचित 

सकल सामग्री-प्रक्रिया उत्तम-ढंग की हों, पश्चात् में समस्याऐं होंगी न्यून। 

माना बाद में भी कुछ उलझनें हो सकती हैं, निजात पाया जा सकता पर 

किन्तु निज शुभ्रता व गुणवत्ता हेतु निष्ठा ही, आहूति है विराट यज्ञ में इस। 

 

सकारात्मक प्रयोग हो इस जीवन का, कुछ योग्य कर्मी बनाओ सहचर 

झझकोरो निज सकल विचारों को तो, अनेक उनमें सुधार माँगते नित। 

तुम न गुजारो समय यूँ बस गाली खाने में, स्व हेतु कुछ जुटाओ आदर 

किंतु संभव वह श्रम-शुचिता से, बजाय औरों के निज-चेष्टा करो प्रखर। 

 

धन्यवाद ! जुटो और ठीक करके दिखाओ कुछ! तुमसे बहु आशा है। 

 


     पवन कुमार, 

२६ अगस्त, २०२३, शनिवार, समय ५:०१ बजे अपराह्न 

( मेरी महेंद्रगढ़ डायरी २५ नवंबर, २०१४ मंगलवार, समय ७:५० बजे प्रातः)