काव्य और कवि-दृष्टि
पवन कुमार,
ब्रह्मपुर (ओडीशा), 19 जनवरी 2024 रविवार, समय 11:26 प्रातः
(मेरी उदयपुर (राज०) डायरी, 25 जनवरी 2016, सोमवार, प्रातः 7:45 बजे से)
Every human being starts his life's journey with perplexed, enchanted sight of world. He uses his intellect to understand life's complexities with his fears, frustrations, joys, meditations, actions or so. He evolves from very simple stage to maturity throughout this journey. Every day to him is a challenge facing hard facts of life and merging into its numerous realms. My whole invigoration is to understand self and make it useful to the vast humanity.
काव्य और कवि-दृष्टि
पवन कुमार,
ब्रह्मपुर (ओडीशा), 19 जनवरी 2024 रविवार, समय 11:26 प्रातः
(मेरी उदयपुर (राज०) डायरी, 25 जनवरी 2016, सोमवार, प्रातः 7:45 बजे से)
समर्पण : यह कविता महाकवि जयशंकर प्रसाद और उनकी कालजयी कृति कामायनी को समर्पित है, जो मानवता, विश्वास, और पुरुषार्थ का पथ आलोकित करती है।
पवन कुमार,
26 दिसंबर 2024 वीरवार, समय रात्रि 21:28 बजे
(मेरी महेंद्रगढ़ (हरि०) डायरी दि० 6 मई 2015, बुधवार, 9:06 बजे प्रातः, से)
चंचल बाल मन-सुलभता
उसे उबासी होती पुराने से, बस सतत प्रयास नव-सम्पर्क का।
कभी सोचा था नियमित लिखूँगा, अब अध्याय कहाँ से ढूँढ़ें
नव,
किंतु मन भी ढ़र्रे में सोचता, तथापि बहुरंगी माँगता निज वचन।
यह तो एक टीवी मीडिया सा, इसे 24x7 भरण-सामग्री चाहिए,
नित्य ही नवीन-रोचक खबरें हों, कभी अमिताभ बच्चन बोले थे।
वहाँ रतों का काम यही, खोज-संकलन, संपादन बाद करें प्रस्तुति,
अंततः दर्शकों को कुछ नवीन मिलेगा, उनकी टीआरपी भी बढ़ेगी।
इसीलिए भिन्न-भिन्न विषय चुनते
, और पृथक व्यक्तित्वों से मिलते,
लघु-महद संवाद करते, नमक-मिर्च लगाकर खबर प्रस्तुत करते।
सब संग्रहालयों की भी एक प्रक्रिया, अप्रतिमों को करना एकत्रित,
जैसा रोचक-अनुपम, विचित्र-दुर्लभ मिल जाए, यत्न से हैं सज्जित
किंतु ज्ञान एवं शोध इतना सरल भी न, कि सोचा और हुआ
संभव,
'गीत गाया पत्थरों ने' जैसे शीर्षक ढूँढ़ते,
वाणियों में पिरोते हैं शब्द।
संग्रहालय-लक्ष्य तो दर्शकों को विभिन्न ज्ञान एक स्थान पर दिखाना,
दर्शक तभी आनंदित होते, जब बहु नूतन विधाओं से सम्पर्क होता।
ये ग्रंथागार-वाचनालय, कलाकृति प्रदर्शनी, विशेषज्ञ सम रखते पक्ष,
पाठक-दर्शक होते हैं प्रेरित, समय के सदुपयोग से बढ़ता मनोबल।
विभिन्न पुस्तकें, अनेक अध्याय, लेखकों के अपने विभिन्न मंतव्य,
सबमें कुछ विशेषता भी, रूचि अनुरूप चाहे तो सकते कुछ गुन।
सब उद्देश्य बहु आयामों से संपर्क कराना, मानव आत्म में अत्यल्प,
इतर-तितर संयोग से विस्तार होता
है, किञ्चित और होता बुद्धिमान।
मन एक बावला है, स्वयं से नहीं संभव, तथापि ले लेता महद वचन,
इस क्षुद्र मस्तिष्क का कौन संगी
है, जिससे नित करा सके निर्मित?
महारथी अर्जुन ने सूर्यास्त तक जयद्रथ
के वध का ले लिया प्रण तो,
किंतु कौरवों ने सफल न होने दिया, लाज बचानी पड़ी कृष्ण को।
वो चीज कहाँ से लाऊँ, तेरी दुल्हन जिसे बनाऊँ, कोई पसंद न आए छोरी
मन किञ्चित तो अचंभित होता, परंतु नवीन हेतु लगाता छलाँग भी।
इस अल्पता का तो भोगी, फिर परजीवी कुछ न रच सकता निज से
युक्ति करने की भी न अति समझ, अतः यूँ ही इधर-उधर हाथ मारे।
नदी में कूदने पर ही तैरना आता, अतः सीख सकते यदि हो प्रयास
अनेक बाहर आते कूप-मंडूकता से, सोच लिया तो दिखेगा भी मार्ग।
बिन कुछ किए तो जगत में, मनुज की नहीं हुआ करती प्रगति बहुत
ध्यान करो, कर्म-इंगित करो, एक साहसी सम बढ़ाओ अग्र कदम।
मेरी भी चेष्टा लेखन सार हेतु, कुछ सुस्त हूँ स्वयं से ही बनाता नव
माना बाह्य अध्ययन भी आवश्यक, जो स्वयं को करते देने महत्तर।
जब अभ्यंतर सुघड़-श्रेष्ठ हो जाएगा, तो बाहर भी उत्तम ही आएगा
यही एक आदान-प्रदान का सिलसिला, बिना किए यश न मिलेगा।
किञ्चित आत्म-प्रयास ही सराहनीय है, किंतु बहुत न होता पर्याप्त
मनीषियों ने बहु विषय सामंजस्य-मंथन कर कुछ बनाए
हैं सिद्धांत।
वे उत्तम क्योंकि अनेक प्रयोगों बाद ही आऐं, उनसे आगम लो अत:
चिंतन-मनन की वांछित सामग्री देगा, उत्पादकता तो बढ़ेगी कुछ।
माना लेखन कर्म तो स्वयं से जूझना ही, पर वहीं से निकलेगा अमृत
किंतु पूर्व कृत-संचित ऊर्जा-ज्ञान बड़ी शक्ति देता, तन-मन को इस।
अतः सीखो जितना भी बन पाए इस जग में, उत्तमता की कुंजी है वह
निर्मल स्वरूप तो शुभ-मिलन से ही बनेगा, सांझी सोच का है महत्त्व।
हम नित्य तो उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण होते हैं, प्रश्न मात्र सम्मान का न अत:
यह मात्र एक चेष्टा दक्ष बनने की, आत्म-आदर की यात्रा है निरंतर।
अतः बस सोच लो लिखने को नव अध्याय, नहीं कोई विषय-अल्पता
अनेक प्रयास करते, इसकी साक्षी हैं सकल उपलब्ध रचनात्मकता।
खिलौनें तो अनेक पर आनंदित-आविर्भूत होकर जाओ नए पर ही
ग्रंथालय-संग्रहालय सा कुछ सहेजो, गर्व-संतोष की होगी अनुभूति।
पवन
कुमार,
ब्रह्मपुर,
2 दिसंबर 2024, सोमवार, समय 9:19 प्रातः
(मेरी
महेंद्रगढ़ डायरी दि० 17 अप्रैल 2015, शुक्रवार, समय 9:17 बजे प्रातः से)
इनायत
भले ही होंठों पर शब्द न आते, दिल का हाल तो नैन-भाषा से उजागर।
यह क्या अफसाना सामने तो न, बस ख्याल उसका ही कर देता विचलित
पता नहीं यह हाल एक ही तरफ का, या दूसरा भी उतना ही है विव्हलित।
अब किसको कहूँ इस मन की उत्पलावता, बस रह-रह कर यूँ टीस उठती
मुख से तो न कह सकता, शब्द लड़खड़ाते, शायद बात मन में रह जाती।
अब दूर ही कहाँ हो, सदा मन में बसते, एक बड़े भाग पर कब्जा कर रखा
परंतु कैसे कब उसकी भरपाई हो सकेगी, मैंने बदले में तो कुछ न हैं दिया।
क्या कभी समक्ष बैठकर मीठी गुफ्तगू भी होगी, या दिल तड़पते रहेंगे यूँ ही
तेरा तो बुलावा था पर खुद ही न गया, फिर क्यों शिकायत यूँ सुबकने की।
यह क्या रिश्ता मनों के तार जुड़ने का, बिन कहे ही कितनी हो जाती बात
इतनी बड़ी दुनिया पर मन कुछ जगह ही ठहरता, बना लिया छोटा नीड़।
जीवन लंबा बहुत दिन देखने पड़ते, पर हृदय की क्या कहें, समझता नहीं
रिश्ते पंछियों जैसे होते हैं, जिंदगी भर साथ रहते प्यार से पकड़ने पर ही।
सुनो तेरे होठों से निकले हर उस शब्द को, सुनने के लिए हमेशा तड़पता
जो अंतः गहराई से निकले और मेरी गीत-कविताओं की बन जाऐं आत्मा।
सोचूँ एक दिन खुद को तितर बितर कर दूँ, आओ बीनो व कर लो इकट्ठा
सँवारा जाऊँ तेरे हाथों से, ख़्वाहिश में कभी बिखर जाने को दिल करता।
दर्द तो है पर इतना भी नहीं, कि कलम स्वतः चलकर कह दे हाल दिल का
शायद शब्द न मिल रहें या कहने से डरता, कई पहरें, फर्ज की हैं बेड़ियाँ।
चाहकर भी कुछ नहीं दे सका, किंचित तुम आशा करते रहे बेवफा सा रहा
हाँ कभी कहकर ही सुकून मिलता, पर तेरी आँखें देखने को दिल मचलता।
उम्र बढ़ने से भी दिल कहाँ मानता, सब तरह के परवान इसमें फिर हैं चढ़ते
सामने रूबरू हो तो सिलसिला चल निकले, इनायत से ही कुछ मरहम लगे।
पवन कुमार,
२ जुलाई, २०२४ मंगलवार, समय ११.०४ बजे रात्रि
(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दि० २२ मार्च, २०१८, वीरवार, समय ८:५१ बजे प्रातः से )