Kind Attention:

The postings in this blog are purely my personal views, and have nothing to do any commitment from Government, organization and other persons. The views in general respect all sections of society irrespective of class, race, religion, group, country or region, and are dedicated to pan-humanity. I sincerely apologize if any of my writing has hurt someone's sentiments even in the slightest way. Suggestions and comments are welcome.
Showing posts with label आत्मीय. Show all posts
Showing posts with label आत्मीय. Show all posts

Sunday, 19 January 2025

काव्य और कवि-दृष्टि


काव्य और कवि-दृष्टि


कैसे कवि दर्शित करता, अन्य को पूर्ण भाव से आलोकित,
हम संतुष्ट लघु अनुभव में, वह विशाल उर से अवलोकित।

कैसे रचती जाती कविता, निर्मल, मृदु और मधुरतर भाव,
जहाँ चेष्ठा, विचार व कृति का समन्वय, होता प्रखर प्रभाव।
कैसे सामान्य घटना बनती, अति रोचक और अप्रत्याशित,
एक मधुर सौंदर्य भाव संग अध्येता-श्रोता, हो जाते विस्मृत।

किस सम्मोहनी मूर्च्छा में, कवि करता है शब्द-आच्छादित,
जैसे हो अपरा विद्या का भर्ता, नव निर्माण कर रहा निरंतर।
हर शब्द मणि-सा दमक रहा है, लेखनी की शेफालिका में,
एक दैवी प्रेरणा से ही संभव, वरन सीमाएँ मनुज प्रचंड रचें।

कैसे गुरु-वाक्य कलम से ही निकले, और बन जाते मंत्र सम,
पाठक, श्रोता, प्रजा सभी मान लेते इनको, जीवन के तंत्र सम।
 सब मन-मलिनता धुल जाती, जैसे मंदाकिनी के पवित्र जल में,
कुछ हिचकोले भी यदि लगते, तो सह जाते प्रबल मन-तन में।

कैसे रहस्य प्रस्फुटित हो जाते, जो छिपे थे अज्ञान के पर्दों में,
अब ज्ञान तंत्र सबल होकर ही, अंतर्चक्षु खोल देता है क्षणों में।
जब सामान्य एक विलक्षण हो जाता, सकल दर्शित ही विचित्र,
घटनाएँ यकायक प्रस्तुत होती, व चमत्कार बनते जाते दृश्य।

कैसे खुलती ही दृष्टि मनोरम, प्रकृति के अद्भुत प्रयोगों पर,
आत्म-सत्य और मनोचिंतन से, नवसृजन की जागती है लहर।
विशाल जगत का संजोया सार है, करता अनुभव को सार्थक,
प्रेरणा देती है कृतियाँ रचने को, नवीन ऊर्जा से है प्रचालित।

कैसे अलंकृत हो जाते हैं शब्द, वे मानवेतर गुणों से भरपूर,
शब्द वीर-गाथाओं संग मिलकर, बन जाते हैं प्रेरक एवं पूर्ण।
यहाँ बाणभट्ट सा एक अनुभव, मणियों से चरित्र पिरोते जहाँ,
हम विस्मित खड़े देखते हैं, वहाँ हो जाती कृतियों की रचना। 


पवन कुमार,

ब्रह्मपुर (ओडीशा), 19 जनवरी 2024 रविवार, समय 11:26 प्रातः 

(मेरी उदयपुर (राज०) डायरी, 25 जनवरी 2016, सोमवार, प्रातः 7:45 बजे से)


Friday, 27 December 2024

कामायनी: एक जीवन गाथा

 

कामायनी: एक जीवन गाथा

समर्पण : यह कविता महाकवि जयशंकर प्रसाद और उनकी कालजयी कृति कामायनी को समर्पित है, जो मानवता, विश्वास, और पुरुषार्थ का पथ आलोकित करती है।


महाकाव्य गढ़ा तो कालजयी बने, संकल्प से अमरत्व है पाया,
आरंभ तो अल्प से ही किया है, निरंतरता ने इतिहास रचाया।

जयशंकर प्रसाद की कामायनी, तीन दिन पूर्व पढ़नी शुरू की,
‘चिन्ता’ और ‘आशा’ के खंड पढ़े हैं, और पल्ले पड़ा कुछ ही।
भाषा तो अतिगूढ़, शब्द चयन गंभीर, अर्थ गहराई में है छिपा,
लंबे वाक्य माप-तोल से गढ़े हैं, भावनाओं का अनमोल सिरा।

यह पुस्तक वर्षों से संग रही, यदा-कदा पढ़ा था कुछ अंश,
पर समझना सरल नहीं, प्रकाण्ड हिन्दी-ज्ञान माँगती है यह।
प्रसाद छठी कक्षा तक स्कूल गए, शेष शिक्षा घर पर ही की,
हिंदी, संस्कृत, आंग्ल-भाषा का ज्ञान विद्वानों से ग्रहण किया।

1889 में बनारस में जन्मे, 1937 में उनका देहावसान हुआ,
मात्र 48 वर्षों में, कालजयी कृतियाँ व अमिट नाम कमाया।
श्लाघा यूँ ही न मिलती, इस हेतु करना होता अथक प्रयास,
जगत तो सिर पर बैठा लेता है, यदि कर्मयोग में हो विश्वास।

प्रसाद, साहित्य का सूर्य, जिनने हर विधा की हैं आलोकित,
कविता, नाटक व कथाओं में, मानवीय संवेदनाऐं की पूरित।
उनकी लेखनी शब्दों में जीवन भरे हैं, सृष्टि का मर्म सिखाए,
मनुष्य के भीतर के गुह्य सत्य को, वे एक नवीन दृष्टि दिखाए।

कामायनी, उनकी विश्वप्रसिद्ध कृति, गहरी मानवता-संदेश,
मनु, श्रद्धा, एवं इड़ा की कथा, जीवन का अद्भुत उपदेश।
चिंता पुरुषार्थ का प्रतीक है, श्रद्धा विश्वास और प्रेम सिखाए,
इड़ा तो ज्ञान और संतुलन से, जीवन को नूतन राह दिखाए।

महावृष्टि के गर्जन में, जल-प्लावन का अंधकार गहराया,
शीतल शिला पर बैठे मनु ने जीवन का संगीत दोहराया।
चहुँ ओर जलधारा का शोर ही, न कोई सहारा, न किनारा,
फिर भी मन का दीपक है, हरेक निराशा पर भारी पड़ा।

श्रद्धा और इड़ा हैं मनु के मस्तिष्क और हृदय का संतुलन,
एक नव सृष्टि का आरंभ, जीवन का मधुर नूतन आलंबन।
आख्यान हो ऐतिहासिक या सांकेतिक, किंतु विपुल है अर्थ,
यह सत्य व रूपक का अद्भुत संगम, जो करता अचंभित।

कामायनी का प्रत्येक संदेश, आज भी उतना ही सार्थक है,
धैर्य, विश्वास एवं पुरुषार्थ ही, जीवन को देता गहरा अर्थ है।
आज के नर-संघर्षों में भी, यह राह दिखाने का मर्म रखती,
मानवता के बहु संकटों में, आशा की एक लौ बन जलती।

जलवायु संकट हो या जीवन-संघर्ष, सार जाग्रत है करता,
हर मनुज में साहस भरता है,  श्रद्धा से विश्वास जगा जाता।
इड़ा के ज्ञान का आलोक,  हर अंधकार को दूर है भगाए,
कामायनी का यह प्रकाश, हर युग में नव निर्माण कराए।

कामायनी पढ़ते-पढ़ते अपने भीतर का एक कोना खोजा,
जहाँ भी चिंताएँ शांत हो, आशाओं ने नई राहें सजीव कीं।
मनु की दुविधा है पर श्रद्धा का विश्वास, और इड़ा का ज्ञान,
मेरे जीवन की कई उलझनों में भी दिखता कुछ समाधान।

यह अनुपम काव्य मैंने शुरू किया, और इसे पूर्ण करूँगा,
संभव है कि यह विचार ही बदल दे, एवं नई दिशा दिखाए।
कामायनी पढ़कर अनुभूत होता, जीवन का अद्भुत प्रवाह,
चिन्ता, आशा एवं श्रद्धा से ही है, मानवता का सच्चा निर्वाह।



पवन कुमार, 

26 दिसंबर 2024 वीरवार, समय रात्रि 21:28 बजे 

(मेरी महेंद्रगढ़ (हरि०) डायरी दि० 6 मई 2015, बुधवार, 9:06 बजे प्रातः, से)


Monday, 2 December 2024

चंचल बाल मन-सुलभता

चंचल बाल मन-सुलभता

 


                             मन एक बालक जैसा है, प्रतिदिन चाहिए एक नया खिलौना,

उसे उबासी होती पुराने से, बस सतत प्रयास नव-सम्पर्क का।

 

कभी सोचा था नियमित लिखूँगा, अब अध्याय कहाँ से ढूँढ़ें नव,

किंतु मन भी ढ़र्रे में सोचता, तथापि बहुरंगी माँगता निज वचन।

यह तो एक टीवी मीडिया सा, इसे 24x7 भरण-सामग्री चाहिए,

नित्य ही नवीन-रोचक खबरें हों, कभी अमिताभ बच्चन बोले थे।

 

वहाँ रतों का काम यही, खोज-संकलन, संपादन बाद करें प्रस्तुति,

अंततः दर्शकों को कुछ नवीन मिलेगा, उनकी टीआरपी भी बढ़ेगी।

इसीलिए भिन्न-भिन्न विषय चुनते , और पृथक व्यक्तित्वों से मिलते,

लघु-महद संवाद करते, नमक-मिर्च लगाकर खबर प्रस्तुत करते।

 

सब संग्रहालयों की भी एक प्रक्रिया, अप्रतिमों को करना एकत्रित,

जैसा रोचक-अनुपम, विचित्र-दुर्लभ मिल जाए, यत्न से हैं सज्जित

किंतु ज्ञान एवं शोध इतना सरल भी न, कि सोचा और हुआ संभव,

'गीत गाया पत्थरों ने' जैसे शीर्षक ढूँढ़ते, वाणियों में पिरोते हैं शब्द।

 

संग्रहालय-लक्ष्य तो दर्शकों को विभिन्न ज्ञान एक स्थान पर दिखाना,

दर्शक तभी आनंदित होते, जब बहु नूतन विधाओं से सम्पर्क होता।

ये ग्रंथागार-वाचनालय, कलाकृति प्रदर्शनी, विशेषज्ञ सम रखते पक्ष,

पाठक-दर्शक होते हैं प्रेरित, समय के सदुपयोग से बढ़ता मनोबल।

 

विभिन्न पुस्तकें, अनेक अध्याय, लेखकों के अपने विभिन्न मंतव्य,

सबमें कुछ विशेषता भी, रूचि अनुरूप चाहे तो सकते कुछ गुन।

सब उद्देश्य बहु आयामों से संपर्क कराना, मानव आत्म में अत्यल्प,

इतर-तितर संयोग से विस्तार होता है, किञ्चित और होता बुद्धिमान।

 

मन एक बावला है, स्वयं से नहीं संभव, तथापि ले लेता महद वचन,

इस क्षुद्र मस्तिष्क का कौन संगी है, जिससे नित करा सके निर्मित?

महारथी अर्जुन ने सूर्यास्त तक जयद्रथ के वध का ले लिया प्रण तो,

किंतु कौरवों ने सफल न होने दिया, लाज बचानी पड़ी कृष्ण को।

 

वो चीज कहाँ से लाऊँ, तेरी दुल्हन जिसे बनाऊँ, कोई पसंद न आए छोरी

मन किञ्चित तो अचंभित होता, परंतु नवीन हेतु लगाता छलाँग भी।

इस अल्पता का तो भोगी, फिर परजीवी कुछ न रच सकता निज से

युक्ति करने की भी न अति समझ, अतः यूँ ही इधर-उधर हाथ मारे।

 

नदी में कूदने पर ही तैरना आता, अतः सीख सकते यदि हो प्रयास

अनेक बाहर आते कूप-मंडूकता से, सोच लिया तो दिखेगा भी मार्ग।

बिन कुछ किए तो जगत में, मनुज की नहीं हुआ करती प्रगति बहुत

ध्यान करो, कर्म-इंगित करो, एक साहसी सम बढ़ाओ अग्र कदम।

 

मेरी भी चेष्टा लेखन सार हेतु, कुछ सुस्त हूँ स्वयं से ही बनाता नव

माना बाह्य अध्ययन भी आवश्यक, जो स्वयं को करते देने महत्तर।

जब अभ्यंतर सुघड़-श्रेष्ठ हो जाएगा, तो बाहर भी उत्तम ही आएगा

यही एक आदान-प्रदान का सिलसिला, बिना किए यश न मिलेगा।

 

किञ्चित आत्म-प्रयास ही सराहनीय है, किंतु बहुत  न होता पर्याप्त

मनीषियों ने बहु विषय सामंजस्य-मंथन कर कुछ बनाए हैं सिद्धांत।

वे उत्तम क्योंकि अनेक प्रयोगों बाद ही आऐं, उनसे आगम लो अत:

चिंतन-मनन की वांछित सामग्री देगा, उत्पादकता तो बढ़ेगी कुछ।

 

माना लेखन कर्म तो स्वयं से जूझना ही, पर वहीं से निकलेगा अमृत

किंतु पूर्व कृत-संचित ऊर्जा-ज्ञान बड़ी शक्ति देता, तन-मन को इस।

अतः सीखो जितना भी बन पाए इस जग में, उत्तमता की कुंजी है वह

निर्मल स्वरूप तो शुभ-मिलन से ही बनेगा, सांझी सोच का है महत्त्व।

 

हम नित्य तो उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण होते हैं, प्रश्न मात्र सम्मान का न अत:

यह मात्र एक चेष्टा दक्ष बनने की, आत्म-आदर की यात्रा है निरंतर।

अतः बस सोच लो लिखने को नव अध्याय, नहीं कोई विषय-अल्पता

अनेक प्रयास करते, इसकी साक्षी हैं सकल उपलब्ध रचनात्मकता।

 

खिलौनें तो अनेक पर आनंदित-आविर्भूत होकर जाओ नए पर ही

ग्रंथालय-संग्रहालय सा कुछ सहेजो, गर्व-संतोष की होगी अनुभूति।

 

 

पवन कुमार,

ब्रह्मपुर, 2 दिसंबर 2024, सोमवार, समय 9:19 प्रातः

(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दि० 17 अप्रैल 2015, शुक्रवार, समय 9:17 बजे प्रातः से)

 

Tuesday, 2 July 2024

इनायत

इनायत



उसने
मुस्कराकर एक बार क्या देखा, दिल अंदर से पूर्ण हो उठा झंकृत 

भले ही होंठों पर शब्द न आते, दिल का हाल तो नैन-भाषा से उजागर। 

 

यह क्या अफसाना सामने तो न, बस ख्याल उसका ही कर देता विचलित 

पता नहीं यह हाल एक ही तरफ का, या दूसरा भी उतना ही है विव्हलित।

अब किसको कहूँ इस मन की उत्पलावता, बस रह-रह कर यूँ टीस उठती 

मुख से तो न कह सकता, शब्द लड़खड़ाते, शायद बात मन में रह जाती। 

 

अब दूर ही कहाँ हो, सदा मन में बसते, एक बड़े भाग पर कब्जा कर रखा 

परंतु कैसे कब उसकी भरपाई हो सकेगी, मैंने बदले में तो कुछ न हैं दिया।

क्या कभी समक्ष बैठकर मीठी गुफ्तगू भी होगी, या दिल तड़पते रहेंगे यूँ ही

तेरा तो बुलावा था पर खुद ही न गया, फिर क्यों शिकायत यूँ सुबकने की। 

 

यह क्या रिश्ता मनों के तार जुड़ने का, बिन कहे ही कितनी हो जाती बात 

इतनी बड़ी दुनिया पर मन कुछ जगह ही ठहरता, बना लिया छोटा नीड़। 

जीवन लंबा बहुत दिन देखने पड़ते, पर हृदय की क्या कहें, समझता नहीं 

रिश्ते पंछियों जैसे होते हैं, जिंदगी भर साथ रहते प्यार से पकड़ने पर ही। 

 

सुनो तेरे होठों से निकले हर उस शब्द को, सुनने के लिए हमेशा तड़पता 

जो अंतः गहराई से निकले और मेरी गीत-कविताओं की बन जाऐं आत्मा। 

सोचूँ एक दिन खुद को तितर बितर कर दूँ, आओ बीनो व कर लो इकट्ठा 

सँवारा जाऊँ तेरे हाथों से,  ख़्वाहिश में कभी बिखर जाने को दिल करता।

 

दर्द तो है पर इतना भी नहीं, कि कलम स्वतः चलकर कह दे हाल दिल का 

शायद शब्द न मिल रहें या कहने से डरता, कई पहरें, फर्ज की हैं बेड़ियाँ। 

चाहकर भी कुछ नहीं दे सका, किंचित तुम आशा करते रहे बेवफा सा रहा 

हाँ कभी कहकर ही सुकून मिलता, पर तेरी आँखें देखने को दिल मचलता। 

 

उम्र बढ़ने से भी दिल कहाँ मानता, सब तरह के परवान इसमें फिर हैं चढ़ते 

सामने रूबरू हो तो सिलसिला चल निकले, इनायत से ही कुछ मरहम लगे।

 

पवन कुमार, 

२ जुलाई, २०२४ मंगलवार, समय ११.०४ बजे रात्रि 

(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दि० २२ मार्च, २०१८, वीरवार, समय ८:५१ बजे प्रातः से )