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Friday, 10 January 2025

मरुधरा के अनुभव: जीवन-सौंदर्य

मरुधरा के अनुभव: जीवन-सौंदर्य


उच्च प्रज्ञान से प्रकृति-रमणीयता का बोध, यदि मन करे गहन चिंतन।
कालिदास एवं बाणभट्ट सम निरूपण हेतु, सरस्वती माता को है वंदन।
 
वे तो उच्चतम श्रेणी के कवि थे, पवित्र दृष्टि से निरंतर निहार सके विश्व,
तज कर मन-कलुष, पवित्र भावों से ही भरते हैं हर चरित्र का अंतर्मन।
शारदा मातृ की कृपा से उनका सौंदर्य लेख-वाणी से होता प्रस्फुटित,
आश्चर्य, नर से अत्युत्तम निर्माण संभव जो साधारणतया विलय प्रतीत।
 
प्रकृति-सौंदर्य, सूर्य-चंद्र, व्योम, नदी, मेघ, पृथ्वी-मरुत एवं द्रुम-पादप,
शुक-सारिका, चक्रवाक, सारस, कालहंस, वकुल और क्रोञ्च-कोकिल।
उनके काव्य में बहु वन्य जीवन, अद्भुत पुष्प-वृक्षों का सजीव चित्रण,
प्रत्येक युग्म से जीवन झलकता, पहुँचता सौंदर्य की चरम सीमा तक।
 
गज-सिंह, वराह-गो, मृग-अश्व, वृषभ-कपि, मीन व अनेक जलथल चर,
उनके कर-लेखनी से शोभित होकर, पाठक-गण को कर देते हैं मुग्ध।
मन में पवित्रतम भाव संजोते, उनकी उपमाओं में महेश जाते हैं उतर,
कुमार-संभव में निर्मल उमा-चरित्र का विवरण, परं-भाव से हृदयांगम
उनकी उपमाएँ, मनोभाव व शिल्प, मानवता को देते हैं परम उद्देश्य। 
 
यह दर्शन केवल सृजन नहीं, अपितु जीवन-दर्शन का एक गहन भाव,
जहाँ आत्मा प्रकृति संग एकाकार होती, एवं सृजन का दिखता आधार।
 
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की 'बाणभट्ट की आत्मकथा' का अध्ययन,
अति मृदुल चरित्र-चित्रण, सजीव मानव भावनाओं का उच्चतम प्रयोग।
वर्तमान मनुज तो अल्प-सोच में उलझा, सार्वभौमिक भावों से अनभिज्ञ,
यदि निज दृष्टि को उच्च पटल पर रखे, तो सौम्यता- विस्तार भी संभव।
 
उज्ज्वल चरित्रों का तपस्या करना भी, सामान्य- जन हितार्थ ही आदर्श,
कैसे स्वयं को वे निर्मल रख सकें, ऋषि- सम जीवन से मिलता आनंद।
यदि चरित्रों में कहीं कटुता-कलुषता है, तो भी उद्देश्य तो है ऊर्ध्वगामी,
हर पात्र के मस्तिष्क की उच्च सोच, सौंदर्य-बोध व दिशा है प्रेरणामयी।
 
तुच्छ-बिंदुओं से समय-ऊर्जा रक्षा, अवलोकन बस अन्य का पवित्र मानस,
अमुक का उद्देश्य सुधारवादी हो, विवेचना-समीक्षा का हो वही मूल एक।
मनन नर-दुर्बलताओं में नहीं अटके, प्रयोगे निहित कुंडलिनी शक्ति सुप्त,
उसे विकसित करना वृहद-कल्याणार्थ, अमापनीय है प्रत्येक जीव-मूल्य।
 
मरीचिमाली-रश्मि का पीत सौंदर्य, हरित वृक्ष पर पड़कर अति प्रकाशित,
भिन्न पल्ल्वों पर प्रभावों से अन्यान्य विकिरण, उर हो जाता बहु पुलकित।
नीले गगन में श्वेतिमा-मिलन से उदित व्यापकता, मन-वृद्धि करे अद्भुत,
वे प्रकृति-मातृ के आगोश में, अतः स्वतंत्र होकर ही रच सकते समेकित।
 
जैसलमेर की मरुधरा में मेरा है यह प्रथम आगमन और परिचय समक्ष,
अबतक मात्र दूरदर्शन, इंटरनेट, पुस्तक, समाचारों से ही था ज्ञान अल्प।
दैव कब वास्तविक मिलन ही करेगा, प्रायः तो नहीं होता है यह चिन्हित,
यदि संपर्क तो आदान-प्रदान होता प्रारंभ, अनुभव स्व-भाग में परिणत।
 
कल सायं रेत टिब्बों का दर्शन हुआ, सुवर्ण भास्कर-मरीची से प्रभासित,
वामन कद की ही अल्प-वनस्पति, वर्षाजल का अभाव है मुख्य कारण।
यह मात्र एक भूमि नहीं है, अपितु दर्शित संघर्ष-सुंदरता का प्रकृति-मेल,
यहाँ हर कण में जीवन की सच्चाई है, जो बन जाती है बड़ा प्रतीक एक।
 
ऊँट के कुब्ज-भाग में सवारी-अनुभव, संकोच-भीत त्याग किया स्वीकार,
हिचकोलों में छिपा नया साहसिक अनुभव, अबल-पक्षों को करता प्रबल।
 
जैसलमेर से धनाना तक का सड़क मार्ग, ले जाता पाकिस्तान-सीमा तक,
सीमा तो कुछ 135 कि० मी०, किंतु हम गए लगभग 50 कि०मी० ही तक।
अधीशासी एम.पी. सिंह और सहायक अभियंता बचन व कालूराम थे संग,
एक अन्य सज्जन दीपक राठी थे, सायं का रोचक अनुभव था स्मृतिबद्ध।
 
'डेसर्ट स्प्रिंग'-एक साहसी मरुधरा-योजना, पर्यटन-कैंप व मनोरंजन प्रबंध,
कुछ व्यय कर लोग सुविधाओं का लुत्फ उठाते, यहाँ सुख है महत्त्वपूर्ण।
मन तो सदैव चरम नव अनुभव का चाही है, उसी हेतु करता सतत प्रयत्न,
एक स्थिति में तो असहज हो जाता, सर्व भ्रमण-प्रयास अनुपम हेतु ही कृत।
 
एक नारी-रूप में पुरुष नृत्यांगना, परिचय क्वीन हरीश की नृत्य-अदाओं से,
सहज चरित्रों को निपुणता में ढाल, कला समाज को नया दृष्टिकोण देती है।
अपने नृत्यों में सबको सम्मिलित करना, एक शिक्षक सी लगती है भूमिका,
केरल के मोहिनीयट्टम चरित्र सा मनोहारी रूप, सबके मन में स्मित भरता।
 
कलाकारों की नृत्य-गायन प्रस्तुति संग था, रात्रिभोज का एक रोचक अनुभव,
पर सकल लक्ष्य तो एक लयबद्ध हो, निकले कुछ कालि-बाण सा अद्भुत।
प्रकृति और संस्कृति का यह मधुर मिलन, मात्र नहीं है एक बाहरी अनुभव,
मन को पूरा झकझोर देता है यह, पर जीवन को नई दिशा देने का अवसर।
 
यह मरुधरा, जो बाहर से मात्र स्थिर प्रतीत होती, समय-प्रवाह है दिखाती,
प्रकृति, कला और आत्मचिंतन का संगम है, जो प्रेरणा का स्रोत बन जाती।
यह राजस्थानी-मरुधरा, मात्र रेत-भूमि नहीं, बल्कि है शुभ जीवन-प्रतीक,
हर मन में एक नई उमंग और ऊर्जा का जगेगा इससे अति मधुर संदेश।
 
 
पवन कुमार, 
ब्रह्मपुर (ओडिशा), 10 जनवरी 2025, शुक्रवार, समय 11:40 बजे रात्रि 
(लेखन, केलोनिवि अथिति गृह, जैसलमेर (राज.), दि० 22 जनवरी 2016, शुक्रवार, 7:20 बजे प्रातः से)
 

Wednesday, 1 May 2024

विचरण - दिशाहीन

विचरण - दिशाहीन



क्या लिखना ही शुरू करूँ, कुछ भी सूझे ना, मस्तिष्क बोझिल है तो कलम चले ना।

अपनी दुनिया ढूँढ़ा करता, जैसे कस्तूरी-मालिक होकर भी हरिण दर-बदर भटकता। 
मेरी दुनिया कैसी, कोई पता नहीं, बस साँसें आने-जाने से ही क्या सब बात बन जाती?

बहुत मन-गहराई, पर छलाँग लगाए कौन, डरते जब खुद से, कष्टों को अपनाए कौन। 
सारा ढोंग किया करते कि हूँ ढूँढ़नवारा, खुद में शांति तो निज से कुछ जुड़ेगा रिश्ता।।

बड़ी मन-उद्विग्नता पर न बाहर आती, भयभीत सा हो जाता खुद से बात कहने में भी। 
कोशिश की तो कोशिश की थी पर कोशिश बेकार गई, विश्वास-संबल जोड़ा था नहीं।।

अनेक विद्वान हुऐ व कलम बन जाती सरस्वती, किंतु आत्म-विश्वास करने में डरता ही।
कब होगा रुग्ण-उन्मादों का परिष्कार कुछ, क्योंकि जीने की भी थोड़ी इच्छा है तब।। 

अपने में विचरना चाहूँ तब मार्ग दिखेगा, कृपा करो मन के नाविक, कुछ पथ दो सुझा। 
दुनियादारी-चक्कर में अधिक लिखा-पढ़ा ना, निज संग बैठकर भी तो गुनगुनाया ना।। 

कीमत तो बहुतेरी होगी पर आँका ना, कोई किस भाव मोल करे तुमको पता ही ना। 
सवाल करोगे तो उत्तर जाऐंगे मिल ही, किंतु प्रश्न करने की कला भी तो आती नहीं।। 

कब तक व्यर्थ-शब्दों से कागज काला करोगे, कुछ ठोस कर्म-प्रेरणा से निज न भरते। 
दुनिया की अदना सा नर, न जानूँ वजूद, तो भी जीतूँगा अंतः-कोने में कहीं है विश्वास।।

दृष्टि को देखने के अनुरूप कर्म करना ही, पर उस हेतु आवश्यक है उसे खुला रखना 
अपनी ज्ञानेन्द्रियाँ तो चाहूँ उपयोग करना, लेकिन कुछ ऐसा जो स्पंदन नहीं होने देता।। 

पर यूँ न अपने को विनिष्ट होने दूँगा, वजूद की बेहतरी हेतु और अधिक चमकाऊँगा।
जब कोशिशों के जरिए ही दमकूँगा, तो खुद पर मान करने के काबिल बन जाऊँगा।।

अहसान तो खुद पर करना होगा ही, वरना तो जिन्दगी यूँ ही निरर्थक निकल जाएगी। 
यह वर्तमान, वो भूत-भविष्य, सब अपना, जब भी जीवन-क्षण प्राप्त हो वरदान वहाँ।।

वह क्या चीज है जो एक समाधि-स्थिति से मिला दे, अपने को निज अहसास करा दे।
अपनी सरलता पर हँसना सिखा दे, कभी मौका मिले तो खुद पर रोना भी सिखा दे।।

मैं और मेरा आत्म दोनों अकेले हैं, देखने में लगते पास, लेकिन कोसों ही दूर शायद।
किञ्चित परस्पर का तो ज्ञान न कोई, मैं झुँझलाता सा गुनगुनाता रहता अपने में ही।। 

कब वो क्षण ही आएगा, जब मित्र बन जाऐंगे, परस्पर के अंतरंग बन एक हो जाऐंगे।
तब दूरी न होगी, कुछ चैन की साँस ले सकूँगा, मेरा भी कुछ वजूद है कह पाऊँगा।। 

सोचना तो और चाहता पर जुकाम है हुआ, मस्तिष्क भारी, ज्यादा जोर न दे पा रहा।
प्रभु तू अपना करुणा-आशीर्वाद रखना, सुलेखन-रुचि हो ऐसा पथ-प्रसस्त करना।। 

धन्यवाद। शुभ रात्रि।  


पवन कुमार,
०१ मई, २०२४ बुधवार, समय ८:५५ बजे सायं 
(मेरी डायरी २७ अक्टूबर, २००५, वीरवार, समय ११:३० बजे मध्य रात्रि से)  

Sunday, 3 July 2022

मानव इतिहास

मानव इतिहास  

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                       कटुता भुलाओ, कब तक सदियों के उत्पीड़न का हिसाब रखोगे, उभरो संकुचन से   

जग में सब तरह की धाराऐं हर काल में रहती, दुश्मनी बदलती रहती दोस्ती में। 

 

शुक्रिया कि संघर्ष-ताप सहते हुए यहाँ तक आ गए, उज्ज्वल भविष्य प्रतीक्षा कर रहा  

गरीबी-अमीरी में एक सतत युद्ध चलता रहता, चोट कमजोर को ही पड़ती ज्यादा। 

सत्ता हेतु अनेक युद्ध हुए, लोगों की जमीनें, घर-बार, कुटुंब-प्रजा, राजपाट लुट गए सब 

अनेक नृशंष हत्याऐं हुई, बच्चों तक को मार डाला गया, औरतों को बना लिया बंधक। 

 

कुछ सहस्र वर्षों का मानव-इतिहास देखें, अनेक जुल्म धर्म-देश-जाति-नस्ल विभेद नाम पर 

कहीं पर शासक-लोभ, दूर-देशों के लुटेरों ने आ तबाही की, कत्ले-आम किया, की लूटपाट। 

 अपने विरोधियों को मार-काट गिराया, इतना जुल्म कि कई पीढ़ियाँ तक कर दी गई समाप्त 

कभी के राजा अब भीख माँगने को मजबूर, औरत-बच्चों से मजदूरों की तरह लिया काम।  

 

कुछ शख्सों को बाजू-ताकत पर विश्वास था, तलवार लेकर जो भी समक्ष आया दिया काट 

एक-२ ज़ालिम इस धरा पर हुए, जिंदगी की न कतई भी इज्जत, बस ताकत पर अभिमान। 

एक अति-क्रूर मानस सा बना लिया, सारी दुनिया से घृणा, उसने सबक़ सिखाया है  इसको

दुनिया के चप्पे-२ पर निज कब्ज़ा हो यही पक्का मंसूबा, चाहे जो भी तरीका हो, अपना लो। 

 

दुनिया में निस्संदेह मारकाट का इतिहास रहा, दबंगों ने पूरी आबादी ही कर दी ख़त्म 

अपने जैसे वहाँ बैठा दिए, मूल-निवासी खेदड़ या मार दिए, या में लगा दिए सेवक-कर्म। 

दूर-प्रदेश के लोगों को ज़बरन पकड़ खेतों में बेगारी करवाते, जानवरों सा करते व्यवहार 

कोड़े मार अधिकतम काम लो, जंगल साफ़ करा, पत्थर ढुलवा, सड़कें बनवा, खेती करवाओ। 

 

कुछ लोगों के दिमाग़ में अवश्य ही शैतान का कीड़ा रहता, सदा दुनिया से शिकायत रहती 

अपने साथ चाहे बड़ी ज़बरदस्ती न हो, लेकिन प्रतिशोध की प्रबल अग्नि रग-२ में खोलती। 

बस मार डालो, मिटा दो, कल सब हमारा होगा, लोगों को तुम मौका ही न दो उबरने का 

कहते हैं कोल्हू के चक्के में बस घुसना चाहिए, मोटा-पतला पिल सब एक जैसा हो जाएगा। 

 

जो कल बादशाह थे उनके वंशज आज कहाँ, पता भी न कहीं चाय की दुकान लगाए हों 

थोड़े दिनों में तो निज पहचान भूल जाते, मर्द मार दिया जाते, बच्चों को नौकर बना दो। 

जब अपने इतिहास का परिचय ही न, तो कैसे ज्ञात किस राजा या धनी की हो संतान 

नर-निर्मूल कर दिए जाते, कोई शिक्षा-ज्ञान परंपरा न, या कुछ दस्तावेज़ ही उपलब्ध। 

 

विभिन्न दृष्टांत आततायियों के, चंगेज़ खां ने कुछ २० वर्ष में ३० लाख लोग संहार किए  

ईरान के नादिरशाह ने २२ मार्च, २२ मार्च, १७३९ को हजारों दिल्ली नागरिक क़त्ल किए। 

तख़्ते-ताऊस यानि मयूर-सिंहासन, मशहूर कोहिनूर हीरा व दरया-ई-नूर को वह ले गया 

दिल्ली की लूट इतनी बड़ी थी कि नादिर में ईरान में तीन वर्षों तक कर ही हटा दिया। 

 

दिल्ली से २ करोड़ रूपए वसूले, निर्बल मुग़ल शासक मोहम्मद शाह ने खज़ाने की चाबी दी 

लंबे समय तक गलियाँ मुर्दों से पटी थी, बागान-पथ गिरे पत्तों से ढ़के, शहर राख़ में गया बदल। 

चांदनी-चौक, दरीबाँ कला, फ़तेहपुरी, फैज़ बाज़ार, हौज़-काज़ी, जौहरी बाज़ार, लाहौरी-अजमेरी 

व काबूली दरवाजे जो हिंदु-मुस्लिम आबादियों से महफूज़ थे, लाशों में परिवर्तित  

मुस्लिम-हिंदुओं ने समर्पण के बजाय औरत-बच्चों व खुद को मारना शुरू दिया कर।  

 

अगस्त १३९८ में तैमूर-लंग ने काबुल से अपना अभियान चालू किय, दिसंबर में दिल्ली पहुँचा 

दिल्ली-मार्ग में कस्बें घेरे व लूटे, अंतिम तुग़लक़ सुल्तान महमूद शाह दिल्ली छोड़ भाग गया। 

तैमूर ने लोगों को मारने-काटने व लूटने का आदेश दिया, जो पंद्रह दिन तक लगातार चला 

लगभग एक लाख आदमी मारे गए, सीरी, पुरानी दिल्ली व जहाँपनाह को तबाह कर दिया। 

 

उसने जनवरी १३९९ में जाते हुए पथ में मेरठ, हरिद्वार, कांगड़ा व जम्मू को बुरी तरह से लूटा 

कई सुंदर भवन-मंदिर नष्ट, हिंदुस्तान के अच्छे कारीगर समरकंद में निज भवन निर्माणार्थ ले गया।

बहुत सी दौलत ली, फसलें नष्ट कर दी, बीमारी फ़ैल गई, हिंदु-मुसलमानों में शत्रुता वर्धित  

उसका इतना डर कि औरतें तैमूर नाम से बच्चों को डराने लगीं, बाल-विवाह गया बढ़। 

 

१७४१-५१ में मराठाओं की बंगाल-फ़तेह मध्य, बिहार-बंगाल के लाखों लोग मारे गए 

१७५७-५८ में मराठाओं द्वारा अफ़गान-फतेह में, हज़ारों अफ़गान-सिपाही मार दिए गए। 

१७६१ के पानीपत-युद्ध में अफ़गानों ने हजारों मराठा मरे, अनेक औरत-बच्चे दास बनाए 

१७६१ में वड्डा घल्लूघारा पंजाब में अहमदशाह दुर्रानी द्वारा अनेक सिख क़त्ले-आम कर दिए। 

 

१९२१ में मालाबार केरल में खिलाफ़त-आंदोलन में हजारों लोग मरे, १ लाख स्थायी भगा दिए  

आज़ादी बाद १९४८ के हैदराबाद-विलय दौरान नरसंहार हुआ, हजारों की संख्या में लोग मरे। 

 

२६१ ईसा पूर्व युद्ध में सम्राट अशोक के समय, १ लाख कलिंग के व उतने ही मौर्य सैनिक मारे गए 

कलिंग वीरता से लड़े पर हार गए, हज़ारों नर-नारी उड़ीसा से बाहर ले जा वन-सफाई में लगाए। 

युद्ध-हिंसा से अशोक अति-मामहर्त हुआ, हिंसा छोड़ अहिंसा अपनाई, बुद्ध-शरण में आ गया 

उपरांत उनका ४० वर्ष काल बड़ी शांति व् प्रजाहित में बीता, और समृद्धि व भाईचारा बढ़ा। 

 

कहते हैं महाभारत के कौरव-पांडव युद्ध में कुरुक्षेत्र-भूमि रक्त से शोणित-वर्णी गई हो 

अनेकानेक सैनिक व राजा खत्म हो गए, जो बाहर से भी लड़ने आए थे, ख़ाक गए हो। 

कौरव तो खैर सारे मारे ही गए, पांडवों का भी बड़ा नुकसान, द्रौपदी के मरे पाँचों पुत्र 

महावंश ज्ञानी-विद्वान सब हिंसा-उद्वेग-रोष की चपेट में , हानि का कोई हिसाब न। 

 

प्राचीन राम-रावण युद्ध दौरान अनेक लोग दोनों तरफ से मारे गए, गाथा - कथन   

कितने परिवार स्थायी रूप  से उजड़ जाते हैं, कोई सहारा देने वाला भी बचता न। 

अनेकानेक युद्ध भारत-भूमि पर ही हुए हैं, असुर-देव संग्रामों के अनेक बखान हैं 

कालिदास का कुमार-संभव असुर-नृप तारक की मृत्यु हेतु शिव-उमा के यहाँ 

कार्त्तिकेय के जन्म-पूर्व की कथा है। 

 

वर्तमान पूज्या दुर्गा चरित्र ने महिषासुर-वध किया, नरसिंह ने किया हिरण्यक्षिपु-वध 

जिन्हें आज नायक-देव या भगवान मानते, इन्होने किन्हीं बड़े युद्धों में पाई विजय। 

पर युद्ध तो अति-विनाशकारी हैं अनेक दुष्परिणाम, प्रजा पर बड़ा बुरा पड़ता असर  

अनेको मरे सैनिकों की संतानें-औरतें अनाथ हो जाते, दर-२ ठोकरें खाने को मजबूर। 

 

इसका मतलब यह भी कि युद्धों ने देशों-लोगों का सदा हेतु इतिहास ही बदल दिया 

अनेकानेक-भाग्य स्थायी परिवर्तित, अमीर गरीब में, पता न कौन किस समूह में गया। 

जो जितना बड़ा लड़ाका उतनी ही बड़ी सज़ा मिली, दास बनाकर रखो, उभरने न पाए 

अनेक कारक मनुज के सिर पर बलात बैठ जाते, कई स्थितियों में आगे बढ़ने से रोकते। 

 

आरंभ में लेखन-उद्देश्य था समझने का, कहाँ तक व्यक्तिगत इतिहास समझना संभव   

कभी विजेता, कभी धरापात, फिर उठने का साहस, कई बार आजतक रहें ही दमित।

अनेक समयों से गुज़र सब अत्याचार सहे, माँ-बहनों पर होते भी देखे कई अत्याचार 

अज्ञात किसने आ अस्मिता ललकारी, सदा विजयी तो न अतः विनयी होना आवश्यक। 

 

जग-इतिहास हमें अच्छे-बुरे समयों का स्मरण कराता, दुश्मन न ढूँढ़ पाओगे अब 

कल के शत्रु आज मित्र हो सकते या विपरीत भी, अपना स्थायी-निवास पता ही न। 

वंश-शुक्राणुओं के दौर से गुजरे, कोई न ठौर एक उत्तम मनोयोग रखना आवश्यक 

धैर्य रखो समय-चक्र के भिन्न पड़ाव, स्वयं को स्थायी अबल न समझो, सबसे रखो प्रेम। 


पवन कुमार,

३ जुलाई, २०२२ रविवार, समय २२:०२ रात्रि 

(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी १ सितंबर २०२० मंगलवार समय ६:३९ प्रातः से)