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Sunday, 26 January 2025

जीवन की राहें

जीवन की राहें


 कैसे करें ये बात सभी, शब्द कहीं रुक ही जाते हैं।

खुद को पूरा खोल न पाए, मन के द्वार बंध जाते हैं।

 

आशा की डोर कहाँ छुपी, इसका भेद न कोई समझा।

भीतर हर्षाया हर कोई, पर सत्य कब किसने है छुआ।

क्या सार्थकता आने की ही यहाँ, ये प्रश्न सदा अधूरा है।

जीवन तो नाव-सा डोल रहा, किनारा अब तक दूर है।

 

बहुतेरे आए, बहुतेरे गए, कुछ ने अमर कहानी लिखी।

बाकी तो मात्र समय गँवा, कोई राह नहीं सुलझा पाई।

मन-गंगा का छोर अनजाना है, गहराई से सब दूर रहे।

परिभाषा तक जो पहुँचे न, वे अर्थ की बात भी न कहें।

 

भोले मन और सादे जीवन हैं, कई रंग आए और गए।

सब छूट गए पर रंग जो गहराया नहीं, उसी से बंधे रहे।

जीवन-उपयोग हुआ अधूरा, संभावनाएँ अब भी छुपी।

भीतर झाँकें, सच को समझें, और हर राह यहाँ खुली।

 

दुनिया बदलेगी, राहें भी, जब खुद को हम पहचानेंगे।

अपनी संगत में संवाद करें, व खालीपन को भर देंगे।

जो काल बीता वह न लौटेगा, पर सपने नए बुनने होंगे।

किस्मत-द्वार खुलेंगे तभी, जब सत्य का दीप जलाएँगे।


 पवन कुमार, 

ब्रह्मपुर (ओडिशा), 26 जनवरी 2025, रविवार, समय 12:32 म० रात्रि 

 (मेरी नई दिल्ली डायरी, 2 नवंबर 2012 से)

 

Friday, 10 January 2025

मरुधरा के अनुभव: जीवन-सौंदर्य

मरुधरा के अनुभव: जीवन-सौंदर्य


उच्च प्रज्ञान से प्रकृति-रमणीयता का बोध, यदि मन करे गहन चिंतन।
कालिदास एवं बाणभट्ट सम निरूपण हेतु, सरस्वती माता को है वंदन।
 
वे तो उच्चतम श्रेणी के कवि थे, पवित्र दृष्टि से निरंतर निहार सके विश्व,
तज कर मन-कलुष, पवित्र भावों से ही भरते हैं हर चरित्र का अंतर्मन।
शारदा मातृ की कृपा से उनका सौंदर्य लेख-वाणी से होता प्रस्फुटित,
आश्चर्य, नर से अत्युत्तम निर्माण संभव जो साधारणतया विलय प्रतीत।
 
प्रकृति-सौंदर्य, सूर्य-चंद्र, व्योम, नदी, मेघ, पृथ्वी-मरुत एवं द्रुम-पादप,
शुक-सारिका, चक्रवाक, सारस, कालहंस, वकुल और क्रोञ्च-कोकिल।
उनके काव्य में बहु वन्य जीवन, अद्भुत पुष्प-वृक्षों का सजीव चित्रण,
प्रत्येक युग्म से जीवन झलकता, पहुँचता सौंदर्य की चरम सीमा तक।
 
गज-सिंह, वराह-गो, मृग-अश्व, वृषभ-कपि, मीन व अनेक जलथल चर,
उनके कर-लेखनी से शोभित होकर, पाठक-गण को कर देते हैं मुग्ध।
मन में पवित्रतम भाव संजोते, उनकी उपमाओं में महेश जाते हैं उतर,
कुमार-संभव में निर्मल उमा-चरित्र का विवरण, परं-भाव से हृदयांगम
उनकी उपमाएँ, मनोभाव व शिल्प, मानवता को देते हैं परम उद्देश्य। 
 
यह दर्शन केवल सृजन नहीं, अपितु जीवन-दर्शन का एक गहन भाव,
जहाँ आत्मा प्रकृति संग एकाकार होती, एवं सृजन का दिखता आधार।
 
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की 'बाणभट्ट की आत्मकथा' का अध्ययन,
अति मृदुल चरित्र-चित्रण, सजीव मानव भावनाओं का उच्चतम प्रयोग।
वर्तमान मनुज तो अल्प-सोच में उलझा, सार्वभौमिक भावों से अनभिज्ञ,
यदि निज दृष्टि को उच्च पटल पर रखे, तो सौम्यता- विस्तार भी संभव।
 
उज्ज्वल चरित्रों का तपस्या करना भी, सामान्य- जन हितार्थ ही आदर्श,
कैसे स्वयं को वे निर्मल रख सकें, ऋषि- सम जीवन से मिलता आनंद।
यदि चरित्रों में कहीं कटुता-कलुषता है, तो भी उद्देश्य तो है ऊर्ध्वगामी,
हर पात्र के मस्तिष्क की उच्च सोच, सौंदर्य-बोध व दिशा है प्रेरणामयी।
 
तुच्छ-बिंदुओं से समय-ऊर्जा रक्षा, अवलोकन बस अन्य का पवित्र मानस,
अमुक का उद्देश्य सुधारवादी हो, विवेचना-समीक्षा का हो वही मूल एक।
मनन नर-दुर्बलताओं में नहीं अटके, प्रयोगे निहित कुंडलिनी शक्ति सुप्त,
उसे विकसित करना वृहद-कल्याणार्थ, अमापनीय है प्रत्येक जीव-मूल्य।
 
मरीचिमाली-रश्मि का पीत सौंदर्य, हरित वृक्ष पर पड़कर अति प्रकाशित,
भिन्न पल्ल्वों पर प्रभावों से अन्यान्य विकिरण, उर हो जाता बहु पुलकित।
नीले गगन में श्वेतिमा-मिलन से उदित व्यापकता, मन-वृद्धि करे अद्भुत,
वे प्रकृति-मातृ के आगोश में, अतः स्वतंत्र होकर ही रच सकते समेकित।
 
जैसलमेर की मरुधरा में मेरा है यह प्रथम आगमन और परिचय समक्ष,
अबतक मात्र दूरदर्शन, इंटरनेट, पुस्तक, समाचारों से ही था ज्ञान अल्प।
दैव कब वास्तविक मिलन ही करेगा, प्रायः तो नहीं होता है यह चिन्हित,
यदि संपर्क तो आदान-प्रदान होता प्रारंभ, अनुभव स्व-भाग में परिणत।
 
कल सायं रेत टिब्बों का दर्शन हुआ, सुवर्ण भास्कर-मरीची से प्रभासित,
वामन कद की ही अल्प-वनस्पति, वर्षाजल का अभाव है मुख्य कारण।
यह मात्र एक भूमि नहीं है, अपितु दर्शित संघर्ष-सुंदरता का प्रकृति-मेल,
यहाँ हर कण में जीवन की सच्चाई है, जो बन जाती है बड़ा प्रतीक एक।
 
ऊँट के कुब्ज-भाग में सवारी-अनुभव, संकोच-भीत त्याग किया स्वीकार,
हिचकोलों में छिपा नया साहसिक अनुभव, अबल-पक्षों को करता प्रबल।
 
जैसलमेर से धनाना तक का सड़क मार्ग, ले जाता पाकिस्तान-सीमा तक,
सीमा तो कुछ 135 कि० मी०, किंतु हम गए लगभग 50 कि०मी० ही तक।
अधीशासी एम.पी. सिंह और सहायक अभियंता बचन व कालूराम थे संग,
एक अन्य सज्जन दीपक राठी थे, सायं का रोचक अनुभव था स्मृतिबद्ध।
 
'डेसर्ट स्प्रिंग'-एक साहसी मरुधरा-योजना, पर्यटन-कैंप व मनोरंजन प्रबंध,
कुछ व्यय कर लोग सुविधाओं का लुत्फ उठाते, यहाँ सुख है महत्त्वपूर्ण।
मन तो सदैव चरम नव अनुभव का चाही है, उसी हेतु करता सतत प्रयत्न,
एक स्थिति में तो असहज हो जाता, सर्व भ्रमण-प्रयास अनुपम हेतु ही कृत।
 
एक नारी-रूप में पुरुष नृत्यांगना, परिचय क्वीन हरीश की नृत्य-अदाओं से,
सहज चरित्रों को निपुणता में ढाल, कला समाज को नया दृष्टिकोण देती है।
अपने नृत्यों में सबको सम्मिलित करना, एक शिक्षक सी लगती है भूमिका,
केरल के मोहिनीयट्टम चरित्र सा मनोहारी रूप, सबके मन में स्मित भरता।
 
कलाकारों की नृत्य-गायन प्रस्तुति संग था, रात्रिभोज का एक रोचक अनुभव,
पर सकल लक्ष्य तो एक लयबद्ध हो, निकले कुछ कालि-बाण सा अद्भुत।
प्रकृति और संस्कृति का यह मधुर मिलन, मात्र नहीं है एक बाहरी अनुभव,
मन को पूरा झकझोर देता है यह, पर जीवन को नई दिशा देने का अवसर।
 
यह मरुधरा, जो बाहर से मात्र स्थिर प्रतीत होती, समय-प्रवाह है दिखाती,
प्रकृति, कला और आत्मचिंतन का संगम है, जो प्रेरणा का स्रोत बन जाती।
यह राजस्थानी-मरुधरा, मात्र रेत-भूमि नहीं, बल्कि है शुभ जीवन-प्रतीक,
हर मन में एक नई उमंग और ऊर्जा का जगेगा इससे अति मधुर संदेश।
 
 
पवन कुमार, 
ब्रह्मपुर (ओडिशा), 10 जनवरी 2025, शुक्रवार, समय 11:40 बजे रात्रि 
(लेखन, केलोनिवि अथिति गृह, जैसलमेर (राज.), दि० 22 जनवरी 2016, शुक्रवार, 7:20 बजे प्रातः से)
 

Saturday, 4 January 2025

तमसो मा ज्योतिर्गमय

तमसो मा ज्योतिर्गमय

प्रभु से प्रार्थना है कि सबको सद्बुद्धि दें और हृदय में एकता व विशालता का भाव जगाएं। माना कि इस लघु जीवन में हम साधारण प्राणियों के लिए इसे पूरी तरह समझ पाना असंभव है। बहुआयामी जीवन-रूपों को उनकी संपूर्णता में देख पाने में भी हम अक्सर असफल रहते हैं। जीवन की अनेक परतें इतनी गहरी हैं कि उनका आभास तक नहीं हो पाता। फिर भी, समय की धारा यह सतत प्रवाहमान जीवन हमें हर पल, हर क्षण अपने साथ बहाए लिए जा रही है। माना कि हम तट-दृश्यों को देखने में भी असमर्थ रहते हैं। यह विचार आता है कि जीवन से हमारी अपेक्षाएँ क्या हैं और क्या यह हमारे लिए सार्थक हो सका है? क्या हम अपनी प्राथमिकताओं को समझ सके हैं या मात्र एक स्वप्निल अवस्था में जी रहे हैं?

पुस्तकें तो ज्ञान से भरी हैं, लेकिन क्या वह हमारा जीवन-अंश बन पाई हैं? जब हम लिखने बैठते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे शून्य-अवस्था में प्रवेश कर रहे हों। लेखनी अपने आप रास्ता बना लेती है और ऐसा प्रतीत होता है कि हम महज एक माध्यम हैं। यह तभी चलती है जब स्वयं चलना चाहती है। हमारे हाथ और कागज दोनों उसकी प्रतीक्षा करते रहते हैं। जैसे कोई सागर के किनारे बैठकर उसके प्रवाह में अनंतता का अनुभव करना चाहता है, वैसे ही यह कागज भी संभावना-अन्वेषण के लिए व्याकुल रहता है।

हम सभी जीवन को विस्तृत करना चाहते हैं—चाहे वह ज्ञान, सामर्थ्य, या रूप में हो। हर कोई सर्वशक्तिमान बनने की आकांक्षा रखता है। जीवन-तत्व बहुत सूक्ष्म है। जितना इसे समझने का प्रयास किया जाए, यह उतना ही गहन और रहस्यमय हो जाता है। सर्वत्र समानता-भाव दिखाई देता है। सजीव और निर्जीव का भेद भी तुच्छ लगने लगता है। यही समानता-भाव हमें सिखाता है कि हर जीव-तत्व अपने भीतर एक ही ऊर्जा संजोए हुए है।

हमारी साधना प्रायः सतही होती है, क्योंकि गहराई तक जाने के लिए साहस और शक्ति की आवश्यकता होती है। जैसे गहरे समुद्र में छिपे मोती तक पहुँचने के लिए लहरों से संघर्ष करना पड़ता है, अंधेरे का सामना करना होता है और सटीक दिशा का पता लगाना पड़ता है, वैसे ही जीवन की गहराई में उतरने के लिए हमें अपनी ऊर्जा और इच्छाशक्ति को संगठित करना होता है। यह विचार उपनिषद की पंक्ति 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' की याद दिलाता है। अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रयास ही तो जीवन का सार है। यह सभी के लिए प्रासंगिक है, क्योंकि प्रकाश की ओर बढ़ना आत्मा की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। दिशाहीन और बिखरी जीवन-ऊर्जा को संगठित करना 'समाधि' का सार है। यह विकिरित किरणों को एक लेंस के माध्यम से अग्निपुंज में बदलने जैसा है। इस संगठित ऊर्जा से जीवन में नए आयाम प्राप्त हो सकते हैं।

प्रत्येक जीवन-पहलू में सुधार की संभावना है। यह हम पर निर्भर करता है कि अपने प्रयासों को कितना सार्थक बना पाते हैं। भले ही हमारे प्रयास टकराएँ या विरोधाभासी लगें, 'पूर्णता' की ओर बढ़ने का प्रयास हर किसी के भीतर होता है। हर दिन एक नई संभावना लेकर आता है—जैसे सूरज का उगना, जो हर अंधकार को मिटाने का वादा करता है। जब हम इस वादे को अपने जीवन में अपनाते हैं, तो हर दिन नए अवसरों से भर जाता है।

इसके लिए हमें कुछ प्रयास करने होंगे। एक सरल उपाय है—हर दिन थोड़ी देर ध्यान करें, अपनी प्राथमिकताओं को लिखें और उन पर विचार करें। एक अन्य प्रभावी उपाय है—प्रातः अपने प्रति आभार व्यक्त करें और उन छोटी-छोटी सफलताओं को याद करें जो हमें प्रेरित करती हैं। यह छोटा-सा अभ्यास हमें अपनी ऊर्जा को सही दिशा में केंद्रित करने में सहायक बन सकता है। जब मानव अपनी अज्ञानताओं को स्वीकार करता है और सुधार के प्रयास करता है, तो वह सामर्थ्य-वर्धन में सक्षम होता है। जब ऊर्जा सही दिशा में लगती है, तो यह न केवल हमें बल्कि हमारे आसपास के लोगों को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।

यह सत्य है कि मानव-जीवन में अपार संभावनाएँ छिपी हैं। यदि सुप्त शक्तियाँ जागृत हों और उचित दिशा में केंद्रित हों, तो जीवन न केवल सार्थक बल्कि सुंदर और प्रेरणादायक हो सकता है। हर दिन अपनी ऊर्जा को जागृत कर, उद्देश्य की ओर बढ़ने का प्रयास ही जीवन का सर्वोत्तम अर्थ हो सकता है। जीवन की सबसे बड़ी सौगात उसकी अनंत संभावनाएँ हैं। जब हम इन्हें पहचानते हैं और उनका उपयोग करते हैं, तो न केवल हमारा जीवन बल्कि पूरा समाज भी उज्ज्वल बनता है। जब हर व्यक्ति अपनी ऊर्जा सकारात्मक दिशा में लगाएगा, तभी समाज और संसार में वास्तविक परिवर्तन संभव होगा। यह प्रयास ही हमारे संसार को और बेहतर बनाएगा।

इन्हीं शुभकामनाओं के साथ। 


पवन कुमार, 

ब्रह्मपुर (ओडिशा), 4 जनवरी 2025, शनिवार, समय 9:08 बजे सायं  

(मेरी नई दिल्ली डायरी दि० 21 जनवरी 2007, रविवार, समय: 7:10 सायं से)


Monday, 2 December 2024

चंचल बाल मन-सुलभता

चंचल बाल मन-सुलभता

 


                             मन एक बालक जैसा है, प्रतिदिन चाहिए एक नया खिलौना,

उसे उबासी होती पुराने से, बस सतत प्रयास नव-सम्पर्क का।

 

कभी सोचा था नियमित लिखूँगा, अब अध्याय कहाँ से ढूँढ़ें नव,

किंतु मन भी ढ़र्रे में सोचता, तथापि बहुरंगी माँगता निज वचन।

यह तो एक टीवी मीडिया सा, इसे 24x7 भरण-सामग्री चाहिए,

नित्य ही नवीन-रोचक खबरें हों, कभी अमिताभ बच्चन बोले थे।

 

वहाँ रतों का काम यही, खोज-संकलन, संपादन बाद करें प्रस्तुति,

अंततः दर्शकों को कुछ नवीन मिलेगा, उनकी टीआरपी भी बढ़ेगी।

इसीलिए भिन्न-भिन्न विषय चुनते , और पृथक व्यक्तित्वों से मिलते,

लघु-महद संवाद करते, नमक-मिर्च लगाकर खबर प्रस्तुत करते।

 

सब संग्रहालयों की भी एक प्रक्रिया, अप्रतिमों को करना एकत्रित,

जैसा रोचक-अनुपम, विचित्र-दुर्लभ मिल जाए, यत्न से हैं सज्जित

किंतु ज्ञान एवं शोध इतना सरल भी न, कि सोचा और हुआ संभव,

'गीत गाया पत्थरों ने' जैसे शीर्षक ढूँढ़ते, वाणियों में पिरोते हैं शब्द।

 

संग्रहालय-लक्ष्य तो दर्शकों को विभिन्न ज्ञान एक स्थान पर दिखाना,

दर्शक तभी आनंदित होते, जब बहु नूतन विधाओं से सम्पर्क होता।

ये ग्रंथागार-वाचनालय, कलाकृति प्रदर्शनी, विशेषज्ञ सम रखते पक्ष,

पाठक-दर्शक होते हैं प्रेरित, समय के सदुपयोग से बढ़ता मनोबल।

 

विभिन्न पुस्तकें, अनेक अध्याय, लेखकों के अपने विभिन्न मंतव्य,

सबमें कुछ विशेषता भी, रूचि अनुरूप चाहे तो सकते कुछ गुन।

सब उद्देश्य बहु आयामों से संपर्क कराना, मानव आत्म में अत्यल्प,

इतर-तितर संयोग से विस्तार होता है, किञ्चित और होता बुद्धिमान।

 

मन एक बावला है, स्वयं से नहीं संभव, तथापि ले लेता महद वचन,

इस क्षुद्र मस्तिष्क का कौन संगी है, जिससे नित करा सके निर्मित?

महारथी अर्जुन ने सूर्यास्त तक जयद्रथ के वध का ले लिया प्रण तो,

किंतु कौरवों ने सफल न होने दिया, लाज बचानी पड़ी कृष्ण को।

 

वो चीज कहाँ से लाऊँ, तेरी दुल्हन जिसे बनाऊँ, कोई पसंद न आए छोरी

मन किञ्चित तो अचंभित होता, परंतु नवीन हेतु लगाता छलाँग भी।

इस अल्पता का तो भोगी, फिर परजीवी कुछ न रच सकता निज से

युक्ति करने की भी न अति समझ, अतः यूँ ही इधर-उधर हाथ मारे।

 

नदी में कूदने पर ही तैरना आता, अतः सीख सकते यदि हो प्रयास

अनेक बाहर आते कूप-मंडूकता से, सोच लिया तो दिखेगा भी मार्ग।

बिन कुछ किए तो जगत में, मनुज की नहीं हुआ करती प्रगति बहुत

ध्यान करो, कर्म-इंगित करो, एक साहसी सम बढ़ाओ अग्र कदम।

 

मेरी भी चेष्टा लेखन सार हेतु, कुछ सुस्त हूँ स्वयं से ही बनाता नव

माना बाह्य अध्ययन भी आवश्यक, जो स्वयं को करते देने महत्तर।

जब अभ्यंतर सुघड़-श्रेष्ठ हो जाएगा, तो बाहर भी उत्तम ही आएगा

यही एक आदान-प्रदान का सिलसिला, बिना किए यश न मिलेगा।

 

किञ्चित आत्म-प्रयास ही सराहनीय है, किंतु बहुत  न होता पर्याप्त

मनीषियों ने बहु विषय सामंजस्य-मंथन कर कुछ बनाए हैं सिद्धांत।

वे उत्तम क्योंकि अनेक प्रयोगों बाद ही आऐं, उनसे आगम लो अत:

चिंतन-मनन की वांछित सामग्री देगा, उत्पादकता तो बढ़ेगी कुछ।

 

माना लेखन कर्म तो स्वयं से जूझना ही, पर वहीं से निकलेगा अमृत

किंतु पूर्व कृत-संचित ऊर्जा-ज्ञान बड़ी शक्ति देता, तन-मन को इस।

अतः सीखो जितना भी बन पाए इस जग में, उत्तमता की कुंजी है वह

निर्मल स्वरूप तो शुभ-मिलन से ही बनेगा, सांझी सोच का है महत्त्व।

 

हम नित्य तो उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण होते हैं, प्रश्न मात्र सम्मान का न अत:

यह मात्र एक चेष्टा दक्ष बनने की, आत्म-आदर की यात्रा है निरंतर।

अतः बस सोच लो लिखने को नव अध्याय, नहीं कोई विषय-अल्पता

अनेक प्रयास करते, इसकी साक्षी हैं सकल उपलब्ध रचनात्मकता।

 

खिलौनें तो अनेक पर आनंदित-आविर्भूत होकर जाओ नए पर ही

ग्रंथालय-संग्रहालय सा कुछ सहेजो, गर्व-संतोष की होगी अनुभूति।

 

 

पवन कुमार,

ब्रह्मपुर, 2 दिसंबर 2024, सोमवार, समय 9:19 प्रातः

(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दि० 17 अप्रैल 2015, शुक्रवार, समय 9:17 बजे प्रातः से)

 

Friday, 22 November 2024

सृजन-पथ

सृजन-पथ

जीवन के वर्तमान रिक्त पलों में, क्या अनुपम कृति बना सकते 

कब तक अल्प प्रयासों में ही अटकेंगे, औरों से पीछे रह जाएंगे।


माना मनन-काव्य सार्थक है, पर क्या यही एक पूर्ण उद्देश्य?

हर चिंतन-साधना में लाभ, पर नर-परियोजना है अति वृहद।

जीवन में कुछ उच्च लक्ष्य हो, जिसके संग हर प्रयास जुड़ा हो,

अल्प रस भी तब अमृत बने, जब कदम बढ़ें व दृष्टि अडिग हो।

 

मनीषी कहते, "हीरा जन्म अमोल है, कौड़ी सा नहीं करो मोल"

जो तम से निकले, साहसी बने, उनका ही नव-विश्व से आत्मसात।

आत्म-केंद्रित रहना भी श्लाघ्य, पर कर्म समर्पित हो जब जगत में,

स्तुति सजती उसी कृति पर सदा, जो अपने स्वार्थ से बढ़कर हो।

 

दैनंदिन जीवन निर्वाह तो सरल, आजीविका से सहजता आए, 

पर सदुपयोग रिक्त काल का ही, सत्य मनुज-कसौटी कहलाए।

सुस्वास्थ्य, स्वाध्याय, समरस शैली, हर जीवन-दिशा में दें गति,

किन्तु ये तो साधन मात्र लक्ष्य हेतु, क्या इनसे राहें तय बनेंगी?

 

जीवन तो आधा बीत चुका, किंतु मन-देह यौवन की सीमा पर

असीम ऊर्जा व समय अपार, पर लक्ष्य अभी तक भी अज्ञात?

बारात सजी, पर दूल्हा न दिखे, यह बाह्य दिखावा भर लगता,

जीवन तो सार्थक तब ही बने, जब कर्म से पथ सच्चा बनता।

 

महानरों ने देखा गुरु स्वप्न, व जीवन को सुलक्ष्य दिया हर पल 

मुफ्त में न यश मिला किसी को, तप से ही सब सृजन सफल।

संभव किसी कृति में जीवन भी लगे, पर सृजन का न छूटे मर्म,

स्वयं को एक परियोजना मानो, व सुप्रबंधन से हों कर्म प्रबल।

 

आत्मा में निहित है जो एक दिव्यता, उसे चेतना से जागृत करें 

लक्ष्य स्वयं आकार ही लेगा, जब आत्मा के स्वर को सुन सकें।

कल्पना से ही सुकृति बनती है, पर श्रम से वह सजीव दिखेगी,

प्रारूप रखो और जुट जाओ, तभी अनेकों सत्य-परतें खुलेंगी।

 

प्रकृति या देव-चित्र के अनुपम अनुभव, हृदय में प्रेरणा जगाएं 

लक्ष्य तय होंगी तो राहें बनेंगी, वरना भटकाव ही कदम गिराएं।

अनिश्चतता से तो यात्रा व्यर्थ, बस भाग्य-सहारे लक्ष्य पूरा न होगा,

गंतव्य साधना पहला कदम है, तभी प्रत्येक पथ सच्चा बनेगा।

 

एक राह चुनो रुपरेखा बनेगी, फिर उसी में मन को रमाओ 

लेखन, सेवा, विज्ञान-कला, जो रुचता हो, उसमें लग जाओ।

माना सर्वत्र निपुण होना संभव न, श्रेष्ठता वहाँ जहाँ है लगन,

एक राह पकड़ो और बढ़ते चलो, लक्ष्य में हो संपूर्ण मगन।

 

माना वर्तमान रूचि लेखन में, किंतु अन्य विषयों में हो चिंतन 

एक विधा में निपुण बनो, और जीवन का स्वर बनाए सजीव।

चयन दुष्कर प्रक्रिया, क्योंकि सब अच्छे पर चिह्नन आवश्यक

महानता का आधार वही, स्वरुचि कृति से श्रेय सजेगा जब।

 

अतः रिक्त समय कदापि न व्यर्थ करो, उसमें बहु स्वप्न गढ़ो

उपलब्धि माना दूर सही, पर चलने से, हर गंतव्य समीप हो।

इस जीवन के पाँसे कहाँ पड़ेंगे, यह तो भविष्य ही बताएगा,

पर शीर्षक खोज कर बढ़ते चलो, लक्ष्य ही मार्ग दिखाएगा।

 

प्राण दुर्लभ, हर पल नूतन जन्म, व्यर्थ मूढ़ता से तो न लाभ 

जो अभी पास, उसे सँजो लो, उससे ही बनाओ अग्रिम राह।

वर्तमान-एकत्रण अग्र की भूमिका बनता, अतः साधना ही पथ

परम जिज्ञासा से हल खोजो, और सुलझने से मिलेg मंजिल।


पवन कुमार, 

22 नवंबर 2024, शुक्रवार, समय 11:30 बजे रात्रि 

(मेरी जयपुर डायरी 20 अक्टूबर, 2016 वीरवार, समय 7:27 बजे से) 

Sunday, 17 November 2024

मनोबल महिमा

मनोबल महिमा 



 हे उच्च मनोबल के नायक, संस्थानों के प्रणेता अपने, 

आत्मा को दबने न देना, चाहे कैसी भी वेदना हो गहरी।

 

जीवन रणक्षेत्र में विजयी होना, हर रूप में सक्षम बनाना, 

निज प्रेरणा पथ पार कराती है, पहले स्वयं से विजय पाना।

 अपनी हार में जो विशाल आनंद है, वह स्वयं से मिलने में है, 

सब दंभ हटते, सच्चा रूप दिखता, अंधकार भी जाता हट।

 

माना कुछ क्षीण हम, किंतु सब बाधाऐं हटाता मनोबल,

ज्ञान-चक्षु कराते दर्शन, घावों पर प्रेरणा लगाती मरहम।

हर क्षण घायल होतें, तथापि सशक्त से संघर्ष में डटे रहते,

माना संघर्ष थकाऊ ही, परंतु सबसे बड़ा जीवन-धर्म है।

 

मूर्खताजनक मुग्धता न श्लाघ्य, पर आशा करना दोष नहीं, 

अबतक न घटित तो आगे भी न होगा, ऐसा मानना न सही।

क्षमताएँ बढ़ सकती हैं, यदि प्रयास हो निरंतर व स्वाभाविक, 

मनुज सीमाओं से बाहर आया, तभी लब्ध सफलता अद्भुत।

 

मरकर जी उठेंगे, धैर्य नहीं छोडेंगे, बाधाएँ नहीं रोकेंगी पथ 

ठोकरें लगेंगी, काँटे चुभेंगे, मजाक भी होगा, कभी गर्व मर्दन।

अपनी असली दशा जानकर, गंतव्य की दूरी भी पहचान लेंगे,

कौन से उपकरण आवश्यक हैं, जुटाकर उन्हें बलवान बनेंगे।

 

अपना स्तर जान दूसरों की शक्ति आँकेंगे, रण-नीति बनाएंगे, 

न स्वयं को कभी दुर्बल आँकेंगे, परिवेश को सशक्त बनाएंगे।

सब लगें अपने को स्थापित करने में यहाँ, होड़ एक जबरदस्त,

क्षीण पीछे छूट जाता, कमसकम प्रतियोगिता में तो हो चयन।

 

माना अब तक संपर्क अपने जैसों से, पर अब महा-मुकाबला,

सब आयुध सहेजो, शस्त्र पैने करो, समर तो अब शुरू हुआ।

यहाँ कृष्ण-वचन सत्य हैं, 'युद्ध कर', जो बहुतों को देते प्रेरणा,

विशाल सेना तत्पर झपटने को, पर मनोबल है महान प्रणेता।

 

अनीति पर सुनीति की विजय, अंधकार को चीर डालता प्रकाश,

असत्य पर सच्चाई की जयश्री है, मृत्यु भी अमृत से जाती हार।

लुब्ध-प्रवृत्तियों पर ईमानदारी की जीत, परिश्रम से विद्या मिलती, 

सुयश प्राप्त है योग्य कर्मों से, चाटुकारिता कभी काम न आती।

 

मेहंदी का रंग चढ़े धीरे-धीरे, सहज पककर ही तब मीठा होए, 

सुगुण-सुगंध तो स्वतः फैलते हैं, अच्छे-बुरे सभी लाभान्वित होते।

आत्म प्रयासों का ही अधिक सहारा, अन्य भी योग्य का साथ देंगे, 

उत्तम बुद्धि में ज्ञानमय होकर, अपनी प्रतिभा हम मनवा ही लेंगे। 

 

कर्मठता का यश दूर तक फैलेगा, यदि मन में होंगे सच्चे प्रयास,

माना जग में कुछ भेदभाव है, प्रतिभा को भी करने में स्वीकार।

एक दिन मेहनत रंग लाएगी, परम श्लाघ्य को न झुठलाता कोई

देखो कहाँ से कहाँ पहुँच गए हो, घबराने का कोई कारण नहीं।

 

आत्मसम्मान के योग्य बनो, कह सको, "निर्मल प्रयास किया", 

संस्तुति परम-आराध्य की होगी तो सरस्वती-लक्ष्मी भी चलेगी।

मन में हों बहु सकारात्मक भाव, सुकथन का बनाओ संकल्प, 

किसी को रुष्ट करना अनावश्यक, छोटी-मोटी बातें लो सह।  

 

सदैव प्रतिक्रिया अनावश्यक, शांतभाव उच्च-मन का प्रतीक, 

जल में रहकर मगर से शत्रुता मारक, सत्य क्षेम में बहु उन्नति।

वरिष्ठों का आशीर्वाद आवश्यक, सब योग्यों से गुण ग्रहण करो, 

उजले मानव-पक्षों को अपनाओ, बात-बात पर न उद्विग्न ही हों।

 

सभी उद्योग बढ़ाओ सकारात्मक दिशा में, स्थिति को सुदृढ़ करो, 

संपर्क करो कुछ योग्यों से, सुसंवाद से आत्म परिवेश शुद्ध करो।

जहाँ सूई काम कर सकती अनावश्यक तलवार, ऊर्जा हो संचित,

बहु कर्म अति-बल मांगेंगे, अतः सीमित ऊर्जा को न करो व्यर्थ।

 

लाभान्वित हों सहकर्मी भी, राष्ट्र-विभाग का नाम करो उज्ज्वल, 

बनकर नियमित प्रदत्त शुभ कर्त्तव्यों में, आधार खूब करो सुदृढ़।



पवन कुमार,

17 नवंबर, 2024 रविवार समय 11:33 बजे प्रातः 

(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दिनांक 4 जून, 2015 वीरवार समय 8:15 बजे प्रातः से)  


Sunday, 10 November 2024

शिक्षक त्रुटियाँ

शिक्षक त्रुटियाँ 
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हम सहसा कुछ गलत हो जाते हैं, एक छोटी सी भूल बन जाती महद
फिर अन्य हमें कैसे ही आँकते, अपने ढंग से विवेचना करते है सब। 

कई संभावनाऐं होती हैं एक काज हेतु, किंतु निर्णय तो एक पर होता ही
इसको करूँ और उसको छोड़ूँ, कितने परिपक्व हैं बाहर निकलने में ही।
एक अंतर्द्वन्द्र नित्य चलता रहता है, भिन्न जीवन-पहलुओं के समन्वय में
सब अपनी कुछ-2 श्रेष्ठता भी रखते, पर सर्वोत्तम तो सदा आवश्यक है। 

हम जीवन में अनेक ही अहम निर्णय भी, यूँ भावावेश में हैं लेते बहकर
परिणाम तो उस समय चिंतन न कर पाते, मात्र सहसा हो जाता कुछ। 
हाँ हरेक क्रिया की एक प्रतिक्रिया भी, आवश्यक न अनुरूप हो हमारे
कदाचित जानकर भी अनाड़ी बने रहते, व्यस्क सम व्यवहार न करते।

दुनिया हमें अपने दृष्टिकोण से देखती है, एक विशेष धारणा ही बनाती
पर वह तो होती मात्र बाहरी दर्शक, तुम्हारे अन्तर्मन की न वह साक्षी।
वास्तविक जगत में तो हम सभी, अपने विभिन्न मनोविज्ञान लिए हुए हैं 
सब अपने ढंग से एक दूजे से जुदा हैं,  निज परिवेशों में विकसित हुए।

क्या हैं ये हमारी बेचकानियाँ या त्रुटियाँ, क्या करते या हो जाती मात्र 
क्या बाह्य-अपेक्षाओं से समन्वय-अभाव, या यकायक बेसमझे बर्ताव।
किन्तु कई बार तो जानते-समझते हुए भी, हम गलती करते हैं जाते 
जैसे स्व पर कोई वश ही न, बस मूढ़ता ही निर्णयों पर भारी होती है।

तब हमारा क्या जीवन-दर्शन होता, उसी अनुरूप मनन-बर्ताव करते
संसार में कुछ देख-समझ कर ही, स्वयं को फिर बदलने की सोचते। 
बहुत बार हाथ जलाऐं हमने मूढ़ता में, फटकार से ही आती कुछ सुध
समझ में आता कि हम ही सही नहीं होते, बहुत मार्ग तुमसे हैं श्रेष्ठतर।

बहु विद्याऐं, पूर्व गमित पथ, प्रयोग-अभ्यास, जिनका जगत रखता ज्ञान 
पर हम अदने से व्यक्तित्व हैं, सब विधाओं में कैसे हो सकते पारंगत। 
मात्र यदि निज क्षेत्र में व्यवहार करना हो, तो भी कुछ संभावना उचित 
परंतु अपरिचित, ज्ञान-विद्या दोनों में अनाड़ी हैं, यह स्वीकार लो तुम।

क्यों हम एक मूढ़ी बन जाते हैं, अपनी जटिलताओं से हो जाते कुत्सित
इस निर्बल मन-देह में बहुत व्यसन पाल लेते, जबकि ज्ञात हैं हानिकर। 
क्यों दुनिया को यह दिखाना चाहते, हम भी अपनी मर्जी के हैं मालिक 
क्यों अनावश्यक प्रतिलोम स्पर्धा, जबकि सत्य असर तो होता स्वयं पर। 

क्यों बदला-भावना से आचार करते, जबकि आत्म पर ही असर अधिक 
'आप तो मरे ही पर तुम्हें सिखा देंगे', युक्ति निज की हानि करती अधिक।
क्यों न आत्म-अंतः शुभ करते, एवं एक विज्ञ-बुद्धिमान सा व्यवहार करते 
और मात्र यूँ परेशान रहते, मानो समस्त जगत का भार इन स्कंधों पर है।

क्यों नहीं स्वयं को हल्का ही करते हो, बोझ अधिक तो लो अन्य सहयोग 
जीवन-प्रबंधन के कुछ नियम सीख लो, बाँटो कार्य रूचि-योग्यतानुरूप। 
एकदम यूँ नहीं चिंतित हो जाओ, अन्यों को भी निष्पादन में लगता समय 
पर देखो लापरवाही न हो कर्त्तव्य-निर्वाह में, यह लागू ही होता सब पर। 

गलतियाँ हमारी ढ़ीलता से भी होती, अनुरूप समय पर गंभीर नहीं होना 
गलत व्यक्ति पर विश्वास करना भी एक, वह स्वयं मरेगा तुम्हें भी मारेगा।
जब घटित हो रहा है सुधरने की महत्तम संभावना, बाद मे रोना-धोना ही 
बाद में त्रुटि-सुधार अति महँगा पड़ता, अतः सब समझदारी है समय की।

हम एक क्षेत्र में, किंतु हेतु यत्न न करते हैं, सीखेंगे नहीं तो गलती ही होगी 
क्यों अनाड़ी ही बने रहना चाहते, जबकि पता परिश्रम से सीख सकते ही।
विश्व सम्मान देता है चेष्टालूओं को, पर छोटी-2 गलतियों की बहुत कीमत
समय-बर्बादी, संसाधन-अपव्यय, मानसिक-व्यथा और हैं व्यर्थ-उपहास।

अनर्थक टिप्पणी, अयोग्य कहने से तो टूटे अवर-विश्वास व वरिष्ठ-झिड़क
ये कुछ सीमा तक तो ये नियमित किए जा सकते, सावधानी ही है बचाव।
पर गलतियाँ मात्र अपुण्यी नहीं, अहसास सजग रहने की प्रेरणा सकती दे
अन्यों को हलके में ही नहीं ले सकते हो, कि जो तुम सोचों वे उसे मान ले।

तो कुछ श्रेष्ठ मानक बनाओं निर्वाह में, हर निर्णय से पूर्व ठीक से देख लो 
तथापि कुछ त्रुटियाँ अवश्यंभावी, एक मजबूत व्यक्ति सम बर्दाश्त करो। 


पवन कुमार,
10 नवंबर, 2024 रविवार समय 8:39 बजे सायं  
(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दिनांक 9 अप्रैल, 2015 वीरवार से)


Saturday, 31 August 2024

स्वतंत्रता-अर्थ

स्वतंत्रता-अर्थ



स्वयं-सहायता महत्तम संबल, मानव इस दुर्धष जगत-जंजाल से मुक्ति पा सकते
सर्वत्र महालोलुप-दृष्टि है, कब सावधानी-च्युत हुए व बाज द्वारा लपक लिए गए। 

तुम कैसे यहाँ निज जीवन-घड़न चाहते, पूर्व-स्वतंत्रता तो नहीं, कोई तो है स्वामी
पर मौलिक महत्त्वपूर्ण, जितने उच्च को बनाओगे, कुछ निज-गुणवत्ता भी बढ़ेगी। 
जगत में ठग को पहचानना बड़ा कठिन है, फिर कौन निर्मल कल्याणक ही नित 
आरंभ में कुछ भद्र-चेतस संभव, पर सत्ता प्राप्ति कैसा ही रूप, जानना है कठिन। 

सत्य कि बहु संघर्षशील नर मृदुल-मानस ही, पर सत्ता-वैभव शनै कर देता गर्वित 
अच्छा-भला शक्त-प्राणी असहाय हो जाता, जगत-तष्णाऐं कर लेती पूर्ण पाशित। 
समय संग हमें मृदुतर होना चाहिए, किन्तु जरा सम्मान मिलते ही फूल से हैं जाते 
और पूर्व भले-समर्थकों को दास समझ लेते, जैसे मात्र हमारी सेवा हेतु यहाँ आए।

पर क्या मानव-कुसूर, वह सब बालपन-युवा-व्यस्क-प्रौढ़ आदि श्रेणियों से गुजरता
सबकी निज परवरिश होती जैसी संगति-विद्या-ज्ञान मिला, वैसे ही परिवर्तित होता। 
स्वयं को तो सोचते अति-बुद्धिमान, किंतु वास्तविकता में हैं विशेष परिस्थिति-रचना 
थोड़ा-बहुत विवेक मिला है हाथ-पैर मारने हेतु, व अति साहसी पार कर लेते बाधा।

चलो मदारी का खेल देखते हैं, वह अपने बंदरों से जो चाहे, वही काम करवा लेता
मदारी की रज्जु से बंधा वानर तो सेवक, स्वामी के हाथ में डंडा, खाना-पीना देता।
जरा सी शरारत की तो मार खानी पड़ती है, गुस्सा हो गया तो खाना भी नहीं प्राप्त 
अब बंदर का अल्प बुद्धि-साहस, अपने से बलशाली के चंगुल से मुक्ति है कठिन। 

जगत में सतत बहु प्रयोग, आखेटक वीभत्स-खूँखारु सिंह को पिंजरे में फाँस लेता 
महाकाय हाथी, गैंडा, जिराफ, मगर तक को फँसा लेता है, स्थायी ही अब उनका। 
माना ताकतवर किंतु नर युक्ति उनसे ऊपर की होती, बेबस जाल में फँस ही जाते 
तात्पर्य है कि चालक कब्जा जमा लेते निरीहों पर, चाहे देह-बल में कमतर उनसे।

अब एक काल तो मनुज-विशेष भी किसी स्तर, एक के ऊपर अनेक चढ़ी हैं परतें 
किंचित दुर्बलों से स्वयं को सुभग मानने लगता, मद में पाश में लेना चाहता उन्हें। 
प्राचीन काल में राजा बेगारी करवाते थे, सारे नर प्रस्तुति को बाध्य उनकी सेवा में 
न कोई प्रश्न, विरोध-स्वर ही, कभी कोई बोले तो कड़ाई से कुचलवा जाता सेना से। 

लोगों ने बड़े किले बनवा लिए, बड़बोलापन इतना अधिक कि गगन-छेद कर देगा 
विश्व की सकल-वैभव इच्छा-समक्ष कर लिए, अन्य-श्रम से फल चोखा है मिल रहा।
ऊपर से काम-प्रवृत्ति में पाशित, विश्वामित्र से तुलना सी जो मेनका से थे गए उलझ 
फिर रूपसी-संसर्ग को ही कुछ स्वर्ग सोचते, जीते-जी जो भोग सकते हो, लो भोग।

अब ताकत-नशा, दूजे को तुच्छ समझते, बात-2 पर औकात दिखाने की बात करते 
निज व्यवहार तो स्वयं से बली समक्ष कभी देखो, भीगी बिल्ली से कोने में दुबकते। 
युक्ति-व्यवहार तुम भी सीख जाते, निज जैसों से मिल महत्तम संभव लाभ लो उठा
यहाँ तुम उसकी सहायता करो और वह तुम्हारी, चोर-चोर तो मौसेरे ही होते भ्राता।

सब दमितों में से कुछ दुर्धष निकल जाते, साहस करके तंत्र समक्ष करतूतें कर देते
फिर सिकंजा धीरे-2 खिचना शुरू होता, विरोधी गुट अपना समस्त जोर लगा देते। 
कानून का पेंच तो बड़ा ही शक्त-पेचीदा है, चाहे तो किसी को भी फँसा देता कहीं 
सहायक-सहारा व निज बल भी अति काम न करते हैं, चक्रव्यूह निश्चित जटिल ही।

खैर ये बातें तो बलशालियों की, किंतु कुदरत समक्ष तो कभी पहाड़ भी है हिलता 
परंतु ये आमजन कहाँ जाऐं, उन पर तो सदा यह नहीं तो वह दबंग काबिज रहता।
स्वावलंबन की उसको कितनी स्वतंत्रता मिल रही है, उस देश-समाज के देन यही
लोकतंत्र ने बहुत आजादी दी, तथापि स्व-मतिमंदता व बली-युक्ति फँसाए रखती। 

चिंता यहाँ आम नर की, कैसे विमुक्त हो सकल सुलभ सुख-आस्वादन कर सकता
तब क्या स्वतंत्रता-अर्थ भी लेगा, क्या प्रज्ञाशील भाँति संयम से आचरण ही करेगा।  
क्या चरित्र-कसौटी, सब योगी-भोगी, राजा-गृहस्थ, साधु-पादरी पृथक आचार करते 
अब असंभव तो है समान प्रशिक्षित , किसको नायक मानें और पद-चिन्हों पर चलें। 

थोड़ा सरल करते हैं नर पूर्व पूर्ण-मुक्त होवे, तब स्वेच्छित पक्ष चिंतन कर ले अपना
यदि देश का शासन-तंत्र निर्मल, अवश्यमेव हरेक को पूर्ण-पनपन अवसर मिलेगा।  
वहाँ परिवेश शिक्षा-परक व मानव के उबार वाला होगा, ताकि ले सके उचित निर्णय 
विषमता भी शनै से मिट ही जाऐंगी, एक साहस होगा, करने को बुराई का प्रतिकार। 

ये धार्मिक तो यूँ ही मोक्ष-नाम लेते, स्वतंत्रता ही चरम उपलब्धि दिशा दिखा सकती 
साम्यवाद भी उत्तम चेतना है, मानव अन्य  का ग्रास न बने, व सुख से रहें दोनों ही। 



पवन कुमार,
ब्रह्मपुर (ओडिशा), ३१ अगस्त, २०२४, शनिवार, समय १०:२३ बजे प्रातः 
(मेरी महेंद्रगढ़ (हरि०)  डायरी ३१ अगस्त, २०१७, वीरवार समय ७:५३ बजे प्रातः से )