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Friday, 28 August 2026

मेह में भीगता मन

मेह में भीगता मन

वर्षा के बाहरी सौंदर्य से आरम्भ हुआ यह चिंतन जल के जीवनदायी और विकराल रूपों से गुजरते हुए मानवीय संबंधों, श्रद्धा, आंतरिक शुद्धि और लोकहित की भावना तक पहुँचता है। मेघ यहाँ केवल प्रकृति का अंग नहीं, बल्कि ग्रहण करने, सँजोने और अंततः सबमें बाँट देने का जीवंत प्रतीक है।

बाहर मेह बरस रहा है। हवा के साथ आती बौछारें कमरे के भीतर तक पहुँच रही हैं। बूँदों का शीतल स्पर्श तन को छू रहा है और रिमझिम-पिटपिट की ध्वनि से सारा वातावरण गूँज उठा है। लगता है, मानो आसमान से अमृत बरस रहा हो और ग्रीष्म से तप्त भूमि को एक गहरा सुकून मिल रहा हो।

आकाश में मेघों का जमावड़ा है। वे एक-दूसरे से टकराते, गरजते, खेलते और अपना भार धरती पर छोड़ते जा रहे हैं। सूर्य बादलों के पीछे छिपा हुआ है और चारों ओर फैली घटाओं ने प्रकृति के एक सौम्य, शीतल आयाम को प्रकट कर दिया है।

बारिश मूसलाधार है। छत की टाइलों पर गिरती बूँदें एक अजब-सा शोर मचा रही हैं। कभी उनकी गति मंद पड़ती है और फिर अचानक तीव्र हो जाती है। हवा के झोंकों के साथ बौछारें भीतर तक चली आती हैं और तन को छूकर एक शीतल सिहरन जगा जाती हैं।

बाहर पेड़ मानो मुस्कुरा रहे हैं। उनकी भीगी शाखाएँ हवा के साथ झूम रही हैं और धुले हुए पत्तों का हरापन पहले से अधिक निखर आया है। तनों से फिसलती बूँदें मूलों की ओर उतर रही हैं। खेत, पेड़-पौधे और तपती धरती—सभी इस मेघ-मधु को अपने भीतर समेटते हुए जैसे नए जीवन से भर उठे हैं। समूची प्रकृति पर एक मुस्कानमयी मस्ती-सी छाई है।

वर्षा अपनी उपस्थिति का पूरा अहसास कराती हुई मानो कह रही है—“मैं आ गई हूँ। अब धरती प्यासी नहीं रहेगी, कोई भूखा नहीं रहेगा। मैं प्रकृति की नियामत हूँ, सबकी मित्र। अब फलने-फूलने का अवसर है; मेरा असर दिखाई देना शुरू हो गया है।”

पानी लगातार बरस रहा है—अभी घर में ही रहना होगा। बाहर तब निकलेंगे, जब बरसात कुछ थम जाएगी। लगता है, छतरी के प्रयोग का समय आ गया है। मनुज, पशु और पक्षी भी अपने-अपने मकानों, खोरों और नीड़ों में कहीं दुबके बैठे हैं। सभी भीगने से बचना चाहते हैं; पर जहाँ बाहर निकलना अपरिहार्य है, वहाँ लोग बरसात में भी चलते और अपना काम करते जा रहे हैं। वर्षा अपना क्रम नहीं रोकती और जीवन भी अपनी आवश्यकताओं तथा दायित्वों के साथ चलता रहता है।

प्रथम तल के कमरे में कुर्सी पर बैठा, आँखों पर ऐनक लगाए, दरवाजे से बाहर फैले खेतों और पेड़ों को देख रहा हूँ। जो कुछ आँखों के सामने है और भीतर अनुभव हो रहा है, वही धीरे-धीरे शब्दों में उतर रहा है। बौछारें भीतर आकर तन को सिक्त कर जाती हैं और मन में भी एक फुहार-सी फूटने लगती है। मन करता है कि इस वर्षा में सराबोर होकर कुछ मेह-सा हो जाऊँ; यह मेह इसी भाँति अविरल गतिमान बना रहे—बूँद-बूँद बरसता रहे और मन की धरती को भिगोता रहे। हाथ में पकड़ी कलम भी इस रिमझिम से लय और प्रेरणा पाए तथा मेह में भीगते मन के सुंदर भावों को शब्दों में उतारती चली जाए।

इस मेघ-मधु की शीतल फुहारों से किसका मन पुलकित न होगा? मनुष्य इस वृहद् सृष्टि का एक क्षुद्र अंश है; प्रकृति भीगती है तो उसका मन भी अनायास भीगने लगता है।

धरती की इस तृप्ति को देखते हुए जल का व्यापक महत्त्व सहज ही सामने आने लगता है। जीवन का समूचा चक्र इसी के आसपास चलता है। समस्त धान्य, खाद्य और वनस्पतियाँ इसी से जन्म लेते हैं; उनसे जुड़े अनेक व्यापार तथा आजीविकाएँ भी अंततः इसी पर निर्भर हैं। जल केवल प्यास नहीं बुझाता—वह खेतों में अन्न, वृक्षों में हरियाली और असंख्य जीवों में जीवन बनकर प्रवाहित होता है।

ये मेघ समुद्रों का जल कितनी बड़ी दूरी से ढोकर लाए हैं! उनका कर्तव्य कितना विराट है—धरती को तृप्त करना और एक-एक जीव तक भोजन तथा जल पहुँचाना। मानो समस्त पृथ्वी उनकी जिम्मेवारी के क्षेत्र में हो। वे समुद्रों से ग्रहण करते हैं, आकाश में उसे सँजोते हैं और समय आने पर बूँद-बूँद धरती को लौटा देते हैं।

किंतु जीवन देने वाले इसी जल का एक विकराल रूप भी है। मानसून के साथ सारी सरिताओं में उफान-सा आ गया है। सारे भारतवर्ष में बारिश हो रही है। निचले स्थानों में पानी भर रहा है और बिहार-असम-नेपाल में बाढ़ की स्थिति बन गई है। पिछले दिनों मुंबई में भी बाढ़ की खबर थी। नगर समुद्र-तट पर स्थित है, फिर भी भरे हुए पानी को समुद्र तक पहुँचने में समय लगता है।

धीरे-धीरे समुद्रों का स्तर भी ऊँचा हो रहा है और तटीय स्थल डूबने लगते हैं। नदियाँ बड़े-बड़े क्षेत्रों का जल अपने में समाहित करती हैं और मैदानी क्षेत्रों में उनका पाट फैल जाता है। पहाड़ों में भी नदियों पर बाँध बना दिए गए हैं, जिससे कई बार पानी का सहज और सुगम प्रवाह रुक जाता है।

जब से चेतना ने संसार को पहचानना आरम्भ किया है, बाढ़ों की खबरें सुनता आया हूँ। अपनी आँखों से भी पानी का दूर-दूर तक फैलाव देखा है। उससे कुछ परेशानी तो होती है, पर यही पानी धरती की हरेक रग में प्रवेश करता है। वही खेतों को सींचता, बीजों को जगाता और अन्न को जन्म देता है। जल कभी वरदान बनकर आता है और कभी कठिन परीक्षा बनकर; फिर भी जीवन का मूल प्रवाह उसी से चलता है।

बाहर की इस वर्षा को देखते-देखते मन अपने भीतर उतरने लगता है और फिर दूर दिल्ली की ओर चला जाता है, जहाँ मेरी सजनी बैठी है। उसकी याद बहुत आती है, पर क्या करें—नौकरी की अपनी मजबूरी है और दूरी का निर्वाह भी जीवन के दायित्वों का ही एक हिस्सा है।

वर्षा की ये बूँदें संबंधों की ओर भी देखने को प्रेरित करती हैं। नौकरी और पढ़ने-लिखने की व्यस्तता में कई बार हम अपने निकटस्थों को अपेक्षित समय और आत्मीयता नहीं दे पाते। उनके अंतरतम को समझने के लिए हमें स्वयं अधिक संवेदनशील होना पड़ता है।

यह उचित नहीं कि मनुष्य जीवन की उलझनों में भीतर से ठूँठ हो जाए। प्रेम की वाणी बोलना और अपने व्यवहार में मिश्री-सा रस घोलना भी जीवन की आवश्यकता है। माना कि संसार में प्रतिदिन अनेक लफड़े हैं, फिर भी समय निकालकर लोगों के साथ मुस्कुरा लेना चाहिए।

कई बार हम किसी समस्या की तह तक नहीं पहुँच पाते और उसे ऊपर-ऊपर से, मोटा-मोटा समझकर ही प्रतिक्रिया दे देते हैं। संभवतः संबंधों की अनेक कठिनाइयाँ इसी अधूरी समझ और त्वरित प्रतिक्रिया से जन्म लेती हैं। वर्षा की यह स्निग्धता व्यवहार को अधिक सहज, संवेदनशील और प्रेमपूर्ण बनाने की प्रेरणा देती है।

यह सावन का महीना है। इस समय लोग अपना घर-बार छोड़कर शिवजी के दर्शन हेतु निकल पड़ते हैं। वे काँवड़ में गंगाजल भरकर लाते हैं और किसी मंदिर अथवा शिवालय में चढ़ा देते हैं। लोगों की श्रद्धा का बड़ा महत्त्व है। वे एक व्रत-सा धारण कर किसी बड़े मुकाम तक पहुँचना चाहते हैं।

सावन का यह जल केवल खेतों और वनस्पतियों को ही नहीं सींचता; मनुष्य की श्रद्धा में गंगाजल बनकर शिव तक भी पहुँचता है। शायद हर ऐसी यात्रा के भीतर किसी कठिनाई से ऊपर उठने, अपने संकल्प को दृढ़ करने और स्वयं को अधिक निर्मल बनाने की आकांक्षा छिपी होती है।

जीवन में समस्याएँ तो अनेक हैं, पर कभी-कभी उन्हें पीछे छोड़ना भी पड़ता है। अपने सभी दुःख संसार के सामने रख देना आवश्यक नहीं। कुछ दुःख मनुष्य को स्वयं धारण करने पड़ते हैं और कुछ से अपने ही धैर्य तथा विवेक के सहारे बाहर निकलना होता है।

यह मेह पत्तों पर जमी धूल साफ करना सिखाता है। वह काया और स्थलों—सबको निर्मल कर देता है। समस्त मल बहकर प्रकृति में ही सम्मिलित हो जाता है और उसके बाद पावनता की नई कोपलें फूटने लगती हैं।

तब एक प्रश्न भीतर उठता है—जो मेह पत्तों, पेड़ों, धरती और समूचे परिवेश का मैल धो सकता है, क्या वह मनुष्य के भीतर जमे मैल को भी धो सकता है? बाहरी वर्षा तन को भिगो सकती है, किंतु अंतर्मन की स्वच्छता तो अपनी इच्छा और साधना से ही आएगी। हमारे भीतर की शुद्धि की जिम्मेवारी कोई दूसरा कैसे ले सकता है?

हम सभी पुलकित होना चाहते हैं; अपनी कठिनाइयों और कुंठाओं से ऊपर उठकर बृहत् हित में काम करना चाहते हैं। माना कि जीवन में अनेक बाधाएँ पार करनी पड़ती हैं और कई बार समय भी कठिन होता है, पर ऐसे अवसरों पर धैर्य ही हमारा सबसे बड़ा सहारा बनता है।

सदा लड़ते रहने की प्रवृत्ति उचित नहीं। मनुष्यों के परस्पर सहयोग से ही संसार चलता है। किसी को अपना बना लेना भी एक बड़ी शक्ति है; इसलिए केवल अपने पक्ष पर अड़े रहने के बजाय सभी पक्षों को समझना और उनका ध्यान रखना आवश्यक है।

प्रकृति का व्यवहार भी हमारे लिए एक संकेत है। मेघ समुद्रों से जल ग्रहण करते हैं और उसे अपने भीतर सँजोते हैं, पर सदा अपने पास रोककर नहीं रखते। समय आने पर अपनी सर्वस्व सम्पदा धरती को सुपुर्द कर देते हैं। मनुष्य के भीतर भी ऐसा ही बाँटने का बल जागे—वह मेघ-सा दाता बने और अपने सामर्थ्य का उपयोग बृहत् हित में करे।

लोगों को कोसने के स्थान पर यदि हम प्रेमपूर्वक व्यवहार करें, परिस्थितियों में उलझकर न रह जाएँ और अपने को उबारने का प्रयत्न करें, तो जीवन अधिक सहज और सार्थक हो सकता है। यह वर्षा-बेला हमारे भीतर सौंदर्य-बोध जगाए, बाँटने का बल उत्पन्न करे और मन पर जमी धूल को धोने की प्रेरणा दे।

शायद मेह में सचमुच भीगने का अर्थ भी यही है—केवल तन का भीगना नहीं, बल्कि मन का निर्मल होना; धरती की तरह ग्रहणशील बनना और मेघ की तरह अपने हिस्से की संचित सम्पदा संसार में बाँट देना।

नैतिक पंक्ति:
मेघ की तरह ग्रहण करें, धरती की तरह सँजोएँ और जीवन की तरह सबमें बाँट दें।


पवन कुमार, 

28 अगस्त, 2026, शुक्रवार समय 10:00 बजे रात्रि  

(मेरी महेंद्रगढ़ (हरियाणा) दि० 18 जुलाई 2019, गुरुवार, प्रातः 8:08 बजे से)


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यदि यह रचना आपको रुचिकर लगी हो, तो मेरी अन्य प्रकाशित कृतियों को भी देख सकते हैं।
— पवन कुमार

Wednesday, 19 August 2026

प्रकृति के स्वर में आत्मबोध

प्रकृति-स्वर में आत्मबोध

एक तुषारमय शीत-प्रभात में पक्षियों के सहज कलरव से आरम्भ यह चिंतन प्रकृति, करुणा, कर्मठता और जिजीविषा से गुजरते हुए मनुष्य के व्यापक अस्तित्व-बोध तक पहुँचता है। सुनने और गुनने की यह यात्रा बाहरी प्रकृति और अंतर्मन के बीच उस सूक्ष्म संवाद को खोजती है, जहाँ श्वास, चेतना और विराट जीवन-स्पन्दन परस्पर जुड़े दिखाई देते हैं।

जनवरी का दूजा सप्ताह; प्रातः साढ़े सात, खेतों पर धवल तुषार-विस्तार,
बिजली गुम, कक्ष में अल्प प्रकाश; रजाई ओढ़े मुझे प्रकाश का इंतज़ार।

बाहर चिड़ियों-तोतों का शोरगुल है, जैसे सर्दी-कुहासे में सुखद संवाद,
विभिन्न ध्वनियों की एक प्रतिद्वंद्विता-सी, मानो प्रकृति का अपना नाद।
मानव तो घरों में सिकुड़े बैठे हैं ठंड में, पर खग-जगत अति चलायमान,
कोलाहल से मुक्त परिवेश मिले, तो क्यों न हो उनका मन गतिमान?

ये खग-वृन्द कितने उत्साहित, उछल-फुदककर प्रसन्नता दर्शित करते,
सुबह शीघ्र जाग, एक समन्वय में परस्पर जैसे आदान-प्रदान करते।
एक-दूजे से वे सुख-दुःख बाँटते, सबकी खुशी में अपनी खुशी पाते,
विस्तृत विश्व के वे भी अवयव हैं, अपने परिवेश में फिर क्यों न मचलें?

यह आह्लाद एक परमानुभूति है, यदि प्राप्त हो तो सचमुच ही अमूल्य,
इस हेतु अनेकों ने सामान्य जग छोड़, प्रकृति-शरण को माना मूल्य।
अनंत से जितना भी हो सके आत्मसात, तन-मन हो जाए सराबोर,
विश्व-कल्याण भले स्वयं से न हो सम्भव, सरसता से लरजे अंतःकोर।

परोक्ष में ध्वनित इनके सतत मधुर गान से मैं पूर्णतया मंत्रमुग्ध हूँ,
जैसे मैं इनमें से ही एक हूँ—तनिक कुछ सुस्त, बस अलग बैठा हूँ।
जानता हूँ, यदि उन्हें छेड़ा तो उड़ जाएँगे, सारा खेल बिगड़ जाएगा,
बाधा कोई न हो—यही योगाभ्यास; उनका सहज क्रम चलता जाएगा।

जितना भी सुनूँ, उतना ही गुनूँ—मैं सुनता रहूँ, और तुम गाते रहो,
भोर का यह मधुर प्राकृतिक संगीत, कोमल भाव बस जगाते रहो।
यदि देख सकूँ तो और भी उत्तम हो, पर अभी कलमबद्ध हुआ हूँ,
उठूँगा तो क्रम टूटेगा; फिर कितना जुड़ेगा—इसी सोच में रुका हूँ।

वाल्मीकि तो कवि बन गए थे, क्रौंच-युगल में से एक का वध देखकर,
करुणा उमड़ पड़ी थी भीतर, निरीह जीव का दुःख हृदय में भरकर।
निरीहों का कष्ट देखकर, क्या कोई स्नेही रह सकता है अविचलित?
पेशल भाव स्वतः उदीरित होते, करुण स्वर हो जाता हित-निमित्त।

यह मन-प्रमोद भी क्या है—किंचित इस प्रकृति से एकरूप हो जाना?
सम्पूर्ण विश्व-सौन्दर्य का उपासक बन, स्वयं को उसका अवयव पाना।
जीव-अजीव यहाँ सब विराट के रूप हैं, सौन्दर्य उसी का होता प्रकट,
जीवित चेतना और भी प्रिय है, प्रत्यक्ष संपर्क ही कराता है बोध निकट।

सीमित से अनंत की ओर जब बढ़ते, भीतर भी कोई द्वार खुलता है,
प्रकृति से जुड़ते-जुड़ते अपना भी पृथक अस्तित्व तनिक धुलता है।
मैं भी अपना अस्तित्व खोना चाहता, उस परम में होना परम-लीन,
जैसे अग्नि में रूप पिघलकर खो देता अपनी पृथक पहचान महीन।

इस पञ्चतत्त्व में ही हर पल चलता आदान-प्रदान का निरंतर क्रम,
बस जरूरत है इसे अनुभूत करने की; फिर कहाँ द्वैत, कैसा भ्रम।
हम भी इसी विस्तृत ब्रह्माण्ड के अंश हैं, उसी प्रकृति से गहरा नाता,
यहाँ हर श्वास, हर स्पन्दन चुपके से साझे अस्तित्व का बोध कराता।

अनेक लोग बैठे सर्दी में रजाइयों में, किंतु कुछ प्रातः निकल जाते सैर,
कई भाँति के व्यायाम करते, मौन मनन में खोजते अंतर्मन की खैर।
जब हम स्वयं निःशब्द हो जाएँ, प्राकृतिक संगीत बने सहज सौगात,
स्वयं को भूलकर बृहद्-अंश बन जाना—शायद यही मुक्ति की बात।

कर्मठ सदा चलायमान रहते हैं, माना वातावरण से प्रभावित भी होते,
बाहर अधिक न दिखें तो इसका अर्थ नहीं कि वे निष्क्रिय होकर सोते।
अनेकों मनस्वी मनन में लीन रहते हैं, अन्य उन्हें चाहे जिस भाँति लें,
जीव में जब तक प्राण-स्पन्दन, कर्मठता अपना सहज क्रम चलने दे।

पंछी-सम हम कभी बाहर निकलें, फुदकें-उड़ें और निज नाद करें,
प्रसन्नता के उच्चतम शिखर चूमने हेतु सतत प्रयत्न और संवाद करें।
अपने उद्गारों को बाहर करना सीखें—मधुर होंगे तो दुनिया सुनेगी,
यदि कर्कश भी हों, तो मिली प्रतिक्रिया शायद कुछ नई समझ देगी।

आओ, इस जिजीविषा को सुदृढ़ बनाएँ; न सोचें सदा हम ही गलत हैं,
जब सब किसी न किसी भाँति सीख रहे हैं, तो हम क्यों पीछे खड़े हैं?
देखें-समझें, फिर अपनी भाँति नृत्य करें—सबने अपनी राह बनाई,
दीन न समझें स्वयं को कभी; परम ने हमें भी बड़े यत्न से है बनाया।

इस धवल तुषार की मनोरम छटा का आनंद लें, मनीषी वृक्ष-सम निहारें,
ज्ञान-चक्षुओं को सदा खुला रखें, आमोद-प्रमोद को भी जीवन में उतारें।
सैर, व्यायाम, योग और मनन—इस तन-मन के हैं अपने-अपने आधार,
उपलब्ध क्षणों के सदुपयोग से ही धीरे-धीरे गढ़ता जाता जीवन-व्यवहार।

जब कभी अकेला सैर को निकलता हूँ, तो मन विचारों से भरता जाता,
कुछ विगत वर्षों से प्रातःकालीन लेखन भी अपनी ओर मुझे है बुलाता।
यहाँ एक साधना को समय मिले, तो दूजा अवसर कुछ पीछे रह जाता,
यह जीवन भी अद्भुत—एक को पाने में कभी कुछ अन्य छूटता जाता।

यही तो उपलब्ध क्षणों का प्रयोग है, जिससे जीवन अपना ढर्रा लेता,
कभी सैर, कभी लेखन, कभी योग—हर अभ्यास कुछ विरला देता।
तन की सक्रियता जितनी आवश्यक, उतना ही मन का भी विस्तार,
दोनों के संतुलित अनुशासन से ही जीवन पाता एक स्वस्थ आधार।

श्वसन-तंत्र का स्वास्थ्य परम आवश्यक, जीवन को सुदृढ़ बनाने हेतु,
स्वच्छ वायु उसकी बड़ी पूरक है; वृक्ष-प्रचुरता बनती संरक्षण-सेतु।
अतः हम जितने वृक्ष लगा सकें लगाएँ, परिवेश स्वच्छ-निर्मल बनाएँ,
प्राणी-मात्र के इस स्पन्दन-तत्त्व की रक्षा में यत्नशील-तल्लीन हो जाएँ।

चाहे ईश-ध्यान हो या श्वास पर ध्यान, एकाग्रता की युक्ति सीखते रहें,
भीतर चलते प्राण-स्पन्दन को भी कुछ क्षण निःशब्द होकर देखते रहें।
यह जीवन आगे बढ़ता ही जाएगा; हम बस उसके प्रवाह में चलते जाएँ,
प्रकृति, प्राण और परम के सम्बन्ध को निज अनुभव में उतरता पाएँ।

बाहर खग-वृन्द का मधुर नाद है, भीतर श्वासों का अविरल गान,
धवल तुषार से उगता प्रकाश है, जगाता भीतर भी नया विहान।
जितना भी सुनें, उतना गुनें—प्रकृति से अपना शुद्ध संवाद बना रहे,
उसके विराट स्पन्दन में अपना लघु-सा अस्तित्व भी सदा आबाद रहे।

मर्म:

प्रकृति को केवल देखें नहीं—उसे सुनें, गुनें और उसके विराट स्पन्दन में अपने अस्तित्व को पहचानें।


— पवन कुमार
18 अगस्त 2026, मंगलवार | रात्रि 11:24 बजे
(मेरी महेंद्रगढ़ (हरियाणा) डायरी, 8 जनवरी 2016, शुक्रवार | प्रातः 7:31 बजे से)


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— पवन कुमार

Sunday, 19 January 2025

काव्य और कवि-दृष्टि


काव्य और कवि-दृष्टि


कैसे कवि दर्शित करता, अन्य को पूर्ण भाव से आलोकित,
हम संतुष्ट लघु अनुभव में, वह विशाल उर से अवलोकित।

कैसे रचती जाती कविता, निर्मल, मृदु और मधुरतर भाव,
जहाँ चेष्ठा, विचार व कृति का समन्वय, होता प्रखर प्रभाव।
कैसे सामान्य घटना बनती, अति रोचक और अप्रत्याशित,
एक मधुर सौंदर्य भाव संग अध्येता-श्रोता, हो जाते विस्मृत।

किस सम्मोहनी मूर्च्छा में, कवि करता है शब्द-आच्छादित,
जैसे हो अपरा विद्या का भर्ता, नव निर्माण कर रहा निरंतर।
हर शब्द मणि-सा दमक रहा है, लेखनी की शेफालिका में,
एक दैवी प्रेरणा से ही संभव, वरन सीमाएँ मनुज प्रचंड रचें।

कैसे गुरु-वाक्य कलम से ही निकले, और बन जाते मंत्र सम,
पाठक, श्रोता, प्रजा सभी मान लेते इनको, जीवन के तंत्र सम।
 सब मन-मलिनता धुल जाती, जैसे मंदाकिनी के पवित्र जल में,
कुछ हिचकोले भी यदि लगते, तो सह जाते प्रबल मन-तन में।

कैसे रहस्य प्रस्फुटित हो जाते, जो छिपे थे अज्ञान के पर्दों में,
अब ज्ञान तंत्र सबल होकर ही, अंतर्चक्षु खोल देता है क्षणों में।
जब सामान्य एक विलक्षण हो जाता, सकल दर्शित ही विचित्र,
घटनाएँ यकायक प्रस्तुत होती, व चमत्कार बनते जाते दृश्य।

कैसे खुलती ही दृष्टि मनोरम, प्रकृति के अद्भुत प्रयोगों पर,
आत्म-सत्य और मनोचिंतन से, नवसृजन की जागती है लहर।
विशाल जगत का संजोया सार है, करता अनुभव को सार्थक,
प्रेरणा देती है कृतियाँ रचने को, नवीन ऊर्जा से है प्रचालित।

कैसे अलंकृत हो जाते हैं शब्द, वे मानवेतर गुणों से भरपूर,
शब्द वीर-गाथाओं संग मिलकर, बन जाते हैं प्रेरक एवं पूर्ण।
यहाँ बाणभट्ट सा एक अनुभव, मणियों से चरित्र पिरोते जहाँ,
हम विस्मित खड़े देखते हैं, वहाँ हो जाती कृतियों की रचना। 


पवन कुमार,

ब्रह्मपुर (ओडीशा), 19 जनवरी 2024 रविवार, समय 11:26 प्रातः 

(मेरी उदयपुर (राज०) डायरी, 25 जनवरी 2016, सोमवार, प्रातः 7:45 बजे से)


Friday, 10 January 2025

मरुधरा के अनुभव: जीवन-सौंदर्य

मरुधरा के अनुभव: जीवन-सौंदर्य


उच्च प्रज्ञान से प्रकृति-रमणीयता का बोध, यदि मन करे गहन चिंतन।
कालिदास एवं बाणभट्ट सम निरूपण हेतु, सरस्वती माता को है वंदन।
 
वे तो उच्चतम श्रेणी के कवि थे, पवित्र दृष्टि से निरंतर निहार सके विश्व,
तज कर मन-कलुष, पवित्र भावों से ही भरते हैं हर चरित्र का अंतर्मन।
शारदा मातृ की कृपा से उनका सौंदर्य लेख-वाणी से होता प्रस्फुटित,
आश्चर्य, नर से अत्युत्तम निर्माण संभव जो साधारणतया विलय प्रतीत।
 
प्रकृति-सौंदर्य, सूर्य-चंद्र, व्योम, नदी, मेघ, पृथ्वी-मरुत एवं द्रुम-पादप,
शुक-सारिका, चक्रवाक, सारस, कालहंस, वकुल और क्रोञ्च-कोकिल।
उनके काव्य में बहु वन्य जीवन, अद्भुत पुष्प-वृक्षों का सजीव चित्रण,
प्रत्येक युग्म से जीवन झलकता, पहुँचता सौंदर्य की चरम सीमा तक।
 
गज-सिंह, वराह-गो, मृग-अश्व, वृषभ-कपि, मीन व अनेक जलथल चर,
उनके कर-लेखनी से शोभित होकर, पाठक-गण को कर देते हैं मुग्ध।
मन में पवित्रतम भाव संजोते, उनकी उपमाओं में महेश जाते हैं उतर,
कुमार-संभव में निर्मल उमा-चरित्र का विवरण, परं-भाव से हृदयांगम
उनकी उपमाएँ, मनोभाव व शिल्प, मानवता को देते हैं परम उद्देश्य। 
 
यह दर्शन केवल सृजन नहीं, अपितु जीवन-दर्शन का एक गहन भाव,
जहाँ आत्मा प्रकृति संग एकाकार होती, एवं सृजन का दिखता आधार।
 
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की 'बाणभट्ट की आत्मकथा' का अध्ययन,
अति मृदुल चरित्र-चित्रण, सजीव मानव भावनाओं का उच्चतम प्रयोग।
वर्तमान मनुज तो अल्प-सोच में उलझा, सार्वभौमिक भावों से अनभिज्ञ,
यदि निज दृष्टि को उच्च पटल पर रखे, तो सौम्यता- विस्तार भी संभव।
 
उज्ज्वल चरित्रों का तपस्या करना भी, सामान्य- जन हितार्थ ही आदर्श,
कैसे स्वयं को वे निर्मल रख सकें, ऋषि- सम जीवन से मिलता आनंद।
यदि चरित्रों में कहीं कटुता-कलुषता है, तो भी उद्देश्य तो है ऊर्ध्वगामी,
हर पात्र के मस्तिष्क की उच्च सोच, सौंदर्य-बोध व दिशा है प्रेरणामयी।
 
तुच्छ-बिंदुओं से समय-ऊर्जा रक्षा, अवलोकन बस अन्य का पवित्र मानस,
अमुक का उद्देश्य सुधारवादी हो, विवेचना-समीक्षा का हो वही मूल एक।
मनन नर-दुर्बलताओं में नहीं अटके, प्रयोगे निहित कुंडलिनी शक्ति सुप्त,
उसे विकसित करना वृहद-कल्याणार्थ, अमापनीय है प्रत्येक जीव-मूल्य।
 
मरीचिमाली-रश्मि का पीत सौंदर्य, हरित वृक्ष पर पड़कर अति प्रकाशित,
भिन्न पल्ल्वों पर प्रभावों से अन्यान्य विकिरण, उर हो जाता बहु पुलकित।
नीले गगन में श्वेतिमा-मिलन से उदित व्यापकता, मन-वृद्धि करे अद्भुत,
वे प्रकृति-मातृ के आगोश में, अतः स्वतंत्र होकर ही रच सकते समेकित।
 
जैसलमेर की मरुधरा में मेरा है यह प्रथम आगमन और परिचय समक्ष,
अबतक मात्र दूरदर्शन, इंटरनेट, पुस्तक, समाचारों से ही था ज्ञान अल्प।
दैव कब वास्तविक मिलन ही करेगा, प्रायः तो नहीं होता है यह चिन्हित,
यदि संपर्क तो आदान-प्रदान होता प्रारंभ, अनुभव स्व-भाग में परिणत।
 
कल सायं रेत टिब्बों का दर्शन हुआ, सुवर्ण भास्कर-मरीची से प्रभासित,
वामन कद की ही अल्प-वनस्पति, वर्षाजल का अभाव है मुख्य कारण।
यह मात्र एक भूमि नहीं है, अपितु दर्शित संघर्ष-सुंदरता का प्रकृति-मेल,
यहाँ हर कण में जीवन की सच्चाई है, जो बन जाती है बड़ा प्रतीक एक।
 
ऊँट के कुब्ज-भाग में सवारी-अनुभव, संकोच-भीत त्याग किया स्वीकार,
हिचकोलों में छिपा नया साहसिक अनुभव, अबल-पक्षों को करता प्रबल।
 
जैसलमेर से धनाना तक का सड़क मार्ग, ले जाता पाकिस्तान-सीमा तक,
सीमा तो कुछ 135 कि० मी०, किंतु हम गए लगभग 50 कि०मी० ही तक।
अधीशासी एम.पी. सिंह और सहायक अभियंता बचन व कालूराम थे संग,
एक अन्य सज्जन दीपक राठी थे, सायं का रोचक अनुभव था स्मृतिबद्ध।
 
'डेसर्ट स्प्रिंग'-एक साहसी मरुधरा-योजना, पर्यटन-कैंप व मनोरंजन प्रबंध,
कुछ व्यय कर लोग सुविधाओं का लुत्फ उठाते, यहाँ सुख है महत्त्वपूर्ण।
मन तो सदैव चरम नव अनुभव का चाही है, उसी हेतु करता सतत प्रयत्न,
एक स्थिति में तो असहज हो जाता, सर्व भ्रमण-प्रयास अनुपम हेतु ही कृत।
 
एक नारी-रूप में पुरुष नृत्यांगना, परिचय क्वीन हरीश की नृत्य-अदाओं से,
सहज चरित्रों को निपुणता में ढाल, कला समाज को नया दृष्टिकोण देती है।
अपने नृत्यों में सबको सम्मिलित करना, एक शिक्षक सी लगती है भूमिका,
केरल के मोहिनीयट्टम चरित्र सा मनोहारी रूप, सबके मन में स्मित भरता।
 
कलाकारों की नृत्य-गायन प्रस्तुति संग था, रात्रिभोज का एक रोचक अनुभव,
पर सकल लक्ष्य तो एक लयबद्ध हो, निकले कुछ कालि-बाण सा अद्भुत।
प्रकृति और संस्कृति का यह मधुर मिलन, मात्र नहीं है एक बाहरी अनुभव,
मन को पूरा झकझोर देता है यह, पर जीवन को नई दिशा देने का अवसर।
 
यह मरुधरा, जो बाहर से मात्र स्थिर प्रतीत होती, समय-प्रवाह है दिखाती,
प्रकृति, कला और आत्मचिंतन का संगम है, जो प्रेरणा का स्रोत बन जाती।
यह राजस्थानी-मरुधरा, मात्र रेत-भूमि नहीं, बल्कि है शुभ जीवन-प्रतीक,
हर मन में एक नई उमंग और ऊर्जा का जगेगा इससे अति मधुर संदेश।
 
 
पवन कुमार, 
ब्रह्मपुर (ओडिशा), 10 जनवरी 2025, शुक्रवार, समय 11:40 बजे रात्रि 
(लेखन, केलोनिवि अथिति गृह, जैसलमेर (राज.), दि० 22 जनवरी 2016, शुक्रवार, 7:20 बजे प्रातः से)
 

Thursday, 14 November 2024

पूर्व दिशा चिंतन


पूर्व दिशा चिंतन  

 

पूर्व दिशा में दृष्टि करना, योग का है एक मुख्य नियम,

यदि पूर्ण उचित नहीं भी लगे, तो भी प्रयास हो अनुपम।

 

सूर्य प्रातः उदित होता, पूर्व से भू को देता ऊर्जा अपार,

शुभ दिशा मानी जाती, भास्कर से सीधा संबंध साकार।

मस्तिष्क का संयोग उचित ही, ध्यान का होता है संगम,

महद चिंतन हो जाता, शरीर की क्रियाएँ होतीं संगठित।

 

वास्तु-शास्त्र है दिशा-आधारित, शुभ-अशुभ करे इंगित,

मंदिर-मुख पूर्व को, आजकल किए जाते भवन-द्वार भी।

सारे योगासन पूर्व दिशा ओर ही मुख करके किए जाते,

कारण तो अधिक न मालूम, बस शुभ-अशुभ से जुड़ते।

 

भारतवर्ष उत्तरी-पूर्वी गोलार्ध में, सूर्य यहीं उगता पहले,

यूरोप-अमेरिका को पश्चिम कहते हैं, वे पश्चिम में बसते।

हम पूर्वी, हमारी संस्कृति उनसे विलग ही बताई जाती,

दक्षिण-पूर्व का क्षेत्र कमोबेश सम विचारधारा अपनाता।

 

मस्जिद-प्रवेश पश्चिम में निर्मित, मक्का-मदीना हैं उधर,

मुस्लिम  हिन्दू संस्कृतियों में बताई जाती है भिन्नता कुछ।

शैली अनगिनत बना लेते, मनुज इन्हें जीवन में अपनाता,

जो अन्य किंचित भिन्न होते, उनमें सहज विरोध हो जाता।

 

भोजन समय पूर्व को मुख करते, पूर्व-दक्षिण को सोते सिर 

दक्षिण ओर पैर न करते, दिशाओं का भी कहा जाता चरित्र।

पर कहते हैं गुरु नानक के पैर, पूर्व व पश्चिम में रख दिए थे,

किंतु वह योगी थे, जिधर देखें, मक्का की मस्जिद ही दिखे।

 

पूर्व दिशा की ओर मुख करके, मनन-चिंतन लगाया जाता,

लेखनी से कुछ बेहतर ही निकालेगा, ऐसा माना है जाता।

पृथ्वी की उत्तर-दक्षिण ध्रुवीय चुंबकीय किरणें हैं निर्धारक,

उत्तर सिर करने से सिर भारी किरणें सीधी होती हैं प्रवेश। 

                                                                 

दक्षिण में ऐसा दुष्प्रभाव न, नियम भी बनें आधार पर इसी,

दक्षिण दिशा में सिर करके सोना, प्राणी को देता है शांति।

इसलिए ध्यान-योग विषयों में, दिशाओं का विशेष स्थान,

प्राचीन नियमों में यह छिपा है, समझो इसको महा ज्ञान।

 

                                      

पवन कुमार,

14 नवंबर, २०२४, गुरुवार समय 7. 37 बजे

(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दिनांक 1 अप्रैल, 2015, बुधवार, समय 8.30 बजे प्रातः से)



Monday, 15 July 2024

वृक्ष-वरदान

वृक्ष-वरदान

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निहारो तरु, नित जीवंतता-अहसास वृद्धि करता, प्रफुल्लित रहता 

अल्प लेकर भी बहुत उत्पाद करता, जन्म से लेकर उपयोगी सदा। 

 

विटप अंतः में जीवन रखता, समय-परिस्थिति मिलने पर प्रफुल्लित 

मृदा-खनिज पोषण, जल भूमि से, आकाश-वायु दुलारती है आकर। 

भू-माता की छाती-खूंटे से ही बँधा रहता, न इतराता बड़ा भी होकर 

मूल अति प्रगाढ़, दुम-जीवन है निर्भर, अतः स्तुत्य ही भरण-पोषण।  

 

प्राय: तो आनंदमय ही वह रहता, इस जगत के सदा आता है काम 

भोजन-औषधि, स्वच्छ-वायु, छाया, भवन-लकड़ी या भी ज्लावनार्थ। 

पल्लव-पुष्प, फल, छाल, विविध वर्ण, सुंदरता बहु रूपों में है दर्शित 

निर्मल, स्वच्छ, अनिल के स्नेह-झोंकें, करते हैं प्रत्येक को अतिमुग्ध।  

 

अनेक जीवन उनपर पनपते, गिरगिट-सर्प व अन्य  खग-गिलहरी

खग नीड़ बना लेते बड़ी सहजता से, आसपास से लेकर सामग्री। 

समस्त जीवन उनके निकट है, उनसे ही हो जाता भोजन उपलब्ध 

वहीं खेलते, लड़ते, दुलारते, जन्मते और अंत में प्राण भी देते निज। 

 

अपने आप में एक पूर्ण जीवन-शास्त्र, अनेक जीवनों को सहारा देते 

निज आहार बनाने में पूर्ण-स्वावलंबी हैं, परजीवियों हेतु तो अमृत।  

भूमि-क्षरण रोके, जल-संरक्षण करते हैं, वसुंधरा को गतिमान रखते 

जीवन-शास्त्र के तो अभिन्न अंग हैं, जीवन तो असंभव बिना इनके। 

 

स्वावलम्बी, नित्य प्रेरक हैं, प्रत्येक स्थिति में अपने को सहेज रखते

असंख्य कीट-पतंगे इनकी शरण में, कटकर भी उपयोगी बने रहते।

अनंत रूप लेते हैं रचनाओं में, साजो-सामान व खिड़कियाँ-दरवाजें 

कहीं धरन-बीम, स्तम्भ, छतें भी, तो पूर्ण भवन भी बनते लकड़ी से। 

 

असंख्य रूप-विकसित, समुद्र-नदियों के जल से विस्तारित भूमि पर 

सुंदर-सजीव कलाकृतियाँ बनती मनोहर, पादप-विज्ञान बहु समृद्ध। 

सूक्ष्म से ले बड़े रूपों में विकसित है, सुकृति हरित-वर्ण नेत्रों हेतु शुभ 

हमारा श्वसन-तंत्र स्वस्थ इनके सान्निध्य में हैं, प्रदूषण को करते अल्प। 

 

ये साक्षात नीलकंठ- शिव स्वरूप, दूषित वायु-गरल पीकर अमृत देते

बहु प्रकृति-मार बड़ी सहजता से सह लेते हैं, कदापि नहीं क्रोध करते।

काटनहारे को भी छाया, फल-फूल देते हैं, सर्वहित पुनीत जीवन लक्ष्य 

इनका हर अवयव उपयोगी है, जीवन-सहयोगी, सबको सदा उपलब्ध। 

 

प्रकाश-संश्लेषण से कार्बन डाई-आक्साइड को ऑक्सीजन में बदलते

जल -लवण वसुधा से लेते हैं, भोजन-फल, पल्लव-पुष्प, शाखा बनाते। 

प्रतिवर्ष एक परत ऊपर चढ़ा लेते हैं, गिनें तो ज्ञात हो सकती अवस्था 

आजकल कार्बन डेटिंग विधि ईजाद है, वृक्ष-आयु का पता लग सकता।

 

गल-जल-सड़ खाद, गैस-तेल बनाते हैं, जीवन-चक्र में सहायतारत नित

शुष्क-बंजर भू को सुंदर हरित बनाते, इनकी बहुलता समृद्धि प्रतीक। 

किञ्चित अल्प लेकर ही अति महद देते, यह एक बड़ा है उत्पाद-केन्द्र

मानव बहुत कुछ इनसे सीख सकता है, बस खोलो चक्षु व बनो शिष्य।

 

समग्रता अपने ढंग से निर्मित की है, विभिन्न परिस्थितियों में भी सहज 

दूजों की प्रसन्नता में तो हमेशा मुदित हैं, हर दुःख में वे रहते बड़ा संग।

शक्तिशाली इसकी शाखाऐं हैं, एक दण्ड कर में हो तो बनता सहायक

बहु कलाकृतियाँ, कंदुक-खिलौने, गृह-उपयोग सामग्री हैं प्रतिपादित। 

 

प्रत्येक वृक्ष यहाँ धरा पर वरदान है, जीवनार्थ इनका संरक्षण आवश्यक

पादप-गण सदा सुरुचिर परिवेश देते हैं, हमारा कर्त्तव्य इनका बचाव। 

दूरस्थ मेघों को आकर्षित करते हैं, पावस-जल से कराते वसुधा-सिंचित

सदा शीतलता है इनकी छाँव में, विश्रांत पाते अनेक थके-मांद पथिक। 

 

तुम सूक्ष्मता से निहारो कैसे जीवन है महकता, शिक्षा लो उपयुक्तता की

बहु कष्टों में भी ये कैसे अविचलित रह सकते हैं, सदा बनते समवृत्ति ही।

चराचरों के संग भी मुस्कुराते-हर्षाते, कर्त्तव्य एक बृहद पावन-उद्देश्यार्थ

जीवन-अमूल्य है समझो-सीखो ध्यान से, जब नहीं रहता कितना अलाभ।

 

इन वृक्ष-मुनियों सम जीवन में धीर-गंभीर रहकर, उचित हित में हो मनन 

तुम भी जीवन इन वृक्षों सा बना लो, उपयोगी बन करो विश्व में सुनिर्वहन।

 


पवन कुमार, 

१५ जुलाई, २०२४ सोमवार, समय १०:५५ बजे रात्रि  

(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दि० ७ अगस्त, २०१५, शुक्रवार, समय ८:५० बजे सुबह से)