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Wednesday, 24 June 2026

कर्तव्य की साधना

कर्तव्य की साधना 


यह गद्यांश जीवन-निर्वाह, दायित्व, प्रशासनिक जटिलताओं और मानवीय संवेदनशीलता के बीच उत्पन्न तनाव का गंभीर चित्र प्रस्तुत करता है। इसमें लेखक यह दिखाता है कि जीवन अनेक प्रकार की बाध्यताओं, निर्भरताओं और अवरोधों से भरा है, फिर भी मनुष्य—विशेषतः एक उत्तरदायी अधिकारी—को सकारात्मक रहते हुए, निरीक्षण, प्रेरणा, अनुशासन और धैर्य के सहारे कार्यों को आगे बढ़ाना होता है। यह केवल व्यक्तिगत व्यथा नहीं, बल्कि कर्तव्य-बोध, नेतृत्व और व्यावहारिक जीवन-दर्शन का लेख है।

जीवन-निर्वाह के क्रम में चलते-चलते कभी-कभी किंचित मायूसी भी छा जाती है। मन किसी एक विषय से जुड़ना चाहता है, किंतु अनेक बातें मनुष्य को जकड़े रखती हैं और आगे बढ़ने से रोकती हैं। लगता है जैसे जीवन कुछ ठहर-सा गया हो, विशेषतः तब, जब संबंधित लोग अपनी जिम्मेदारियों के प्रति उदासीन दिखाई देते हैं, पूछने पर भी कोई स्पष्ट उत्तर नहीं देते, अपने अपेक्षित संसाधन नहीं सजाते, सब वायदे खटाई में डाल देते हैं, अपने और अन्यों की प्रतिष्ठा की परवाह नहीं करते। अपने से संबंधित कार्यों के दोषों को भी नहीं देखते, केवल वित्तीय प्रबंधन और लाभ-हानि की योजनाओं में ही व्यस्त रहते हैं, आदेश के पालन में भी विश्वास नहीं रखते, और अनेक प्रकार की चेष्टाएँ पालते हुए भी काम में वैसी रुचि नहीं दिखाते।

यह जीवन भी अजीब खिंचाव में रखता है; आप जितने चाहे संवेदनशील हो लें, कहीं-न-कहीं यह आपको पकड़ने के लिए हाथ बढ़ा ही देता है। किसी भी क्षण आपकी अस्मिता को ललकार देता है, जब चाहे आपको धकेल देता है, और कर्त्तव्य-निर्वाह में ढील बरतने का दोषी भी ठहरा देता है। आप कहें, समझाएँ, अपनी बात रखें, फिर भी यह अपनी बाध्यता प्रकट कर ही देता है। इसलिए जीवन एक चक्रव्यूह-सा प्रतीत होता है, जो सामने और परोक्ष, दोनों प्रकार की गुत्थियों को सुलझाने के लिए पूरी ताकत चाहता है।

किंतु पंछी को उड़ने के लिए पंख फड़फड़ाने ही पड़ते हैं, मछली को तैरना ही होता है, हिरण को जान बचाने के लिए दौड़ना ही पड़ता है। ड्राइवर को संकरे और भयानक रास्तों से भी गुजरना पड़ता है, लोगों को भीषण सर्दी-गर्मी में भी काम-धंधे पर निकलना ही होता है। माँ को बच्चे को छोड़कर, चाहे उसी के लिए ही, बाहर जाना पड़ता है, और एक पिता को संतान-निर्वाह के लिए दिन-रात खटना ही होता है।

एक अधिकारी के रूप में संवेदनशील होना उत्तम गुण है, क्योंकि इसी से आप अन्य लोगों को झकझोर सकते हैं, उन्हें चलायमान कर सकते हैं, कुछ शुभ करना सिखा सकते हैं, लापरवाही से हटा सकते हैं। आजीविका के उपाय बता सकते हैं, समय पर परियोजनाएँ पूरी करवा सकते हैं, अन्यों की शुभाकांक्षा प्राप्त कर सकते हैं, और उन्हें व्यर्थ के गर्व-भाव से दूर रख सकते हैं।

सरकारें हमें पद व वेतन सुविधा के लिए नहीं, बल्कि कर्तव्य-समर्पण और संभावित समस्याओं के समाधान के लिए देती हैं। यदि समय पर उत्तम निरीक्षण हो जाए, तो आगे की दिक्कतें कम हो सकती हैं; अन्यथा बाद में पछतावा ही शेष रहता है।

मैं मानता हूँ कि परियोजना-कार्यों के निष्पादन हेतु अनेक आगम जुटाने पड़ते हैं। वित्त एकत्र करना पड़ता है, बाहर वाले नकद माँगते हैं, सामान समय पर नहीं भेजते, और कोई सहज विश्वास नहीं करता। संभव है, उन्हें भी आगे से कुछ जुगाड़ करना पड़ जाए। इस जगत में परस्पर निर्भरता इतनी अधिक है कि कोई भी काम समय से और ठीक प्रकार से हो नहीं पाता।

जीवन हमें सिखाना चाहता है, पर हम अनेक बार जड़त्व में पड़े रहते हैं; तब कोई बाहरी बल हमें धक्का देता है। जैसे न्यूटन के द्वितीय नियम में होता है, वैसे ही जीवन भी हमें चलाता है; अपना कोई स्थायित्व नहीं है, अतः जैसे धकेल दिया जाता है, वैसे ही चल पड़ते हैं।

तथापि, अपने को सकारात्मक रखना है; एक वरिष्ठ होने के नाते सबमें विश्वास भरना है, कृपा से अपना मस्तक भी ऊँचा रखना है। काम आगे बढ़ाने हैं, रुके हुओं को आगे करना है, अपने को काम का बनाना है, नुकसान कम करना है, और यथासंभव शांति बनाए रखते हुए आयाम संपन्न करा लेने हैं।

अतः, कृपया अपने विषयों को संभालते हुए कुछ करके दिखाइए; बीच की अवस्थाएँ आती ही हैं, पर आशा है कि प्रेम, धैर्य और संतुलन से आप इन सबसे निकल जाएँगे।

मर्म-पंक्ति : जीवन की जटिलताओं के बीच भी जो व्यक्ति धैर्य, संवेदनशीलता और कर्तव्य-बोध बनाए रखता है, वही अंततः अपने काम को सार्थकता और अपने जीवन को गरिमा दे पाता है।


पवन कुमार,

24 जून, 2026, बुधवार, समय 11:29 रात्रि  
(
मेरी ब्रह्मपुर डायरी दि०  24 सितंबर, 2024, मंगलवार, समय  10.10 प्रातः से)


2 comments:

  1. बहुत सुंदर संदर्भ...मानवता की सुवास नैसर्गिक कार्य बोध हैं...।

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  2. Shashi: बहुत अच्छा लेख है। जीवन की सच्चाइयों और जिम्मेदारियों को सरल शब्दों में समझाया गया है। पढ़कर अच्छा लगा

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