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Friday, 28 August 2026

मेह में भीगता मन

मेह में भीगता मन

वर्षा के बाहरी सौंदर्य से आरम्भ हुआ यह चिंतन जल के जीवनदायी और विकराल रूपों से गुजरते हुए मानवीय संबंधों, श्रद्धा, आंतरिक शुद्धि और लोकहित की भावना तक पहुँचता है। मेघ यहाँ केवल प्रकृति का अंग नहीं, बल्कि ग्रहण करने, सँजोने और अंततः सबमें बाँट देने का जीवंत प्रतीक है।

बाहर मेह बरस रहा है। हवा के साथ आती बौछारें कमरे के भीतर तक पहुँच रही हैं। बूँदों का शीतल स्पर्श तन को छू रहा है और रिमझिम-पिटपिट की ध्वनि से सारा वातावरण गूँज उठा है। लगता है, मानो आसमान से अमृत बरस रहा हो और ग्रीष्म से तप्त भूमि को एक गहरा सुकून मिल रहा हो।

आकाश में मेघों का जमावड़ा है। वे एक-दूसरे से टकराते, गरजते, खेलते और अपना भार धरती पर छोड़ते जा रहे हैं। सूर्य बादलों के पीछे छिपा हुआ है और चारों ओर फैली घटाओं ने प्रकृति के एक सौम्य, शीतल आयाम को प्रकट कर दिया है।

बारिश मूसलाधार है। छत की टाइलों पर गिरती बूँदें एक अजब-सा शोर मचा रही हैं। कभी उनकी गति मंद पड़ती है और फिर अचानक तीव्र हो जाती है। हवा के झोंकों के साथ बौछारें भीतर तक चली आती हैं और तन को छूकर एक शीतल सिहरन जगा जाती हैं।

बाहर पेड़ मानो मुस्कुरा रहे हैं। उनकी भीगी शाखाएँ हवा के साथ झूम रही हैं और धुले हुए पत्तों का हरापन पहले से अधिक निखर आया है। तनों से फिसलती बूँदें मूलों की ओर उतर रही हैं। खेत, पेड़-पौधे और तपती धरती—सभी इस मेघ-मधु को अपने भीतर समेटते हुए जैसे नए जीवन से भर उठे हैं। समूची प्रकृति पर एक मुस्कानमयी मस्ती-सी छाई है।

वर्षा अपनी उपस्थिति का पूरा अहसास कराती हुई मानो कह रही है—“मैं आ गई हूँ। अब धरती प्यासी नहीं रहेगी, कोई भूखा नहीं रहेगा। मैं प्रकृति की नियामत हूँ, सबकी मित्र। अब फलने-फूलने का अवसर है; मेरा असर दिखाई देना शुरू हो गया है।”

पानी लगातार बरस रहा है—अभी घर में ही रहना होगा। बाहर तब निकलेंगे, जब बरसात कुछ थम जाएगी। लगता है, छतरी के प्रयोग का समय आ गया है। मनुज, पशु और पक्षी भी अपने-अपने मकानों, खोरों और नीड़ों में कहीं दुबके बैठे हैं। सभी भीगने से बचना चाहते हैं; पर जहाँ बाहर निकलना अपरिहार्य है, वहाँ लोग बरसात में भी चलते और अपना काम करते जा रहे हैं। वर्षा अपना क्रम नहीं रोकती और जीवन भी अपनी आवश्यकताओं तथा दायित्वों के साथ चलता रहता है।

प्रथम तल के कमरे में कुर्सी पर बैठा, आँखों पर ऐनक लगाए, दरवाजे से बाहर फैले खेतों और पेड़ों को देख रहा हूँ। जो कुछ आँखों के सामने है और भीतर अनुभव हो रहा है, वही धीरे-धीरे शब्दों में उतर रहा है। बौछारें भीतर आकर तन को सिक्त कर जाती हैं और मन में भी एक फुहार-सी फूटने लगती है। मन करता है कि इस वर्षा में सराबोर होकर कुछ मेह-सा हो जाऊँ; यह मेह इसी भाँति अविरल गतिमान बना रहे—बूँद-बूँद बरसता रहे और मन की धरती को भिगोता रहे। हाथ में पकड़ी कलम भी इस रिमझिम से लय और प्रेरणा पाए तथा मेह में भीगते मन के सुंदर भावों को शब्दों में उतारती चली जाए।

इस मेघ-मधु की शीतल फुहारों से किसका मन पुलकित न होगा? मनुष्य इस वृहद् सृष्टि का एक क्षुद्र अंश है; प्रकृति भीगती है तो उसका मन भी अनायास भीगने लगता है।

धरती की इस तृप्ति को देखते हुए जल का व्यापक महत्त्व सहज ही सामने आने लगता है। जीवन का समूचा चक्र इसी के आसपास चलता है। समस्त धान्य, खाद्य और वनस्पतियाँ इसी से जन्म लेते हैं; उनसे जुड़े अनेक व्यापार तथा आजीविकाएँ भी अंततः इसी पर निर्भर हैं। जल केवल प्यास नहीं बुझाता—वह खेतों में अन्न, वृक्षों में हरियाली और असंख्य जीवों में जीवन बनकर प्रवाहित होता है।

ये मेघ समुद्रों का जल कितनी बड़ी दूरी से ढोकर लाए हैं! उनका कर्तव्य कितना विराट है—धरती को तृप्त करना और एक-एक जीव तक भोजन तथा जल पहुँचाना। मानो समस्त पृथ्वी उनकी जिम्मेवारी के क्षेत्र में हो। वे समुद्रों से ग्रहण करते हैं, आकाश में उसे सँजोते हैं और समय आने पर बूँद-बूँद धरती को लौटा देते हैं।

किंतु जीवन देने वाले इसी जल का एक विकराल रूप भी है। मानसून के साथ सारी सरिताओं में उफान-सा आ गया है। सारे भारतवर्ष में बारिश हो रही है। निचले स्थानों में पानी भर रहा है और बिहार-असम-नेपाल में बाढ़ की स्थिति बन गई है। पिछले दिनों मुंबई में भी बाढ़ की खबर थी। नगर समुद्र-तट पर स्थित है, फिर भी भरे हुए पानी को समुद्र तक पहुँचने में समय लगता है।

धीरे-धीरे समुद्रों का स्तर भी ऊँचा हो रहा है और तटीय स्थल डूबने लगते हैं। नदियाँ बड़े-बड़े क्षेत्रों का जल अपने में समाहित करती हैं और मैदानी क्षेत्रों में उनका पाट फैल जाता है। पहाड़ों में भी नदियों पर बाँध बना दिए गए हैं, जिससे कई बार पानी का सहज और सुगम प्रवाह रुक जाता है।

जब से चेतना ने संसार को पहचानना आरम्भ किया है, बाढ़ों की खबरें सुनता आया हूँ। अपनी आँखों से भी पानी का दूर-दूर तक फैलाव देखा है। उससे कुछ परेशानी तो होती है, पर यही पानी धरती की हरेक रग में प्रवेश करता है। वही खेतों को सींचता, बीजों को जगाता और अन्न को जन्म देता है। जल कभी वरदान बनकर आता है और कभी कठिन परीक्षा बनकर; फिर भी जीवन का मूल प्रवाह उसी से चलता है।

बाहर की इस वर्षा को देखते-देखते मन अपने भीतर उतरने लगता है और फिर दूर दिल्ली की ओर चला जाता है, जहाँ मेरी सजनी बैठी है। उसकी याद बहुत आती है, पर क्या करें—नौकरी की अपनी मजबूरी है और दूरी का निर्वाह भी जीवन के दायित्वों का ही एक हिस्सा है।

वर्षा की ये बूँदें संबंधों की ओर भी देखने को प्रेरित करती हैं। नौकरी और पढ़ने-लिखने की व्यस्तता में कई बार हम अपने निकटस्थों को अपेक्षित समय और आत्मीयता नहीं दे पाते। उनके अंतरतम को समझने के लिए हमें स्वयं अधिक संवेदनशील होना पड़ता है।

यह उचित नहीं कि मनुष्य जीवन की उलझनों में भीतर से ठूँठ हो जाए। प्रेम की वाणी बोलना और अपने व्यवहार में मिश्री-सा रस घोलना भी जीवन की आवश्यकता है। माना कि संसार में प्रतिदिन अनेक लफड़े हैं, फिर भी समय निकालकर लोगों के साथ मुस्कुरा लेना चाहिए।

कई बार हम किसी समस्या की तह तक नहीं पहुँच पाते और उसे ऊपर-ऊपर से, मोटा-मोटा समझकर ही प्रतिक्रिया दे देते हैं। संभवतः संबंधों की अनेक कठिनाइयाँ इसी अधूरी समझ और त्वरित प्रतिक्रिया से जन्म लेती हैं। वर्षा की यह स्निग्धता व्यवहार को अधिक सहज, संवेदनशील और प्रेमपूर्ण बनाने की प्रेरणा देती है।

यह सावन का महीना है। इस समय लोग अपना घर-बार छोड़कर शिवजी के दर्शन हेतु निकल पड़ते हैं। वे काँवड़ में गंगाजल भरकर लाते हैं और किसी मंदिर अथवा शिवालय में चढ़ा देते हैं। लोगों की श्रद्धा का बड़ा महत्त्व है। वे एक व्रत-सा धारण कर किसी बड़े मुकाम तक पहुँचना चाहते हैं।

सावन का यह जल केवल खेतों और वनस्पतियों को ही नहीं सींचता; मनुष्य की श्रद्धा में गंगाजल बनकर शिव तक भी पहुँचता है। शायद हर ऐसी यात्रा के भीतर किसी कठिनाई से ऊपर उठने, अपने संकल्प को दृढ़ करने और स्वयं को अधिक निर्मल बनाने की आकांक्षा छिपी होती है।

जीवन में समस्याएँ तो अनेक हैं, पर कभी-कभी उन्हें पीछे छोड़ना भी पड़ता है। अपने सभी दुःख संसार के सामने रख देना आवश्यक नहीं। कुछ दुःख मनुष्य को स्वयं धारण करने पड़ते हैं और कुछ से अपने ही धैर्य तथा विवेक के सहारे बाहर निकलना होता है।

यह मेह पत्तों पर जमी धूल साफ करना सिखाता है। वह काया और स्थलों—सबको निर्मल कर देता है। समस्त मल बहकर प्रकृति में ही सम्मिलित हो जाता है और उसके बाद पावनता की नई कोपलें फूटने लगती हैं।

तब एक प्रश्न भीतर उठता है—जो मेह पत्तों, पेड़ों, धरती और समूचे परिवेश का मैल धो सकता है, क्या वह मनुष्य के भीतर जमे मैल को भी धो सकता है? बाहरी वर्षा तन को भिगो सकती है, किंतु अंतर्मन की स्वच्छता तो अपनी इच्छा और साधना से ही आएगी। हमारे भीतर की शुद्धि की जिम्मेवारी कोई दूसरा कैसे ले सकता है?

हम सभी पुलकित होना चाहते हैं; अपनी कठिनाइयों और कुंठाओं से ऊपर उठकर बृहत् हित में काम करना चाहते हैं। माना कि जीवन में अनेक बाधाएँ पार करनी पड़ती हैं और कई बार समय भी कठिन होता है, पर ऐसे अवसरों पर धैर्य ही हमारा सबसे बड़ा सहारा बनता है।

सदा लड़ते रहने की प्रवृत्ति उचित नहीं। मनुष्यों के परस्पर सहयोग से ही संसार चलता है। किसी को अपना बना लेना भी एक बड़ी शक्ति है; इसलिए केवल अपने पक्ष पर अड़े रहने के बजाय सभी पक्षों को समझना और उनका ध्यान रखना आवश्यक है।

प्रकृति का व्यवहार भी हमारे लिए एक संकेत है। मेघ समुद्रों से जल ग्रहण करते हैं और उसे अपने भीतर सँजोते हैं, पर सदा अपने पास रोककर नहीं रखते। समय आने पर अपनी सर्वस्व सम्पदा धरती को सुपुर्द कर देते हैं। मनुष्य के भीतर भी ऐसा ही बाँटने का बल जागे—वह मेघ-सा दाता बने और अपने सामर्थ्य का उपयोग बृहत् हित में करे।

लोगों को कोसने के स्थान पर यदि हम प्रेमपूर्वक व्यवहार करें, परिस्थितियों में उलझकर न रह जाएँ और अपने को उबारने का प्रयत्न करें, तो जीवन अधिक सहज और सार्थक हो सकता है। यह वर्षा-बेला हमारे भीतर सौंदर्य-बोध जगाए, बाँटने का बल उत्पन्न करे और मन पर जमी धूल को धोने की प्रेरणा दे।

शायद मेह में सचमुच भीगने का अर्थ भी यही है—केवल तन का भीगना नहीं, बल्कि मन का निर्मल होना; धरती की तरह ग्रहणशील बनना और मेघ की तरह अपने हिस्से की संचित सम्पदा संसार में बाँट देना।

नैतिक पंक्ति:
मेघ की तरह ग्रहण करें, धरती की तरह सँजोएँ और जीवन की तरह सबमें बाँट दें।


पवन कुमार, 

28 अगस्त, 2026, शुक्रवार समय 10:00 बजे रात्रि  

(मेरी महेंद्रगढ़ (हरियाणा) दि० 18 जुलाई 2019, गुरुवार, प्रातः 8:08 बजे से)


📚 मेरी प्रकाशित पुस्तकें
यदि यह रचना आपको रुचिकर लगी हो, तो मेरी अन्य प्रकाशित कृतियों को भी देख सकते हैं।
— पवन कुमार

5 comments:

  1. श्याम किशोर: Dear Pawan Kumar ji , you are a great , sensitive writer ! Extremely rare quatity in an Engineer ! 👌👏🌹🙏
    Shyam Kishore

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  2. बेहतरीन...हवा की शीतल व उसकी आर्द्रता, मेघों के उच्छल छटा, बूंदों का मल्हार, तरू पत्तियों, शाखाओं एवं पुष्पों की शास्त्रीय अठखेलियां देख किसका मन भाव विभोर नहीं होगा...प्रकृति के नव सृजन का आगाज़ उसकी सार्वभौम उपस्थित का संकेत हैं...!

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  3. बरसात के माध्यम से पारम्परिक संबंधो को लेकर, अद्भुत लेख l बहुत ही सुंदर l बहुत बहुत साधुवाद lll

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  4. Naval Singh : बहुत ही सुंदर। लेखक के मन की ऊँची उड़ान ही उसे ऊँचे अस्तर पर ले जाती हैं।आप तारीफ़ के क़ाबिल हैं।👍

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