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Sunday, 20 September 2026

भाई-भाई

 भाई-भाई

(रूठने-मनाने और साथ निभाने का रिश्ता)


यह रचना किसी एक परिवार या दो विशेष भाइयों का निजी वृत्तांत मात्र नहीं, बल्कि हमारे पारिवारिक जीवन में प्रायः दिखाई देने वाले भाई-भाई के रिश्ते की सामूहिक छवि है। एक ही घर-आँगन में पले भाइयों का रिश्ता केवल रक्त का नहीं होता। माँ का दुलार, पिता की घुड़की, बहन का बीच-बचाव, साझे कपड़े-पुस्तकें, अभावों में त्याग, आपसी तकरार और संकट में साथ खड़े रहने की भावना इसे गढ़ती है। समय के साथ राहें और स्वभाव बदल सकते हैं, पर मन के किसी कोने में भाई के सुख-दुःख की चिंता बनी रहती है।

एक ही माँ के उदर से जन्मे, एक-सा पालन-परिवेश,
एक-सी बोली, साँझे विचार-विमर्श और ‘हम’ का भाव।

परस्पर पूरक, संग रहना, रूठना और फिर मनाना,
लड़ाई, गुस्सा-प्यार और एक-जैसे कितने भ्रम।
एक ही माता-पिता के अंशों से निकले दो जीवन,
एक ही माँ की कोख में दोनों ने आकार लिया।

वंश के सारे ही तो सूत्र दोनों की देहों में साँझे,
हाँ, कुछ गुण दोनों में अलग-अलग भी मुखरित।
एक-सा रंग-रूप, बाल व मिलती-जुलती कद-काठी,
संग-संग पले-बढ़े, जैसे आपस में गहरे दोस्त।

वह माँ का दुलार और पिता की कड़ी घुड़की,
भाई से तकरार, बहन द्वारा बचाव के उपाय।
एक-दूसरे की कमियाँ भी खूब सहन कर लेते,
कभी-कभी गुस्सा भी तो प्यार का प्रतिबिंब है।

अपनी छोटी-बड़ी चीजें आपस में बाँट लेते,
छोटा बड़े के कपड़े बड़े चाव से पहन लेता।
पुरानी पुस्तकें भी उसके खूब काम हैं आतीं,
घर की हर चीज में दोनों की साँझ बनी रहती।

बड़ा छोटे को पढ़ाता, समझाता है और डाँटता,
प्यार-डाँट से उसे योग्य बनाने की कोशिश करता।
मन में एक त्याग—भाई को भी सब मिल जाए,
उसकी बड़ाई में मुँह से शुभ शब्द ही निकलें।

“अरे, तुम उसको मत छेड़ना; उसके बड़े भाई को
यदि पता लग गया, तो वह बहुत गुस्सा होगा।
हो सकता है, तुम्हारी बड़ी धुनाई भी कर दे”—
छोटे के पीछे बड़े की ऐसी धाक रहती थी।

बड़े भाई ने छोटे को धूम्रपान करते देख लिया,
तो उसे खूब डाँटा—कभी दो हाथ भी लगा दिए।
“तुझे पता नहीं, इससे कितना नुकसान होगा?
गंदी आदत छोड़, अपनी जिंदगी मत बिगाड़।”

“अरे, तू सारा दिन इधर-उधर घूमता रहता है,
पढ़ाई कौन करेगा—ऐसे तो तू फेल हो जाएगा।
अब थोड़ा संजीदा हो जा, किताब उठाकर पढ़;
तेरा समय निकल गया, तो लौटकर न आएगा।”

हम आपस में चाहे वे कितना ही लड़-मर लें,
पर दूसरों की मध्यस्थता बर्दाश्त नहीं होती।
आखिर इसी घर में तो संग-संग रहना है हमें,
आपसी झगड़े से अपना रिश्ता कहाँ टूटता है!

कभी दूसरे की हानि की सोच भी न होती,
सदा उसके लाभ और भलाई की चिंता रहती।
कुछ हो जाए, घर की इज्जत बचनी चाहिए—
यही बात मन में सबसे ऊपर बनी रहती है।

आपस का लगाव, नाज-नखरे भी सह लेते,
परस्पर की भलाई हेतु अनेक कवायदें करते।
ऊपर से चाहे कितने वे कड़े शब्द बोल दें,
भीतर भाई के लिए मन नरम ही रहता।

दूसरे की खातिर समस्त जग से लड़ पड़ते,
कभी भाई के लिए जान की बाजी लगा देते।
कितना प्रेम और कितनी जिम्मेवारी एक-दूजे की,
उसके दुःख को अपना और सुख साझा समझते।

“तू अगर अमीर है, तो वह भी हमारा ही है;
वह अपना भाई है, उसका सब कुछ अपना है।
पानी में लाठी मारने से पानी टूटा न करता;
हम लड़ेंगे व भिड़ेंगे, पर फिर भी संग रहेंगे।”

परिवार की इज्जत मिटने नहीं देंगे कभी,
पीठ पीछे भी एक-दूसरे का पूरा पक्ष लेते।
आपस में भले कई दिनों से बोलचाल न हो,
पर बाहर आलोचना बिल्कुल सहन न करते।

कोई भाई के खिलाफ दो शब्द भी बोल देता,
तो सारी नाराज़गी छोड़ उससे लड़ है बैठते।
चाहे मुँह फेरकर चल रहे होते एक-दूसरे से,
पर संकट में सबसे पहले वही सामने आता।

अपनी चीजें उसके लिए सहज छोड़ दीं—
“तू यह मिठाई खा ले, मुझे अभी भूख न है।
तू आराम कर ले, मैं यह काम कर दूँगा;
तू दुःखी मत हो, सब ठीक हो जाएगा।”

कभी भाई को बचाने हेतु झूठ भी बोल दिया,
“यह नई कमीज पहन ले, मेरा तो चल जाएगा।
अपने भाई को पढ़ाना है, कमाना तो पड़ेगा ही;
वह पढ़-लिख जाएगा, तो घर का नाम करेगा।”

“देख, तू अपनी जिंदगी में तरक्की कर ले,
हम तो जैसे-तैसे अपना गुजर कर ही लेंगे।
तू ऐश और इज्जत से रहे—बस यही इच्छा है;
तेरा जीवन बन जाएगा, तो हम भी खुश होंगे।”

अपने जूते फटे, पर भाई के लिए नए ले आए,
उसकी बुराई किसी के मुँह से सहन न हुई।
उससे जुड़ी हर बात अपनी ही लगती थी—
उसकी चोट जैसे सीधे अपने मन पर लगती।

हर पल एक-दूसरे की भलाई की सदा इच्छा—
कोई युक्ति मिले तू धनवान और ज्ञानी बने।
“अरे, तू छोटा है, मुझसे आगे जाना चाहिए;
हाँ, बड़े को कुछ अधिक सहना ही पड़ता है।”

“भाई, तू छाया में बैठ, मैं काम कर देता हूँ;
मुझे कुछ न होगा, भीतर से बड़ा तगड़ा हूँ।
अपना गुजर अच्छे से कर, हमारी चिंता छोड़;
यह सब ठीक है, हम अपना काम चला लेंगे।”

कितनी ऊँची आकांक्षा अपने भाई के लिए—
“तू अफसर, नेता, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बने।
तू खूब अमीर हो, सबसे बुद्धिमान कहलाए;
अरे, क्या हुआ यदि हम अनपढ़ ही रह गए!”

साथ-साथ बचपन से अब दोनों युवा हो गए,
सबसे गहरा परिचय तो अपने भाई से ही रहा।
उसकी अच्छाई, कमजोरी और मन की चाल—
भाई से भला कितने दिनों तक छिप सकती है?

उसकी तरक्की में अपना ही फायदा लगता,
आखिर अपना भाई है, सब कुछ अपना है।
कभी नाराज़गी हुई भी, तो सतह पर ही रही—
“हाँ, अब वह बदल गया है, समय नहीं देता।”

कभी-कभी मन में एक बड़ी कसक भी उठती—
“मेरा भाई पीछे रह गया, आगे नहीं बढ़ पाया।
वह कमजोर है, तो उसे सहारा देना ही होगा;
भला अपने भाई को बीच रास्ते कौन छोड़ता है?”

“भाई, यह अपने घर की बात है, किससे कहें?
बाहर वालों को इसका पता नहीं लगना चाहिए।
चलो, पहले आपस में बैठकर कोई रास्ता निकालें;
अपने घर का दुःख अपना ही अधिक समझता है।”

कभी-कभी मन हारकर यह भी कहना पड़ता—
“उसे समझाने-बुझाने का कोई फायदा नहीं।
वह अपनी मर्जी से चलता, किसी की नहीं सुनता;
अब कितना लड़ें—खुद ठोकर खाकर समझेगा।”

“वह अब बच्चा तो नहीं, अपना अच्छा-बुरा जाने;
आदमी अपनी ही ठोकरों से बहुत कुछ सीखता है।”
पर मुँह से यह सब कुछ कह देने के बाद भी,
मन चुपके-चुपके उसी की चिंता करता रहता।

कभी शिकायत कटु होकर बाहर आ जाती—
“मेरा भाई रूठ गया है, बड़ा लोभी हो गया।
देखो, उसे तो हमारी कोई चिंता ही नहीं रही,
चाहे हम परेशान हों या कष्ट में पड़े रहें।”

उधर दूजा भाई भी अपनी विवशता कह देता—
“मुझसे अपना ही गुजर मुश्किल से हो रहा है।
मैं आखिर कहाँ से लाऊँ और कितना बाँटूँ?
सबको अपना गुजर करना भी तो आना चाहिए।”

“भाई, अब तुम अपने पैरों पर खड़े हो जाओ,
दूसरों का बहुत सहारा भी अच्छा नहीं होता।
आदत बिगड़ जाती है, हाथ दूजों की ओर रहता;
अपना जोर लगाए बिना आदमी कहाँ बढ़ता है?”

“देखो, जब पता हो मुफ्त में सब मिल जाएगा,
तो आदमी पुरुषार्थ छोड़कर बैठने सा लगता है।
बस थोड़े में गुजर करके मन को समझा लेता,
फिर आगे बढ़ने की इच्छा भी मंद पड़ जाती है।”

“पता चला, भाई पीछे से अब ऐब करने लगा है,
वह दारू पीता है, और गलत संगति में बैठता है।
उसे इस हालत में देखकर बड़ा दुःख है होता;
क्यों अपना बना-बनाया जीवन बिगाड़ रहा है?”

भाई उसकी बुरी आदत छुड़ाने को लड़ पड़ता—
“तू समझ क्यों नहीं रहा, बड़ा नुकसान होगा।
भाई, सँभल जा और अपनी जिंदगी बना ले;
बिगाड़ने वाले अनेक, भलाई चाहने वाले कम हैं।”

कभी छोटा भी तैश में आकर उत्तर दे देता—
“चल, तू करता है, तो मैं भी करके दिखाऊँगा;
मैं भी देखता हूँ, मुझे आखिर कौन रोकता है!”
उस पल गुस्सा समझ से कहीं आगे निकल जाता।

फिर भी भाई अपने मन को थामकर कहता—
“देख, तूने नुकसान किया, आगे ऐसा मत करना।
तेरी इज्जत करता हूँ, इसलिए इस बार छोड़ता हूँ;
तू समझकर चलेगा, तो सभी तेरा साथ देंगे।”

भाई रूठ गया, उसे मनाने की कोशिश की है,
पर नहीं मान रहा—कोई उपाय करना चाहिए।
“चलो, तुम ही उसको मेरी ओर से मना दो;
मानता हूँ, गलती मेरी है—वह माफ कर दे।”

समय बीतता रहा, राहें और घर अलग होते गए,
अपने-अपने परिवार और जिम्मेवारियाँ बढ़ती गईं।
अब पहले जैसी रोज की बैठकी कहाँ रह पाई,
परंतु भीतर बचपन का वह आँगन बना रहा।

कभी दोनों के बीच महीनों बोलचाल न होती,
फिर किसी खबर पर मन बेचैन हो उठता है।
किसी दूसरे से चुपचाप उसका हाल पूछ लेते—
“वह ठीक तो है? कोई बड़ी परेशानी तो नहीं?”

“भाई, मैं कमजोर हूँ—तेरा ही तो सहारा है;
मिल-बाँटकर हम दोनों का गुजर हो जाएगा।
माँ-बाप तो अब इस दुनिया में नहीं रह गए;
तू ही सब कुछ है—आ, कुछ बातचीत कर ले।”

माँ की गोद नहीं रही, पिता की घुड़की नहीं,
बहन का वह बीच-बचाव भी पीछे छूट गया।
वह पुराना घर और आँगन कितना बदल गया,
पर भाई में उस पूरे घर का अक्स बचा रहा।

ऐसे ही मनोरथों, भरोसों और लघु लड़ाइयों में,
प्यार, दुराव, त्याग और अनेक कष्टों के बीच,
भाई-भाई की जिंदगियाँ आपस में लिपटी पड़ी हैं—
एक की यादों में दूसरे का हिस्सा बसा हुआ है।

हम रूठते रहे, लड़ते रहे, और दूर भी होते रहे,
पर एक-दूसरे से सचमुच अलग ही कहाँ हुए?
अरे, पानी में लाठी मारने से पानी टूटा न करता—
भाई आखिर भाई है, कभी पराया हुआ न करता।

नैतिक संदेश: भाई का रिश्ता केवल एक ही रक्त से जन्म लेने का नहीं; एक-दूसरे के सुख-दुःख, अभाव, डाँट, त्याग, नाराज़गी और चिंता को जीवन भर अपने भीतर सँभालने का रिश्ता है।

 

पवन कुमार,

19 सितंबर, 2026, शनिवार, समय 11:56 मध्य रात्रि  

(मेरी महेंद्रगढ़ (हरि०) डायरी 22 फरवरी 2019, शुक्रवार, प्रातः 9:18 बजे से)


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यदि यह रचना आपको रुचिकर लगी हो, तो मेरी अन्य प्रकाशित कृतियों को भी देख सकते हैं।
— पवन कुमार

Saturday, 5 September 2026

उनींदी कलम

उनींदी कलम

फरवरी 2007 की मध्यरात्रि में लिखी यह कविता कलम से किया गया आत्मीय संवाद है। जीवन की अनिश्चितताओं के बीच कवि उद्देश्य, आत्म-परिचय और साधना की राह खोजते हुए धीरे-धीरे संकल्प और जागरण की ओर बढ़ता है।

तेरी गहराइयों से रूबरू होने की चाहत है;
ऐ उनींदी कलम, इस यात्रा में साथ तो देना।

मैं तो यूँ ही जीवन को तमाम करता रहा,
समय की गति में स्वयं को भी भूलता रहा।
मन में क्या कसक थी, यह मैं कह न सका,
नासमझ की मानिंद यूँ उनींदा ही पड़ा रहा।

कुछ हसरतें बना पाऊँ, कुछ बड़े ख्वाब ले लूँ,
वरना ज़िंदगी तो यूँ ही निकलती चली जाएगी।
बिना किसी उद्देश्य के जीकर मैं करूँगा भी क्या—
साधना का मोल ज़िंदगी शायद न लगा पाएगी।

क्या करूँ मैं इस जीवन में, ज़रा समझा जाना;
रोने के अलावा हँसना भी है, ज़रा बतला जाना।
कुछ करने की कसक लेकर दुनिया में आ गया;
अब कोई काम सामने रख दे, उसमें लगा जाना।

मेरे मन का महद् इतिहास यूँ ही बन्द पड़ा है,
इसे कुरेदने की कभी मुझे फुरसत ही न मिली।
कैसे झकझोरूँ इसे, कैसे चलायमान करूँ—
मेरे मन की उम्मीदों को फिर नया जीवन मिले।

पल-पल साँस लेते हुए मैं भीतर सिमटता रहा,
क्षण-क्षण उठकर अपने को फिर सँभालता रहा।
मन में कुछ करने की हसरतें बहुत अधिक थीं,
पर समय के साथ उनका गुनगुनाना भूल गया।

मेरे मन की थाह क्या है—यह जानना अभी शेष;
इस दुनिया में मैं क्या सामान हूँ—उत्तर अभी शेष।
क्यों आया हूँ यहाँ और क्या मेरा मकसद है—
क्या मेरी इबादत है और मेरे रास्ते क्या हैं?

मेरे जीने की सूरत में रोम-रोम का संचालन है,
जगत में रहने की चाहत, साँसों में विचलन है।
कुछ करने की इच्छा जगे तो इसे जीवन कहूँ,
वरना बिना समझे ही यह जीवन बीत जाएगा।

मेरी बर्बादियों और उन्नति का वह रब साक्षी है;
मैं उसकी इबादत फिर निरन्तर करता रहूँ।
माना, अभी पूरा शऊर नहीं, न उसका ढंग ही—
उसी की कृपा से सीखते हुए आगे बढ़ता रहूँ।

अपने मन का मीत आखिर बनाऊँ किसको,
जब स्वयं से पूरा परिचय अभी कर न पाया?
बहुत कुछ पाया है मैंने बाहर की दुनिया से,
फिर भी अपने भीतर कुछ अनजाना-सा हूँ।

मेरे मन की तसल्लियों की कोई महफ़िल हो,
उसी में शायद मैं भी अपने फ़साने कह सकूँ।
कहने की कला को अभी धीरे-धीरे साध रहा हूँ,
लड़खड़ाते शब्दों में भी अपना मन खोल रहा हूँ।

मुझ पर तू कृपा कर, मुझे आगे बढ़ाओ ना;
जीवन को जीने के कुछ नए ढंग सिखाओ ना।
गुज़ारिश है—कुछ मकसद देना इस ज़िंदगी को,
ताकि अंत में कुछ न करने का मलाल न हो।

मेरी तरक्कियों का रास्ता तूने ही सुझाया है;
तेरी ही राह पर अब मुझे आगे बढ़ते जाना है।
तेरा साथ और तेरी प्रेरणा मुझे सदैव चाहिए ही—
क्योंकि देख, तू बड़ा गुरु है और मैं तेरा चेला हूँ।

मुझे समझ नहीं आता कि प्रेम का रंग कैसा है;
कैसे तुझमें आत्मसात होकर गौरवान्वित होऊँ?
मुझ पर अपनी कृपा की चादर तू ओढ़ा देना,
जमाने की तमाम गर्मी-सर्दी से मुझे बचा लेना।

जीवन में निरन्तर चलते रहने का चिंतन देना,
मेरे भीतर विश्वास और विवेक बनाए रखना।
ऐ कलम, अपने अक्षरों से राह दिखाती रहना—
मैं उस राह पर जागृत होकर चलता रहूँगा।

 नैतिक संदेश: आत्मप्रश्न जब संकल्प से जुड़ते हैं, तो उनींदी चेतना भी जीवन की राह पहचानने लगती है।

 

पवन कुमार,

5 सितंबर 2026, सायं 6:22 बजे

(मेरी डायरी 6 फरवरी 2007, मध्यरात्रि 1:00 बजे से)


📚 मेरी प्रकाशित पुस्तकें
यदि यह रचना आपको रुचिकर लगी हो, तो मेरी अन्य प्रकाशित कृतियों को भी देख सकते हैं।
— पवन कुमार

Friday, 28 August 2026

मेह में भीगता मन

मेह में भीगता मन

वर्षा के बाहरी सौंदर्य से आरम्भ हुआ यह चिंतन जल के जीवनदायी और विकराल रूपों से गुजरते हुए मानवीय संबंधों, श्रद्धा, आंतरिक शुद्धि और लोकहित की भावना तक पहुँचता है। मेघ यहाँ केवल प्रकृति का अंग नहीं, बल्कि ग्रहण करने, सँजोने और अंततः सबमें बाँट देने का जीवंत प्रतीक है।

बाहर मेह बरस रहा है। हवा के साथ आती बौछारें कमरे के भीतर तक पहुँच रही हैं। बूँदों का शीतल स्पर्श तन को छू रहा है और रिमझिम-पिटपिट की ध्वनि से सारा वातावरण गूँज उठा है। लगता है, मानो आसमान से अमृत बरस रहा हो और ग्रीष्म से तप्त भूमि को एक गहरा सुकून मिल रहा हो।

आकाश में मेघों का जमावड़ा है। वे एक-दूसरे से टकराते, गरजते, खेलते और अपना भार धरती पर छोड़ते जा रहे हैं। सूर्य बादलों के पीछे छिपा हुआ है और चारों ओर फैली घटाओं ने प्रकृति के एक सौम्य, शीतल आयाम को प्रकट कर दिया है।

बारिश मूसलाधार है। छत की टाइलों पर गिरती बूँदें एक अजब-सा शोर मचा रही हैं। कभी उनकी गति मंद पड़ती है और फिर अचानक तीव्र हो जाती है। हवा के झोंकों के साथ बौछारें भीतर तक चली आती हैं और तन को छूकर एक शीतल सिहरन जगा जाती हैं।

बाहर पेड़ मानो मुस्कुरा रहे हैं। उनकी भीगी शाखाएँ हवा के साथ झूम रही हैं और धुले हुए पत्तों का हरापन पहले से अधिक निखर आया है। तनों से फिसलती बूँदें मूलों की ओर उतर रही हैं। खेत, पेड़-पौधे और तपती धरती—सभी इस मेघ-मधु को अपने भीतर समेटते हुए जैसे नए जीवन से भर उठे हैं। समूची प्रकृति पर एक मुस्कानमयी मस्ती-सी छाई है।

वर्षा अपनी उपस्थिति का पूरा अहसास कराती हुई मानो कह रही है—“मैं आ गई हूँ। अब धरती प्यासी नहीं रहेगी, कोई भूखा नहीं रहेगा। मैं प्रकृति की नियामत हूँ, सबकी मित्र। अब फलने-फूलने का अवसर है; मेरा असर दिखाई देना शुरू हो गया है।”

पानी लगातार बरस रहा है—अभी घर में ही रहना होगा। बाहर तब निकलेंगे, जब बरसात कुछ थम जाएगी। लगता है, छतरी के प्रयोग का समय आ गया है। मनुज, पशु और पक्षी भी अपने-अपने मकानों, खोरों और नीड़ों में कहीं दुबके बैठे हैं। सभी भीगने से बचना चाहते हैं; पर जहाँ बाहर निकलना अपरिहार्य है, वहाँ लोग बरसात में भी चलते और अपना काम करते जा रहे हैं। वर्षा अपना क्रम नहीं रोकती और जीवन भी अपनी आवश्यकताओं तथा दायित्वों के साथ चलता रहता है।

प्रथम तल के कमरे में कुर्सी पर बैठा, आँखों पर ऐनक लगाए, दरवाजे से बाहर फैले खेतों और पेड़ों को देख रहा हूँ। जो कुछ आँखों के सामने है और भीतर अनुभव हो रहा है, वही धीरे-धीरे शब्दों में उतर रहा है। बौछारें भीतर आकर तन को सिक्त कर जाती हैं और मन में भी एक फुहार-सी फूटने लगती है। मन करता है कि इस वर्षा में सराबोर होकर कुछ मेह-सा हो जाऊँ; यह मेह इसी भाँति अविरल गतिमान बना रहे—बूँद-बूँद बरसता रहे और मन की धरती को भिगोता रहे। हाथ में पकड़ी कलम भी इस रिमझिम से लय और प्रेरणा पाए तथा मेह में भीगते मन के सुंदर भावों को शब्दों में उतारती चली जाए।

इस मेघ-मधु की शीतल फुहारों से किसका मन पुलकित न होगा? मनुष्य इस वृहद् सृष्टि का एक क्षुद्र अंश है; प्रकृति भीगती है तो उसका मन भी अनायास भीगने लगता है।

धरती की इस तृप्ति को देखते हुए जल का व्यापक महत्त्व सहज ही सामने आने लगता है। जीवन का समूचा चक्र इसी के आसपास चलता है। समस्त धान्य, खाद्य और वनस्पतियाँ इसी से जन्म लेते हैं; उनसे जुड़े अनेक व्यापार तथा आजीविकाएँ भी अंततः इसी पर निर्भर हैं। जल केवल प्यास नहीं बुझाता—वह खेतों में अन्न, वृक्षों में हरियाली और असंख्य जीवों में जीवन बनकर प्रवाहित होता है।

ये मेघ समुद्रों का जल कितनी बड़ी दूरी से ढोकर लाए हैं! उनका कर्तव्य कितना विराट है—धरती को तृप्त करना और एक-एक जीव तक भोजन तथा जल पहुँचाना। मानो समस्त पृथ्वी उनकी जिम्मेवारी के क्षेत्र में हो। वे समुद्रों से ग्रहण करते हैं, आकाश में उसे सँजोते हैं और समय आने पर बूँद-बूँद धरती को लौटा देते हैं।

किंतु जीवन देने वाले इसी जल का एक विकराल रूप भी है। मानसून के साथ सारी सरिताओं में उफान-सा आ गया है। सारे भारतवर्ष में बारिश हो रही है। निचले स्थानों में पानी भर रहा है और बिहार-असम-नेपाल में बाढ़ की स्थिति बन गई है। पिछले दिनों मुंबई में भी बाढ़ की खबर थी। नगर समुद्र-तट पर स्थित है, फिर भी भरे हुए पानी को समुद्र तक पहुँचने में समय लगता है।

धीरे-धीरे समुद्रों का स्तर भी ऊँचा हो रहा है और तटीय स्थल डूबने लगते हैं। नदियाँ बड़े-बड़े क्षेत्रों का जल अपने में समाहित करती हैं और मैदानी क्षेत्रों में उनका पाट फैल जाता है। पहाड़ों में भी नदियों पर बाँध बना दिए गए हैं, जिससे कई बार पानी का सहज और सुगम प्रवाह रुक जाता है।

जब से चेतना ने संसार को पहचानना आरम्भ किया है, बाढ़ों की खबरें सुनता आया हूँ। अपनी आँखों से भी पानी का दूर-दूर तक फैलाव देखा है। उससे कुछ परेशानी तो होती है, पर यही पानी धरती की हरेक रग में प्रवेश करता है। वही खेतों को सींचता, बीजों को जगाता और अन्न को जन्म देता है। जल कभी वरदान बनकर आता है और कभी कठिन परीक्षा बनकर; फिर भी जीवन का मूल प्रवाह उसी से चलता है।

बाहर की इस वर्षा को देखते-देखते मन अपने भीतर उतरने लगता है और फिर दूर दिल्ली की ओर चला जाता है, जहाँ मेरी सजनी बैठी है। उसकी याद बहुत आती है, पर क्या करें—नौकरी की अपनी मजबूरी है और दूरी का निर्वाह भी जीवन के दायित्वों का ही एक हिस्सा है।

वर्षा की ये बूँदें संबंधों की ओर भी देखने को प्रेरित करती हैं। नौकरी और पढ़ने-लिखने की व्यस्तता में कई बार हम अपने निकटस्थों को अपेक्षित समय और आत्मीयता नहीं दे पाते। उनके अंतरतम को समझने के लिए हमें स्वयं अधिक संवेदनशील होना पड़ता है।

यह उचित नहीं कि मनुष्य जीवन की उलझनों में भीतर से ठूँठ हो जाए। प्रेम की वाणी बोलना और अपने व्यवहार में मिश्री-सा रस घोलना भी जीवन की आवश्यकता है। माना कि संसार में प्रतिदिन अनेक लफड़े हैं, फिर भी समय निकालकर लोगों के साथ मुस्कुरा लेना चाहिए।

कई बार हम किसी समस्या की तह तक नहीं पहुँच पाते और उसे ऊपर-ऊपर से, मोटा-मोटा समझकर ही प्रतिक्रिया दे देते हैं। संभवतः संबंधों की अनेक कठिनाइयाँ इसी अधूरी समझ और त्वरित प्रतिक्रिया से जन्म लेती हैं। वर्षा की यह स्निग्धता व्यवहार को अधिक सहज, संवेदनशील और प्रेमपूर्ण बनाने की प्रेरणा देती है।

यह सावन का महीना है। इस समय लोग अपना घर-बार छोड़कर शिवजी के दर्शन हेतु निकल पड़ते हैं। वे काँवड़ में गंगाजल भरकर लाते हैं और किसी मंदिर अथवा शिवालय में चढ़ा देते हैं। लोगों की श्रद्धा का बड़ा महत्त्व है। वे एक व्रत-सा धारण कर किसी बड़े मुकाम तक पहुँचना चाहते हैं।

सावन का यह जल केवल खेतों और वनस्पतियों को ही नहीं सींचता; मनुष्य की श्रद्धा में गंगाजल बनकर शिव तक भी पहुँचता है। शायद हर ऐसी यात्रा के भीतर किसी कठिनाई से ऊपर उठने, अपने संकल्प को दृढ़ करने और स्वयं को अधिक निर्मल बनाने की आकांक्षा छिपी होती है।

जीवन में समस्याएँ तो अनेक हैं, पर कभी-कभी उन्हें पीछे छोड़ना भी पड़ता है। अपने सभी दुःख संसार के सामने रख देना आवश्यक नहीं। कुछ दुःख मनुष्य को स्वयं धारण करने पड़ते हैं और कुछ से अपने ही धैर्य तथा विवेक के सहारे बाहर निकलना होता है।

यह मेह पत्तों पर जमी धूल साफ करना सिखाता है। वह काया और स्थलों—सबको निर्मल कर देता है। समस्त मल बहकर प्रकृति में ही सम्मिलित हो जाता है और उसके बाद पावनता की नई कोपलें फूटने लगती हैं।

तब एक प्रश्न भीतर उठता है—जो मेह पत्तों, पेड़ों, धरती और समूचे परिवेश का मैल धो सकता है, क्या वह मनुष्य के भीतर जमे मैल को भी धो सकता है? बाहरी वर्षा तन को भिगो सकती है, किंतु अंतर्मन की स्वच्छता तो अपनी इच्छा और साधना से ही आएगी। हमारे भीतर की शुद्धि की जिम्मेवारी कोई दूसरा कैसे ले सकता है?

हम सभी पुलकित होना चाहते हैं; अपनी कठिनाइयों और कुंठाओं से ऊपर उठकर बृहत् हित में काम करना चाहते हैं। माना कि जीवन में अनेक बाधाएँ पार करनी पड़ती हैं और कई बार समय भी कठिन होता है, पर ऐसे अवसरों पर धैर्य ही हमारा सबसे बड़ा सहारा बनता है।

सदा लड़ते रहने की प्रवृत्ति उचित नहीं। मनुष्यों के परस्पर सहयोग से ही संसार चलता है। किसी को अपना बना लेना भी एक बड़ी शक्ति है; इसलिए केवल अपने पक्ष पर अड़े रहने के बजाय सभी पक्षों को समझना और उनका ध्यान रखना आवश्यक है।

प्रकृति का व्यवहार भी हमारे लिए एक संकेत है। मेघ समुद्रों से जल ग्रहण करते हैं और उसे अपने भीतर सँजोते हैं, पर सदा अपने पास रोककर नहीं रखते। समय आने पर अपनी सर्वस्व सम्पदा धरती को सुपुर्द कर देते हैं। मनुष्य के भीतर भी ऐसा ही बाँटने का बल जागे—वह मेघ-सा दाता बने और अपने सामर्थ्य का उपयोग बृहत् हित में करे।

लोगों को कोसने के स्थान पर यदि हम प्रेमपूर्वक व्यवहार करें, परिस्थितियों में उलझकर न रह जाएँ और अपने को उबारने का प्रयत्न करें, तो जीवन अधिक सहज और सार्थक हो सकता है। यह वर्षा-बेला हमारे भीतर सौंदर्य-बोध जगाए, बाँटने का बल उत्पन्न करे और मन पर जमी धूल को धोने की प्रेरणा दे।

शायद मेह में सचमुच भीगने का अर्थ भी यही है—केवल तन का भीगना नहीं, बल्कि मन का निर्मल होना; धरती की तरह ग्रहणशील बनना और मेघ की तरह अपने हिस्से की संचित सम्पदा संसार में बाँट देना।

नैतिक पंक्ति:
मेघ की तरह ग्रहण करें, धरती की तरह सँजोएँ और जीवन की तरह सबमें बाँट दें।


पवन कुमार, 

28 अगस्त, 2026, शुक्रवार समय 10:00 बजे रात्रि  

(मेरी महेंद्रगढ़ (हरियाणा) दि० 18 जुलाई 2019, गुरुवार, प्रातः 8:08 बजे से)


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— पवन कुमार

Wednesday, 19 August 2026

प्रकृति के स्वर में आत्मबोध

प्रकृति-स्वर में आत्मबोध

एक तुषारमय शीत-प्रभात में पक्षियों के सहज कलरव से आरम्भ यह चिंतन प्रकृति, करुणा, कर्मठता और जिजीविषा से गुजरते हुए मनुष्य के व्यापक अस्तित्व-बोध तक पहुँचता है। सुनने और गुनने की यह यात्रा बाहरी प्रकृति और अंतर्मन के बीच उस सूक्ष्म संवाद को खोजती है, जहाँ श्वास, चेतना और विराट जीवन-स्पन्दन परस्पर जुड़े दिखाई देते हैं।

जनवरी का दूजा सप्ताह; प्रातः साढ़े सात, खेतों पर धवल तुषार-विस्तार,
बिजली गुम, कक्ष में अल्प प्रकाश; रजाई ओढ़े मुझे प्रकाश का इंतज़ार।

बाहर चिड़ियों-तोतों का शोरगुल है, जैसे सर्दी-कुहासे में सुखद संवाद,
विभिन्न ध्वनियों की एक प्रतिद्वंद्विता-सी, मानो प्रकृति का अपना नाद।
मानव तो घरों में सिकुड़े बैठे हैं ठंड में, पर खग-जगत अति चलायमान,
कोलाहल से मुक्त परिवेश मिले, तो क्यों न हो उनका मन गतिमान?

ये खग-वृन्द कितने उत्साहित, उछल-फुदककर प्रसन्नता दर्शित करते,
सुबह शीघ्र जाग, एक समन्वय में परस्पर जैसे आदान-प्रदान करते।
एक-दूजे से वे सुख-दुःख बाँटते, सबकी खुशी में अपनी खुशी पाते,
विस्तृत विश्व के वे भी अवयव हैं, अपने परिवेश में फिर क्यों न मचलें?

यह आह्लाद एक परमानुभूति है, यदि प्राप्त हो तो सचमुच ही अमूल्य,
इस हेतु अनेकों ने सामान्य जग छोड़, प्रकृति-शरण को माना मूल्य।
अनंत से जितना भी हो सके आत्मसात, तन-मन हो जाए सराबोर,
विश्व-कल्याण भले स्वयं से न हो सम्भव, सरसता से लरजे अंतःकोर।

परोक्ष में ध्वनित इनके सतत मधुर गान से मैं पूर्णतया मंत्रमुग्ध हूँ,
जैसे मैं इनमें से ही एक हूँ—तनिक कुछ सुस्त, बस अलग बैठा हूँ।
जानता हूँ, यदि उन्हें छेड़ा तो उड़ जाएँगे, सारा खेल बिगड़ जाएगा,
बाधा कोई न हो—यही योगाभ्यास; उनका सहज क्रम चलता जाएगा।

जितना भी सुनूँ, उतना ही गुनूँ—मैं सुनता रहूँ, और तुम गाते रहो,
भोर का यह मधुर प्राकृतिक संगीत, कोमल भाव बस जगाते रहो।
यदि देख सकूँ तो और भी उत्तम हो, पर अभी कलमबद्ध हुआ हूँ,
उठूँगा तो क्रम टूटेगा; फिर कितना जुड़ेगा—इसी सोच में रुका हूँ।

वाल्मीकि तो कवि बन गए थे, क्रौंच-युगल में से एक का वध देखकर,
करुणा उमड़ पड़ी थी भीतर, निरीह जीव का दुःख हृदय में भरकर।
निरीहों का कष्ट देखकर, क्या कोई स्नेही रह सकता है अविचलित?
पेशल भाव स्वतः उदीरित होते, करुण स्वर हो जाता हित-निमित्त।

यह मन-प्रमोद भी क्या है—किंचित इस प्रकृति से एकरूप हो जाना?
सम्पूर्ण विश्व-सौन्दर्य का उपासक बन, स्वयं को उसका अवयव पाना।
जीव-अजीव यहाँ सब विराट के रूप हैं, सौन्दर्य उसी का होता प्रकट,
जीवित चेतना और भी प्रिय है, प्रत्यक्ष संपर्क ही कराता है बोध निकट।

सीमित से अनंत की ओर जब बढ़ते, भीतर भी कोई द्वार खुलता है,
प्रकृति से जुड़ते-जुड़ते अपना भी पृथक अस्तित्व तनिक धुलता है।
मैं भी अपना अस्तित्व खोना चाहता, उस परम में होना परम-लीन,
जैसे अग्नि में रूप पिघलकर खो देता अपनी पृथक पहचान महीन।

इस पञ्चतत्त्व में ही हर पल चलता आदान-प्रदान का निरंतर क्रम,
बस जरूरत है इसे अनुभूत करने की; फिर कहाँ द्वैत, कैसा भ्रम।
हम भी इसी विस्तृत ब्रह्माण्ड के अंश हैं, उसी प्रकृति से गहरा नाता,
यहाँ हर श्वास, हर स्पन्दन चुपके से साझे अस्तित्व का बोध कराता।

अनेक लोग बैठे सर्दी में रजाइयों में, किंतु कुछ प्रातः निकल जाते सैर,
कई भाँति के व्यायाम करते, मौन मनन में खोजते अंतर्मन की खैर।
जब हम स्वयं निःशब्द हो जाएँ, प्राकृतिक संगीत बने सहज सौगात,
स्वयं को भूलकर बृहद्-अंश बन जाना—शायद यही मुक्ति की बात।

कर्मठ सदा चलायमान रहते हैं, माना वातावरण से प्रभावित भी होते,
बाहर अधिक न दिखें तो इसका अर्थ नहीं कि वे निष्क्रिय होकर सोते।
अनेकों मनस्वी मनन में लीन रहते हैं, अन्य उन्हें चाहे जिस भाँति लें,
जीव में जब तक प्राण-स्पन्दन, कर्मठता अपना सहज क्रम चलने दे।

पंछी-सम हम कभी बाहर निकलें, फुदकें-उड़ें और निज नाद करें,
प्रसन्नता के उच्चतम शिखर चूमने हेतु सतत प्रयत्न और संवाद करें।
अपने उद्गारों को बाहर करना सीखें—मधुर होंगे तो दुनिया सुनेगी,
यदि कर्कश भी हों, तो मिली प्रतिक्रिया शायद कुछ नई समझ देगी।

आओ, इस जिजीविषा को सुदृढ़ बनाएँ; न सोचें सदा हम ही गलत हैं,
जब सब किसी न किसी भाँति सीख रहे हैं, तो हम क्यों पीछे खड़े हैं?
देखें-समझें, फिर अपनी भाँति नृत्य करें—सबने अपनी राह बनाई,
दीन न समझें स्वयं को कभी; परम ने हमें भी बड़े यत्न से है बनाया।

इस धवल तुषार की मनोरम छटा का आनंद लें, मनीषी वृक्ष-सम निहारें,
ज्ञान-चक्षुओं को सदा खुला रखें, आमोद-प्रमोद को भी जीवन में उतारें।
सैर, व्यायाम, योग और मनन—इस तन-मन के हैं अपने-अपने आधार,
उपलब्ध क्षणों के सदुपयोग से ही धीरे-धीरे गढ़ता जाता जीवन-व्यवहार।

जब कभी अकेला सैर को निकलता हूँ, तो मन विचारों से भरता जाता,
कुछ विगत वर्षों से प्रातःकालीन लेखन भी अपनी ओर मुझे है बुलाता।
यहाँ एक साधना को समय मिले, तो दूजा अवसर कुछ पीछे रह जाता,
यह जीवन भी अद्भुत—एक को पाने में कभी कुछ अन्य छूटता जाता।

यही तो उपलब्ध क्षणों का प्रयोग है, जिससे जीवन अपना ढर्रा लेता,
कभी सैर, कभी लेखन, कभी योग—हर अभ्यास कुछ विरला देता।
तन की सक्रियता जितनी आवश्यक, उतना ही मन का भी विस्तार,
दोनों के संतुलित अनुशासन से ही जीवन पाता एक स्वस्थ आधार।

श्वसन-तंत्र का स्वास्थ्य परम आवश्यक, जीवन को सुदृढ़ बनाने हेतु,
स्वच्छ वायु उसकी बड़ी पूरक है; वृक्ष-प्रचुरता बनती संरक्षण-सेतु।
अतः हम जितने वृक्ष लगा सकें लगाएँ, परिवेश स्वच्छ-निर्मल बनाएँ,
प्राणी-मात्र के इस स्पन्दन-तत्त्व की रक्षा में यत्नशील-तल्लीन हो जाएँ।

चाहे ईश-ध्यान हो या श्वास पर ध्यान, एकाग्रता की युक्ति सीखते रहें,
भीतर चलते प्राण-स्पन्दन को भी कुछ क्षण निःशब्द होकर देखते रहें।
यह जीवन आगे बढ़ता ही जाएगा; हम बस उसके प्रवाह में चलते जाएँ,
प्रकृति, प्राण और परम के सम्बन्ध को निज अनुभव में उतरता पाएँ।

बाहर खग-वृन्द का मधुर नाद है, भीतर श्वासों का अविरल गान,
धवल तुषार से उगता प्रकाश है, जगाता भीतर भी नया विहान।
जितना भी सुनें, उतना गुनें—प्रकृति से अपना शुद्ध संवाद बना रहे,
उसके विराट स्पन्दन में अपना लघु-सा अस्तित्व भी सदा आबाद रहे।

मर्म:

प्रकृति को केवल देखें नहीं—उसे सुनें, गुनें और उसके विराट स्पन्दन में अपने अस्तित्व को पहचानें।


— पवन कुमार
18 अगस्त 2026, मंगलवार | रात्रि 11:24 बजे
(मेरी महेंद्रगढ़ (हरियाणा) डायरी, 8 जनवरी 2016, शुक्रवार | प्रातः 7:31 बजे से)


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— पवन कुमार

Thursday, 6 August 2026

श्रम का सम्मान

श्रम का सम्मान


श्रम केवल शारीरिक परिश्रम नहीं, बल्कि बुद्धि, कौशल, उत्तरदायित्व और सेवा का भी रूप है। यह चिंतन श्रम की गरिमा, उद्यम की भूमिका तथा श्रमिक, स्वामी और समाज—तीनों की साझा नैतिक जिम्मेदारी को समझने का एक विनम्र प्रयास है।


आज 1 मई—श्रमिक दिवस है। मैं भी श्रमरत हूँ; यद्यपि मेरा श्रम मुख्यतः बौद्धिक है, दैहिक नहीं।

वस्तुतः श्रम का स्वरूप बहुरूपी है। यद्यपि शारीरिक श्रम को प्रधान माना जाता है, तथापि बुद्धि, अनुभव और कौशल का भी अपना महत्त्व है। बौद्धिक और दैहिक—दोनों प्रकार के श्रम अंततः समाजोपयोगी कर्म के ही रूप हैं। प्रायः प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में श्रमिक है। अत्यल्प लोग ही बिना परिश्रम के जीवन बिताना चाहते हैं; सभी जानते हैं कि श्रम ही जीवन का आधार है।

खेती करना, अन्न उगाना, पानी लाना, कपड़े बुनना व सीना, भवन एवं सड़कें बनाना—सब श्रमिक-कर्म हैं। दुकानों पर सामान बेचना, बोझ उठाना, वस्तुएँ बनाना, शिल्पकारी करना तथा सड़कें-गलियाँ स्वच्छ रखना भी उसी श्रम-गरिमा के उदाहरण हैं। जूते बनाना, कारखानों में काम करना, मरम्मत करना, तेल निकालना, चौकीदारी करना, कोयला-खनन करना तथा लकड़ी काटना—ऐसे असंख्य कार्य समाज की आधारशिला हैं।

शायद श्रमिक दिवस की परिकल्पना में कार्यालय-कर्म, लेखन, अध्यापन, शोध अथवा काव्य-कर्म को उतनी स्पष्टता से सम्मिलित नहीं किया जाता। किन्तु ये भी समाज के लिए किए जाने वाले श्रम के ही विविध रूप हैं। वस्तुतः जो भी कार्य ईमानदारी, उत्तरदायित्व और समाजोपयोगिता के लिए किया जाए, वह भी श्रम ही है।

वास्तविक भेद शायद श्रमिक और स्वामी के बीच नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व के निर्वाह में है। जहाँ नेतृत्व केवल आदेश देने तक सीमित रह जाए और सहभागिता घटने लगे, वहाँ दूरी भी बढ़ने लगती है। इसके विपरीत जहाँ विश्वास, सहभागिता और पारस्परिक सम्मान हो, वहाँ श्रम केवल जीविका नहीं, सृजन का माध्यम बन जाता है।

अक्सर छोटे व्यापारी अपने कर्मचारियों के साथ मिलकर काम करते दिखाई देते हैं। किन्तु कई बार लाभ का बड़ा भाग ऊपर ही सिमट जाता है और श्रम का उचित प्रतिफल नीचे तक नहीं पहुँच पाता। समाचारों में भी समय-समय पर घरेलू सहायिकाओं अथवा श्रमिकों के साथ अन्याय की घटनाएँ पढ़ने को मिलती हैं। ऐसी परिस्थितियाँ केवल आर्थिक व्यवस्था की नहीं, मानवीय संवेदना की भी परीक्षा हैं।

जहाँ श्रम का सम्मान घटता है और शोषण बढ़ता है, वहाँ सामाजिक असंतुलन जन्म लेता है। कार्य-विभाजन आवश्यक है, पर श्रमिक के स्वास्थ्य, सम्मान और सम्मानजनक जीवन-स्तर का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है।

यह भी उतना ही सत्य है कि किसी उद्योग, विद्यालय, महाविद्यालय अथवा अस्पताल की स्थापना और संचालन के लिए बुद्धि, साहस तथा पूँजी आवश्यक हैं। नए कार्यों की कल्पना करना, जोखिम उठाना और उन्हें सफल बनाना भी एक साधना है। उन स्वप्नों को साकार करने के लिए विशेषज्ञों, कुशल-अकुशल—सभी श्रमिकों का सहयोग अनिवार्य होता है। अतः उद्यम और श्रम एक-दूसरे के पूरक हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं। उचित पारिश्रमिक और परस्पर सम्मान, दोनों समान रूप से आवश्यक हैं।

यह भी सत्य है कि प्रत्येक व्यवसाय लाभ में नहीं चलता। अनेक संस्थाएँ कठिनाइयों से गुजरती हैं और कभी-कभी वेतन देना भी चुनौती बन जाता है। दूसरी ओर श्रमिक का भी परिवार है; उसकी भी आवश्यकताएँ हैं, बच्चों की शिक्षा है और जीवन की मूलभूत ज़िम्मेदारियाँ हैं। इसलिए संवेदनशील संतुलन ही स्थायी समाधान है।

समृद्धि तभी स्थायी बनती है, जब उसका लाभ अधिकाधिक हाथों तक पहुँचे। पूँजी और अवसर कुछ स्थानों पर ही सिमट न जाएँ, बल्कि श्रम के साथ न्यायपूर्ण रूप से समाज में प्रवाहित हों। लाभ कमाना अनुचित नहीं; परन्तु लाभ के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी जुड़ा होना चाहिए। श्रम का उचित सम्मान और न्यायपूर्ण प्रतिफल केवल श्रमिक का अधिकार नहीं, बल्कि समाज की स्थिरता का भी आधार है।

प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ-न-कुछ उपयोगी कार्य अवश्य करना चाहिए। उत्पादित समृद्धि का प्रवाह भी अधिकाधिक लोगों तक पहुँचना चाहिए। जितने अधिक कार्यस्थल विकसित होंगे, उतने अधिक लोग सम्मानपूर्वक उनसे जुड़ेंगे और समाज का आधार उतना ही सुदृढ़ होगा।

श्रमिक भी बुद्धिजीवियों के समान आदर के अधिकारी हैं। किसान हमारे अन्नदाता हैं और प्रत्येक श्रमिक समाज-निर्माण का सहभागी। इन्हीं के श्रम से हमारे घर, उद्योग, विद्यालय, अस्पताल और दैनिक जीवन सुचारु रूप से चल पाते हैं। उनके परिवार भी सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें, सबके बीच परस्पर समझ और सहयोग बढ़े। तभी वास्तविक उन्नति होगी; समाज मात्र वाद-विवाद में न उलझकर सहभागिता, संवेदना और सामूहिक उत्तरदायित्व की दिशा में अग्रसर होगा।


मूल संदेश

समृद्ध समाज वही है, जहाँ श्रम का सम्मान, उद्यम का उत्तरदायित्व और मानवता का संतुलन साथ-साथ चलते हैं।



पवन कुमार,
6  अगस्त, 2026, वीरवार, समय 8:44 बजे सायं 9:32 बजे रात्रि 
(मेरी चेन्नई डायरी दिनाँक 1 मई, 2023,  सोमवार, समय 9:23 बजे प्रातः से) 

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📚 लेखक की अन्य प्रकाशित पुस्तकें

यदि यह रचना आपको रुचिकर लगी हो, तो पवन कुमार की अन्य प्रकाशित कृतियों को भी पढ़ सकते हैं—संस्कृत की कालजयी रचनाओं के हिंदी अनुवाद से लेकर मौलिक एवं चिंतनपरक काव्य-संग्रह तक।

📖 महाकवि कालिदास विरचित

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आशा है, ये कृतियाँ भी आपके मन और विचारों से संवाद करेंगी। यदि कोई पुस्तक आपकी रुचि जगाती है, तो उसे पढ़ने और अपने पुस्तक-संग्रह का हिस्सा बनाने पर विचार करें। आपका पाठकीय सहयोग स्वतंत्र साहित्य-सृजन को प्रोत्साहित करता है और विचारपरक लेखन को अधिक पाठकों तक पहुँचने में सहायक होता है।

— पवन कुमार