संध्या-वेला में स्वान्वेषण
मनुज-सृजनशीलता सदैव तो एक सम नहीं, हमें सकल क्षीणताऐं दिखती हैं समक्ष
भिन्न प्रक्रिया-तापों से गुजर, अग्रचरण हो विचारित-लक्ष्य चूमने में लगता है समय।
लेखन-शैली
पटरी पर आने में समय लेती, मनुज-मस्तिष्क कभी उबाऊ सा
दिखता
गुणवत्ता-उत्पादकता अति न दर्शित, समय काटना मजबूरी व सब निरर्थक लगता।
आत्म-श्रेष्ठता के वहम भग्न होते, हस्तप्राप्य परियोजना में प्रगति होती नहीं दिखती
अंततः मन को समझाना ही पड़ता है, एकांतता-स्थिति की कीमत चुकानी पड़ती।
पर नर को अमुक समय बिताना पड़ेगा, हाँ श्रेष्ठता चिन्हित कर सकता क्षणों में
'भागते चोर की लंगोटी सही', यानि यथासंभव महत्तम लाभ लेने की ही सोच लो।
मैं भी अति उत्पादक न वर्तमान सायं-क्षणों में, मात्र बोरियत-क्षण पाटने का यत्न
बालकॉनी में कुछ देर खड़ा होकर आया, दूर कहीं वर्षा हुई है, यहाँ भी हो शायद।
मनुज को सत्य-शुभ विचारना चाहिए, गुणवत्ता देगा प्रक्रिया से कुछ उत्तम निकल
अब बारिश शुरू, बालकॉनी-द्वार खुला, मैं बेड पर लेटा, देह-भार है कुहनियों पर।
फर्श पर बिछी चादर पर डायरी रखी, दृष्टि पृष्ठ पर, व पीछे-दाएँ रोशन हैं दो बल्ब
एक उत्तम मनन जँच जाए व कलम कर्म करने
लगे, तो कुछ कालजयी हो रचित।
हाँ, शुभेच्छा तो सदा उत्तम, संसार चलता स्वयं व विश्व प्रति सकारात्मकता रखने से
एक अक्षुण्ण सत्य कि वातावरण-अनुरूप
ही मन-बुद्धि के भी मौसम बदलते रहते हैं।
एक काल भिन्न जग-स्थलों पर सब समय, धूप-छाँव, रात-दिवस, प्रातः-शाम हैं होते
सब तरह के विषय-संदर्भ लोगों के
समक्ष होते, अच्छे-बुरे काम सब
होते ही हैं रहते।
अब बारिश बंद किंतु अँधेरा, मन जमाने हेतु इस संध्या-वेला में स्वान्वेषण-प्रयास है
दायित्व तो निभाना, चाहे आगे का कुछ पता नहीं, पर चलेंगे तो कुछ
दिखने लगेगा।
कोई भी समस्या अंतिम न, बीच में अन्य आ जाती, सुलझाने में लगता है कुछ समय
हल तो प्रायः जटिल ही, तब मात्र प्रतीक्षा कर सकते, या मूड बदलने हेतु
करते कुछ।
मैं भी विरला न, पर कुछ योजना समर्थ, सुंदर जग-निर्माण में मेरा
भी हो कुछ हाथ
चाहे अतिलघु तत्व,
'ऊँट के मुँह में जीरा' कर्त्तव्य ही, माना कि नितांत है अपर्याप्त।
सुस्त न रहना चाहता,
ढोल बजाते रहना, निकट परिवेश में गूंज चाहे अल्प ही प्रभाव
'डूबते को तिनके का सहारा' भी बन सको तो उत्तम, नित्य अनेक सुलझते हैं आयाम।
उत्तम बुद्धि-सेटिंग एक स्वाभाविक
वरदान, बलात न किंतु प्रयास तो पथ
दिखाएगा ही
प्रथमतया जड़त्व से लड़ना होता, आगे तो खुद सहारा देकर कुछ उम्दा करवा लेती।
बीच में आ कुछ प्रेरणा दे जाती, स्मरण करा देती, एक अप्रतिम करवा देती साक्षात्कार
'मन चंगा तो कठौती में गंगा' जैसा दृष्टांत बनाती, मन में उदित होने लगते हैं शुद्ध भाव।
पहले ऋषि-मुनि वनों में प्राय: एकांत
वासी थे, पर सदैव मनन में तो नहीं सकते रह
आज भी अनेक लोग एकस्थ हो ध्यान लगाते, भीड़भाड़ से कहीं दूर एकाकी होकर।
पर उनके अंतः में भी बोरियत-क्षण आते होंगें, पाटन हेतु कुछ उपाय करते ही होंगे
माना अनेक जुझारू देश-दुनिया के
संदर्भ ढूँढकर समस्या-पाटन में व्यस्त हैं रहते।
शांत कविचित्त तो न बहुमुखर हैं, प्रायः गृह-निवास ही जबतक न अत्यावश्यक
तो वे करें भी क्या, जब प्रसन्नता हेतु, पर्याप्त सामग्री मिल
जाती हैं अपने निकट।
यह भी कि हम पूर्वजों को सुमर सकते, वे कभी हमारी भाँति चलते-फिरते पुर्जे थे
किंतु काल ने उनको सब भाँति ग्रास
बना लिया, अब मात्र शेष स्मृति अंतः में है।
क्या जीवन मात्र स्वयं में व्यतीत
करने हेतु है, अथवा इसे चलायमान भी
करें कुछ
क्या इसे कुछ योजनाबद्ध कर सकते, अभ्यास से देह सौष्ठव-स्वस्थ सकती है बन।
मस्तिष्क माना शरीर का ही एक भाग, किंतु मुख्यतया विचार में ही बीतता काल
अब उनसे कैसे पूरा काम लिया जाए, पूर्णतः तंदरुस्त होंगे तो करेंगे ही शुभ काम।
प्राचीन व वर्तमान में भी लोग
संध्या-उपासना करते, मन-साधन का
करते प्रयास
शाम को मंदिरों में पूजा-प्रार्थना, लोग आँखें मूंदकर निज ईश में लगाते हैं ध्यान।
मन को कुछ शांति सी भी मिलती, परिवेश एक ध्यान लगाने हेतु होता है उपयुक्त
मनुष्य ईश-सान्निध्य से गौरवान्वित होते, वे अपनी मन की इच्छाएँ भी लेते हैं कह।
भारत में बहु मंदिर-मस्जिद, चर्च-गुरुद्वारे, धार्मिक अनुष्ठान-प्रार्थना
वहाँ पूरी होती
सेना, पुलिस पैरा-मिलिट्री बलों के कैंपों में लोग पूजा-गृह बना लेते, प्रार्थना चलती।
लोग प्रातः-शाम मंदिर जाते दिखते, हाथ में पूजा की थाली लिए कुछ अर्पित करने।
लोग स्वयं में पुण्य भाव लिए हो सकते, किंतु पूर्वाग्रह रहता समाज-घटकों के प्रति
काल संग सोच भी परिवर्तन, सर्व-प्रतिनिधित्व की बात होती, किंतु सबको न जँचती।
सहस्र वर्षों के दुराभाव लेकर हम डोल
रहे हैं, मात्र कुछ जन-विभिन्नताओं के चलते
आज के वैज्ञानिक युग में भी क्यों
मनुष्यों में भेदभाव, यही बड़ा सबसे विरोधभास है।
दुनिया एक अद्भुत परिवेश, नेताओं द्वारा अनेक समता-आंदोलन चलाए जाने
जरूरी
समाज-सुधार की तो प्रतिकोण होना
चाहिए, क्यों अंत्योदय-वार्ता हों बस चुनावों में ही।
हर जीवन-क्षेत्र में सबसे गरिमापूर्ण
व्यवहार हो, और सबसे एक सहोदर सम
व्यवहार
सब नर ससम्मान रहे, लोक सोच सकारात्मक, उत्तम-समतापरक शिक्षा पाएं बालक।
मात्र मन में विचारता, बाह्य तो नहीं अति प्रसारण, कुछ धरातल पर भी बदलाव हों
इतनी शक्ति-साहस देह-बुद्धि में कि
बाहर निकलकर कुछ आयाम उचित कर दो।
साहसी पुरुष ही धरातल पर सत्य समाज
सेवा करते, निज बात बेबाकी से कह देते
संबंधित तंत्रों से वार्ता करते हैं, अन्य-अपेक्षाऐं भी ध्यानते, और कुछ लाभ भी ले लेते।
कुछ कवि-लेखक, पत्रकार-विचारक तंत्रों से डरे रहते, सत्य
कथन कहने से घबराते
किंतु कई तो
स्पष्ट कह देते, मनुष्यों में साहस-प्रेरणा भरते, किंचित बदलाव होता भी।
सब डर-छुपकर न बैठते, सशक्त तंत्रों से नित संघर्ष करते, अंततः विजय पा लेते ही
लेकिन पीछे सशक्त संगठन बनाना होता, धन-बल जुटाना व प्रखर सोच बनानी होती।
जो भी सकारात्मक परिवर्तन इस जगत में
दर्शित हैं, वे घर से बाहर निकलकर ही हुए
स्वयं में जितने भी अच्छे हों, लाभ देश व समाज को भी मिलना चाहिए, सार्थकता तभी।
घर में बोर रहना निश्चितेव
अकर्मण्यता-परिणाम है, कुछ व्यस्तता
भले उद्देश्यों हेतु हो
आपसे कुछ अपेक्षाऐं हैं: देह-क्रिया
बढ़ाओ और यदि जरूरी हो तो समस्याओं से जूझो।
सब परिस्थितियों से निपट, समाज में एकता बनाकर आत्म-सशक्तिकरण करना चाहिए
सब समाजों में सबल नेतृत्व उदित हो, सबके साथ बैठकर महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात
करें
यहाँ ऐसे
आर्थिक-सामाजिक-ऐतिहासिक-धार्मिक, क्षेत्रीय, प्रकृति आदि अनेक संदर्भ हैं।
विकासवाद में मानव एक इकाई है, जैसे बंदर-रीछ-शेर-मगर-जिराफ़-हिप्पो और गेंडे हैं
पुराणों की अद्य वैज्ञानिक सोच
अनुरूप पुनर्भाषण-अनिवार्य है, लोग
परस्पर पास आएंगे।
फिर जैसा समझ में आया, लिख दिया, किंतु एक बड़ी सोच से अनेक अधूरे कार्य पूरे करने
निज समय-सदुपयोग से जीवन विराट होना चाहता, आत्मा-बुद्धि का
सहयोग अपेक्षित है।
आशा है ऐसा ही होगा।
पवन कुमार,
13 जून, 2026, शनिवार, समय 3:45 बजे अपराह्न
मेरी ब्रह्मपुर (ओडिशा) डायरी दि० 22.09.2024, रविवार, समय 5.05 बजे अपराह्न
Shashi Ranjan, DD News : Sir Namaste 🙏
ReplyDeleteA thoughtful and inspiring poem. It beautifully expresses personal feelings, self-reflection, and a positive outlook on life. The message encourages us to keep moving forward, stay hopeful, and do our best for society.
Balwan Singh Arya : वाह...यथोचित मनन ही कृत्य की दिशा तय करता हैं...!
ReplyDeleteBharat Sharma: If your steps do not stop when the path seems unclear, the way will reveal itself.
ReplyDeleteEvery small spark of sincere effort will one day become a radiant light.
What appears today as a tiny drop may tomorrow grow into a vast ocean.
Walk forward with a positive mind, and every evening will awaken into a new dawn.