श्रम का सम्मान
श्रम केवल शारीरिक परिश्रम नहीं, बल्कि बुद्धि, कौशल, उत्तरदायित्व और सेवा का भी रूप है। यह चिंतन श्रम की गरिमा, उद्यम की भूमिका तथा श्रमिक, स्वामी और समाज—तीनों की साझा नैतिक जिम्मेदारी को समझने का एक विनम्र प्रयास है।
आज 1 मई—श्रमिक दिवस है। मैं भी श्रमरत हूँ; यद्यपि मेरा श्रम मुख्यतः बौद्धिक है, दैहिक नहीं।
वस्तुतः श्रम का स्वरूप बहुरूपी है। यद्यपि शारीरिक श्रम को प्रधान माना जाता है, तथापि बुद्धि, अनुभव और कौशल का भी अपना महत्त्व है। बौद्धिक और दैहिक—दोनों प्रकार के श्रम अंततः समाजोपयोगी कर्म के ही रूप हैं। प्रायः प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में श्रमिक है। अत्यल्प लोग ही बिना परिश्रम के जीवन बिताना चाहते हैं; सभी जानते हैं कि श्रम ही जीवन का आधार है।
खेती करना, अन्न उगाना, पानी लाना, कपड़े बुनना व सीना, भवन एवं सड़कें बनाना—सब श्रमिक-कर्म हैं। दुकानों पर सामान बेचना, बोझ उठाना, वस्तुएँ बनाना, शिल्पकारी करना तथा सड़कें-गलियाँ स्वच्छ रखना भी उसी श्रम-गरिमा के उदाहरण हैं। जूते बनाना, कारखानों में काम करना, मरम्मत करना, तेल निकालना, चौकीदारी करना, कोयला-खनन करना तथा लकड़ी काटना—ऐसे असंख्य कार्य समाज की आधारशिला हैं।
शायद श्रमिक दिवस की परिकल्पना में कार्यालय-कर्म, लेखन, अध्यापन, शोध अथवा काव्य-कर्म को उतनी स्पष्टता से सम्मिलित नहीं किया जाता। किन्तु ये भी समाज के लिए किए जाने वाले श्रम के ही विविध रूप हैं। वस्तुतः जो भी कार्य ईमानदारी, उत्तरदायित्व और समाजोपयोगिता के लिए किया जाए, वह भी श्रम ही है।
वास्तविक भेद शायद श्रमिक और स्वामी के बीच नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व के निर्वाह में है। जहाँ नेतृत्व केवल आदेश देने तक सीमित रह जाए और सहभागिता घटने लगे, वहाँ दूरी भी बढ़ने लगती है। इसके विपरीत जहाँ विश्वास, सहभागिता और पारस्परिक सम्मान हो, वहाँ श्रम केवल जीविका नहीं, सृजन का माध्यम बन जाता है।
अक्सर छोटे व्यापारी अपने कर्मचारियों के साथ मिलकर काम करते दिखाई देते हैं। किन्तु कई बार लाभ का बड़ा भाग ऊपर ही सिमट जाता है और श्रम का उचित प्रतिफल नीचे तक नहीं पहुँच पाता। समाचारों में भी समय-समय पर घरेलू सहायिकाओं अथवा श्रमिकों के साथ अन्याय की घटनाएँ पढ़ने को मिलती हैं। ऐसी परिस्थितियाँ केवल आर्थिक व्यवस्था की नहीं, मानवीय संवेदना की भी परीक्षा हैं।
जहाँ श्रम का सम्मान घटता है और शोषण बढ़ता है, वहाँ सामाजिक असंतुलन जन्म लेता है। कार्य-विभाजन आवश्यक है, पर श्रमिक के स्वास्थ्य, सम्मान और सम्मानजनक जीवन-स्तर का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है।
यह भी उतना ही सत्य है कि किसी उद्योग, विद्यालय, महाविद्यालय अथवा अस्पताल की स्थापना और संचालन के लिए बुद्धि, साहस तथा पूँजी आवश्यक हैं। नए कार्यों की कल्पना करना, जोखिम उठाना और उन्हें सफल बनाना भी एक साधना है। उन स्वप्नों को साकार करने के लिए विशेषज्ञों, कुशल-अकुशल—सभी श्रमिकों का सहयोग अनिवार्य होता है। अतः उद्यम और श्रम एक-दूसरे के पूरक हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं। उचित पारिश्रमिक और परस्पर सम्मान, दोनों समान रूप से आवश्यक हैं।
यह भी सत्य है कि प्रत्येक व्यवसाय लाभ में नहीं चलता। अनेक संस्थाएँ कठिनाइयों से गुजरती हैं और कभी-कभी वेतन देना भी चुनौती बन जाता है। दूसरी ओर श्रमिक का भी परिवार है; उसकी भी आवश्यकताएँ हैं, बच्चों की शिक्षा है और जीवन की मूलभूत ज़िम्मेदारियाँ हैं। इसलिए संवेदनशील संतुलन ही स्थायी समाधान है।
समृद्धि तभी स्थायी बनती है, जब उसका लाभ अधिकाधिक हाथों तक पहुँचे। पूँजी और अवसर कुछ स्थानों पर ही सिमट न जाएँ, बल्कि श्रम के साथ न्यायपूर्ण रूप से समाज में प्रवाहित हों। लाभ कमाना अनुचित नहीं; परन्तु लाभ के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी जुड़ा होना चाहिए। श्रम का उचित सम्मान और न्यायपूर्ण प्रतिफल केवल श्रमिक का अधिकार नहीं, बल्कि समाज की स्थिरता का भी आधार है।
प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ-न-कुछ उपयोगी कार्य अवश्य करना चाहिए। उत्पादित समृद्धि का प्रवाह भी अधिकाधिक लोगों तक पहुँचना चाहिए। जितने अधिक कार्यस्थल विकसित होंगे, उतने अधिक लोग सम्मानपूर्वक उनसे जुड़ेंगे और समाज का आधार उतना ही सुदृढ़ होगा।
श्रमिक भी बुद्धिजीवियों के समान आदर के अधिकारी हैं। किसान हमारे अन्नदाता हैं और प्रत्येक श्रमिक समाज-निर्माण का सहभागी। इन्हीं के श्रम से हमारे घर, उद्योग, विद्यालय, अस्पताल और दैनिक जीवन सुचारु रूप से चल पाते हैं। उनके परिवार भी सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें, सबके बीच परस्पर समझ और सहयोग बढ़े। तभी वास्तविक उन्नति होगी; समाज मात्र वाद-विवाद में न उलझकर सहभागिता, संवेदना और सामूहिक उत्तरदायित्व की दिशा में अग्रसर होगा।
मूल संदेश
समृद्ध समाज वही है, जहाँ श्रम का सम्मान, उद्यम का उत्तरदायित्व और मानवता का संतुलन साथ-साथ चलते हैं।
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— पवन कुमार
Bharat Sharma: श्रम ही शक्ति है, कर्म ही पहचान है और राष्ट्रनिर्माण ही हमारा संकल्प है। श्रम को नमन, श्रमिकों को सलाम! 🙏
ReplyDeleteआपका लेखन निर्दोष एवं बहुत ही उत्कृष्ट है l बहुत बहुत बधाई व साधुवाद llll
ReplyDeleteAr. Satish Kumar Sharma : Great. Keep it up.
ReplyDeleteMy best wishes and blessings.
Mool Chand : बहुत सुंदर और अनुकरणीय लेखन 🙏🙏
ReplyDeleteSagar Mehra : Thanks for sharing your thoughts on such an important and interesting topic!
ReplyDeleteSagar Mehra : Thanks for sharing your thoughts on such an important and interesting topic!
ReplyDeleteAnand Dhiman : 👏🏻👏🏻🌹🌹🙏🏻🙏🏻💐💐👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻😍😍😍, बहुत ही सुंदर एवं उत्कृष्ट लेखन lll जय हो l
ReplyDeleteJK Paul : Maine aapko rachana padhi kafi acchi aur prernadayak hai. Sajha karne ke liye dhanyawaad 🙏🙏
ReplyDeleteBahut khoob
ReplyDeleteDr. Ranbir Singh: Absolutely true and necessary!
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