प्रकृति-स्वर में आत्मबोध
बाहर चिड़ियों-तोतों का शोरगुल है, जैसे सर्दी-कुहासे में सुखद संवाद,
विभिन्न ध्वनियों की एक प्रतिद्वंद्विता-सी, मानो प्रकृति का अपना नाद।
मानव तो घरों में सिकुड़े बैठे हैं ठंड में, पर खग-जगत अति चलायमान,
कोलाहल से मुक्त परिवेश मिले, तो क्यों न हो उनका मन गतिमान?
ये खग-वृन्द कितने उत्साहित, उछल-फुदककर प्रसन्नता दर्शित करते,
सुबह शीघ्र जाग, एक समन्वय में परस्पर जैसे आदान-प्रदान करते।
एक-दूजे से वे सुख-दुःख बाँटते, सबकी खुशी में अपनी खुशी पाते,
विस्तृत विश्व के वे भी अवयव हैं, अपने परिवेश में फिर क्यों न मचलें?
यह आह्लाद एक परमानुभूति है, यदि प्राप्त हो तो सचमुच ही अमूल्य,
इस हेतु अनेकों ने सामान्य जग छोड़, प्रकृति-शरण को माना मूल्य।
अनंत से जितना भी हो सके आत्मसात, तन-मन हो जाए सराबोर,
विश्व-कल्याण भले स्वयं से न हो सम्भव, सरसता से लरजे अंतःकोर।
परोक्ष में ध्वनित इनके सतत मधुर गान से मैं पूर्णतया मंत्रमुग्ध हूँ,
जैसे मैं इनमें से ही एक हूँ—तनिक कुछ सुस्त, बस अलग बैठा हूँ।
जानता हूँ, यदि उन्हें छेड़ा तो उड़ जाएँगे, सारा खेल बिगड़ जाएगा,
बाधा कोई न हो—यही योगाभ्यास; उनका सहज क्रम चलता जाएगा।
जितना भी सुनूँ, उतना ही गुनूँ—मैं सुनता रहूँ, और तुम गाते रहो,
भोर का यह मधुर प्राकृतिक संगीत, कोमल भाव बस जगाते रहो।
यदि देख सकूँ तो और भी उत्तम हो, पर अभी कलमबद्ध हुआ हूँ,
उठूँगा तो क्रम टूटेगा; फिर कितना जुड़ेगा—इसी सोच में रुका हूँ।
वाल्मीकि तो कवि बन गए थे, क्रौंच-युगल में से एक का वध देखकर,
करुणा उमड़ पड़ी थी भीतर, निरीह जीव का दुःख हृदय में भरकर।
निरीहों का कष्ट देखकर, क्या कोई स्नेही रह सकता है अविचलित?
पेशल भाव स्वतः उदीरित होते, करुण स्वर हो जाता हित-निमित्त।
यह मन-प्रमोद भी क्या है—किंचित इस प्रकृति से एकरूप हो जाना?
सम्पूर्ण विश्व-सौन्दर्य का उपासक बन, स्वयं को उसका अवयव पाना।
जीव-अजीव यहाँ सब विराट के रूप हैं, सौन्दर्य उसी का होता प्रकट,
जीवित चेतना और भी प्रिय है, प्रत्यक्ष संपर्क ही कराता है बोध निकट।
सीमित से अनंत की ओर जब बढ़ते, भीतर भी कोई द्वार खुलता है,
प्रकृति से जुड़ते-जुड़ते अपना भी पृथक अस्तित्व तनिक धुलता है।
मैं भी अपना अस्तित्व खोना चाहता, उस परम में होना परम-लीन,
जैसे अग्नि में रूप पिघलकर खो देता अपनी पृथक पहचान महीन।
इस पञ्चतत्त्व में ही हर पल चलता आदान-प्रदान का निरंतर क्रम,
बस जरूरत है इसे अनुभूत करने की; फिर कहाँ द्वैत, कैसा भ्रम।
हम भी इसी विस्तृत ब्रह्माण्ड के अंश हैं, उसी प्रकृति से गहरा नाता,
यहाँ हर श्वास, हर स्पन्दन चुपके से साझे अस्तित्व का बोध कराता।
अनेक लोग बैठे सर्दी में रजाइयों में, किंतु कुछ प्रातः निकल जाते सैर,
कई भाँति के व्यायाम करते, मौन मनन में खोजते अंतर्मन की खैर।
जब हम स्वयं निःशब्द हो जाएँ, प्राकृतिक संगीत बने सहज सौगात,
स्वयं को भूलकर बृहद्-अंश बन जाना—शायद यही मुक्ति की बात।
कर्मठ सदा चलायमान रहते हैं, माना वातावरण से प्रभावित भी होते,
बाहर अधिक न दिखें तो इसका अर्थ नहीं कि वे निष्क्रिय होकर सोते।
अनेकों मनस्वी मनन में लीन रहते हैं, अन्य उन्हें चाहे जिस भाँति लें,
जीव में जब तक प्राण-स्पन्दन, कर्मठता अपना सहज क्रम चलने दे।
पंछी-सम हम कभी बाहर निकलें, फुदकें-उड़ें और निज नाद करें,
प्रसन्नता के उच्चतम शिखर चूमने हेतु सतत प्रयत्न और संवाद करें।
अपने उद्गारों को बाहर करना सीखें—मधुर होंगे तो दुनिया सुनेगी,
यदि कर्कश भी हों, तो मिली प्रतिक्रिया शायद कुछ नई समझ देगी।
आओ, इस जिजीविषा को सुदृढ़ बनाएँ; न सोचें सदा हम ही गलत हैं,
जब सब किसी न किसी भाँति सीख रहे हैं, तो हम क्यों पीछे खड़े हैं?
देखें-समझें, फिर अपनी भाँति नृत्य करें—सबने अपनी राह बनाई,
दीन न समझें स्वयं को कभी; परम ने हमें भी बड़े यत्न से है बनाया।
इस धवल तुषार की मनोरम छटा का आनंद लें, मनीषी वृक्ष-सम निहारें,
ज्ञान-चक्षुओं को सदा खुला रखें, आमोद-प्रमोद को भी जीवन में उतारें।
सैर, व्यायाम, योग और मनन—इस तन-मन के हैं अपने-अपने आधार,
उपलब्ध क्षणों के सदुपयोग से ही धीरे-धीरे गढ़ता जाता जीवन-व्यवहार।
जब कभी अकेला सैर को निकलता हूँ, तो मन विचारों से भरता जाता,
कुछ विगत वर्षों से प्रातःकालीन लेखन भी अपनी ओर मुझे है बुलाता।
यहाँ एक साधना को समय मिले, तो दूजा अवसर कुछ पीछे रह जाता,
यह जीवन भी अद्भुत—एक को पाने में कभी कुछ अन्य छूटता जाता।
यही तो उपलब्ध क्षणों का प्रयोग है, जिससे जीवन अपना ढर्रा लेता,
कभी सैर, कभी लेखन, कभी योग—हर अभ्यास कुछ विरला देता।
तन की सक्रियता जितनी आवश्यक, उतना ही मन का भी विस्तार,
दोनों के संतुलित अनुशासन से ही जीवन पाता एक स्वस्थ आधार।
श्वसन-तंत्र का स्वास्थ्य परम आवश्यक, जीवन को सुदृढ़ बनाने हेतु,
स्वच्छ वायु उसकी बड़ी पूरक है; वृक्ष-प्रचुरता बनती संरक्षण-सेतु।
अतः हम जितने वृक्ष लगा सकें लगाएँ, परिवेश स्वच्छ-निर्मल बनाएँ,
प्राणी-मात्र के इस स्पन्दन-तत्त्व की रक्षा में यत्नशील-तल्लीन हो जाएँ।
चाहे ईश-ध्यान हो या श्वास पर ध्यान, एकाग्रता की युक्ति सीखते रहें,
भीतर चलते प्राण-स्पन्दन को भी कुछ क्षण निःशब्द होकर देखते रहें।
यह जीवन आगे बढ़ता ही जाएगा; हम बस उसके प्रवाह में चलते जाएँ,
प्रकृति, प्राण और परम के सम्बन्ध को निज अनुभव में उतरता पाएँ।
बाहर खग-वृन्द का मधुर नाद है, भीतर श्वासों का अविरल गान,
धवल तुषार से उगता प्रकाश है, जगाता भीतर भी नया विहान।
जितना भी सुनें, उतना गुनें—प्रकृति से अपना शुद्ध संवाद बना रहे,
उसके विराट स्पन्दन में अपना लघु-सा अस्तित्व भी सदा आबाद रहे।
मर्म:
प्रकृति को केवल देखें नहीं—उसे सुनें, गुनें और उसके विराट स्पन्दन में अपने अस्तित्व को पहचानें।
— पवन कुमार
18 अगस्त 2026, मंगलवार | रात्रि 11:24 बजे
(मेरी महेंद्रगढ़ (हरियाणा) डायरी, 8 जनवरी 2016, शुक्रवार | प्रातः 7:31 बजे से)
कविता के माध्यम से प्रकृति का अद्भुत एवं दिव्य विश्लेषण , अति सुन्दर l मन कर रहा है बार बार पढ़ कर मनन करूं l जय हो l आनंद आ गया lll
ReplyDeleteभरत शर्मा : आपकी रचना ने शीतभरी भोर में प्रकृति के जीवंत संगीत का सुंदर चित्र उकेर दिया।
ReplyDeleteपक्षियों का कलरव मानो हमें प्रेम, समन्वय और सहज आनंद का संदेश दे रहा है।
हर पंक्ति में प्रकृति से आपका आत्मीय संवाद स्पष्ट सुनाई देता है।
सचमुच, जो प्रकृति की मौन भाषा समझ ले, उसका अंतर्मन आनंद से भर जाता है।
ऐसी भावपूर्ण और मनमोहक रचना के लिए आपको हृदय से साधुवाद!
आनंद शर्मा: अद्भुत कृति l अति सुन्दर, दिव्य l आनंद आ गया पढ़कर l जय हो l मां सरस्वती की आपके ऊपर अनंत कृपा है l जय हो l 👌🏻👌🏻😍😍👍🏻👍🏻🙏🏻🙏🏻💐💐🌹🌹👏🏻👏🏻
ReplyDeleteपिंकेश कुमार: नमस्कार मामाजी 🙏
ReplyDeleteबहुत ही सुंदर एवं भावपूर्ण रचना। आपकी लेखनी में एक सहृदय कवि की संवेदना, एक मनीषी की चिंतनशीलता और एक प्रकृति-साधक की सूक्ष्म दृष्टि का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। प्रकृति के सहज सौंदर्य से आरम्भ होकर जीवन, चेतना और अस्तित्व के गहन चिंतन तक पहुँचती यह रचना मन को छूती भी है और सोचने के लिए प्रेरित भी करती है।
ऐसी सुंदर एवं विचारपूर्ण रचना के लिए आपको सादर प्रणाम एवं हार्दिक बधाई। 🙏🌿
जयंत पाॅल: अति उत्तम 🙏💐
ReplyDeleteराजीव वर्मा: पवन जी आप के आत्मबोध को कोटि कोटि नमन💐💐💐🙏🏻
ReplyDeleteबहुत ही खूब रचना।
ReplyDelete