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Saturday, 29 August 2020

हमारी लूना

हमारी लूना

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एक  पिल्ली हमारे घर में आई, और  प्रवेश हुआ आनंद

लैब्रेडोर प्रजाति की वह कृष्ण श्वान-कन्या, वय दो मास। 

 

२२ अक्टूबर, २०१४ सांय जब कार्यक्षेत्र महेंद्रगढ़ से घर पहुँचा,  

यह घर थी, बेटा सात्विक व उसका पड़ौसी-मित्र तुषार थे वहाँ। 

वह अति प्रिय व संवेदनशील, जैसे पूर्व से ही सबको जानती थी 

पुत्री सौम्या भी वहाँ थी, एक दिन पूर्व अपने हॉस्टेल से आई थी। 

 

सात्विक ने बताया  हमारी ही है, किसी NGO ने उपहार दी है 

 शहर में  कई कुत्ते-प्रेमी हैं, इच्छुकों को बेहतर ध्यान हेतु दे देते। 

उत्तम नस्लियों का तो बहु बाजार-मूल्य, पर कभी मुफ़्त भी प्राप्त

ये जीव बड़े मिलनसार, और वस्तुतः मानव के हैं बहुत  निकट। 

 

इसका नाम रखा था लूना, जो अतीव प्रिय और चपल थी 

हाथ-पैर मुँह से चाटती, झूठे ही काटने का नाटक करती। 

सौम्या को कुत्तों से बड़ा प्रेम है, काफी दिनों से पिल्ला लाने को रही थी कह 

सात्विक हाँ मिलाता, उसे भी खेलना-बातें करना अच्छा लगता उनके संग।  

 

उषा भी उत्साहित थी, और बच्चों की ख़ुशी में शामिल थी 

मैं भी कुछ पशु-प्रेमी सा, मिलने पर बना लेता हूँ दोस्ती। 

प्रेम एक ऐसी भाषा है, भले से समझते हैं जिसे जीव सब

एक दूजे के प्रति जिम्मेवारी वातावरण को बनाती मधुर। 

 

सौम्या उसे अपने कक्ष में रखती, उसका पूरा ध्यान रखती 

बाहर घुमाने ले जाते, जहाँ वह मल-मूत्र त्याग कर्म करती। 

शिशु ही तो है ध्यान माँगती, समझने संकेत व संवाद-भाषा

बच्चे सम उसका ध्यान रखना, यदि गृह-सदस्य है बनाना। 

 

अगले दिन मैं प्रातः उसे घुमाने ले गया सैक्टर-६ के पार्क 

हमने वहाँ दो चक्कर लिए, और बड़ी प्रसन्नचित्त थी वह। 

सोसाइटी के बच्चे हिलमिल गए, जैसे वह उनमें ही एक है 

संग खेलना-दौड़ना-पुकारना, बनाता एक मनोहर दृश्य है। 

 

भले ही अभी तक कुत्ता न पाला, पर संपर्क तो बचपन से ही मेरा 

रूचि  सब पालतुओं में, पर उनका मल-त्याग कुछ भद्दा लगता। 

जब हम छोटे बच्चे थे तो पिल्लों के लिए घरों से मल्लौटा माँगते थे 

'दे दो मल्लौटा, थारे घर के बाहर झोटा' कुछ ऐसे संवाद बोलते थे 

कुतिया माँ पिल्लों को दूध पिलाने हेतु अतिरिक्त ऊर्जा मिलती। 

 

रविवार तक तो छुट्टियाँ सब घर पर थे, अतः न कोई चिंता का विषय

शनिवार शाम सात्विक-तुषार संग गया सैक्टर-६ के पशु-क्लिनिक। 

डॉ० इंद्र सिंह ने लूना को जाँचा, व संक्रमण-बचाव हेतु लगाया टीका 

कुछ कैल्शियम व मल्टी-विटामिन शीशियाँ, सुझाव सहित दी थमा। 

 

बच्चे उत्साहित पर मैं व उषा कुछ चिंतित, कार्य-दिवसों में कैसे चलेगा 

सौम्या  कॉलेज में, मैं महेंद्रगढ़ और उषा-सात्विक अपने विद्यालयों में। 

उस  समय  नन्हीं लूना का ध्यान कौन रखेगा, कौन बाहर घुमाएगा उसे 

खैर खाने-पीने की तो कोई न चिन्ता, पर नन्हीं जान अकेली रहेगी कैसे?

 

मन में कई विचार कि सात्विक की नानी या मौसी के पास छोड़ दें 

पर सौम्या तो मात्र भी तैयार न, कि अन्य के पास भेजा जाए उसे। 

तब उषा के आगमन तक नीचे गार्ड के पास रखने का दिया सुझाव 

पर वह बहुत संभव नहीं क्योंकि वे हमारे तो नहीं हैं  निजी चाकर। 

 

सुबह जल्द जाने की मजबूरी, सब अति-व्यस्त, लूना की होती चिंता 

सोमवार महेंद्रगढ़ आया, उषा ने लूना को सौम्या के कमरे में छोड़ा। 

दोपहर को जब उषा घर आई, कक्ष में लूना मूत्र-गंदगी से  बेहाल थी 

बड़ा मार्मिक दृश्य, बेचारी कूँ-कूँ करती, अकेले तो थी न रह सकती। 

 

परसों सौम्या घर पर आई और लूना को लेकर थी बहुत चिंतित 

अपनी मम्मी पर गुस्सा थी कि हम लूना को न रख रहे हैं उचित। 

पर  समझती भी यह सब मजबूरी, तथापि प्रेम-वश विव्हल थी 

कल कॉलेज से छुट्टी की, कुछ उपाय लूना को छोड़ने का कहीं। 

 

परसों रात बड़ी परेशान थी, मैंने दो बार बात की - समझाया 

कहा हम भी चिंतित हैं, पर उपाय तो कुछ करना ही पड़ेगा। 

छोटी बच्ची पर अत्याचार, असावधानी तो पाप ओर धकेलती 

अगर घर पर एक सदस्य भी रहता, तो फिर कोई चिंता न थी। 

 

कल दोपहर सौम्या लूना को अपने संग ही हॉस्टल ले गई 

कहती किसी पैट- केयर में दूँगी, दिसंबर में ले आऊँगी। 

रात मैंने उससे बात की, उसकी मन-पीड़ा में शरीक हुआ 

बड़ा बुरा लग रहा पर लाचार, अतः यही उपाय मंजूर किया। 

 

सात्विक से भी बात की, जब संभव होगा पिल्ला रखेंगे अवश्य 

हमें ख़ुशी होगी यदि अपने बच्चों की ख़ुशी में शामिल हों हम। 

बकौल उषा सोसाइटी के बच्चे लूना प्रति बड़े ही उत्साहित थे

उन्हें भी बड़ा कष्ट लग रहा, क्योंकि वह तो प्रिय ही इतनी है। 

 

सामने A-६०४ के मि० डे का बेटा सोनू, जो प्रायः हमारे घर ही रहता 

 २ साल का वह लूना से हिलमिल गया, उसकी रस्सी लेकर है चलता। 

शुरू में तो वह डर रहा था, लेकिन अब कुछ दोस्ती सी थी हो गई 

एक सप्ताह का आनंद अंत में, एक  महद पीड़ा देकर गया है ही। 

 

उस लूना की मधुर स्मृति, चिरकाल तक रहेगी हमारे जीवन में 

मुझे न मालूम मुझे अब कभी मुलाकात भी होगी या न उससे। 

पर कामना  जहाँ भी रहे खुश  रहे, एक अच्छी देखभाल मिले 

अंततः हमारी ख़ुशी उसी सब में है, जो सर्वहित से जुड़ी हुई है।

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(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी २९ अक्टूबर, २०१४ समय ९:२० बजे प्रातः से ) 



                                       और उसके बाद वर्तमान स्थिति ---------------------------------


हुआ यूँ कि सौम्या ने लूना छोड़ी ही नहीं, उषा ने कष्ट से लूना को पाला 

उसे घर  छोड़ती, कभी कोई छुट्टी लेता, वर्ष भर सफाई का काम बड़ा। 

फिर जैसे-तैसे एक दूसरे को समझा, लूना ने भी काफी नियंत्रण किया 

अब घर की एक पूर्ण सदस्या, पूर्णतया सबको निज पाश में ले है रखा। 



पवन कुमार,

२९ अगस्त, २०२० समय ८:२२ बजे प्रातः :


Monday, 17 August 2020

इंद्रधनुषी रंग

इंद्रधनुषी रंग
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शाखा का सिहरना, मलय का बहना, पत्ते झड़ना, हिम-नद का सरकना
चिड़िया का गीत, समुद्र का उफान, सूरदास का गायन, बूढ़े का सम्मान।  

रक्त-प्रवाह, श्वास का चलन, उर की धड़कन, उत्सर्जन तंत्र, श्रवण-नयन
कंचन-चमक, कंगन खनक, रसिक धुन, झूझने की ललक, गौरव-पथ। 
तप्त हृदय हूक, लुहार की फूँक, निशाना अचूक, मनीषी चिंतन-दर्शन 
वीर की हुँकार, उद्यमी प्रयास, अजातशत्रु सी मैत्री, भृत्य का सेवाभाव। 
 
 प्राची का सौंदर्य, सरोवर का नीरव, चंद्र का उदय, सूर्यास्त की लालिमा 
सूर्य की ऊर्जा, पृथ्वी-धीरता, आकाश की विस्तृता, सुरम्य की भव्यता। 
कस्तूरी की महक, चंदन-हींग-इलायची की सुगंध, तुलसी की पवित्रता
हल्दी-औषधि, त्रिफला सा सेवन, खीरे-पपीते-शीताफल सी सुपाच्यता। 

द्रौपदी का चीर, राँझे की हीर, राम की पीर, मीठी खीर, पावस का नीर
प्रेमी की चाह, प्राणी-साँसत, युवा का साहस, पंछी  की उड़ान, गंभीर। 
कष्टों  का जाल, देह का विश्राम, पथिक की थकान, दरिया का फैलाव
दिन-प्रकाश, धाँस की फाँस, क्रोध के दुष्परिणाम, अहंकार का नाश।

मौत का डर, तूफान में फँस, बगुले का ध्यान, भुजंग विष, बिच्छू का दंश
चकुवा-युग्ल, वानरी सी संतति-प्रेम, हस्ती सा घ्राण-बल, भेड़ सी नकल। 
 चितैरे मृग-नैन, भ्रमर-नृत्य, डॉल्फिन सी मित्र-सहायता, सर्वत्र-वासी मूषक
अजा बुद्धि व जिज्ञासा, मृग छावे का जन्म के २० मिनट में चलना आरंभ।  
 
हारमोनियम संगीत, शंख-ध्वनि, ढ़ोलक थाप, मृदंग नाद, बांसुरी की लय 
बीन की लहर, शहनाई  धुन, डुगडुगी की गड़गड़, खज्जरी की खनखन। 
 वीणा-सुर, घड़े की ढप, इकतारा तान, जल-तरङ्ग टनक, मंजीरे की ख़नक 
सितार सप्त-सुर, भोंपू का शोर, मन में गुनगनाहट, मित्र  फुसफुसाहट। 

गर्मी जलन-प्यास, भूमध्य रेखीय प्रदेशों की उष्ण, दक्षिण वृत्त में सर्दी पर 
पावस-बादर बरसें, हरियाली, भू-सुवास, भादों की उमस, इंद्रधनुषी रंग।  
शरत में रमणीयता-मस्ती, हेमंत पतझड़, शाली कटना, दिवाली की ख़ुशी
गृह-द्वार स्वच्छ, परस्पर बधाई, गले मिलते, भेंटें स्वीकारते, प्रसन्नता सी। 

शिशिर  में माघ-पौष की ठंडक - ठिठुरन, सर्वत्र शीत, दिन लंबे-रातें छोटी
जीव ऊष्मा चाहते, क्रिसमस-पर्व, साईबेरिया-आर्कटिक ध्रुवों में अति सर्दी। 
वसंत में वानस्पतिक सौंदर्य विस्तरित, सर्वत्र उल्लास-समृद्धि, होली का रास
उपवनों में बहार, सर्दी में कमी, आम्र-अंकुर, जीव-पादपों में चरम उल्लास। 
 
अमेरिका-जापान, द० कोरिया, प० यूरोप, यूनान विकसित, नभ-चुम्बी भवन
तकनीक समर्थ, उच्च जीवन-स्तर, शिक्षित प्रजा, सुविधाऐं, खोज-अंतरिक्ष। 
कई विकासशील जिसमें भारत-चीन भी एक, आगे  बढ़ने का यत्न कर रहें 
कई एशियाई-अफ़्रीकी-द०अमेरिकी अर्ध-विकसित, गरीबी-कहर झेल रहें।

महानता अंश, कर्मठता का दक्ष, सच्चरित्रता का अक्ष, संपूर्णता का कक्ष
मौलिकता का प्रयोग, वैज्ञानिक का उद्योग, किसान-कमेरे का सतत श्रम।
प्राणी सहयोग, कर्मठता का योग, उपयोगी निर्माण, सबका साथ-विकास
वसुधा-कुटुंबकम, परस्पर प्रेम, प्राकृतिक संतुलन व समन्वय सहेजना।   

गीता ज्ञान, तुलसी का मानस, मानस रस, रावण का ज्ञान, भर्तृहरि त्याग
शबरी के बेर, कृष्ण सी मैत्री, रंतिदेव सी करुणता, शंकर सा ब्रह्म-ज्ञान।  
ज्योतिबा फुले सी शिक्षा, राममोहन राय व विद्यासागर सा समाज-सुधार
सुकरात बुद्धिमता, बुद्ध सौम्यता, कबीर की फक्कड़ता, नव-संविधान।  


पवन कुमार,
१७ अगस्त, २०२० सोमवार, ६:२६ बजे प्रातः 
(मेरी  महेंद्रगढ़ डायरी २९ सितंबर, २०१९ शुक्रवार, २०१९ समय ९:०७ बजे प्रातः से)

Sunday, 9 August 2020

अनंत-चिंतन

अनंत-चिंतन 
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मेरी अनंतता के क्या मायने, या कुछ यूँही लिख दिया  एक शब्द
जीव तो स्व में ही सीमित, क्या सूझी स्वयं को कह दिया अनंत। 

अनंत तो नाम न पर अनेकों का, कुछ मनन से ही होगा नामकरण 
या सीमित को अनंत-दिशा हेतु, यहीं मत रुको अति दूर है गंतव्य। 
यदि निराश बैठे रहे, माँ से चिपके, घर-घुस्सू रहे तो कैसे हो प्रगति 
हदें तो बढ़ानी होगी, हर पोर में संपूर्णता की ललक चाहिए जगनी। 

नर-वपु में खरबों कोशिकाऐं पर एक प्राण तत्व, मिल गति-शक्ति देते 
पर क्या यह अल्प उपहार - नकारे या सस्ते में लें, अमूल्य स्वयं में है। 
हमने कुछ वस्तु-पण लगा दिया, जबकि निर्माण में लगी ऊर्जा अथाह
पर उपलब्धता व क्रय-शक्ति अनुसार करते सीमित मूल्य निर्धारण। 

पर प्रयुक्त अनंत शब्द का क्या हो अर्थ, सोचा कभी मेरी क्या सीमाऐं
या हूँ अन्तः विपुल जलधि या ब्रह्मांड प्रारूप, अद्यतन अजान जिससे। 
कुछ तो मैं भी अद्वितीय पर शायद चिन्हित न, क्षुद्र पहचान में ही मग्न 
यह न उचित, निज-संपदा परिचय से ही एक महत्ता हो सकती प्राप्त। 

अनंतता चिंतन से भ्रमितचित्त हूँ, और अन्वेषण श्रम, छूटता सा कुछ
अर्थात संभावनाऐं तलाशो, कुछ अवश्यमेव काम की होगी अनुरूप। 
सदा तो बहाने न  बना सकता, परम जीवन-तत्व कर से फिसल रहा 
क्यूँ संशय में हो - कोई न सहायतार्थ आएगा, कुछ झंझाड़ना पड़ेगा। 

स्वान्वेषण एक  अनवरत प्रक्रिया, पर शून्यता प्रतीतित क्षुद्र परिधि में 
फिर चाहूँ कि  अनंतता से संपर्क हो, हलचल मचा देता प्रति रोम में। 
रूमी तो न गुरु शम्स तबरीजी से मिल हद-परिचय, यहाँ सब सफाचट 
कब-किससे संपर्क हो अदर्शित, कथन-अशक्य, स्थिति में सी विक्षुब्ध। 

इस अनंतता के क्या अर्थ संभव, भिन्न आयाम नाना समयों पर उभरते 
शक्ति कितनी संभव है, सम कद-काठी वाले एक  सुदृढ़ -सौष्ठव बने। 
अनेक प्रातः भ्रमण करते, व्यायामशाला जाकर विभिन्न कसरतें  करते 
पसीना बहाते, फेफड़ों में पूरी हवा भरते, हृदय में रक्त-प्रवाह बढ़ाते। 

स्वच्छ्ता व बल निर्णय मन में स्थापित, क्रियाऐं ऐसी कि रहें पूर्ण स्वस्थ 
यूँ निद्रा-तंद्रा में न हो समय व्यतीत, पूर्ण जीने का एक लक्ष्य हो निर्माण। 
एक नियमित दिनचर्या स्वास्थ्यमुखी, तो कुछ दिन में दिखोगे सुंदर-बली 
यह भी सत्य है कि लोग एक व्यक्तित्व अंकन करते शरीर पुष्टता से भी। 

चाहे हम टायसन बनने में न समर्थ, तो भी सकते अनेकों से बली बन
पर यहाँ अन्यों से न प्रतिस्पर्धा, बस एक पूर्ण-स्वास्थ्य करना अनुभव। 
अर्थात एक ऐसा पथ चुनें जिसमें निज भी हित, उत्तम-अनंतता में पथ 
हदें सदा वर्द्धित होगी, अनंतता अर्थ भी दर्शित सामर्थ्य से अग्रचरण। 

माना दिमाग़ में परिमित कोशिकाऐं, तथापि क्या है समुचित सुप्रयोग  
कुछ काम अवश्य ही लो, वरन क्षीणता मनन में ही जीवन होगा पार। 
प्राण में मधुरतम क्षण रसास्वादन करना, किंचित इसे करना है पूरित 
यह पूर्णता ही संभवतया अनंत स्वरूप है, पश्चात मिल होंगे एक सम। 

यह दृष्टि विस्तृत होनी ही चाहिए, मृदुलतम स्वरूप दर्शन कर सकूँ 
जिजीविषा कदापि क्षीण न हो, स्व पवन नामानुरूप गतिमान होवूँ। 
अनंतता प्रत्येक प्राण-आयाम निहित हो, आमुखता की सोचूँ यत्न से 
क्षमता-वृद्धि भी इस दिशा से ही, हर विरोध पार जाने का साहस है। 

कोई न मन थाह बस चिंतन सीख लो, सफलता-द्वार खुलेंगे अनुरूप 
जग-व्यवस्था प्रयासों व मति अनुरूप ही, इसे और मृदु बना दो तुम। 
सुमधुर जग-गठन में पुण्यी सहकार करो, निज ही होंगे साधन सकल
इसी मन-देह का वासी मानना छोड़ दो, प्रभुता तुम्हारे चूमेगी चरण। 

अनंतता अर्थ स्व में असीम ब्रह्मांड निहित, सर्वस्व इसी से प्रतिपादित 
जय-संहिता के विपुल कृष्ण सा विश्व-रूप, पर  होना सदा प्रयासरत। 


पवन कुमार,
९ अगस्त, २०२० रविवार समय ९:०० बजे प्रातः
(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी १७ मार्च, २०२० समय ८:३२ प्रातः से)  

Monday, 27 July 2020

बरखा -बहार

बरखा -बहार 
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सुवासित सावन-शीतल समीर से उर है पुलकित, मेरा मन झूमे 
पर संग में  तो प्रियतमा नहीं है, दिल उमस कर ठहर जाता है। 

तरु शाखाऐं-पल्लव झूम रहें, कभी ऊपर-नीचे, कभी दाऐं या बाऐं 
एक अनुपम सी गति-प्रेरणा देते, देखो आओ बाहर स्व जड़त्व से। 
हम जग-अनिल से रूबरू, पूर्ण-ब्रह्मांड का आनंद निज में समाए 
निश्चित प्रकृति-सान्निध्य में वासित, संभव सुनिर्वाह में सहयोग करें। 

दिन-रैन, प्रातः-शाम-मध्याह्न के प्रयत्न-साक्षी, निहारते खुली कुदरत 
सर्वस्व झेलते देह  पर, सुख-ताप-शीत-चक्रवात का सीधा अनुभव। 
कोई घर तो न मनुज भाँति, अनेक छोटे-बड़े जीवों को देते बसेरा हाँ 
अनेक चिड़ियाँ-गिलहरी, कीड़े-मकोड़ों की शरण, नर्तन जीवों का।   

सावन में पवन की दिशा पूर्व से पश्चिम है, गर्मी-ताप से अति-राहत 
     आर्द्र-परिवेश से पर्णों को सुकून, उष्ण-कर्कशता से थे झुलसे वरन।     
ग्रीष्म से तो रक्त-द्रव ही शुष्क, अल्प भूजल, स्पष्ट क्षीणता-चिन्हित 
हाँ यथासंभव छाया-पुष्प-फल देते, निज ओर से न छोड़ते कसर। 

पावस-ऋतु तो अति-सुखकारी, अनेक बीजों को प्राण-दान लब्ध 
वरन पड़े बाँट जोहते, कब जमीं पर पनपने का मिलेगा अवसर। 
बहुतेरी मृत घास-फूस, खरपतवार आदि, वर्षा आते ही स्फुटित 
हरितिमा रुचिर, वरन निर्जन सूखे तरु, नग्न पहाड़ियाँ ही दर्शित। 

अब उदित मृदु-मलमली तीज, गिजाई-अग्निक, जो पूर्व में थे लुप्त 
अनेक कंदली - छतरियाँ दर्शित, जिनमें खुंभी भी कहलाते कुछ। 
जहाँ भूमध्य रेखा निकट सारे वर्ष वर्षा है, हरियाली की सदाबहार 
नीर-बाहुल्य से जीवन-विविधता समृद्ध, सूखे को हरा करता जल। 

वर्षा में ही वन-महोत्स्व, सिद्धता नन्हें पादपों के मूलों में निकट जल 
एक-२ कर चहक से उठते, ऊष्मा-पानी चाहिए बढ़ जाते एक दम। 
भू-लवण मात्रा वर्धित, एक से अन्य स्थल को खनिज बहने से गमन 
मृदा-गुणवत्ता पूरित, स्वच्छता होती, हर रोम खोलकर रिसाव जल। 

अति-ऊष्मा तप्त प्राणी-पादप को अति चैन, मन-आत्मा पुलकित 
शस्य-श्यामला वसुंधरा, समृद्धि-प्रतीक, हर रोम से तेज स्फुटित। 
लोगों की कई चाहें जुडी रहती, बरखा आई तो तीज, मेले-त्यौहार 
लोग एक-दूसरे को बधाई देंगे, मेल-जोल से तो बढ़ेगा प्रेम और। 

वर्षा एक जीवंत-ऋतु, सर्व स्वच्छता-प्रणाली को देती नव आयाम 
सारा कूड़ा-कचरा बह जाता, पहुँचने में सहयोग अंतिम मुकाम। 
सरिताऐं तो उफान पर होती, नहरों में भी पानी छोड़ दिया जाता 
धरा में जल-रिसाव, सरोवरों में एकत्र नीर पूरे साल काम आता। 

 प्रचुर खाद्य शाकाहारियों हेतु, दुधारू पशुओं में वर्धित दुग्ध-मात्रा 
घास-चारा खाओ न कमी, पहले  चरवाहे-पाली करते थे चराया। 
गड्डों में पानी-मिट्टी एकत्रित, लगता  समतल सी हो जाएगी पृथ्वी
सब भेद विस्मृत, कहीं-२ बाढ़ आने से लोग होते कठिनता में भी। 

कभी धूप -छाँव, बहुरूपी मेघ दर्शित, इंद्रधनुष छटा बिखेरता 
पक्षी-कलरव सुनाई देते, सतत हर्ष प्रकट कर ही देते अपना। 
धराधर मूसलाधार बरसते, प्रखर प्रहार, भागकर  होता बचना 
पथों में पानी प्रभृत, गड्डों का अंदाजा न, हो भी जाती दुर्घटना।  

सुदूर मेघ-यात्रा, वाष्प सोखते, ऊष्मा से नभ में अत्युच्च उठते 
वहाँ वे शीतल होते व अवसर मिलते ही बरस जाते, रिक्त होते। 
प्रकृति के खेल निराले हैं, यदा-कदा धूप में भी बारिश हो जाती 
मेघ देख वनिताओं को प्रिय-स्मरण, खिन्न हो मन मसोस लेती।  

कालिदास-कृति मेघदूत अनुपम, कथा-सुव्याख्यान  यक्ष-विरह 
उन्हीं के काव्य ऋतु-संहार में पावस का एक रमणीक विवरण। 
दादुर टर्राते, भ्रमर मधुर गुनगुनाते, जुगनूँ  अँधेरे में टिमटिमाते 
प्रफुल्लित मयूर नर्तन करते हैं, सरोवर  पूरित शुभ्र कुसुमों से। 

इस वेला में आनंद में झूमना हर प्राणी-मन की होती फितरत
कलम का भी एक निश्चित संग, माँ वाग्देवी-कृपा आवश्यक। 
रिक्त पलों में एक गुरु ब्रह्मांड-रूप वर्षा पद्य था चिर-इच्छित
कलम चले तो मृदु फूँटेगा, फिर यथासंभव दिया ही है लिख। 

पवन कुमार,
२७ जुलाई, २०२० सोमवार १०:१७ रात्रि 
( मेरी महेंद्रगढ़ डायरी ३ अगस्त, २०१७, वीरवार, ९:२० बजे प्रातः से )  
 

Wednesday, 22 July 2020

मन-पावस

मन-पावस 
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प्रातः वेला बाहर मद्धम वर्षा हो रही, शाखा-पत्तों संग वृक्ष रहें मुस्कुरा 
कुर्सी में बैठा खिड़की से अवलोकन करता, यह पृष्ठांकन कर हूँ रहा। 

मनोद्गार-अभिव्यक्ति हेतु हुनर चाहिए, सुघड़ता कहने की कोई बात 
दूर समुद्र-जल मेघ द्वारा आकर-बरसकर कराता बड़प्पन अहसास। 
सुदूर से पवन आ खुशनसीबी बख़्शती, हाँ न कहती कि बड़ी हूँ स्वयं 
माँ प्रकृति सर्वस्व देते भी मौन रहती, दिल से तो अहसानबंद हैं सब। 

बाहर वृष्टि अंतः मन आर्द्र, सब बरसें, निर्मल-जल करता प्राण स्पंदन 
 वारि बिन मलिनता-ऊसरता थी व्याप्त, अब जल तो जाती आशा बन। 
मैं भीगा अंदर-बाह्य से, सरोबार, पर विभोर मन से नहीं हुआ है संपर्क
बस उसी पूर्व-बोझिलता में ही लुप्त, नूतन से परिचय हो तो होऊँ पूर्ण। 

यह धराधरों का पर्व, ऊपर गगन में मेघ विपुल आकारों में लदे से पड़े 
कुछ अद्भुत आकृतियाँ रचित, पर बादल गतिमय रूप बदलते रहते। 
कुछ धूल-पानी से ही तो निर्मित हैं, चलते-२ थकते भी, करते हैं विश्राम 
अब देखो मेघ शावक सा लघ्वाकर, कभी लड़खड़ाता सा बुजर्ग  सम। 

बारिश तो है पर मन विचार न फूँट रहें, पुनः जगा हूँ पौना घंटा सोकर 
आशा कि कुछ उत्तम विचारित हो, कलम अपने से यात्रा कराती पर। 
सब दिवस तो एक जैसे न  होते, सबमें नूतनता है अपनी भाँति की हाँ 
निहारकर मुस्कान-कला आनी चाहिए, सब उत्तम है सीखो सराहना। 

एक भूरी चिड़िया नीड़ से निकल आ बैठी, गर्दन घुमाकर ऊपर देखती 
 खंभे पर एक कबूतरी बैठी  है, चोंच से अपनी देह को खुजला सी रही। 
निकट भवन-कोण में कपोत बैठा, पंख फैलाकर सुखाने का करे यत्न  
अब ये भी बारिश में भीग जाते, सर्दी-गर्मी-आर्द्रता सब करेंगे अनुभव। 

 घर के बाहरी गेट के बाऐं स्तंभ पर दो, व दाऐं पर एक कबूतर आ बैठे 
गर्वित सी ग्रीवा तनी, कुछ सोच से रहे, खिड़की से मुझे झाँकते लगते। 
सब निमग्न आत्म में क्यूँ बाहर की चिंता, बदलती रहती निज ही शक्ल 
अब पंख फैला उड़ कहीं ओर जा बैठे, एक स्थल रहता कौन टिककर। 

सोचूँ इस पावस में मन तन इतना विभोर हो जाए, धुल जाए सब कुत्सित 
इस ऊसर भू में भी कुछ बीज उगें, और जीवन-संचरण हो प्रतिपादित। 
मन के सब भ्रांत पूर्ण नष्ट हो जाऐं, निर्मल में कुछ स्पष्ट सा हो दर्शित सब 
कई चुनौतियाँ समक्ष हैं, दृढ़ हो सुलझाऊँ, अकर्मण्यता से तो गुजार न। 

ऊर्वर बनूँ अनेक अंकुर उगें, तरु बनें, वसुंधरा धन-धान्य में सहयोग हो
कुछ भूखों की क्षुधा मिटें, पल्लव मुस्कुराऐं, आश्रय दें जीव-जंतुओं को। 
सुफल प्रकृति-अंश, सुख-दुःख सम्मिलित, योग सुखी परिवेश निर्माण में
जहाँ शक़्कर-मधुरता सब आ जाऐंगे, कर्कशता से अच्छे भी भाग जाते।

मैं भी  ऊर्वर माँ-उदर से अंकुरित, तात ने अंड में अपने बीज डाले 
दोनों समर्थ थे अंकुरण-प्रक्रिया में, तथैव कई जग-विस्तृत मेरे जैसे। 
पर हमारा क्या योगदान जग-निर्वाह में, कुछ घौंसले बनाऐं भले बन 
खग विश्राम करते चूजों को चुग्गा दे सकें, सुकून-जिंदगी हो बसर। 

अनेक कर्मठ हैं सदैव कार्यशील, अनेक संस्थाओं में सहयोग कर रहे 
उनका योगदान चिरकाल तक अविस्मरणीय, बड़ों के काम भी बड़े। 
कदापि न सकुचाना चाहिए, जितना बन सके कोशिश हो अधिकतम 
उलझाना सरल, सुलझाना कठिन, पथ से पत्थर-काँटें हटाना उत्तम। 

जग-आक्षेपों की न चिंता, लोग  चिल्लाते रहेंगे हमें तो निर्वाह कर्त्तव्य
जीवन-पथ संकरा पर दूर ले जाऐगा, सिखाएगा असल-जीवन लक्ष्य। 
सब संशय मिटाना प्राथमिकता, प्रखर चाह ऊँचा उड़ना चाहता यह 
ओ दूर के राही औरों को संग ले, अकेला न छोड़, कई अंग गए बन। 

ऐ पावस, मन प्रमुदित व कर्त्तव्य-परायण कर, प्रेरणा-स्रोत बनें तेरे गुण 
 कुछ जग-नियम समझने लगा हूँ, बड़े डंडे खाए हैं योग्य बना तब कुछ। 
उत्तम संस्मरण करता रहूँगा, दूर तक जाना, आभारी अनेक चीजों का 
रुकने न देना यात्रा, प्रार्थना  मेघदूत के यक्ष सम अनेक भाव दिलाना। 

कवित्व तो न, हाँ कलम जरूर घिस लेता, शायद यहीं से प्राप्त मृदुता 
आशा यह पावस प्रबल मन-शक्ति देगी, जो कर्म मिला उत्तम दूँ निभा। 

पवन कुमार, 
२२ जुलाई, २०२० बुधवार, समय ८:४२ बजे प्रातः 
(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी २५ जुलाई, २०१८ बुधवार, ९:५२ बजे प्रातः से )

Saturday, 18 July 2020

मेरी प्रथम प्रकाशित पुस्तक 'महाकवि कालिदास विरचित'

मेरी प्रथम प्रकाशित पुस्तक 'महाकवि कालिदास विरचित'


प्रिय मित्रों, यह बताते हुए मुझे अत्यधिक हर्ष हो रहा है कि ज़ोरबा बुक्स, गुरुग्राम (हरियाणा) के माध्यम से मेरी प्रथम हिंदी अनुवाद पुस्तक 'महाकवि कालिदास विरचित' दिनांक १० जुलाई, २०२० को प्रकाशित हो गई है। यह पुस्तक प्रकाशक के आउटलेट, अमेज़न, फ्लिपकार्ट व किंडल पर उपलब्ध है। यह एक महाकवि कलिदास के संस्कृत में महाकाव्यों 'मेघसंदेश, कुमारसंभव व ऋतुसंहार' के दुसाध्य अनुवाद कार्य है जिसको मैंने अपने शब्दों में हिंदी में लयबद्ध पद्य में पुनः अंकन करने का प्रयास किया है। ये कार्य इस ब्लॉगर साइट पर भी उपलब्ध हैं लेकिन संपूर्ण कार्य पुस्तक में एक स्थान पर संकलित हैं। मुझे पूर्ण आशा है कि मेरे प्रिय पाठक मित्र इस पुस्तक को पढ़ेंगे और टिप्पणियों सहित उत्साहवर्धन करेंगे। धन्यवाद।

पुस्तक निम्न लिंक्स पर उपलब्ध है :

Monday, 13 July 2020

घर-बाहर

घर-बाहर 
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मेरी दुनिया क्या है, परिवार जहाँ जन्मा या वह जहाँ वर्तमान में रह रहा 
अनेक शिक्षण-कार्य स्थलों में दीर्घकाल, घर के अलावा भी कई आयाम। 

देखना चाहूँ  कितना घर या बाहर, क्या प्रतिबद्धता काल -अनुपात में माप 
या कुछ पक्ष औरों से महत्त्वपूर्ण, गुणवत्ता का  मात्रा से कहीं अधिक भार। 
सब पक्षों का स्व प्रभाव, मानव सुस्त तो भी दुनिया निज कर्म करती रहती 
हर निवेश का स्वभाव अतः कुछ  न गौण, सहयोग से ही दुनिया बनती।  
 
क्या सोचूँ जितना मनन करूँ, दायरा बढ़ता या  सिकुड़ता जाऐ आत्म तक 
माता-गर्भ में अकेला था पर कुछ  परिपक्व हो, बाह्य -ध्वनियाँ लगा श्रवण। 
जन्म-पश्चात तो सब तरह का कोलाहल, शांत मन पर निरत हथौड़े बरसते 
परिजन-संबंधी, पड़ौसी-गाँव वाले, मामा-चाचा, बुआ, चचेरे-फुफेरे-ममेरे। 

 नर की निज तो न मौलिकता, यहीं से अन्न -जल-शिक्षा ले प्रभावित रहता 
कुछ तंतु तो पृथक मनों में, स्वभाव-गुण, विविध तौर-तरीक़े लेते अपना। 
बाह्य नज़र में तो सब एक जैसे  होते, पर  अनेक विरोध पाले रखते अंतः 
विविधता एक जीव पहलू, स्वीकृति में न दोष, पर अभी दायरे पर मनन। 

कह न सकता पूरे गाँव को जानता, असंभव भी, जाने गए संपर्क वाले ही 
मुझे भी अनेक जानते होंगे, कुछ  ऐसे  होंगे जिनसे कभी बात ही न हुई। 
कुछों को पसंद या नापसंद करते,  लेकिन कुछ रिश्ता तो बना ही रहता 
रिश्तेदार आते या मैं जाता, निकटस्थ गली-सड़क का कुछ प्रभाव होगा। 

स्कूल शुरू तो नया  परिवेश, बाहरी शिक्षिकाऐं, छात्रों का निज परिवेश 
पर सब बैठ शिक्षिका की बात सुनते, अंतः प्रवेश करता कुछ सम रस। 
वही पाठ्य- पुस्तकें व माहौल, विविधता  में एकता-सूत्र पिरोने का यत्न 
परीक्षा-प्रश्न,  प्रार्थना-खेल, डाँट-डपट, गपशप, बाह्य भी माहौल एक।  

घर आगमन बाद वही माँ-बाप, सहोदर-पड़ोसी, स्कूल को भूलने लगते 
पशु-पेड़, घर - बगड़, घेर-गंडासा, मार्ग-तालाब, सदैव प्रभावित करते। 
खाली हुए तो मित्रों संग खेलने लगते, घर के पास या कभी गाँव के गोरे 
वर्षा में मस्ती, भैंस की पूँछ पकड़ जोहड़ में, गिल्ली-डंडा, पिट्ठो खेलते। 

स्कूल से अलग  गृह परिवेश, छुट्टियों में मज़े होते, कई दोस्त बन जाते 
पेड़ों पर चढ़ते, बड़ की बरमट नमक लगाकर खाते, कभी कच्चे आम,
बेर-जामुन-अमरूद-लसोडा-शहतूतों की खोज में कभी यूँ घूमते रहते। 
साइकिल चलाना सीखते, कैंची से डण्डा फिर काठी और पीछे कैरियर
सब मिल महद रोमांच भरते, सीखते जाते, दुनिया होती रहती विस्तृत। 

गाँव से नगर के बड़े स्कूल गए, कई पृष्ठभूमियों के स्टाफ़, छात्र-शिक्षक  
कोई इस या अन्य गाँव का, शहर या निकट क़स्बे का, धनी  या निर्धन। 
कोई पैदल या  साइकिल से आए, बस-ट्रेन तो कोई ऑटो-स्कूटर से ही 
 कोई समीप या  दूर से, छात्रावासित, अधिकांश आते- जाते घर से ही।   

लघु-बड़ी कक्षाऐं स्कूल में, सबको न जान सकते, धीरे-२ प्रवासी वरिष्ठ 
हम भी बड़ी कक्षाओं में बढ़ते, खंड बदलते, नव मित्रों से प्रेम-परिचय। 
कोई जरूरी न सब पसंद ही, अनेकों से उदासीन या नापसंद भी करते 
शिक्षकों का भी अतएव व्यवहार, उनके विषय में निश्चित राय बना लेते। 

बचपन में कितने ही मित्र संपर्क में आते, सारे कहाँ याद रह पाते हैं पर 
जिनके संग खेलें-पढ़ें, एक व्यवहार था, आज स्मृति-पटल से हैं विस्मृत। 
कह सकते हैं मानव के वृहद भाग के साथ रहकर भी, पराए से ही रहते 
अन्यों के ज्ञान विषय में सीमित ऊर्जा, असमर्थ अनेक संपर्क निर्माण में।  

कॉलेज गए विलग ही परिवेश, अनेक स्थानों के छात्र-छात्राऐं व शिक्षक 
 कोई परिचित भी मिल जाता, अन्यथा खुद से ही बनाने पड़ते कुछ मित्र। 
फिर पहुँचने हेतु किसी वाहन का प्रबंध, पुस्तकें-कॉपी-पैन  व जेबखर्ची 
दोस्तों संग सिनेमाघरों में फिल्म की लत पड़ जाती, पढ़ाई गौण हो गई।  

फिर जैसे-तैसे कुछ पढ़े, जैसा भी परिणाम आया फिर नए संस्थान गए 
वहाँ माहौल और बड़ा विचित्र, कई वहम टूटते, पर संपर्क बनता शनै। 
सीनियर-जूनियर मिलते, जिंदगी में एक छवि बनाते लोग लेते उसी सम 
शनै अनेकों से लगाव-गुफ़्तगू, खेलते-गाते व पढ़ते, पूरा हो जाता समय। 

अतएव कार्यस्थलों पर अनेकों से भी मिलन, व्यक्तित्व में लाभ है रहता 
घर के अलावा  भी निज जग, सब अपने हैं बस संजोना आवश्यकता। 


पवन कुमार,
१३ जुलाई, २०२० समय ८:१४ बजे सायं
( मेरी महेंद्रगढ़ डायरी  दि० १२.०६.२०१९ समय ८:५१ प्रातः से )