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Sunday, 14 August 2016

लक्ष्य-कटिबद्धता

लक्ष्य-कटिबद्धता
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क्यों अटके हो यत्र - तत्र, दृष्टि-प्रगाढ़ करो किंचित उत्तम लक्ष्य में 
यदि क्षुद्र में ही व्यस्त रहते, कहाँ से महा ग्रन्थ - काव्य जाते रचे। 

माना अल्प जुड़कर बृहद बनता, लक्ष्य हेतु कटिबद्धता चाहिए पर 
रामायण, महाभारत, बृहत्कथा संभव, क्योंकि लेख था अबाधित।  
एक लक्ष्य बना, स्व -चालित हो लिए, कुछ प्रतिदिन किया अर्पित  
विशाल चित्र मस्तिष्क में बना होगा, मध्य की कड़ी मनन-लेखन। 

पर मैं क्या करता कागज-कलम उठा लेता, कृति-निर्माण न ज्ञात   
बस चल देता यूँ ही, योजना तो न बनी, क्रमबद्धता कहाँ से आए ? 
जीव - प्रतिबद्धता जब लक्ष्य में होगी, तभी तो बनेगा कुछ प्रारूप 
जैसे लिख दूँगा जो विचार में होगा, पर स्थूल-प्रेरणा चाहिए समक्ष। 

एक शब्द हेतु भी सामग्री चाहिए, यूँ ही तो न ऊल-जलूल दोगे 
नर प्रगति कर रहें हर क्षण में, मुझ मूढ़ से रमणीय न निकले। 
समकक्षों में ही से कुछ महान बनेंगे, इतिहास में कमाऐंगे नाम 
जितना डालेगा उतना मिलेगा, बिना किए तो मिलता कुछ न। 

क्यों न प्रयास उच्चतम हेतु, योग्य - उपयुक्त पर ही यश चाहिए 
वह भी न, बस कुछ बेहतर कर्म-इच्छा, प्राप्ति सब दैवाधीन है। 
पर युक्ति तो अवश्य सुगम-पथ की, पुरुष बाधाओं से पार जाते 
यूँही समय न गँवाते, समर्पित हों, पुनः-पुनः परिविष्टि जता जाते। 

चिंतन का भी चिंतन चाहिए, पर्वत खोदने से ही मिलेगी कुछ धातु 
अल्प-श्रम से कभी ही सु-परिणाम, सर्व-औजार क्षमता वृद्धि हेतु।  
महासार का मूल्य चुकाना होगा, मुफ्त प्राप्ति से तो पाचन न होगा
निज बूते पर कुछ बन दिखाओ, अयोग्यों को ही सुहाती अनुकंपा। 

मम जीवन का क्या ध्येय हो सके, कलम से तो अभी न है इंगित  
बस यूँ ही स्व-संग बतला लेती, पर क्या काष्टा रहेगी ही सीमित ? 
नर स्व-वृत्त बढ़ाते, मोदी को देखो चाय-दुकान से विश्व-नेता स्वप्न 
कितने ही नित्य होते विज्ञ-समृद्ध, निज हेतु क्यों न बनाता सुपथ ? 

कुछ जाँचन अवश्य चाहिए, किस उपलब्धि की अपेक्षा-सम्भावना 
बस छटपटाने से काम न चले, रोग क्या है व उपचार तुरंत प्रारम्भ। 
लक्ष्य-निर्माण चाहिए इस अकिंचन को भी, चाहे प्रकृति या अंतर्यात्रा 
सब तम को निकाल बाहर फेंको, कितना भी वीभत्स, नहीं है चिंता। 

कलम-कागद का हो सु-प्रयोग, कलाकार की न कूची से पहचान  
सामग्री-औजार  से किसी को न मतलब, क्या रचा, है महत्त्वपूर्ण। 
परिप्रेक्ष्य-निर्माण निज - दायित्व, प्रक्रिया कुछ काल पश्चात् नगण्य 
अंततः - परिणाम में ही रुचि, भोजन चाहिए, कैसे बना न मतलब। 

पर यह है श्रम का ही विषय, भवन बनेगा तभी तो सकोगे रह  
कृषक खेती न करे, कहाँ से खाना मिले, किसी को न है ज्ञात। 
जीवन इतना न सरल निट्ठलेपन से चले, सुस्तों की देखो दीनता  
देख विभिन्न प्रयोगों का विस्तीर्ण, अपने मन को मैं सकूँ महका। 

क्या मुझसे भी कुछ उत्तम सम्भव, प्रशिक्षण योग्य संस्था में ले लो 
नौसिखिए सम न करो आचरण, क्या उचित विधि है अपना लो। 
सामग्री क्षमता - गुणवत्ता वर्धन हेतु, शक्ति मात्र तुम तक न स्थित 
यदि सहारा लो उपलब्ध युक्तियों का, निस्संदेह कल्याण सम्भव। 

निज शक्ति बढ़ाओ मित्र-बंधु सहयोग से, यह सर्व-जग तुम्हारा ही 
माना मूल्य देना भी होगा, क्यों हो डरते, उत्तम वस्तुऐं महंगी होती। 
जीव-कल्याण इतना भी न सुगम होता, मन से न चाहे, होए ही स्वयं
जीवन - समर्पण करना ही होगा, बिन मरे तो स्वर्ग-दर्शन न संभव। 

किंचित विशाल सोचो, लिख दो भित्ति पर, सदैव प्रेरणा रहे मिलती 
पथ बहुत सुगम हो जाता, जब चलोगे तो मंजिल जाएगी दिख ही। 

मानव-धर्म उच्च-प्रेरणा हेतु ही, वर्धन निज तुच्छता से ऊर्ध्व- मन 
स्व - उत्थान निज-दायित्व, कोई आकर न शीर्ष पर न करे तिष्ठ। 
मन सन्तोष में पढ़ेगा तो यकायक सफलता-कुञ्ज में प्रवेश होगा 
तन - मन दोनों प्रसन्न होंगे, वास्तविक उद्देश्य तभी इंगित होगा। 

यह विडम्बना है, एक कदम बढ़ाने पर ही अग्र का पता चलता 
एक उपाधि मिली तो अन्यों में भी उत्सुकता, जानकारी मिलती। 
प्रथम दिवस ही किन उपाधियों का संचय, ऐसा तो सदा अज्ञात 
हाँ जुड़ती कड़ियाँ व कदम-2 बढ़ाते, महद दूरी हो जाती तय। 

जीवन में मात्र यही दीर्घ इच्छा, उस परम-लक्ष्य का हो चिंतन  
पूर्व इसी अन्वेषण में बीत रहा, जल्द ही उपलब्धि मिलेगी पर। 
श्वास बढ़ता इस आशा के साथ ही, कुछ योग्य करने में सक्षम  
पर जीव-विकास सतत स्वतः प्रक्रिया, अति-शीघ्रता न सुफल। 

स्व-मन का क्या करूँ, सदा निज-अपेक्षाओं में ही उलझा रहता 
बहुत कर्म अधूरे नन्हीं जान को, सुबह-शाम रोना-पीटना लगा। 
गति परम में परिवर्तन इसका, कुछ महात्माओं में लगे उपस्थिति 
विशाल होगा भी, शंका में रहता, पर निराश हो न बैठूँगा कभी। 

ओ जिंदगी, जरा पास तो आ, स्पंदन मेरे मन-देह रोमों में कर दे 
सदा मुस्कुराना - चलना सिखा दे मुझे, व्यर्थ बकवादों से हटा दे। 
हो सार्थक - संवाद प्रेरणामय शब्द-प्रयोग, अकिंचन की हो शैली
उच्च शिखर-इंगन हो सम्भव मुझसे, गतिमान तो श्रम में है मेरी। 

ओ सखा, अमूमन लिखो गागर में सागर, सत्यमेव हो गहन-मंथन 
तब मोती, माणिक्य, रत्न निकलेंगे, निज-लेखनी का रखो चलन। 

पवन कुमार,
१४ अगस्त, २०१६ म० रा० ०१:१० बजे 
(मेरी डायरी १६ जुलाई, २०१६ समय १०:१० प्रातः से)