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Monday, 28 May 2018

सम्मिलित चेतना

सम्मिलित चेतना
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इस प्रकृति के बहु-आयाम, अति सघन-विस्तृत, प्रतिकण  है विचित्र रूप 
उसका सबसे गहन-संबंध, मनीषियों का सर्व-ब्रह्मांड एकत्रण हेतु मनन। 

मानव भी बहु-संख्यक, अन्य जीव सम प्रकृति-हिस्सा, तदानुक्रम उत्पन्न
लाखों वर्षों  संग रह रहा, एक समन्वय सा बनाया तभी तो रहा जीवित। 
औरों का भी एक जीवन-दर्शन, अनावश्यक न किसी पर करते आक्रमण 
विकास-सिद्धांत के चयन की माने तो संघर्ष भी, नतीजा विफल-सफल। 

पुरा-काल से भिन्न-रूपों से गमन, कुछ लक्ष वर्ष पूर्व से वर्तमान स्वरूप 
यदि 'सम्मिलित चेतना' सी वस्तु सृष्टि में, मानव को पूर्वजों से ही प्राप्त। 
हममें सर्व जीव-भाव निहित, किंचित कुछ अनावश्यक, प्रयोग विस्मृत 
हर प्राणी निज का ही हिस्सा है, यहाँ तक निर्जीव में भी हमारे अवयव। 

मानव के क्या दृश्यमान, एक बाह्य-जगत जो नेत्र-गोचर, अनुभव संभव
एक भाग अंतः-चेतना का, जो मन-अंतः ही है चिन्तन - प्रतिक्रिया कृत। 
स्थूल दृष्टि-बुद्धि से जो समझ आता, कह देते, रहस्य-भेदन न पूर्ण-समर्थ 
अनेक निगूढ़ मानव-समझ परे आज भी, प्रयास से भी स्पष्टता होती न।  

यावत हम अशिक्षित-अपरिचित हैं, हमने पूछा नहीं किसी ने बताया न 
सारे अक्षर भैंस बराबर दिखते हैं, पढ़ना सीख लें तो कुछ निकले अर्थ। 
जबसे नर का विज्ञान-संपर्क, हर तह में जा ध्यान से देखना किया प्रारंभ 
अनेक वहम टूटे, मन भी विकसित व विकसित हुई जग-प्रक्रिया समझ। 

वैज्ञानिकों-तकनीशियनों को बहुत ज्ञान, सामान्य-बुद्धि में न प्रवेश सुलभ
परीक्षण-दर्शनार्थ कुछ यंत्र बना लिए, सूक्ष्म-दूर की वस्तु-दर्शन संभव। 
कैसे एक वैज्ञानिक दृष्टि उत्पन्न हो, होना चाहिए एक खोजी-प्रयोगी मन 
फिर प्रयोग-विफलता पर न हारना, कोई न कोई तीर तो सधेगा उचित। 

अभ्यास व उचित-संपर्क महत्त्वपूर्ण, जो आजतक अज्ञात जानना संभव 
अनेक रहस्यों का पर्दा उठा है, व अनेक दिशाओं से हो रहे लाभान्वित। 
मन की विचक्षण-दृष्टि से साधनों के सहारे, गुह्य समझने का करो प्रयास 
अपढ़-अबूझ-भ्रमित जीवन अति-निम्न, सदुपयोग से बनो विपुल-समृद्ध। 

पवन कुमार,
२८ मई, २०१८ समय ००:४३ मध्य रात्रि 
(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दि० २३ जनवरी, २०१८ समय ९:३९ प्रातः से)
    

Sunday, 20 May 2018

निकटस्थ - हित

निकटस्थ - हित 
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सभी निज संगठनों से जुड़े रहते, शांत रह समाज हेतु करते काम 
घर-कार्यालय माना प्रधान, पर यहीं नागरिक-दायित्व रूकता न। 

जिस परिवेश में हम जन्म लेते, उसके प्रति लगाव एक प्रवृत्ति सहज 
माना संपूर्ण ब्रह्मण्ड एक कुटुंब ही, निकटस्थों को समझते अधिक। 
हर परिवेश सदस्यों का श्रम-श्वेद माँगता, सुप्रबंधन तो सर्वत्र वाँछित 
जब अपने निर्धन-दुर्बल-दुःखी तो, निस्संदेह अधिक त्याग आवश्यक। 

लोगों का अपनों से कुछ विशेष स्नेह ही, जितना हो सके आगे दो बढ़ा 
वृहद-विश्व की न्यूनतम अपेक्षाऐं भूलते, अपनों में ही खोए चाहते रहना। 
घर-संबंधी व कार्यालय को एक सा, अपनों को चाहिए अधिकतम लाभ
अन्य भाग्य कोसते, वह उच्च पदासीन है अपनों को ही फायदा दे रहा। 

चलो कुछ भाई-भतीजावाद भी, अधिक ही दया-दृष्टि क्षेत्र-जाति-धर्म पर 
 पर सार्वजनिक नर को न लोभ उचित, संविधान प्रदत्त कर्त्तव्य यह एक। 
निजों का ध्यान भी न अधिक बुरा, स्वास्थ्य-शिक्षा-विकास हेतु कमसकम 
यदि सक्षम तो स्वयं पथ ढूँढ़ लेंगे, तव भूमिका मुख्यतया एक मार्गदर्शक। 

जीवन का सत्य-लक्ष्य अधिकतमों में सकारात्मक परिवर्तन करने का 
लोग पढ़-लिखकर सुयोग्य बनें तो अपनी जिम्मेवारी खुद सकेंगे उठा। 
कब तक रहेंगे वे वैसाखियों पर, खड़ा ही होना सिखला दो सहारे-निज
 जन-स्थापित कई संगठन हैं पर-सहायतार्थ, अधिकतम कर्त्तव्य-पालन। 

माना घर-जीविकार्थ पूर्वेव अपेक्षित, तथापि कुछ ऊर्जा वाँछित अन्यार्थ 
लघु उपकार से भी महद-हित, डूबते को तिनके का सहारा है वरदान। 
 जितना संभव हो उतना कर दो, तुम भी अनेक सहायताओं से ही वर्धित 
कुछ समन्वय कर चलो जहाँ संभव, अन्यों संग अपने भी प्रगति-पथ।   

हर स्तर पर सदा न्यूनाधिक राजनीति, तुमको काम करना चाहिए आना 
कमसकम नियमानुसार लाभ भी दोगे तो अति जन-कल्याण हो सकता। 
मात्र रुदन-शिकायतों से न हल, सकारात्मक कर्म-परिणाम से ही श्लाघा 
एक समय मिला महादान हेतु, थोड़ा सोचो व सहायतार्थ चरण दो बढ़ा। 

पवन कुमार,
२० मई, २०१८ समय 00:0७ मध्य रात्रि 
(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी १४ जून, २०१७ समय ९:४६ प्रातः से ) 

Sunday, 6 May 2018

मस्तिष्क-ग्रंथि प्रहेलिका

मस्तिष्क-ग्रंथि प्रहेलिका
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अन्वेषण प्रक्रिया से एक शब्द की यात्रा, प्राप्ति तो कुछ अग्र चरण  
सकल जीवन यूँ चिंतन में बीतता, ठहरकर क्यूँ न उठाता अनुपम। 

चारों ओर ध्वनि-नाद गुंजायमान, मैं कर्ण होते भी न श्रव्य-सक्षम  
अंदर से कुछ भी निकल न रहा, यूँ मूढ़ भाँति प्रतीक्षा करता बस। 
इतना विशाल विश्व सर्व-दिशा ध्वनित, पर मैं तो मात्र सा निस्पंद 
कुछ तरंगें तो मुझमें से भी उदित, सुयोग हो बात बने किञ्चित। 

क्यूँ रिक्तता मन-देह प्राण में, चाहकर भी न कुछ मनन-अक्षम 
क्या कोई गति ही न है, कोलाहल में सर्वथा भी न लगता दिल। 
उससे पृथक न कोई प्रलोभन, वर्तमान क्षण भी स्व तक सीमित 
हर दुविधा निज-हल ले आती, चिर-काल से मुझसे न बना पर। 

क्या कुछ शून्यातीत होते हुए भी, अंतः-स्वर निकलने हैं संभव 
अपने को समझा ही न पाता, कैसे क्या घटित, जानना कठिन।  
यह क्या है स्व-क्षेत्र, न सुलझती इस मस्तिष्क-ग्रंथि की प्रहेलिका 
 स्वयं ही अपार, बहु-साँसते जग की, कई पेंचों से विकट-सामना। 

कितना सिकुड़ जाता स्वयं में, अतिरिक्त संवाद न संभव भी 
न जग-ज्ञान, कैसे जन परस्पर-संवाद, मैं तो खड़ा एकाकी ही। 
दिवस-काल में कुछ शब्द संचार, जगत-चलन को आवश्यक 
कुछ निश्चित कर्त्तव्य भृति-कुटुंब हेतु भी, निर्वाह तो अनिवार्य।  

उसमें न अति-रूचि, करना विवशता, स्व में खोया रहना चाहता 
इस निज-मूढ़ता में इतना तल्लीन हूँ, व्यग्र होते भी पाता सांत्वना। 
निष्ठ अज्ञात परम-वस्तु की खोज में, कब सान्निध्य, भटकता फिरता
अति-विडंबना न ध्येय-ध्यान, क्या-क्यों-कैसे-कब-कहाँ कुछ न पता। 

विचित्र स्थिति क्या ऐसा भी होता, अचेतना में ही समग्र वय व्यतीत 
मस्तिष्क-कर्मशाला में तो अनेक निज-मग्न, क्या खोजते न प्रतीत। 
जग को आभासित कि मतिमंद हैं, वरन आगे बढ़ न करते संवाद 
सत्य अंतः-स्थिति वे ही जानें, बाहरी तो मात्र लगा सकते कयास। 

क्या अवस्था स्व-तल्लीनता की, कुछ न सूझे फिर भी रहना चाहता 
न बहिर्दर्शन-कामना, जितना संकुचन संभव, उतना प्रयास करता। 
जीवन-चिंतन विज्ञान में न कोई महद रुचि, इस दशा में ही परमानंद  
न ईश-प्राप्ति की ही इच्छा, जी लूँ इन पलों को भरपूर यही कवायद। 

क्या इस सम स्थिति से कुछ निष्कर्ष संभव है, या मात्र नदी सम प्रवाह 
कुछ उद्गम-उद्भव-संगम अन्य अपनों से, या जलनिधि में निश्चित विलय। 
मैं किसी भी उसकी एक अवस्था में, पर न कोई स्पंदन चल रहा सहज 
 किस जीव-विकास प्रक्रिया के अमुक अंश से यात्रा, कथापि तो ज्ञात न। 

कौन नियंत्रक इस मन-देह-प्राण का, क्यों स्थिति में रखना चाहता इस 
क्या अपेक्षाऐं उसकी न मालूम प्रयोजन हितकारी अथवा समय-व्यर्थ। 
कर्म तो बहु-प्रकार के शक्य थे इन पलों में, इसमें ही धकाया गया क्यों 
क्यों रह-२ वैसे भाव उभरते, सदुपयोग हो तो कुछ काम की बात हो। 

अनेक विद्वद-जनों के ग्रंथ समक्ष हैं, न जानता वे भी ऐसा करते अनुभव
पर लेखन-संवाद जग-समक्ष विलग ही, ज्ञान विशेष अन्यों के प्रयोजन। 
न प्रतीत कि  गुण-ग्राह्य हूँ, मेरी स्थिति से क्या किसी को होगा ही लाभ
पर यहाँ न तो और हैं निज ही न पता, बस चल रहें इसी में है आनंद। 

अब लेखन-अंत ओर बढ़ना होगा, पर सिलसिला मन में चलित सतत  
आओ इसे महका लें, शरद-पूर्णिमा निकट-गत, चंदा की प्रखर चमक। 
 भाँति-२ के पुष्प खिलने शुरू हो रहें, हाँ पतझड़ का अपना आनंद भी 
जब झड़ जाऐंगे पुरातन तो नवोदित, नव-जीवन से ही निकलेगी सृष्टि। 

जैसा भी जहाँ हूँ मुझे पूर्णातिरेक रहना चाहिए, निज में तो है परमानंद 
स्व-आत्मसात की औरों के श्रेयस बोध में मदद, सदुपयोग में लो अतः। 
अग्र-सहज स्थिति मिलन तो दैवाधीन, अनर्थक-संवाद दूरी अति-सुभीता  
  न ज्ञात ज्ञान-मिलन कब किस क्षण, अभी रस में हूँ, ऐसा ही रहना चाहता। 

चलो चलते कहीं दूर यात्रा में, अपने में भी अनेक क्षेत्र-विचित्रताऐं पूरित 
उससे परिचय हो जग भी देख लूँगा, संपूर्ण प्रयास है स्व-संवाद व प्रबोध। 

पवन कुमार,
६ मई, २०१८ समय १९:१२ सायं 
(मेरी जयपुर डायरी दि० १८ अक्टूबर, २०१६ समय ९:१२ प्रातः से)