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Saturday, 14 July 2018

वय-वृद्धि क्रम

वय-वृद्धि क्रम 
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कालक्रम में जीवन भोला न रहता, बाल्य के शौख-अंदाज उम्र संग लुप्त 
मुस्काता, खिलता-हँसता मुख, आयु की वीभत्स युद्ध-छाया में जाता छुप। 

'भूल गए तानमान भूल गए जकड़ी, याद रह गई नून-तेल-लकड़ी' तीन
प्रातः-जाग बाद दिवस संघर्ष में धकेले हैं, सर्व-दिन सुलझाने में लीन। 
उसकी त्रुटि कभी निजी, स्व पे क्रोध कभी उसपे, दर्शित कुछ तो कमी 
कभी विलंब,  अनुचित-निर्वाह, उपेक्षा, अवहेलना-असावधानी कभी। 

कभी दूजा सुस्त, पूर्ण न रूचि, डॉँट-फटकार, मनुहार का न लाभ भी 
बहु-विषय समक्ष फिर भी निश्चिंत, बस अपने काम की बात में ही रुचि। 
विभाग का पूर्ण-दायित्व तो न व्यवहार-लक्षित, बस सुनो और रहो चुप 
नर अति-चतुर, संबंध भी अनुज्ञा, क्या अपेक्षा करें - मूल्य पहचान न। 

वय-वृद्धि संग मानव सठिया जाता, प्रचंड अग्नि अदर्शित नव-यौवन की 
बस जैसे चल रहा चलने दो, संसार हमसे भी पहले था, रहेगा आगे भी। 
आज कहीं पढ़ा कि 'बचपन की ख्वाहिशें आज भी मुझे खत हैं लिखती 
शायद बेखबर इस बात से कि वो जिंदगी अब इस पते पर नहीं रहती।'

बहुतों को बेफ़िकरा सा भी देखता, जो कुछ सामने आ जाएगा कर लेंगे 
कुछ तो जिंदगी की भागदौड़ न समझते, बस समय कट जाए जैसे तैसे। 
जितने प्राणी उतने चरित्र, सब अपनी भाँति विचित्र सा कर रहे आचरण 
कब वे भला तेरे ढाँचे में समाऐंगे, समन्वय न तो विरोध होगा आभासित। 

लोग प्रातः ही गुजर हेतु बहिर्गमन, चाहे संजीदा भी पृथक भाव से देखते 
लोग भूखे मर रहें, अपढ़-सुविधाहीन, पर धनियों को मतलब मुनाफे से। 
कार्य में एक उत्तम कर रहा, सभी तो उसकी प्रतिभा न पहचानते पर  
सबने निज उपनेत्र* पहने, तेरी प्राथमिकताओं से उनको न कोई अर्थ।

उपनेत्र* - चश्मा  

जीवन तो निश्चित ही संघर्षमय, इहलोक को समझाना इतना भी न सरल
सब विषय-तत्व सबकी प्रज्ञा में न आता, न ही किसी की चाहत  समझ। 
तेरे सरोकार तुम तक सीमित, हम करेंगे जितने से आजीविका अबाधित 
अधिक दबाओगे तो विद्रोह भी संभावी, इतने न दुर्बल हैं करें सब सहन। 

एक छद्म-युद्ध प्राणियों मध्य सदा निरत, चाहे बाह्य मुस्कान, जी-हुजूरी 
कौन सुनना चाहता प्रगीत पीड़ितों का, दर्द से बिलबिलाते रहते हैं ही। 
किसी ने काम बोला  तो है शत्रु लगता, चाहे स्व-कर्तव्य का ही हो अंग 
कुछ नर ही दायित्व सहर्ष लेते मन में क्या सोचते देखना अति-कठिन। 

स्व-दायित्व में कुछ करते भी दिखे, पर सच में उपस्थिति का अप्रभाव
त्रुटि सदा रहती, इधर-उधर देखते रहो, जैसे सीधा मुझसे न सरोकार। 
क्या तुम भाषण सुनने हेतु ही आते, बंधु निज-व्यक्तित्व की छोड़ो छाप 
कोई बलात न किसी से कर्म करा सकता, कहे-सुने से ही लो संकेत। 

वरिष्ठ-अवर सहयोगियों की समीक्षा, कुल मिला तव व्यक्तित्व-कसौटी 
संसार भी निज नेत्रों से देख रहा, सभी अरि न कुछ निर्मल-निष्पक्ष भी। 
आदर-प्राप्ति तो निज कर्म-काज से ही, सुलभ न मेहनत करनी पड़ेगी 
सफल जीवन-निर्वाह भी एक कला, यथा-शीघ्र सीखो उतना भला ही। 

प्रतिदिन-संघर्ष थकाता पर सुदृढ़ीकरण, यहीं कुछ हँसी भी सीखनी 
मूल स्वरूप को न भुला देना, सहज रहने से ही गुणवत्ता बनी रहेगी। 
एक स्मित वदन पर बनाए रखनी, आत्म व दूजों का भी करो सम्मान 
कर्कशता त्यागो संघर्ष एक सहज-नियम, मृदु भाव संजोए रखो अंतः। 

पवन कुमार,
१४ जुलाई, २०१८ समय २२:१० बजे रात्रि
(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दि० २५ अप्रैल, २०१८ समय ९:५९ प्रातः से )     


Sunday, 1 July 2018

कठिन मूल-भेदन

 कठिन मूल-भेदन
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सृष्टि-चलन एक महातंत्र, बहु कारक, सतत घटित, अनेक रहस्य विस्मयी 
कौन जग को पूर्ण मनन में सक्षम, प्राणी क्षीण-चिंतक, विचार मात्र सतही। 

विशाल सृष्टि, बहुल-विस्तृत अवयव, चिर-दूरी मध्य, स्पष्ट संदर्भ भी न दर्शित 
सब अपनी जगह नन्हें जग में मशगूल, न स्वयं कष्ट चाहते, औरों में रूचि न। 
एक जड़त्व सा प्रकृति में, शेल्फ्स पर पड़ी पुस्तकें अपने से न कहती पढ़ लो 
काफी समय से सम-स्थिति में भित्ति पर लटका तार, न कहता ठीक कर दो। 

कह सकते कुछ वस्तुऐं निर्जीव, कुछ सजीव, उनमें भेद किञ्चित दृष्टि-गोचर 
जीवन-शास्त्र कृत अंतर सूचीबद्ध, प्राणी-जगत वनस्पति-जीव में है विभक्त।  
वे फिर विभिन्न श्रेणियों में बाँटे गए, जब तक स्पेसिस तक न हो जाय चिन्हित  
कुछ संबंध भी दर्शाया उनके मध्य, पर इतना बड़ा जग सर्व न संभव समझ। 

सब वृक्ष निज-स्थल तिष्ठ, हवा संग झूम लेते, प्राकृतिक सर्दी-गर्मी सहन करते  
स्पंदन सा तो है चाहे दर्शन असुलभ, पुराने पत्ते पीत होकर स्वतः पतित होते। 
नवांकुर प्रवेशित, फूल-फल निर्माण, शनै प्रक्रिया, ध्यान दें तो कुछ ज्ञान संभव 
अंतः गति-प्रक्रिया अति-जटिल, वैज्ञानिक लघु-रहस्य समझने में लगाते जीवन। 

हर निज में महारहस्य, मूल-भेदन कठिन, विज्ञान निश्चितेव प्रखर-जाँचन ग्राही
यहाँ तक कि एक रेत-कण में भी पूरी कायनात है, कई तत्वों का बना वह भी। 
कई भौतिक-रासायनिक क्रियाऐं उस या मातृ-घटकों पर, जिससे अद्य स्वरूप 
कौन मृदा कहाँ दबी, ठोस बनी, जल-वायु प्लावित, घर्षण से पाषाण बना कण।  

समक्ष काष्ट-फ्रेम की ग्लास जड़ित खिड़की, वर्तमान रूप में कहाँ इतना सरल 
किस्म, मूल तत्व, थोथी-ठोस, कितनी सीजन, साफ या गाँठे, बाहर से रंजित।  
इसके अंदर चिटकनी-हैंडल लगे, जोड़-कब्जें, एक घर्षणमयी गुण, कस लेते 
कील-पेंच भी अति-उपयोगी पुर्जे, लसलसे संग विभिन्न भाग परस्पर जोड़ देते। 

गिर्द भिन्न वस्तु-पदार्थ-तथ्य-स्थिति का अपूर्ण ज्ञान ही, जग तो और अति-विस्तृत 
भीत-पलस्तर, रंग-रोगन, फर्श-टाईलें, कुर्सी, सूती-गर्म वस्त्र, रजाई सब समृद्ध। 
देह-मन रचना, आंतरिक प्रक्रिया, कई छोटे-बड़े अंग, हर की पृथक बनावट-गुण 
कर्रेंट, मोबाईल-कम्प्यूटर, चश्मा-कलम, भाण आदि, निकट-समझ अति-विरल। 

फिर भी चलते है जितना बनता है, कोशिश करो, 
अपनी कमजोरियाँ जानने के बाद ही ताकत आती है। 

पवन कुमार,
०१ जुलाई, २०१८ रविवार, समय १८:१३ सायं 
(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दि० २८ मार्च, २०१८ समय ९:४१ प्रातः से )