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Monday, 25 December 2017

ललकार

ललकार 
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समय यूँ परीक्षा लेता, अनेक कष्ट देकर बनाता सशक्त
न बीतता चैन से जीवन, मानव बनने में है बहुत माँग। 

अब नहीं बालक, जब सब माता-पिता से मिलता पोषण 
युवा-शिक्षित हो बन्धु, एक पद मिला करने को निर्वाह। 
विभाग एक जैसों का कुल्य, सबके करने से ही तो प्रगति  
न प्रमादता निज-दायित्वों में, तुम्हें कुछ आश्वासन देती। 

भृति न सुलभ निठल्लेपन से, कार्य करने को करता बाध्य 
देश का नाम हो दीप्त, प्रजा को मिले गुणवत्ता-आश्वासन। 
वर्तमान माहौल यहाँ कार्यक्षेत्र का, झझकोरता अंतः से पूर्ण
कैसे निकलूँ पार इस चक्रव्यूह से, प्रश्न इस समय है महद। 

कुछ की लापरवाही-अकर्मण्यता अन्यों को भी देती है कष्ट  
पर प्रकृति-नियम कुछ ऐसा है, झेलना पड़ता जो है समक्ष। 
मेरे विवेक मद्धम हुआ जाता जो प्रायः देता  समरसता दर्शन
क्यूँ न निरत अंतः कर्म-योद्धा, अभी तक हुआ है युद्ध-रत। 

जो नियति से मिली है जिम्मेवारी, करो कार्य उसके अनुरूप 
वरन भागी औरों की त्रुटियों में, समय से यदि न किया काज। 
स्पष्ट-संदेश एक ही पर्याय लब्ध - कार्य करो वा जाओ चले 
अन्यथा समय का दाँव अति-मारक, चैन से न देगा बैठने। 

न चंचल अवस्था यह, अपितु विवेक-युक्ति बैठाने का समय 
रोगी स्थिति, दवा कटु अवश्य है देती नीरोगता है अन्ततः। 
बहुत आशा से विभाग ने भेजा, उसको तुम न बुझने देना 
देखो सफल होकर दिखलाओ, जन कन्धों पर लेंगे बैठा। 

प्रत्येक क्षण में जीवन-संचरण, ढीलता करो पूर्ण-विव्हलित  
न स्वयं विराम, न सहचरों को, विश्राम-स्थिति न बिल्कुल।  
जीवन का यदि है अग्र-प्रसरण, परिश्रम तो दुर्धर अवश्य ही
नहीं तो तुम सड़ जाओगे, वृद्ध सरोवर में ठहरे जल भाँति। 

यह ललकार सुधार-आग्रह, संग्राम है तुम्हारा स्वयं संग 
निज को करो तत्पर, समस्त सामग्री जुटाओ हेतु संघर्ष। 
जग मात्र वीरों को ही पथ देता, जिनमें चीरने की शक्ति 
मात्र संवाद-सीमा से तो, वास्तविक हल न सुलभ कभी।  

क्या है यह व्यग्रता, मन-पथिक को न विश्राम किञ्चित 
तरंगें उदित अति उत्तुंग, बल-दृढ़ता से करती विव्हलित। 
मुझपर असंवेदनशीलता-आरोप, नितान्त भी नहीं सत्य 
स्व-कर्त्तव्य पूर्ण-निष्ठ, मन-काया में नहीं कोई प्रमाद। 

न होने दूँ स्वयं को व्यथित, पर लक्ष्य उससे महत्तर  
न रुद्ध प्रदत्त कर्त्तव्य, हो अति शीघ्र प्रबन्धन में स्थित।  
अनेक बाधाऐं आती पथ पर, यह भी आई तो होगी उचित 
लोग मानेंगे प्रयासों को, लेकिन तो लगेगा कुछ समय। 

तुम भई अच्छे, कुछ किया ही नहीं, मुफ़्त श्लाघा-मत्सर  
वृक्ष उगाया नहीं फल की इच्छा, खाने को टपकती लार। 
माना कुछ भाग्यशाली होते, जिन्हें दूसरों द्वारा कृत मिला 
मूल आनन्द करके खाने में, वही आत्म-सम्मान है सच्चा। 

निकलो दुविधा से, होवो गतिमान, हानि हो यथा-संभव अल्प
जिनसे आवश्यक करो संपर्क, उसी में सबका कल्याण। 
उत्तम कर्म परिलक्षित होने चाहिए, विश्व देखना है माँगता 
करते रहो कृत्यों का ज़िक्र, जिससे झलके कार्यशीलता। 

धन्यवाद। चले चलो, अच्छा करके की दम लो। अवश्य सफल होओगे। 

पवन कुमार,
२५ दिसंबर, २०१७ समय रात्रि २३:४३ बजे  
( मेरी डायरी दि० २० नवम्बर, २०१४ समय ९ :१८ प्रातः से ) 
  

Sunday, 10 December 2017

मन-दृढ़ता

मन-दृढ़ता
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कौन हैं वे चेष्टाओं में प्रेरक, मूढ़ को भी प्रोत्साहन से बढाते अग्र 
निश्चित ही कर्मठ-सचेत, वृहद-दृष्टिकोण, तभी विश्व में नाम कुछ। 

क्या होती महापुरुष-दिनचर्या, एक दिन में कर लेते काम महद 
प्रत्येक पल सकारात्मक क्रियान्वित, तभी तो कर जाते अनुपम।
 किया निज ऊर्जाओं को संग्रहण, मात्र वार्तालाप में न व्यर्थ समय 
श्रम-कर्त्तव्य संग ही समय-व्यापन, शनै योग से निर्माण बेहतर। 

महाजन-परियोजना भी विपुल, एक साथ ही अनेक विषय-मनन 
जटिल विषयों पर भी विशेषज्ञों संग, विचार बना निर्णय में समर्थ। 
सशक्त बहु-आयामी निवेशों से, व्यक्ति-अस्मिता का स्पष्ट-दर्शन 
 स्व की कर्मों से सार्थक-रचना, लोगों को हैं काम, करते सम्पर्क। 

क्या है स्व-प्रति पूर्ण-समर्पण, निज से ही महायुद्ध - कुप्रवृत्ति-विजय 
स्व देह-मन ही कुरुक्षेत्र है, पक्ष-विपक्ष सेना भी स्वतः ही रही जनित। 
एक हूँक सी उठती स्व-जयश्री की, कैसे महत्तम अपने ही से उदित 
पूर्ण समावेश मन-आँचल में, कंदर्प (कूर्म) सम स्व में ही सिकुड़न। 

प्रथम बनो निज-कार्यक्षेत्र, जब  अंतः-शक्त होंगे तो बाह्य भी सरल 
बाह्य भी अंतः से न अति-विलग, संवेदनशील चेष्टा को लेंगे पहचान। 
जग-पथ सुगम जब निज से संतुष्टि, वरन पर-छिद्रान्वेषण में ही व्यस्त  
बाह्य युद्ध-प्रहार सहन है शक्य, अंदर से तेजस्वी होना अत्यावश्यक। 

कोई महद-उद्देश्य पकड़ लिया मन ने, समस्त-चेष्टाऐं ही वहाँ समर्पित 
लोगों ने जीवन-विचार की धाराऐं  बदल दी, मन की दृढ़ता थी महद। 
उनको अपने व्रत-दर्शन पर विश्वास, मन बनाकर जोर कार्यान्वयन पर 
उपदेश की भी वाँछित शैली, एक मनुज ने ही रच दिया गुरु राज-धर्म। 

एक मनुज में अति-शक्ति संभव, जब और बढ़े क्या न कर सकते तुम 
 स्तुति-ग्रंथ बाद या जीवन-काल में लिखे जाते, जीते-जी दिया काज कर। 
पुरुष में जीवनी-शक्ति ही चाहिए, एक अदम्य साहस-चेष्टा का प्रार्दुभाव 
मानव-संकल्प एक प्रबल उपकरण, ऊर्जा समेकन से सब कुछ संभव। 

कैसे परियोजनाऐं मिलती जाती निष्ठावानों को, लोग कर सकते विश्वास 
वे कार्यान्वयन में सफल भी हो जाते, लघु-२ जोड़कर बना लेते महान। 
अवसरों को हाथ से न जाने देते, जरूरत होती तो जाकर बात कह देते 
स्वीकारोक्ति का भी एक गुण, संजीदा देख तो लोग प्रतिक्रिया ही देते। 

जीवन-दर्शन विवेचन अति-कठिन, निज-पथ गठन तो और भी दुष्कर 
पर जो समर्पित हुआ परमोद्देश्य में, किञ्चित हो जाएगा ध्रुव के भी पार। 
लेखन-भाषण-ज्ञान-कर्म व प्रत्यक्ष व्यवहार, श्रद्धा-संभरण में भी समर्थ 
पार्थिव-सुविधा में न अति-रूचि, उचित जग-परिणति ही चेष्टा-समस्त। 

बहु-रूढ़िवादिताऐं जग-व्याप्त, जीवन परम-सत्य जान सकते ही कम 
और भी अल्प जो पुरा-भ्रामक रूढ़ियों पर, निष्पक्ष टिपण्ण-कर्तुम समर्थ। 
लोगों को निज-सोच का अंग बनाना हुनर, जुड़कर ही तो बलयुत बनेगा 
इतिहास हटा नव-नियम निर्माण-साहस, बीज में वृक्ष-रूप दर्शन-कला। 

चाणक्य सम प्रतिज्ञा सी कर ली कि नंद-वंश को मिटाकर ही हूँगा प्रसन्न 
बुद्ध ने समाज-धर्म कुरीतियों पर घात कर, रचा एक निर्मल-मानव धर्म। 
मुहम्मद ने देख अनेकों की दुर्दशा, पहुँचाया वसुधैव-कुटुंबकम नियम 
सर्व-नर सम पृथ्वी-संसाधन सबके, क्यूँ कुछ ही कर लें अधिकार-पूर्ण।  

डा० अंबेडकर ने जाति-मूलक समाज के अपुण्यों को किया जग समक्ष 
एक नूतन मानवता-वादी दर्शन से, विधि-सहायता से आमूल परिवर्तन। 
सर्व हेतु सम मूल-अधिकार, धर्म-जाति-स्थान नाम पर कोई भेदभाव न 
इतना साहस कि दबंग-तंत्र से भी संघर्ष, अंतः-शक्त थे सब गए सहन। 

उत्तम परिवेश दान वर्तमान-भावी संतानों को, व्यक्तित्व की कसौटी  
मात्र खाने-सोने से मनुज-प्राण क्षय, श्रम से ही संभव श्रेयस-परिणति।  
क्रांतिकारी आऐ हैं धरा पर, धारा ही बदल दी, निज-हेतु भी सोचो नाम
जब सोच की नर-जीवन में स्थली, अमर होवोगे, यही है जीवन-पाठ। 

लोगों ने हर काल में श्रम किया, महत्तम हेतु होवों समर्पित मन लगा
     जीवन-आविष्कार को मूर्त रूप दो, प्रयास से आते परिणाम महान।    


पवन कुमार,
१० दिसंबर, २०१७ समय १९:५५ सायं  
   (मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दि० २८ मार्च, २०१७ समय ८:२२ प्रातः से )
    

Sunday, 3 December 2017

आदर्श व्यवहार

आदर्श व्यवहार 
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अपने पंथों की मान्यताऐं बनाए रखने हेतु, लोग कैसे-2 उपाय रखते 
लोभ निश्चित ही मानव में, सत्य जानते भी आनाकानी स्वीकारने में। 

रूढ़िवादिता - जो लिखा-बोला गया उचित ही, किंचित स्वानुरूप भी  
यदि वह भी गुप्त स्वार्थ में ही उवाच, निष्कर्ष निकाले तो अन्यजन ही। 
कई सात्विक-प्रकृति के भी, महापुरुष तो महावाक्य करते रहते घोषित 
पर स्वार्थियों की निज-टिपण्णी, मुख्य उद्देश्य तो बनाए रखना वर्चस्व। 

कहीं प्राचीन-ग्रंथ लेख का हवाला, सर्वमान्य महानर-कथन की दुहाई 
कहीं अपने से ही उचित, कहीं तुम अनुचित, बलात निज-मंशा व्यक्त। 
कहीं है जबरन लाठी-अस्त्र, लोगों को डरा-धमका पंथ स्वीकार कराते
कहीं देते धन-लोलुप, सहायता-आश्वासन, उचित मान देंगे जुड़ो हमसे। 

यह क्या तमाशा भी है दुनिया, वर्तमान में तो ईश्वर सम दिव्यात्मा न दृष्ट 
कुछ सज्जन तो निश्चित ही, उनका सदा सर्वहित-सदाशयता ही उवाच। 
पीछे उनके अनेक लुब्ध-जन भी, बड़ों के साथ अनेकों का चलता काम  
वह भी उचित यदि लक्ष्य पवित्र, मानव महात्राण - मुक्ति हेतु सद्प्रयास। 

अति-कठिन स्वार्थ प्रबंधन, मानव रह-रहकर अपनाता अनेक उपाय  
चिंता निजी या बंधु-परिजनों  की, कवायद में रचता रहता सब प्रपंच। 
कुछ सिद्धि होती तो हेंकड़ी भी आती, हड़का भी लेता ऊँचा बोलकर  
जहाँ जैसा भेद चल जाय उचित, निज काम निकल जाना चाहिए बस। 

अनेक तो चकमा दे जाते, असमंजसता में रखते, चुपके से जाते निकल 
धूर्त दोनों - एक की क्षुद्र-स्वार्थाशा, अन्य को उचित होते हुए भी वंचन। 
क्या है यह दोगलापन, पुरुष की सदाशयता-भलेपन का भी आदर न  
जब खुद पर पड़ी तो बिलखते, अन्यों के विषय में तो कोई भी टिपण्ण। 

उसी अपुण्य हेतु पर को अपशब्द, जबकि खुद भी उसके शिकार बड़े 
 हम अंदर से एक जैसे ही होते, हाँ बाह्य साधनों से दम-खम आजमाते। 
दूजे को पूर्ण-मूर्ख ही समझ, एक-दूजे के भाव जानते  बस अकथन ही 
  यह किंचित शिष्ट-व्यवहार की औपचारिकता, वरन बहुदा होते नग्न भी। 

किसका आदर जरूरी जो सम्मान कर रहा, भीतर-चिन्ह तुमको ज्ञात 
जब वैसा ही किसी अन्य हेतु करते, तो क्या कारण है कटे रहे व मौन। 
देखो बलात कुछ न मिलता, प्रत्यक्ष व्यवहार में जो माँगते लाभ में रहते 
लज्जालू हाशिए पर ही, नर लाभ तो उठाते हैं पर चुपके से निकल लेते। 

मेरा विषय और था कहीं पहुँच गया, कोशिश करूँ हो कुछ मनन निर्मल 
जीवन तो भोलेपन से न चलता, आप एक जगह पड़े रहो कोई न पूछत। 
जो आगे रहते, विषय-मशगूल, लोगों की नजरों में रहकर बना लेते काम 
सफलता हेतु कृष्ण से सर्वगुण वाँछित, आदर्श में वन-2 मारे फिरते राम। 

दूर से इज्जत किसी की भी, पर वास्तविक व्यवहार में क्या हैं आदर्श  
अपने लोभ से तो न हट पाते, रह-रहकर मन की पीड़ा पर जाते पहुँच। 
कई बार साहस-अल्पता से मौन, पर मौका पाते ही लपटने को उदित  
चोर-सिपाही खेल, जो जीता सिकंदर, भोला कोई न - निर्बल अवश्य। 

विश्व-नियम विस्मयी, देखो न मूषक-पाश को घात लगाए बैठा विडाल 
सिंह हिरण-निकटता प्रतीक्षा में, छुपकर काम हो जाय तो अत्युत्तम।  
कई बार दौड़-भाग कर पकड़ भी लिया, अपने बल की होती परीक्षा  
बहुदा यत्न बावजूद भी कर से फिसलता, मन में बस रह जाती हताशा। 

क्या आदर्श व्यवहार जहाँ सब परस्पर सम्मान करते पूरी करें अपेक्षाऐं
क्या हिरण स्वयमेव सिंह समक्ष आऐ, मुझे मारकर निज-क्षुधा मिटा ले। 
या सिंह  छोड़ देगा -अहिंसावादी हूँ, घास-फूँस खा करूँगा उदर-पूर्ति  
क्या उद्यमी लाभ कर्मियों में बाँट देता, जबकि ज्ञात कमाया उन्होंने ही। 

क्या यह उहोपोह जीवन की, सब प्रपंच जानते हुए भी बने रहते नादान 
उनसे ही सदाशयता आशा, जो हैं पूर्णतया स्वार्थी और लुब्ध-चालाक। 
अपने शिकार से मतलब, सिद्धांत हैं औरों के मुख का तो   सहारा लेते 
हमाम में देखो सब नंगे, जिनको मौका न मिला वे ईमानदार कहलाते। 

दूजों का सुख-वैभव देख जीभ लपलपाते, कब आएगा पास रहते व्यग्र  
कई बार निर्लज्ज हो समक्ष भी कथन, वह भी घुमा-फिरा  करता बात। 
कुछ शीघ्र ही अर्थ पर आते, सीधी ऊँगली से न निकले तो टेढ़ी आजमा 
लोगों के विषय लटके रहते, जिसको चिंता हो दाम लेकर लो निकलवा। 

न कहता सब पूर्ण स्वार्थी ही, अनेक निर्मल-जन सर्वहित ही करते काम 
पर आम जन तो सब भाँति के दोष-लिप्त, हाँ सबके अलग-2 होते बाण। 
यहाँ क्या जरूरी दाँव-पेंचों को बढ़ाना या प्रयास से कुछ माहौल सुधार  
सभी को मिले पूर्ण-पनपन का मौका, हर स्तर पर होना चाहिए ही न्याय। 

निश्चिततया सर्वहित यत्न आवश्यक, निज-पंथ उचित तो वर्धन न अपराध 
वर्तमान-संदर्भ में औचित्य-आँकन भी जरूरी, सुधार हेतु   करो प्रयास। 
लोग विवेक से जाँचे-परखे, उत्तम  तो स्वयं अपनाऐंगे - स्वीकार्य होगा  
पर तंद्रा से जगाना चाहिए, लोग बुद्धिमान होंगे तो जग का  और भला।  

एक प्रयास नर के अंतः-गतिविधि विवेचन का, धर्म-कर्म वार्ता फिर कभी
ज्ञान-प्रवाह तो मनो-प्रवृत्तियों जानकर ही, अतः सचेत हो करो सुवृत्ति। 

पवन कुमार,
३ दिसंबर, २०१७, रविवार, २०:५१ रात्रि 
(मेरी जयपुर डायरी दि० २० जनवरी, २०१७ समय ९:२५ प्रातः से )