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Sunday, 26 May 2019

श्री बाणभट्ट कृत कादंबरी (प्रणय-कथा) : उत्तर भाग परिच्छेद - १० व ११

परिच्छेद१०

इस परिशेष कथा के अति-कठिन श्रम हेतु मैं सृष्टि-गुरु (अभिभावक) गिरिसुता पार्वती परमेश्वर दोनों की वन्दना करता हूँ, जिनकी दो अर्ध-देहों की एक वपु रचना बनते हुए तो सन्धि भेद को लक्षित होती है। 

मैं विश्वस्रजा नारायण को नमन करता हूँ, जिनके द्वारा नर्सिंह-रूप हर्ष से आविष्कृत है, जो केसर सटा (जटा) दिखाते हुए अपने हस्त में खड़ग, शंख, गदा चक्र विस्फुरित करते हैं। मैं इस कथा के सृष्टि-कर्ता वागीश्वर अपने तात को प्रणाम करता हूँ जो किसी अन्य द्वारा संभव नहीं है, उस आर्य को जिनकी सब गृहों लोकों में अर्चना होती है और जिनसे पूर्वजन्म-पुण्यों से ही मेरा आत्म-लाभ हुआ है। 

जब मेरे पिता स्वर्ग-लोक उत्थित हुए, पृथ्वी पर उनकी वाणी द्वारा कथा-प्रबन्ध विच्छेद हो गया। और मैंने जैसे कि उनके असमाप्ति-कृत दुःख को देखकर बिना किसी कवित्व-दर्प के इसको प्रारम्भ किया। 

उसके हेतु इस गुरु-चारुता से शब्द-प्रवाह मेरे पिता का विशेष पुरस्कार है; अमृतरस सुधा-स्रोत चन्द्रपाद (किरण) का सम्पर्क ही मृगांक (चन्द्रहास) को द्रवित करने हेतु पर्याप्त है।

जैसे अपनी पूर्णता पर सभी सरिताऐं गंगा प्रवेश करती हैं, और अपनी तन्मयता में समुद्र-लीन हो जाती हैं, अतएव इस कथा के पूर्ण हेतु अपने पिता के वचन-प्रवाह द्वारा सिंधु-गमन पर मेरी वाणी भी क्षिप्त है। 

कादम्बरी के मधुर-रस भरण से मत्त सम मुझमें किञ्चित भी चेतना जनित नहीं होती है, उसमें मैं रस-वर्ण वर्जित होने से अपनी वाणी में एक समाप्ति अनुसंधान करने के कारण भीत हूँ। 

विटप (बीज) जो गर्भित फलों का वचन देते हैं और कुसुम-निर्माण हेतु दैवित हैं, उचित-कर्मों से विटप बोने वाले द्वारा बलात्कृत होते हैं; उत्कृष्ट-भूमि में छितराऐ होते हैं; पक्वता हेतु वर्धित होते हैं; परन्तु यह बिखेरने वाले का पुत्र ही है जो उनको एकत्रित करता है।



परिच्छेद - ११

"कादम्बरी ने निरंतरता रखी, "और इसके अतिरिक्त यदि कुमार को स्वयं लज्जा आती है अथवा मेरी मनोभव विकार-वेदना (तरलता) द्वारा लज्जा में रखे जाते हैं, तो उनके दर्शन सुलभ होंगे। अपने से डरो, बलात उनको लाने के अपराध से, भीत से, उनकी उपस्थिति प्रवेश होगी। यह सब तब सम्भव होगा यदि मेरी सखी पत्रलेखा मुझसे स्नेह कारण अपना पूर्ण-प्रयास करती है, और तथापि उनको आने हेतु प्रेरित कर सकीउसके चरणपात होते हुए भी, या तो भाग्य से उसके अभिभावकों के प्रति अपने आदर से, अथवा राजन्य-कर्त्तव्य के प्रति अपनी श्रद्धा से, अथवा अपनी मातृभूमि-प्रेम से, अथवा मेरे प्रति अनिच्छा-भाव से, नहीं, और नहीं। मैं वह कादम्बरी हूँ जिसको कुमार ने शीतगृह में  एक कुसुम-शय्या पर विश्राम करते हुए देखा था, और वह चन्द्रापीड़ है, अन्य की पीड़ा से सर्वस्व-अभिज्ञ, जो यहाँ मात्र दो दिवस रहा, और फिर चला गया। मैंने महाश्वेता को विवाह करने का वचन दिया था, यह कहते हुए कि कामदेव प्रायः एक अदर्शित हेतु भी प्रणय द्वारा हमारा जीवन ले लेता है। परन्तु यह मेरी प्रस्तुति नहीं है। क्योंकि मन द्वारा कल्पित कुमार सदा मेरी दृष्टि में स्वयं को प्रस्तुत करता है, और सोते अथवा जागते हुए, सब स्थानों में मैं उसको विचार करती हूँ। अतः उसको लाने की वार्ता करो। 

उसके ऊपर मैंने मनन किया, "सत्य ही प्रिय, जैसा कि कल्पना-चित्रित है, अपने कांताओं से पृथक कामिनियों हेतु एक महान सहाय है, विशेषतया उत्तम-कुल कन्याओं हेतु।" और मैंने कादंबरी को वचन दिया कि कुमार, मैं उसे लाऊँगी। तुम्हारे नाम की मेरी पूर्ण-ध्वनि से प्रेरित तब उसने, विष-शमन हेतु एक मन्त्र द्वारा, तुरन्त अपने चक्षु खोले, और कहा, "पत्रलेखा, मैं नहीं कहती कि तुम्हारा गमन मुझे प्रमुदित करता है। यह मात्र तब है जब मैं तुम्हें देखती हूँ कि मैं अपना जीवन सहन कर सकती हूँ; तथापि यदि यह अभिलाषा तुमको पाशित करे, तुम क्या करोगी ?" यह कहते हुए उसने अनेक उपहारों संग मुझे विदा किया।

तब किंचित नमित शीर्ष संग पत्रलेखा ने निरन्तरता रखी : "मेरे युवराज, राजकन्या की नवनीत करुणा ने मुझे साहस दिया है, और मैं उसके हेतु चिंतित हूँ, और अतः तुमसे कहती हूँ, 'क्या तुम उसे इस अवस्था में छोड़कर अपनी मृदु-प्रकृति के अनुरूप व्यवहार कर रहे हो ?"

'पत्रलेखा द्वारा अतएव भर्त्सना करने पर, और कादम्बरी के वचन सुनने पर, अतएव विरोधाभासी-भावों से पूर्ण, कुमार भ्रमित हो गया; और कादंबरी की भावनाओं में सम्मिलित होते हुए, उसने अश्रुओं सहित पत्रलेखा से पूछा, "मुझे क्या करना चाहिए ? मदन ने कादम्बरी मुझे हेतु दारुण का एक कारण बना दिया है, और तुम्हारे हेतु निंदा का। और मैं सोचता हूँ यह किंचित शाप ही था जिसने मेरा मस्तिष्क कृष्ण कर दिया है; अन्यथा कैसे मेरा मस्तिष्क वंचित होता जब स्पष्ट चिन्ह प्रदत्त थे, जो एक मूढ़-चेतस में भी कोई प्रश्नचिन्ह उत्पन्न नहीं करता? मेरा यह सब दोष एक त्रुटि कारण ही उदित हुआ है। अतः अब मैं तुमसे उसके निज-हेतु समर्पण द्वारा, यहाँ तक कि अपने जीवन द्वारा भी, अतएव आचरण करता हूँ कि राजकन्या मुझे इतना कर्कश-हृदयी समझे।"

"जब वह इस प्रकार उवाच कर रहा था, एक दासी ने शीघ्रता से प्रवेश किया और कहा : 'युवराज, महाराज्ञी विलासवती ने यह कहते हुए एक संदेश भेजा है, 'मैंने अपने अनुचरों की वार्ता से सुना है कि पत्रलेखा जो पीछे रह गई थी, अब वापस गई है। मैं उसको तुम्हारे जितना ही स्नेह करती हूँ। क्या तुम अतएव आओगे, और उसे संग लाओगे। तुम्हारे मृणाल-मुख की दृष्टि, सहस्रों अभिलाषाओं द्वारा विजित, कदाचित ही प्राप्त होती है।"

"अब मेरा जीवन कैसे विभ्रमों द्वारा उछाला गया है", युवराज ने विचार किया। "मेरी माता दुःखित हो जाती है यदि एक क्षण हेतु भी वह मुझे नहीं देखती है। मेरी प्रजा मुझे अत्यधिक स्नेह करती है। कादंबरी मेरी विजय-उपयुक्त है, और मेरा चेतस विलम्ब से अधीर है", यह विचारते हुए वह महाराज्ञी के पास गया, और एक असहनीय उर-अभिलाषा में दिवस गुजारा; जबकि रात्रि उसने कादंबरी के रमणीयता-विचार में बिताई, जो प्रेम-मन्दिर सम थी।

'उसके पश्चात मधुर-वार्ता ने उसके अन्तः में कोई प्रवेश नहीं पाया। अपने मित्र-वचन उसको कर्कश प्रतीत होते थे; बांधव-वार्ता कोई हर्ष प्रदान नहीं करती थी। मदनाग्नि से उसकी वपु शुष्क हो गई थी, परन्तु उसने निज उर-तनयता का विसर्ग नहीं किया था। वह प्रसन्नता से घृणा करता था लेकिन आत्म-नियंत्रण को नहीं।
       
'जब वह प्रखर-प्रेम द्वारा अतएव अग्र-आकर्षित था, जिसका जीवन कादंबरी की उत्तमता चारुता पर विश्राम करता था, और अपने अभिभावकों हेतु गहन-स्नेह द्वारा पार्श्व-ग्रसित था, उसने एक दिवस, जब वह शिप्रा-तीर पर भ्रमण कर रहा था, एक अश्व-दल आते हुए देखा। उसने एक पुरुष को पूछने हेतु भेजा कि यह क्या हो सकता है, और स्वयं शिप्रा पार करते हुए जहाँ जल उसकी जंघा तक ही चढ़ता था, अपने दूत की वापस-आगमन की एक कार्तिकेय-मन्दिर में प्रतीक्षा की। पत्रलेखा को निकट बुलाकर उसने कहा, "देखो ! वह अश्वारोही पुरुष जिसका मुख कठिनता से ही स्पष्ट है, केयूरक ही है।"

तब उसने अपने अश्व से स्वयं को दूर हटाते देखा जबकि वह बहुत दूर था, जो त्वरित-आरोहण से उड़ी रज से धवल, जबकि अपने परिवर्तित रूप द्वारा, श्रृंगार-रहित उसका निराश मुख, और उसके नेत्र जो उसकी अन्तः-पीड़ा के अग्रदूत थे, उसने बिना वचनों के ही कादंबरी के दुःख-संतापों को प्रकट किया। चन्द्रापीड़ ने उसे स्नेह से बुलाया और जब वह शीघ्रता से झुका, अपने निकट खींच लिया, और अंक से लगा लिया। और जब वह पीछे हट चुका और अपना अभिवादन दे चुका, युवराज ने अपने अनुचरों को नम्र-प्रश्नों से प्रसन्न किया, उसकी ओर उत्सुकता से देखा, और कहा, "केयूरक, तुम्हारे दर्शन से कादंबरी और उसके अनुचरों की कुशलता स्पष्ट हो जाती है। तुम क्यों विश्राम में हो और आराम से हो, क्या तुम मुझे अपने आगमन का कारण बताओगे ?", और वह केयूरक पत्रलेखा को अपने गज पर बैठाकर निकेतन ले गया। तब उसने अनुचर विदा किए, और मात्र पत्रलेखा की संगति में, उसने केयूरक को पास बुलाया, और कहा : मुझे कादम्बरी, मदालेखा महाश्वेता का संदेश सुनाओ।"

"मैं क्या कहूँगा", केयूरक ने उत्तर दिया; 'मुझे इनमें से किसी का कोई संदेश नहीं है। क्योंकि जब मैंने पत्रलेखा को मेघनाद के सुपर्द किया, और वापस लौटा, और तुम्हारे उज्जैयिनी-गमन के विषय में बताया, महाश्वेता ने ऊर्ध्व देखा, एक दीर्घ-ऊष्म आह ली, और निराशा से 'तब यह अतएव है' कहती हुई अपने तप हेतु अपने आश्रम लौट गई। जैसे कि महाश्वेता की विदाई से अभिज्ञचेतना-शून्य कादंबरी ने एक दीर्घ-काल पश्चात अपने लोचन खोले, घृणा से मुझे महाश्वेता को बताने का आदेश देते; और मदालेखा से पूछते हुए यदि कभी किसी ने ऐसा कृत्य किया है जैसे चन्द्रापीड़ ने, अथवा करेगा, उसने अपने अनुचर निवृत किए, अपने को  शय्या-क्षिप्त कर लिया, और अपने मुख ढ़क लिया, और यहाँ तक कि मदालेखा से भी वार्ता बिना दिवस व्यतीत किया, जो पूर्णतया उसके दारूणों में सम्मिलित थी। जब अगली अति-प्रातः मैं उसके पास गया, उसने मुझे अश्रु-पूर्ण चक्षुओं से देखा, जैसे कि मुझे दोष ही दे रही हो। और जब मैंने अपनी दुःखित स्वामिनी को अतएव देखा, स्वयं को निकास हेतु आदेशित पाया, और अतएव बिना राजकन्या को बताए, मैं अपने स्वामी-चरणों में आगमन कर चुका हूँ। अतएव केयूरक के संवाद को ध्यान से सुनने हेतु विभूषित, जिसका उर एक जीवन-रक्षा उत्सुक है, जिसकी मात्र शरण तुममें है। क्योंकि, तुम्हारे प्रथम आगमन द्वारा जैसे सुवासित मलयानिल द्वारा लता पूर्ण-कौमार्य हो अरण्य में विव्हलित होती है, वैसे ही जब उसने तुमको देखा, पूर्ण-लोक का हर्ष, एक वसन्त सम, मदन उसमें प्रवेश कर गया जैसे कि वह एक लोहित अशोक-लता हो। परंतु अब वह तुम्हारे हेतु महद पीड़ा को सहन करती है।" तब केयूरक ने विस्तार से उसके कष्ट बताए, जब तक कि युवराज दारुण द्वारा विजित होकर, इसे सहन कर स्का और मूर्छित हो गया।

तब अपनी मूर्च्छा से जागकर, उसने पश्चाताप किया कि कादंबरी या उसकी सखियों से एक संदेश-प्राप्ति को अति-कर्कश हृदय में विचारा गया, और उनको जब वह वहाँ था, निज-प्रेम उसे बताने का दोष दिया।

"एक से सम्बन्धित को लज्जा क्यों होनी चाहिए जो उसका सेवक है, सदा उसके चरणों में, कि अति-तनय में दुःख ने अपना गृह बनाना चाहिए ? अब, मैं क्या कर सकता हूँ, कुछ दिनों से उससे दूर हूँ। उसकी वपु एक कुसुम-पात भी सहन में अक्षम है जबकि यहाँ तक कि मेरे जैसे निष्ठुर-हृदय हेतु भी कामदेव-शर सहन करना दुष्कर है। जब क्रूर दैव द्वारा प्रारम्भ किए अस्थिर कार्यों को मैं देखता हूँ, मैं नहीं जानता यह कहाँ रुकेगा ? अनश्वर-भूमि पर क्या मेरा आगमन अन्यत्र था, किन्नरों हेतु क्या मेरा अन्वेषण व्यर्थ था ? जहाँ महाश्वेता संग मेरी हेमकुण्ट-यात्रा, अथवा मेरा राजकन्या का वहाँ दर्शन, अथवा मेरे हेतु उसका प्रेम-उदयअथवा वापस लौटने हेतु मेरे तात का आदेश, जिसका कि मैं उल्लंघन कर सकता था, यद्यपि मेरी अभिलाषा अभी अपूर्ण थी ? यह दुर्दैव कारण है कि हम उच्च उठाए जाते हैं, और फिर भूमि पर पटक दिए जाते हैं। अतः हम देवी के आश्वासन हेतु अपना सर्वस्व करें।" तब संध्या में उसने केयूरक से पूछा, "तुम क्या सोचते हो ? जब तक हम नहीं पहुँचते, क्या कादम्बरी निज-जीवन को सहारा देगी ? अथवा क्या मैं एक कातर मृगिणी की उसकी अक्षियों संग उसके मुख को पुनः देख पाऊँगा ?" "युवराज, दृढ़ बनो", उसने उत्तर दिया।" प्रस्थान हेतु अपना भरसक करो।" युवराज ने प्रस्थान हेतु स्वयं योजनाऐं निर्माण प्रारंभ कर दिया; परन्तु क्या अपने तात के आदेश के बिना प्रसन्नता अथवा उर की कौन सी तृप्ति होगी, अथवा अपनी दीर्घ-अनुपस्थिति पश्चात उसको कैसे उपलब्ध किया जा सकता था ? एक सखा की सहायता वहाँ आवश्यक थी, परन्तु वैशम्पायन दूर था।    

परंतु अगली प्रातः उसने अपनी सेना के दशापुरा पहुँचने का समाचार सुना, और हर्ष के साथ सोचते हुए कि अब उसको दैव-अनुग्रह प्राप्त होगा, अब वैशम्पायन निकट था, उसने हर्ष से समाचार केयूरक को बताया। "यह घटना", अपर ने उत्तर दिया, "तुम्हारे प्रस्थान को निश्चित ही घोषित करती है। निस्संदेह तुम देवी को प्राप्त करोगे। क्योंकि किसी चन्द्रिका बिना शशि कब देखा जाता था, अथवा एक मृणाल बिना कमल-सर, अथवा लता बिना एक उपवन ? तथापि वैशम्पायन-आगमन उसके संग अपनी योजनाऐं निश्चित करने में विलम्ब होगा। परन्तु मैं तुम्हें देवी की अवस्था व्यक्त चुका हूँ, जो किंचित विलम्ब भी अस्वीकृत करती है। अतएव तुम्हारे स्नेह-विभूषण से मूढ़ मेरा उर चाहता है कि अपने स्वामी के आगमन-हर्ष को सुनाने हेतु अकस्मात-प्रस्थान हेतु मुझे एक आदेश द्वारा अनुग्रहित किया जाए।" जिसपर एक दृष्टि संग जो उसकी आतंरिक-सन्तुष्टि प्रदर्शित करती थी, युवराज ने उत्तर दिया : "कौन है जो काल स्थान को इतनी भली-भाँति जानता है, अथवा कौन इतना शुभेच्छु निष्ठावान है ? अतः यह एक हर्षदायक विचार है। देवी के प्राण-सहायार्थ जाओ और मेरी वापसी हेतु तैयारी करो। परन्तु पत्रलेखा को भी देवी-चरणों में अपने संग आगे जाने दो। क्योंकि वह देवी द्वारा अनुग्रहित (स्नेह-प्राप्त) है।" तब उसने मेघनाद को बुलाया और उसको पत्रलेखा को कादंबरी को यह बताने का आदेश दिया कि उसकी उत्तम निष्ठा प्राकृतिक-तनयता (मृदुता) ने उसे संभाल रखा है, यद्यपि बहुत दूर है और प्रेमाग्नि-दग्ध है, आगमन हेतु उसकी स्वीकृति की प्रार्थना करें। उनकी विदाई पश्चात, वह वैशम्पायन से मिलने हेतु अपने तात की स्वीकृति लेने गया। महाराज ने स्नेह से उसका स्वागत किया, और शुकनास से कहा : "वह अब विवाह हेतु अवस्था पर गया है। अतः महारानी विलासवती संग विचार-विमर्श करके कि कोई सुंदर कन्या चुनी जाए। क्योंकि मेरे पुत्र जैसा एक मुख प्रायः नहीं देखा जाता है। जब अब हमें एक वधू के कमल-आनन दर्शन द्वारा हर्षित होने दो।" शुकनास ने स्वीकारा कि युवराज ने सभी विद्याऐं प्राप्त कर ली हैं, राजन्य-भाग्य का दृढ़ता से निज-निर्माण किया है, और वसुंधरा-पाणिग्रहण किया है, अतः ऐसा कुछ भी उसके हेतु अशेष है सिवाय एक वधू-विवाह करने के।" चन्द्रापीड़ ने सोचा, "कादम्बरी संग युग्म के मेरे विचार हेतु मेरे तात की योजना कितनी उपयुक्त है। 'एक अंधकार हेतु प्रकाश' उक्ति अथवा 'एक मृत पुरुष हेतु अमृत-वर्षा, मुझमें सत्य हो रही है। मात्र वैशम्पायन-दर्शन पश्चात् मैं कादम्बरी को विजित करूँगा।" तब महाराज विलासवती के पास गए, और विनोद में अपने पुत्र हेतु एक वधू हेतु कोई सलाह देने की भर्त्सना की। इस मध्य युवराज ने वैशम्पायन-आगमन की प्रतीक्षा में दिवस व्यतीत किया। और उसके हेतु प्रखर-अभिलाषा में रात्रि के दो प्रहार अनिद्रा में बिताने के पश्चात् (४९५) उसकी प्रेम-ऊर्जा दुगूनी हो गई, और उसने अपने प्रस्थान की शंख-ध्वनि हेतु आदेश दिया। तब उसने दशापुरा के पथ पर प्रारम्भ किया और कुछ दूर जाने के पश्चात् शिविर को देखा, और यह विचारते हुए प्रसन्नता अनुभव की कि वह अब वैशम्पायन को देखेगा; और अकेले चलने पर, उसने पूछा कि उसका सखा कहाँ है ? परन्तु रुदन करती स्त्रियों ने उत्तर दिया : "क्यों पूछते हो ? उसको यहाँ क्यों होना चाहिए ?" और भीषण-उद्विग्नता में उसने शिविर-मध्य शीघ्रता की। वहाँ उसको पहचान लिया गया और उसके प्रश्नों पर मुखियों ने एक वृक्ष नीचे विश्राम करने की प्रार्थना की जबकि वे वैशम्पायन की कथा सुनाऐं। उन्होंने कहा : 'वह अभी तक जीवित है, और बताया कि क्या हुआ था। जब तुम्हारे द्वारा उत्सृज (छोड़े जाने) के पश्चात्, वह एक दिवस रुका और उसने हमारी यात्रा हेतु आदेश दिया। 'तथापि' उसने कहा, 'अच्छोडा सरोवर पुराणों में अति-पावन वर्णित है। हम वहाँ स्नान करें और इसके तीर पर निर्मित मन्दिर में शिव की आराधना करें। क्योंकि क्या कोई स्वप्न में भी, देव-विचरित इस स्थल को पुनः देखेगा ? परन्तु तीर पर एक निकुञ्ज (लता-मण्डप) देखकर उसने इसे दृषि से एक दीर्घ बिछुड़े एक भ्राता सम देखा, जैसे कि उसमें स्मरण जागृत हो गए थे। और जब हमने उसे विदा हेतु अनुरोध किया, उसने ऐसा आचरण किया कि जैसे उसने सुना ही हो; परन्तु अंत में उसने हमें गमन-अनुमति दे दी, यह कहते हुए कि वह उस स्थल का त्याग नहीं करेगा। 'क्या मैं भली-भाँति नहीं जानता हूँ, उसने कहा, 'वह सब जो तुमने मेरी विदाई हेतु उवाच किया है ? परन्तु मेरा स्वयं ऊपर कोई वश नहीं है, और मैं जैसे कि यह था, स्थल पर बाँध दिया गया हूँ, और तुम्हारे साथ जा सकता हूँ।' अतः अंत में हमने उसे छोड़ दिया, और यहाँ गए।"   

"इस कथा पर विस्मित, जिसको कि वह एक स्वप्न में भी कल्पित कर सकता था, चन्द्रापीड़ ने आश्चर्य किया : "उसका सबको त्याग और अरण्य-वास संकल्प का क्या कारण हो सकता है ? मैं स्वयं का कोई दोष नहीं देखता हूँ। वह मुझ संग प्रत्येक वस्तु साँझा करता है। क्या मेरे तात अथवा शुकनास द्वारा किंचित ऐसा कहा गया है जिससे वह आहत हो ? वह अंत में उज्जैयिनी लौट गया, यह सोचते हुए कि जहाँ वैशम्पायन है वहाँ कादम्बरी भी है, और उसको वापस लाने का निश्चय किया। उसने सुना कि महाराधिराज महाराज्ञी शुकनास के आवास गए हैं, और उसने उनको वहाँ अनुसरण किया। वहाँ उसने सुना कि मनोरमा अपने पुत्र की अनुपस्थिति पर विलाप कर रही है जिसकी दृष्टि बिना वह जीवित नहीं रह सकती थी, और पूर्व कदापि भी जिसने, यहाँ तक कि अपने प्रारम्भिक काल में भी उसने उसकी उपेक्षा नहीं की थी। उसके प्रवेश पर महाराजाधिराज ने उसका अतएव अभिनन्दन किया : 'मैं उसके हेतु तुम्हारे महद स्नेह को जानता हूँ। तथापि जब मैंने तुम्हारी कथा सुनी है मेरा हृदय तुम्हारा कुछ दोष सन्देह करता है।" परन्तु शुकनास, जिसका मुख पीड़ा अधीरता से कृष्ण हो गया था, ने भर्त्सना-पूर्ण उवाच किया : "यदि, महाराजाधिराज, शशि में ऊष्मा है अथवा अग्नि में शीतलता है, तब युवराज में भी दोष हो सकता है। वैशम्पायन जैसे पुरुष विनाश अग्र-सूचक हैं, ईंधन बिना पावक, चमकते दर्पण जो प्रत्येक वस्तु विलोम पथ प्रस्तुत करते हैं; उनके हेतु अधम उत्कृष्ट है, अनुचित उचित है, और अज्ञानता प्रज्ञा है। उनमें प्रत्येक अपुण्यता हेतु निर्मित है, और उत्तमता हेतु नहीं। अतएव वैशम्पायन तो तुम्हारे क्रोध से भीत हुआ है, यह सोचा कि उसकी माता का जीवन, उसपर निर्भर करता है, ही कि वह अपनी कुल-निरन्तरता हेतु अर्घ्य-अर्पित होने हेतु जन्मा है। सत्य ही इतने पातकी दैत्यी का जन्म मात्र हमको क्लेश देने हेतु था। इसपर महाराज ने कहा: "सत्य ही मुझ एक जैसे हेतु तुम्हें समझाना एक दीपक द्वारा अग्नि को प्रकाश देने के समान है, अथवा दिवस-प्रकाश के प्रभाकर को उतनी ही चमक देना। तथापि सबसे बुद्धिमान का चित्त भी क्लेश द्वारा मलिन हो जाता है जैसे कि पावस ऋतु द्वारा मानस-सर और तब दृष्टि नष्ट हो जाती है, लोक में ऐसा कौन नहीं है जो यौवन द्वारा परिवर्तित हुआ हो ? जब यौवन अपना प्रदर्शन करता है, वृद्धों हेतु वात्सल्य बालपन संग बह जाता है। मेरा हृदय शोकित है जब तुम वैशम्पायन के विषय में कर्कश बोलते हो। उसे यहाँ लाया जाय। तब जो उपयुक्त होगा, हम करेंगे।" शुकनास ने अपने पुत्र की निंदा निरन्तर रखी; परन्तु चन्द्रापीड़ ने उसे घर लाने हेतु गमन का अनुरोध किया, और शुकनास ने अंत में स्वीकृति दे दी। तब चन्द्रापीड़ ने ज्योतिषियों को बुलाया, और गुप्त रूप से अपने गमन हेतु दिवस-नाम कथन का अनुरोध किया, ताकि जब वे महाराज अथवा शुकनास द्वारा पूछे जाते हों तो उसके प्रस्थान में विलम्ब हो। उन्होंने उसे उत्तर दिया : "ग्रह-सहयोग तुम्हारे प्रस्थान-विरुद्ध है तथापि एक भूप काल-निर्धारक होता है। किसी भी समय जब तुम्हारी इच्छा निश्चित है, प्रत्येक विषय हेतु ही वह समय है।" तब उन्होंने प्रस्थान-दिवस उद्घोषणा की; और उसने अपनी यात्रा पर मनोरथ करते हुए दिवस रात्रि बिताई, और विश्वास करते कि उसने उससे पूर्व ही कादम्बरी वैशम्पायन को देख लिया है। 

और जब समय आया, विलासवती ने उसे गहन दुःख संग विदाई ली : "मैंने तुम्हारे प्रथम-प्रस्थान हेतु शोक किया था जैसे कि अब करती हूँ। मेरा हृदय विदीर्ण है; मेरी वपु पीड़ा में है; मेरा चित्त उद्विग्न है। मैं नहीं जानती क्यों मेरा उर इतना चिंतित है। बहुत काल तक दूर मत रहना।" उसने उसे सांत्वना का प्रयास किया, और तब अपने तात के पास गया, जिन्होंने उसका तनयता संग अभिनन्दन किया, और अंततः यह कहते हुए विदा किया : 'मेरी इच्छा है कि तुम एक भार्या लो और साम्राज्य-भार प्राप्त करो, जिससे मैं राजर्षियों द्वारा अनुसरित पथ-प्रवेश हो सकूँ, परन्तु वैशम्पायन का यह विषय इसके पथ में है, और मुझे आशंकाऐं हैं कि मेरी अभिलाषा पूर्ण नहीं होने जा रही हैं; अन्यथा वह कैसे एक इतने विचित्र ढंग से आचरण कर सकता था ? अतएव यद्यपि तुमको अवश्य ही जाना चाहिए, मेरे पुत्र, शीघ्र वापस लौटना, जिससे कि मेरी हृदय-अभिलाषा असफल हो।" अंत में उसने प्रारम्भ किया, और अपने मित्र गन्धर्व-लोक के मनन में अपनी यात्रा पर दिवस रात्रि बिताए। और जब वह बहुत दूरी तय कर चुका, पावस ऋतु गई, और वर्षा-पातों (झंझावात) ने अपना समकक्ष उसके निज-हृदय को भी पा लिया। तथापि उसने अपनी यात्रा-विराम नहीं की, ही उसने अपने मुखियों के अपने स्वयं के ऊपर किंचित ध्यान देने के अनुरोध पर ध्यान दिया, परन्तु समस्त दिवस अश्व पर चलता रहा। परन्तु पथ का एक तिहाई भाग तय करना शेष रह गया था जब उसने मेघनाद को देखा, और, वैशम्पायन के विषय में उत्सुकता से पूछते हुए, उसको ज्ञात हुआ कि पत्रलेखा ने यह निश्चय करके कि वर्षा उसके आगमन में विलम्ब करेगी, मेघनाद को उससे मिलने हेतु भेजा है, और कि अपर अच्छोडा सरोवर पर नहीं था। द्विगुणित पीड़ा से युवराज सरोवर पर गया, और अपने अनुचरों को इसकी सभी दिशाऐं रक्षित करने का आदेश दिया, ताकि लज्जा में कहीं वैशंपायन उनसे दूर भाग जाए; परन्तु उसके सब अन्वेषणों ने उसके मित्र का कोई संकेत नहीं दिखाया। उसने मनन किया, 'मेरे चरण उसके बिना इस स्थल को नहीं छोड़ सकते हैं, और यद्यपि कादंबरी नहीं दिखाई दी है। संयोग से महाश्वेता इस विषय में जानती होगी, मैं कम से कम उसको देखूँगा।" अतः वह इंद्रायुध पर आरोह हुआ, और उसके तपोवन की ओर गया। वहाँ अवरोह हो, उसने प्रवेश किया, "परन्तु गुफा-द्वार पर कठिनता से तारालिका द्वारा सहारा दी हुई, बुरी तरह विलाप करती हुई महाश्वेता को देखा। "ईश्वर करे", उसने विचार किया कि कादंबरी पर भी कोई विपदा पड़ी हो क्योंकि महाश्वेता इस अवस्था में है, जबकि मेरा आगमन हर्ष का एक कारण होना चाहिए।" व्यग्रता एवं दारुणता से उसने तारालिका से प्रश्न किया, परन्तु मात्र महाश्वेता के मुख को देखा। तब अपर हिचकिचाहट से अंत में बोली : "क्या इतना अधम हो सकता है कि तुम्हें बताए ? तथापि कथा तो कहनी ही चाहिए। जब केयूरक से तुम्हारी विदाई के विषय में सुना, मेरा हृदय इस विचार से विदीर्ण हो गया कि कादंबरी के अभिभावकों की अभिलाषा, मेरी स्वयं की इच्छा, और तुम्हारे संग मिलन में कादंबरी के हर्ष-दृष्टि नहीं लाई गई थी, और उसके प्रति प्रेम-बन्धन को भेदकर भी, मैं उससे पूर्व और अधिक कर्कश-दण्ड हेतु आवास लौट गई। यहाँ मैंने एक तुम्हारे जैसा एक युवा ब्राह्मण देखा, शून्य-दृष्टि से इधर-उधर देखता हुआ। परन्तु मेरी दृष्टि पर उसके चक्षु मात्र मुझपर ही स्थित हो गए, यद्यपि पूर्व में नहीं देखा हुआ, उसने मुझे पहचान लिया, यद्यपि एक अपरिचित वह मुझे एक दीर्घ काल से जानता थाऔर एक मूढ़ अथवा वशित भाँति मुझको देखकर अंत में उसने कहा : 'शुभ कन्ये, मात्र जो जानते हैं कि जन्म, वय रूप हेतु क्या उपयुक्त है इस लोक में निंदा से पार पाते हैं। तुम अतएव क्यों कष्ट करती हो, दुराग्रही दैव की भाँति एक इतने अनुचित आचरण में, जिसमें तुम एक माला सम तनय वपु को मदद पश्चाताप में व्यर्थ करती हो ? तप-कष्ट उनके लिए हैं जो जीवन-प्रमोद आनन्दित कर चुके हों और अपनी महिमा खो चुके हैं, परन्तु चारुता-विभूषित एक हेतु नहीं।' यदि तुम मेदिनी-हर्षों से दूर रहती हो, व्यर्थ में स्मर (कामदेवअपना शर मोड़ लेगा, अथवा निशापति-उदय व्यर्थ हो जाएगा। चन्द्रिका मलय-सलिल का कोई उद्देश्य नहीं रह जाएगा।

"परन्तु मैंने, पत्रलेखा की विदाई बाद किंचित भी परवाह करते हुए उसके बारे में कोई प्रश्न नहीं पूछे, और तारालिका को उसे दूर रखने हेतु आदेश दिया, क्योंकि यदि वह वापस लौटता है तो अवश्य ही कुछ अपुण्य घटित होगा। परन्तु दूर रखे जाने के बावजूद, चाहे काम के दोष से हो अथवा दुःख-दैव से हो जो हम पर पड़ी है, उसने अपना आकर्षण नहीं त्याग किया; और एक रात्रि, जब तारालिका सुप्त थी, और मैं पाण्डुरीक के विषय में विचार कर रही थी, मैंने दिवस सम स्पष्ट शशि-ज्योत्स्ना में देखा कि एक युवक एक मदहोश सम रहा है। इस दृश्य से मुझे चरम-भय ने पाशित कर लिया। 'एक बुरी वस्तु', मैंने विचार किया, 'मुझ पर पड़ी है। यदि वह निकट आता है और अपने कर से मुझे स्पर्श करता है, यह शापित वपु निश्चित ही नष्ट हो जानी चाहिए; और तब इसका सहन, जो मैंने पुनः पाण्डुरीक की मनन-आशा में स्वीकार किया था, वृथा ही होगा।' जबकि मैं अतएव विचार कर रही थी वह निकट आया, और बोला : 'चन्द्रमुखी देवी, कामदेव-सखा चन्द्र मुझे मारने हेतु प्रयास कर रहा है। अतः मैं सुरक्षा माँगने हेतु आया हूँ। मुझे बचा लो, जो अशरण है, और स्वयं-सहायता में अशक्य है, क्योंकि मेरा जीवन तुम पर समर्पित है। यह तपस्वियों का कर्त्तव्य है कि उनकी रक्षा करें जो उनके पास रक्षण हेतु पलायन करते हैं। तब तुम यदि निज को मुझपर समर्पित नहीं करती तो चन्द्र मदन मुझे मार देंगे।' इन वचनों पर क्रोध-पूर्ण एक ध्वनि से मैं चिल्लाई : 'दुष्ट, अपने इन वचनों के उवाच से तुम्हारे शीर्ष पर वज्रपात क्यों नहीं हो गया ?' निश्चित ही नश्वरों में उचित एवं अनुचित के साक्षी पञ्च-तत्व तुम्हारी देह में न्यून हैं, उसमें पृथ्वी वायु और अग्नि अन्यों ने तुम्हें पूर्णतया नष्ट नहीं किया है। यद्यपि तुमने एक शुक सम उवाच करना सीख लिया है, बिना विचारे कि कहने हेतु क्या उचित अथवा अनुचित है। क्यों नहीं तुम एक शुक-रूप में पैदा होते ? मैं तुम पर यह दैव-प्रबन्ध करती हूँ कि तुम अपनी निज-वाणी अनुरूप एक जन्म में प्रवेश करो, और एक मुझ जैसी से प्रेम करना त्याग दो।' ऐसा कहते ही मैं शशि की ओर मुड़ी और ऊपर उठाए करों से प्रार्थना की : 'सौभाग्यशाली, सबके स्वामी, विश्व-रक्षक, यदि पाण्डुरीक की दृष्टि के पश्चात मेरा हृदय किसी अन्य पुरुष-विचार से स्वतन्त्र हो गया है, कृपया यह मिथ्या-प्रेमी, मेरे इस उवाच-सत्य द्वारा, मेरे द्वारा ध्वनित अवस्था में पतित हो जाय।' तब सीधे, मैं नहीं जानती कैसे, चाहे प्रेम-शक्ति से, अथवा उसके अपने पाप से, अथवा मेरे शब्द-बल से, वह मूलों द्वारा उखाड़े गए वृक्ष-सम निर्जीव गिर गया। और जब तक वह मृत नहीं हो गया कि मैंने उसके रुदन करते अनुचरों से जाना कि उत्तम युवराज, वह तुम्हारा सखा था।" अतएव कथन पश्चात, उसने लज्जा में अपना आनन नमन कर लिया और नीरवता से रुदन करती रही। परन्तु अडिग दृष्टि स्खलित-ध्वनि द्वारा चन्द्रापीड़ ने उत्तर दिया : 'देवी, तुमने अपना सम्पूर्ण कर लिया, और तथापि इस जीवन में देवी कादंबरी के चरण-सम्मानित करने के हर्ष प्राप्त करने मैं भी अतीव अभागा हूँ। कृपया अन्य जीवन में मेरे हेतु यह कल्याण निर्मित करें।" इन वचनों के साथ, जैसे कि कादम्बरी-विजय में अनुत्तीर्ण होने के दारुण से, एक मधु-मक्षिका द्वारा भेदित खिलती एक कली की भाँतिउसका मृदु हृदय विदीर्ण हो गया।

'तब तारालिका उसकी निर्जीव वपु पर और महाश्वेता हेतु भर्त्सना-विलापों में फूट पड़ी। और जब मुखियों ने भी दारुण एवं विस्मय के क्रंदन-स्वर उठाए, वहाँ कुछ मात्र परिचारिकाओं संग कादम्बरी ने स्वयं प्रवेश किया, जैसे कि अपने प्रेमी-मिलन हेतु सँवरी हो, जैसे कि महाश्वेता से मिलन उसके आगमन का एक उपालम्भ हो, और जैसे कि वह पत्रलेखा की बाहु पर झुकी, उसने युवराज द्वारा पुनरागमन के दिए गए वचन पर अपने सन्देह व्यक्त किए, और उवाच किया कि जब वह उसे देखेगी तो उससे बात नहीं करेगी, ही उसके विनय से और ही अपनी सखी के प्रयासों से सन्तुष्ट होगी। उसके वचन ऐसे थे, परन्तु उसने उसे पुनः देखने की अपनी अभिलाषा के प्रकाश में यात्रा के सभी कष्टों की गणना की। परन्तु जब उसने उसे मृत देखा, एक आकस्मिक-क्रंदन सहित वह भूमि-पात हो गई। और जब वह मूर्च्छा से चेतना में आई, उसने अडिग चक्षुओं और स्पंदित मुख से देखा, जैसे कि एक तत्पर कुठार-घात के नीचे एक कम्पित-लता हो, और तब अपनी नारी-सुलभ प्रकृति विपरीत एक दृढ़ता संग निश्चल खड़ी हो गई। मदालेखा ने उसको अपने कष्ट-अश्रुओं को विश्राम देने हेतु अनरोध किया ताकि कहीं उसका हृदय भी टूट जाय, और स्मरण रखने हेतु कि उसपर द्विकुल-आशाऐं निहित हैं। "मूढ़ बाला", कादम्बरी ने एक स्मित संग उत्तर दिया, "कैसे मेरा वज्रमय उर विदीर्ण होगा यदि यह इस दृश्य पर नहीं टूटा है ? परिवार सखा-विचार उन हेतु हैं जो जीवन-आशा रखते हैं, मेरे हेतु नहीं, जिसने मृत्यु-चयन किया है, क्योंकि मैंने अपने प्रिय की वपु जीत ली है, जो मेरे लिए जीवन है, और जो चाहे जीवित है अथवा मृत, चाहे पार्थिव-मिलन द्वारा अथवा मेरे द्वारा मृत्यु-अनुसरण द्वारा, प्रत्येक दारुण के शमन हेतु सक्षम है। यह मेरे हेतु ही है कि मेरा स्वामी यहाँ आया और अपना जीवन समाप्त कर लिया; तब क्यों मैं अश्रु-बहाव द्वारा महान सम्मान को लघु बनाऊँ ? अथवा स्वर्ग के उसके प्रस्थान को एक अपशुकन-विलाप लाऊँ ? अथवा हर्षित क्षण पर कैसे रुदन करूँ जब उसकी चरण-रज सम, मैं उसका अनुसरण कर सकती हूँ ? अब सब कष्ट बहुत दूर हैं। उसके हेतु मैंने सभी अन्य बन्धन नकार दिए हैं, और अब, जब वह मर चुका है, तुम मुझे कैसे जीवित रहने हेतु कह सकती हो ? उसके मरण में ही अब मेरा जीवन स्थित है, और जीवित रहना अब मेरे हेतु मृत्यु है। क्या तुम मेरे अभिभावकों मेरी सखियों संग मेरा स्थान लोगी, और जब मैं अन्य लोक में हूँगी, मेरे लिए जल-तर्पण करने हेतु एक पुत्र की माता बनोगी ? तुमको अवश्य ही मुझे अपने पुत्र-सम प्रिय बाल-आम्र तरु का विवाह माधवी-लता से करा देना चाहिए। अशोक-वृक्ष, जिसको मेरे चरणों ने आलिंगन किया है, की एक भी शाखा टूटनी नहीं चाहिए, यहाँ तक कि एक कर्ण-पुष्प रचना हेतु भी। मालती लता जिसका मैं पालन करती थी, के कुसुम मात्र देवों के अर्पणार्थ ही तोड़े जाऐं। मेरे कक्ष में मेरे तकिए के निकट रखे कामदेव के चित्र को टुकड़ों में फाड़ दिया जाना चाहिए। जो आम्र-द्रुम मैंने रोपित किए हैं, इस तरह रोपित किए जाऐं कि वे फल-प्राप्त हों। मैना कालिंदी शुक परिहास को उनके पिंजर-कष्टों से मुक्त कर देना। छोटा नकुल (नेवला) जो मेरे अंचल (गोद) में विश्राम करता था अब तुम्हारी में करे। मेरा बाल तारालक मृग तपोवन को दे दिया जाय। क्रीड़ा-शैल पर तीतर जो मेरे कर में बड़े हुए हैं, जीवित रखे जाऐं। देखो कि हंस जो मेरे चरण-अनुसरण करते थे, मारे जाए। कृपया मेरी अभागिनी वनमानुषी स्वतन्त्र की जाय क्योंकि वह उस आवास में उदास है। क्रीड़ा-शैल को किसी शांत-चित्त तपस्वी को दान दिया जाय, और जो वस्तुऐं मैं स्वयं प्रयोग करती थी, ब्राह्मणों को दान दी जाय। मेरी वीणा अवश्य ही तुम्हारी गोद में रखी जाय, और अन्य कुछ भी जो तुमको प्रसन्न करती हैं, तुम्हारी हो जाऐ। परन्तु अपने हेतु मैं अपने स्वामी की ग्रीवा-आलिंगन करुँगी, और चित्ताग्नि-ज्वर का निराकरण करुँगी जिसको चन्द्र, चन्दन, मृणाल-पुष्प, और सभी शीतल वस्तुओं ने मात्र वर्धन ही किया है।" तब उसने यह कहते हुए महाश्वेता को आलिंगन में ले लिया, "तुमको जीवन-सहन हेतु निश्चित ही कुछ आशा है, यद्यपि इसके कष्ट मृत्यु से भी अधिक भयावह हैं; परन्तु मुझे तो कुछ भी नहीं है, और अतः प्रिय सखीमैं तुमसे विदा लेती हूँ जब तक कि हम अन्य लोक में  मिलें।"

'जैसे ही उसने पुनर्मिलन-हर्ष अनुभूत किया, उसने नमित मूर्धा से चन्द्रापीड़-चरणों को सम्मानित किया, और उनको अपनी गोद में ले लिया। उसके स्पर्श पर एक विस्मयी-चमकीली ज्योति चन्द्रापीड़ की वपु से उठी, और सीधे एक आकाश-वाणी सुनाई दी : "प्रिय महाश्वेता, मैं तुम्हें पुनः आश्वासन दूँगा। तुम्हारे पाण्डुरीक की वपु, मेरे लोक-पोषित है और मेरे प्रकाश द्वारा मृत्यु से स्वतन्त्र है, तुम्हारे संग अपने पुनर्मिलन की प्रतीक्षा करती है। अन्य चन्द्रापीड़-वपुमेरी ज्योति-पूरित है, और अतएव मृत्यु-प्राप्त नहीं हुई है। दोनों अपनी प्रकृति से, और क्योंकि यह कादंबरी-स्पर्श द्वारा पोषित है; एक शाप कारण आत्मा-शून्य की गई है, एक योगी-देह भाँति जिसकी आत्मा अन्य लोक-प्रवेश हो गई है। कृपया इसे तुम्हें और कादम्बरी को सांत्वना हेतु यहीं विश्राम करने दो जब तक कि शाप समाप्त हो जाय। तो इसे अग्नि-समर्पित किया जाय, जल-प्रवाहित, और त्यागा जाय। इसको इसके पुनर्मिलन तक सभी सावधानियों संग रखा जाय।'

"इस वाणी पर पत्रलेखा के अतिरिक्त सब अचंभित थे, और अपनी दृष्टि व्योम पर लगा थी; परन्तु वह चन्द्रापीड़ की मृत्यु देखने द्वारा आई मूच्छा से चेतना में आते हुए, उस प्रकाश के शीतल-स्पर्श से उठी, शीघ्रता से उसके अश्वपाल से इंद्रायुध को छीनती हुई, कहते हुए : "यह हमारे लिए कैसा भी हो, तुमको एक क्षण मात्र भी अपने स्वामी को अपनी दीर्घ-यात्रा पर बिना अश्व के एकाकी-गमन हेतु नहीं त्यागना है"; और इंद्रायुध संग अच्छोडा सरोवर में डुबकी लगा दी। तुरन्त सर में से एक युवा तापसी उदित हुआ और महाश्वेता के पास आते हुए शोक से कहा : "गन्धर्व राज-कन्ये, तुम मुझे जानो, अब कि मैं अन्य जन्म से गुजर चुका हूँ ?" प्रसन्नता शोक के मध्य बँटी हुई, उसने उसके चरणों पर श्रद्धा अर्पित की, और उत्तर दिया : "सौभाग्यशाली कपिञ्जल, क्या मैं इतनी गुण-शून्य हूँ कि तुम्हें भूल जाऊँ ? और तथापि मेरा यह मन्तव्य स्वाभाविक है, क्योंकि मैं स्वयं से इतनी आश्चर्यजनक रूप से अपरिचित हूँ और मूढ़ता द्वारा भ्रमित हूँ कि जब मेरा स्वामी पाण्डुरीक स्वर्ग में चला गया तथापि मैं जीवित हूँ। (५७२) मुझे पाण्डुरीक के विषय में बताओ।" तब उसने स्मरण किया कि कैसे वह आकाश में उठा था उस प्राणी के अन्वेषण में जो पाण्डुरीक को ले गया था, और अपने स्वर्गिक-रथों में भ्रमण करते देवों द्वारा गुजरते हुए, वह चन्द्रलोक पहुँच गया था।" तब उस प्राणी ने", उसने निरन्तरता रखी, "महोदय नामक कक्ष में रखी एक शय्या पर पाण्डुरीक की वपु को रख दिया, और कहा : 'मुझे तुम शशांक रूप में जानो। जब मैं लोक-सहायतार्थ उदित हो रहा था, मैं तुम्हारे मित्र द्वारा शापित किया गया, क्योंकि मेरी मरीचियाँ उसे घायल कर रही थी इससे पूर्व कि वह अपनी प्रियतमा से मिले; और उसने प्रार्थना की स्वयं प्रेम-कष्टों को जानते हुए मैं भी भरत-भूमि में मर सकता हूँ जो समस्त पवित्र-संस्कारों का आवास है। परन्तु उसके अपने दोष हेतु शापित होने से क्रुद्ध मैंने भी शाप उवाच किया कि वह भी मुझ सम मात्रा में अनेक हर्ष अथवा कष्ट सहन करे। यद्यपि जब मेरा क्रोध शांत हो गया, मैंने जाना कि महाश्वेता के विषय में क्या हुआ था। अब वह उस कुल में उत्पन्न हुई है जिसका प्रादुर्भाव मेरे रश्मियों में था, और उसने उसको अपने स्वामी रूप में चयन किया था। तथापि उसे और मुझे दोनों को नश्वर-लोक में दो बार जन्म लेना होगा, अन्यथा जन्मों का उपयुक्त नियम पूरित नहीं होगा। अतएव वपु मैं यहाँ लाया हूँ, और मैं इसे अपनी ज्योति द्वारा पोषित करूँगा अन्यथा यह शाप-समाप्ति पूर्व ही विनिष्ट हो जाएगी, और मैंने महाश्वेता को सांत्वना दी है। तुम सब वृतांत पाण्डुरीक के तात को बता देना। उनका आध्यत्मिक-बल महद है, और वह एक उपाय प्राप्त कर लेगा।' और मैं दुःख में दौड़ते हुए, एक स्वर्गिक-रथ में अन्य आरोही से दूर उछल पड़ा, और क्रोध में उसने मुझसे कहा : 'क्योंकि स्वर्ग के चौड़े पथ में तुम मुझपर अपने उज्जड़ (असभ्य) पथ से एक अश्व भाँति मेरे ऊपर से उछल पड़े हो, तुम एक अश्व बन जाओ, और नश्वर-लोक में नीचे उतर जाओ।' मेरे अश्रुपूर्ण आश्वासन पर कि मैं दारुण-अंधता में उसके ऊपर से कूद गया था, कि कुत्सा (घृणा) से, उसने उत्तर दिया, "शाप जो एक बार उवाच हो जाता है, वापस नहीं हो सकता। परन्तु जब आरोही मर जाएगा, तुम स्नान करोगे और शाप-मुक्त होवोगे।' तब मैंने उससे अनुरोध किया कि जैसे कि मेरा मित्र चन्द्र-देव के संग नश्वर-लोक में जन्म लेने वाला है, मैं भी एक अश्व रूप में उसके संग रहूँ। मेरे स्नेह द्वारा द्रवित उसने बताया कि चन्द्र उज्जैयिनी में महाराज तारापीड़ के पुत्र रूप में जन्म लेगा, पाण्डुरीक उसके मंत्री शुकनास का पुत्र होगा, और कि मैं युवराज का अश्व हूँगा। तुरंत मैं महासागर में कूद गया, और एक अश्व रूप में उदित हुआ, परन्तु अभी तक भूतकाल-चेतना त्याग नहीं की थी। यह मैं था जो किन्नर-अन्वेषण में चन्द्रापीड़ को यहाँ उद्देश्य संग लाया था। और वह जिसने एक पूर्वजन्म-रोपित प्रेम कारण तुम्हें चाहा था, और तुम्हारी अज्ञानता में शाप कारण मृत्यु-प्राप्त हुआ था, मेरा मित्र पाण्डुरीक ही था जो पृथ्वी पर आया था।"

"तब महाश्वेता ने एक संतापी-क्रंदन संग अपन वक्ष यह कहते हुए पीट किया : "पाण्डुरीक, तुमने अपना प्रेम अन्य जन्म-माध्यम से मुझ हेतु सुरक्षित रखा; तुम्हारे हेतु मैं ही सर्व-लोक थी; और तथापि एक दैत्य सम, एक नूतन जन्म में भी तुम्हारे विनाश हेतु जन्मी, मैंने वर्षों की अवधि तुम्हें पुनः-2 मारने हेतु प्राप्त की है। मैं सोचती हूँ कि अब तुममें भी, एक ऐसी अभागी हेतु भाव-शून्यता उदित हो गई होगी, उसमें ही तुम मेरे विलापों का उत्तर नहीं देते हो", और उसने स्वयं को भूमि पर पटक दिया। परन्तु करुणा से कपिञ्जल ने उत्तर दिया : "राज-कन्ये, तुम दोषमुक्त हो, और हर्ष निकट ही है। अतः शोक मत करो, परन्तु अपने द्वारा लिए गए प्रायश्चित का निर्वाह करो क्योंकि एक सिद्ध-तप हेतु किञ्चित भी असम्भव नहीं है, और अपने तप-बल द्वारा तुम शीघ्र ही मेरे सुहृद की बाहुओं में होवोगी।"

"तब कादंबरी ने कपिञ्जल से पूछा कि पत्रलेखा को क्या हुआ था जब वह उसके साथ सरोवर में कूदी थी। परन्तु वह नहीं जानता था कि क्या हुआ है, या तो उसके हेतु, अथवा उसका मित्र, अथवा चन्द्रापीड़ को क्योंकि तब तक कि वे पाण्डुरीक के तात मुनि श्वेतकेतु से पूछने हेतु नभ-गमन कर थे, जिसके लिए त्रिलोकों में सर्व-दर्शित था। तब महाश्वेता ने कादंबरी को परामर्श दिया, जिसका उसके प्रति स्नेह अपने जैसे दारुण से और निकट खिंच गया था, उसे अपना जीवन चन्द्रापीड़-वपु की सेवा में बिताना चाहिए, श्रेष्ठ-प्राप्ति हेतु बिना असन्देह के अन्य चाहे काष्ठ प्रस्तर की प्रतिमा-आराधना करें यह मानते हुए कि वे अपितु अदृश्य देव हैं, उसे वर्तमान चन्द्रापीड़-नाम से आवरित देव-अर्चना करनी चाहिए। उसकी देह को तनयता से शिला पर रखते हुए, कादम्बरी ने अपने सब आभूषण एक तरफ रख दिए जिनको कि वह पहनकर अपने अनुरागी से मिलने आई थी, मात्र एक मंगल-सूचक कण्ठहार पहनते हुए। उसने स्नान किया, दो शुभ्र अंशुक पहने, अपने ओष्ठों से ताम्बूल का गहन रक्त-वर्ण पौंछ डाला, और वे ही कुसुम, धूप और लेप जो वह एक प्रसन्न-प्रणय की शोभा हेतु एक देव को अर्पण हेतु लेकर आई थी, उसने अब चन्द्रापीड़ को अर्पित कर दिए। वह दिवस-रात्रि उसने युवराज-चरणों को पकड़े हुए अविचलित होकर बिताई, और दिवस होने पर प्रसन्नता से देखा कि उसकी ज्योति अपरिवर्तित है, और संदेशों द्वारा अपनी सखियों युवराज के अनुचरों को हर्षित किया। अग्रिम दिवस उसने मदालेखा को अपने अभिभावकों को सांत्वना देने हेतु भेजा, और वापसी में उन्होंने एक आश्वासन भेजा कि उन्होंने कदापि उसे पाणिग्रहण में दर्शन हेतु विचार नहीं किया था, और कि अब वे हर्षित हैं कि उसने स्वयं चन्द्र-देव अवतार को अपने पति हेतु चयन किया है। उन्होंने आशा की जब शाप समाप्त होगा तो वे पुनः उसका मृणाल-मुख अपने जामाता की संगति में देखेंगे। अतएव सांत्वना पाने पर, कादम्बरी युवराज-वपु की देखभाल उपासना हेतु स्थिर रही। और जबकि पावस ऋतु समाप्त हो गई थी, मेघनाद कादम्बरी के पास आया और उसे बताया कि युवराज के विलम्ब का कारण जानने हेतु तारापीड़ द्वारा संदेशवाहक भेजे गए हैं, और उसने उसको कष्ट देकर पूर्ण-कथा बता दी है, और शीघ्रता से सबकुछ महाराजाधिराज को कथन-निवेदन किया है। हालाँकि, उसने उत्तर दिया है कि निस्संदेह यह संभव है तथापि युवराज हेतु उनके नैसर्गिक-स्नेह के विषय में कुछ कहना, एक विस्मय-दर्शन की अति-महद इच्छा से उन्होंने अनुरोध किया है कि उसके दर्शन हेतु स्वीकृति दी जाय; उसकी दीर्घ-सुश्रुषा अनुग्रह का पात्र है; और महाराज क्या कहेंगे यदि उन्होंने चन्द्रापीड़-वपु नहीं देखी है? शोक से स्वयं चित्रित करते हुए कि तारापीड़ का दारुण कितना भीषण होगा, कादम्बरी ने संदेशवाहकों को प्रवेश करा दिया, और जैसे कि उन्होंने अश्रुपूरित हुए स्वयं को दण्डवत किया, उसने उनको सांत्वना यह कहते हुए दी कि यह एक हर्ष कारण है कि दुःख का।" तुमने युवराज का आनन देख लिया है, और उसकी वपु परिवर्तन-मुक्त है, अतः तुम शीघ्रता से महाराज-चरणों में त्वरित होवों। तथापि इस कथा को विदेश में विस्तृत करो, परन्तु कहो कि तुमने युवराज को देखा है, और कि अच्छोडा सरोवर निकट वास करता है। क्योंकि मृत्यु सबको आनी ही है, और सुलभता से विश्वास किया जाता है, परन्तु यह घटना, चाहे देखी ही गई हो, कठिनता से ही श्रद्धा जीत सकती है। यह अभी लाभ नहीं करती है, अतः इसे उसके अभिभावकों को बताने द्वारा उसकी मृत्यु-शंका ही उनमें उत्पन्न करेगी; परन्तु जब वह जीवन पुनः प्राप्त करेगा, यह विचित्र कथा उनको स्पष्ट हो जाएगी।" परन्तु उन्होंने उत्तर दिया : "तब हमें या तो अवश्य ही लौटना चाहिए अथवा मौन रखना चाहिए। परन्तु कोई सा पथ भी सम्भव नहीं है; ही अतएव विलाप कर रहे महाराजाधिराज का स्वागत कर सकते हैं। अतः कथा का विश्वास दिलाने हेतु उसने चन्द्रापीड़ के भृत्य त्वरितका को उनके साथ भेजा, क्योंकि युवराज की सब राजन्य सेना ने मात्र मूल फल खाते वहीं निवास का एक व्रत ले लिया था, और वापस नहीं लौटने का जब तक कि युवराज स्वयं नहीं करते।

'अनेक दिवस पश्चात, अपने पुत्र-समाचार हेतु अपनी प्रखर अभिलाषा में महारानी विलासवती अवन्ती की दैवी-माताओं के मन्दिर में उसकी वापसी हेतु प्रार्थना करने गई, जो उज्जैयिनी की रक्षक-देवियाँ हैं, और सैन्य-दल से अकस्मात एक क्रंदन उदित हुआ : " महाराज्ञी ! तुम प्रसन्न होवों ! माताओं ने तुमपर अनुग्रह दिखाया है। युवराज के संदेशवाहक निकट ही हैं।" तब उसने हरकारों को उनके गिर्द नागरिकों को देखा, युवराज का समाचार पूछते हुए, अथवा पुत्रों, भ्राताओं और उसके अनुचरों में अन्य बांधवों का, परन्तु कोई उत्तर प्राप्त नहीं कर रहे थे। उसने उनको मन्दिर-प्रांगण में बुलाया, और याचना की : "मुझे शीघ्रता से मेरे पुत्र के विषय में बताओ। क्या तुमने उसे देखा है ?" और उन्होंने अपना दारुण छिपाने का प्रयास करते हुए उत्तर दिया : " महारानी, वह हमारे द्वारा अच्छोडा-सरोवर के तीर पर देखा गया था, और त्वरतिका तुम्हें अग्र बताएगा।" "और क्या अधिक", उसने कहा, "यह अप्रसन्न पुरुष क्या मुझे बता सकता है ? क्योंकि तुम्हारी निज व्यथित-अवस्था ने कथा बता दी है। अहोभाग्य ! मेरे बच्चे ! तुम कहीं से लौट क्यों नहीं रहे हो ? जब तुमने मुझसे विदाई ली थी, मैं अपने पूर्वाभासों द्वारा जानती थी कि मैं तुम्हारा मुख पुनः नहीं देख सकूँगी। यह सब मेरे पूर्व-जन्म के अपुण्य कृत्यों के कारण से हुआ है। तथापि मेरे पुत्र, क्या नहीं सोचते कि मैं तुम्हारे बिना रह लूँगी, क्योंकि कैसे मैं तुम्हारे तात का सामना भी कर सकूँगी ? और तथापि चाहे यह वात्सल्य से हो, अथवा इस विचार से कि जो इतना चारु है कि उसे जीवित रहना ही चाहिए, अथवा एक स्त्री-मन की नैसर्गिक सरलता से मेरा हृदय यह विश्वास नहीं कर सकता कि पातक तुम पर पतित हुआ है। इसी मध्य, महाराजिधिराज को समाचार सुना दिया गया, और उसने शुकनास संग मन्दिर जाने की शीघ्रता की, और महारानी को क्लेश-जड़ता से यह कहते हुए जगाने का प्रयास किया : 'मेरी महाराज्ञी, हम दुःख के इस प्रदर्शन से अपना तिरस्कार करते हैं। एक पूर्व-जन्म के हमारे पुण्य-कृत्य अभी तक हमें अतएव लाए हैं। हम भावी हर्षों के पात्र नहीं हैं। जो हमने अर्जित नहीं किया है, वक्ष-ताड़न द्वारा विजित नहीं होता है। विधाता जो चाहता है, करता है, और किसी पर निर्भर नहीं करता है। हमने अपने पुत्र के शिशुकाल, बाल्यकाल यौवन के हर्ष प्राप्त किए हैं। हमने उसे अभिषिक्त किया है, और उसकी विश्व-विजय के उसके आगमन का अभिनन्दन किया है। वह सब जो हमारी इच्छाओं को क्षतिपूर्ण है वह है कि हमने उसे विवाहित नहीं देखा है, जिससे कि हम उसे अपने स्थान पर देख सकें, और एक तपोवन-विश्राम करें। परन्तु प्रत्येक अभिलाषा-प्राप्ति एक अति-विरल पुण्य का प्रसाद ही है। तथापि हमें त्वरतिका से पूछना चाहिए क्योंकि हम अभी तक सब कुछ नहीं जानते हैं।" परन्तु जब उसने त्वरतिका से सुना कि कैसे उसका हृदय विदीर्ण हो गया था, उसने उसे बाधित किया और क्रंदन किया कि उसके स्वयं के हेतु महाकाल-मन्दिर के निकट एक चित्ताग्नि निर्मित की जाय। उसके समस्त धन-धान्य ब्राह्मणों को दान दिए जाऐं, और जो नृप उसका अनुसरण करते थे, अपनी निजी-भूमियों को लौट जाऐं। जब त्वरतिका ने वैशम्पायन की शेष कथा सुनने का अनुरोध किया, और उसका शोक विस्मय में अनुसरित हुआ; जबकि शुकनास ने अपने दुःख विस्मरण तथा सांत्वना हेतु और एक सच्ची मित्र-कामना प्रदर्शित करने हेतु कहा : "श्रीमान, इस विस्मयी परिवर्तनशील लोक में, जहाँ देव, दैत्य, पशु मनुष्य, हर्ष-क्लेश से पूरित हुए विचरण करते हैं, ऐसी कोई घटना नहीं है जो सम्भव हो सके। तब इससे सम्बन्धित में शंका क्यों ? यदि कारण हेतु एक अन्वेषण से, कितनी ही वस्तुऐं हमारी परम्परा पर अवस्थित हैं और कितनियों का अभी सत्य देखा जाना शेष है ? जैसे एक विषाक्त पुरुष के उपचार हेतु ध्यान अथवा विशेष आसनों का प्रयोग, चुम्बकीय-आकर्षण, मन्त्र-प्रभावोत्पादकता, वैदिक अथवा अन्य सभी प्रकार के कर्मों में, जहाँ धार्मिक परम्परा हमारा प्रमाण है। अब पुराणों, रामायण, महाभारत  अन्यों में शापों की अनेक कथाऐं हैं। क्योंकि यह एक शाप के कारण ही था कि नुहुष एक सर्प बन गया, सूर्यवंशी नृप सौदास एक नरभक्षी (दैत्य), ययाति एक जरा-ग्रस्त, त्रिशंकु एक चाण्डाल, दैवी महाभिष शांतनु के रूप में पैदा हुआ जबकि गंगा उसकी भार्या बनी, और वसु उसके पुत्र। नहीं, यहाँ तक कि सर्वोच्च देव विष्णु भी यमदग्नि के पुत्र-रूप में पैदा हुआ, और स्वयं को चार भागों में बाँटकर वह दशरथ के यहाँ उत्पन्न हुआ और मथुरा के वासुदेव के यहाँ भी। अतः देवों का नश्वरों में जन्म अविश्वनीय नहीं है। और श्रीमन्त, तुम भी गुणों में पुरातन-पुरुषों से पीछे नहीं हो, ही चन्द्र उस देव से श्रेष्ठ है जो मृणाल-जनित है। हमारे पुत्र-जन्म हमारी स्वप्न-कथा को उचित ठहराते हैं; सुधा जो शशि-निवासित है - युवराज-वपु का रक्षक है, और उसकी रमणीयता जो लोक को हर्षित करती है, अवश्य ही विश्व-आवास हेतु निर्धारित होनी चाहिए। अतः हम शीघ्र ही उसका विवाह कादम्बरी संग देखेंगे, और उसमें जीवन के सभी गत-कष्टों के पुनरुद्धार से अधिक पाऐंगे। तब तुम इस आशीर्वाद की सुनिश्चितता हेतु अपना सर्वस्व देव-अर्चना, ब्राह्मणों को दान, और तप-अभ्यास कर्मों द्वारा करो।" महाराज ने स्वीकार किया, परन्तु युवराज के स्वयं दर्शनार्थ अपना निश्चय प्रदर्शित किया, और वह महाराज्ञी, शुकनास उसकी भार्या के संग सरोवर गए। मेघनाद के आश्वासन द्वारा शीतलता पाकर, जो उससे मिलनार्थ आया था, कि युवराज की वपु में प्रतिदिवस ज्योति वर्धित है, उसने तपोवन में प्रवेश किया; जबकि उसके आगमन-समाचार पर, महाश्वेता लज्जा से गुफा के भीतर भाग गई, तथा कादम्बरी मूर्छित हो गई। और जैसे ही उसने अपने पुत्र को देखा जो मात्र सुप्त प्रतीत हो रहा था, महारानी ने आगे बढ़ने की शीघ्रता की, और स्नेहिल-भर्त्सनाओं द्वारा चन्द्रापीड़ को उनसे बोलने हेतु अनुरोध किया। परन्तु महाराज ने उसे स्मरण दिलाया कि उनका कर्तव्य शुकनास उसकी पत्नी को सांत्वना देना भी है।" वह भी, जिसको हम अपने पुत्र के पुनर्जीवन दर्शन-आंनद हेतु आभारी होंगे, गन्धर्व-राजकन्या भी अभी तक एक मूर्च्छा में है; तुम उसे अपनी भुजाओं में ले लो, और उसे पुनः चेतना में लौटाओ।" तब उसने मृदुलता से कादम्बरी का यह कहते हुए स्पर्श किया, "मेरी माताशांत होवो, तुम बिन कौन मेरे पुत्र चन्द्रापीड़ की वपु रक्षा करेगा ? निश्चित ही तुम पूर्णतया अमृत-निर्मित हो, कि हम पुनः उसका मुख दर्शनार्थ समर्थ हुए हैं।" चन्द्रापीड़ के नाम पर और अपनी स्वयं जैसे महाराज्ञी द्वारा स्पर्श पर कादम्बरी ने अपनी चेतना प्राप्त की, और लज्जा में झुके मुख से, यद्यपि मदालेखा द्वारा, उसके अभिभावकों को यथोचित आदर प्रदान करने में सहायता की गई। उसने उनके आशीर्वचन प्राप्त किए : "चिरंजीवी होवों और एक सुहागिनी का दीर्घ-जीवन आनन्दित करो", और विलासवती के निकट बैठ गई। महाराज ने तब उसको युवराज की देखभाल के विषय में संक्षिप्त वर्णन हेतु निवेदन किया, और अपना आवास तपोवन के निकट, एक शीतल प्रस्तर-शिला द्वारा संयोजित, और एक तापसी के उपयुक्त एक पर्ण-कुटी में बनाया, और अपने राजन्य-परिचारकों को बताया कि अब वह अपनी एक मुनि-जीवन की अपनी चिर-अभिलाषित इच्छा का निर्वाह करेगा, और कि उनको उसकी प्रजा की रक्षा करनी है। यह निश्चय ही एक उपलब्धि होगी यदि मैं इसके उपयुक्त अपना स्थान सौंप दूँ, और अपनी इस दुर्बल  निष्प्रयोजन वपु को अन्य लोक-हर्षों को विजय करने दूँ।"

'ऐसा कहते हुए, उसने अपने सब स्वभावगत (नित्य) प्रमोदों का त्याग किया, और स्वयं को वनों में असामान्य-जीवन सुपर्द किया, उसने द्रुमों के नीचे एक हर्म्य बनायालताओं में रनिवास-प्रमोद; मृग-छौनों में सखा-वात्सल्य; फटे क्षौम अंशुकों में वेशभूषा-आंनद। मालाऐं उसकी शस्त्र थी, उसकी कामना अन्य लोकार्थ थी; उसकी ऐश्वर्य-कामना व्रत में थी। उसने वे सब स्वादिष्ट भोज्य अस्वीकृत कर दिए थे जो कादम्बरी महाश्वेता ने उसको अर्पित किए थे, और अतएव अपनी महारानी शुकनास संग निवास करने लगा, सभी दुःखों की अल्प-गणना करते, जिससे कि प्रत्येक प्रातः सायं वह चन्द्रापीड़ का दर्शन-सुख पा सके।'

......क्रमशः   

हिंदी भाष्यांतर,

द्वारा
पवन कुमार,
(२६ मई, २०१९ समय १४:३८ अपराह्न)

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