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Sunday, 2 June 2019

स्वतंत्र-विचरण

स्वतंत्र-विचरण
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स्वतंत्र मन-विचरण की, साइबेरिया हंस से दीर्घ डयन सी  
सर्व-दिशा आत्मसात की, विद्युत्तरंगें सर्वत्र विकिरण की। 

मन-जिजीविषा उत्तंग करने की, सागर सम उछाल भरने की 
नदी सम लहरने-मटकने की, हिरणी सम कुलाँचे भरने की। 
कोयल सम नाद करने की, गायक सम राग मल्हार गाने की 
झील सा शांत रहने की, भँवरे सम निकुञ्ज में गुँजन करने की। 

 गज सम चिंघाड़ करने की, वन-सिंह सम दहाड़ करने की,  
अश्व-बल सा वहन करने की, वानर सा चपल घों-२ करने की। 
गाय सा रँभाने की, अजा सा मिमियाने की, शुक टें-टाने सी 
भेड़िए के गुर्राने सी, श्वान के भोंकने सी, शृगाल हुल्लाने सी।  

अश्व-खच्चर सा हिनहिनाने की, गाय-महिषी के रँभाने की,
मक्षिका के भिनभिनाने की, निशा-जुगनू के टिमटिमाने की
बुलबुल गाने की, कीट गुनगुनाने की, गिलहरी गिटगिटाने की।
मत्सर के भिनभिनाने की, दुबके कपोत के गुड़गुड़ाने की
चिड़िया-गोरैया चिंचियाने की, विहंग के पर फड़फड़ाने की।

बालक के खिलखिलाने की, युवकों की हँसी-ठिठोली की, 
विरही-आह सी, वृद्ध के खाँसने की, रोगी के करहाने की।
सखी-फुसफुसाहट सी, मित्र-गुफ्तुगू सी, शायरी-मुशायरे की
युवा-दंभीपन सी, धूर्तों की अफवाह की, चौरी-सेंध मारने की। 

मंदिरों में घंटा-नाद, कथा सी, मस्जिद की प्रातः अजान सी
कुम्भ-पर्व में श्रृद्धालुओं की भीड़ सी, महानृपों की शान सी।
गुरुद्वारों में कीर्तन-शब्द की, गिरजाघरों की रविवार-गोष्ठी सी
पाठशाला में छात्र-प्रार्थना सी, धर्मशालाओं में यूथ-यात्री सी।

वन-द्रुम की शुद्ध छाया-अनिल देने की, उपवनों के महकने की
फसल-वृक्ष लहरने की, पत्तें टकरने की, नल जल टपकने की।
शैल-पाषाण लुढ़कने की, द्वार खुलने की, भवन-ध्वज फहरने की
हिमक्षेत्र सौंदर्य सी, महासागर वृहदता सी, जीव-विविधता सी।

पंखे की घुर्मन-स्वर की, वाहन चलन-शोर की, पर्दे हिलने की,
श्वास-ध्वनि की, बाल्टी के फर्श पर रखने की, पलंग सरकने की। 
चद्दर हिलने की, हवा में रोम सिहरने की, धूर्म के ऊर्ध्व-गमन की
भाँप बनने की, चीनी से क्रिस्टल की, पवन-चक्की विद्युत् सी।

सवितुर तेज की, मयंक की शीतलता की, भूगर्भ ऊष्णता की
सर्व-पृथ्वी ग्रह सी, संध्या की गोधूलि की, भोर की शुद्धता की। 
तड़ित के दमकने की, मेघ के गरजने की, पर्वत के सरकने की
जल-प्रपात सी, नाभिकीय ऊर्जा प्रयोग की, ब्रह्मांड-भ्रमणने की।

माइकलेंगो की चित्रकारी सी, लियोनार्डो विंचि की सृजना सी 
कालिदास-शैक्सपीयर के साहित्य सी, सिकंदर की शूरता सी।
न्यूटन के निरीक्षण सी, डार्विन सिद्धांत सी, लाओत्से कथन सी
 मार्क्स-साम्यवाद सी, कबीर-फक्क़ड़पन सी, गाँधी-दर्शन सी। 

ई० फर्मी की अनुमान कला सी, गूगल वेब के अति-विस्तार सी
वर्डस्वर्थ के प्रकृति ज्ञान सी, पातञ्जलि के गहन समाधि-ध्यान सी।
गौतम के महान बौद्ध-धर्म दर्शन सी, महावीर की जितेन्द्रियता सी
सुकरात व अरस्तु के प्रखर ज्ञान सी, यशु मसीह की मानवता सी।

खगोल को समझने की, दूरियों को फाटने सी, नक्षत्र-दर्शन की,
आकाश-गंगा के सितारे गणना की, महत्तम से निज-सम्पर्क की।  
वैज्ञानिक-तकनीक अनुसंधान सी, गगनचुंबी-भवन निर्माण की
सुदूर अंतरिक्ष-यात्रा करने की, इतिहास-वर्तमान समझने की। 

ज्ञानी सम मनन की, कवि के चिंतन की, परंतप से लग्न की,
जीव प्राण की, हठयोगी के त्राण की, शिक्षक के ज्ञान की।
कृष्ण की बाँसुरी सी, चक्रवर्ती प्रभुता की, चरित्र शुद्धता की
शिष्य की विद्या सी, त्राटक एकाग्रता की, काक चेष्टा सी।   

राधा के प्रेम की, सीता के बलिदान की, देवी के वरदान की
शांति दान की, दीन-कल्याण की, कुरीतियों के उपचार की। 
समस्ता के ज्ञान की, विश्व-दर्शन भान की, पूर्ण-तमस नाश की
मृत्यु के ह्रास की, सर्व-धूर्तता त्याग की, योग्यों के साथ की।

जीवन-परिष्कार की, मूर्खता के त्याग की, अग्रज सम्मान की
संस्कृति-विकास की, देश के अभिमान की, प्राणी-मान की।
ब्रह्मांड कल्याण की, विविधता सम्मान की, प्रतिपक्ष ज्ञान की
नरत्व-उपकार की, अदम्य साहस की, दुर्बलता त्याग की।

गुण समाने की, मन में जग बसाने की, परमानुभूति पाने की 
सर्वकला संपन्न की, पूर्ण-विकसन की, अन्यों को समझने की।
एकधा सहयोग की, परिश्रम फल की, वसुधैव-कुटुंबकम की 
तन-मन महकने की, रोग से मुक्ति की, स्वास्थ्य से युक्ति की। 

बंधु-प्रेम की, पड़ोसियों से सहिष्णुता की, जीव-मात्र समर्पण की
 सृष्टि के सहायक सी, शिव से शांत सी, अभिषेक से मान की।
भरत के मिलाप सी, माता के दुलार की, पिता की फटकार की
मिथ्या गर्व हटाने की, शास्त्रों के ज्ञान की, पंडितों के मान की।

कवि कल्पना सी, कामिनी अल्पना सी, ध्यानी की विपश्यना सी
विवेचन समर्थता की, समुचित सहायता की, ग्राह्य-भावना की।
सिंधु के मंथन सी, रहस्य-उद्घाटन की, गूढ़-अध्ययन करने की
अंध-नेत्र खुलने की, बधिर के सुनने सी, पंगु के चाल भरने सी।

मूर्ख के ज्ञानी बनने सी, पूर्णता ओर बढ़ने की, विद्याऐं ग्रहण की
मनीषी कवित्व की, पतिव्रता सतीत्व की, शहीद बलिदान सी। 
प्राचीन विद्वत्व की, व्यास के ज्ञान सी, विल-डुरांट के संकलन सी
चाणक्य-नीति सी, अंबेडकर-संघर्ष सी, आइंस्टीन की विज्ञान सी। 

राम के राज्य की, महाराणा राणा के प्रताप सी, मंडेला के धैर्य सी 
अशोक के न्याय सी, नेपोलियन नेतृत्व सी, लिंकन के बंधुत्व सी। 
मदर टेरेसा व लूथर किंग की करुणा सी, हाकिंग की जीवंतता सी 
गेट्स की व्यवसायिक समझ सी, स्टीव जॉब्स की मौलिकता सी।   

यूँ ही न उचित मानने की, देशाटन करने की, भ्रमण से समझने की
मानव-गुणवत्ता भरण की, रोचक बनन की, स्व के श्रेष्ठ बनने की।
कथन में न झिझकने की, त्याज्य हटाने की, त्रुटियाँ स्वीकारोक्ति की
अशिक्षितों को योग्य बनाने की, व विश्व के कुछ काम का बनने की। 


पवन कुमार,
२ जून, २०१९ समय १६:५७ अपराह्न 
(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दि० १६ जून, २०१६ समय ८:५० प्रातः से)    

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