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Saturday, 26 July 2014

सार्थक संवाद

सार्थक संवाद 
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कैसा हो वार्तालाप जो कुछ सार्थक बयान करे
शब्दों में ही न उलझकर कुछ गंभीर हेतु यत्न करें। 

कवि-हृदय भी एक बालक ही, मात्र हतप्रदता दर्शाता 
कभी तो वह व्याकुल होता, कभी ख़ुशी में मग्नाता। 
वह बेचारा तो कभी अपने से ऊपर हो ही न सका 
बस निज-अंतर के संग कुछ मंथन ही करता रहता। 

पर यह उसको कदाचित बाह्य से पृथक कर देती 
उसे संसार-विवादों के लिए समय ही मिलता नहीं। 
अपनी लघु सामग्री संग इस काल-क्षण में है व्यस्त 
उसी से कोशिश करता क्या महान हो सकता संभव। 

मूर्तिकार पाषाण-खण्ड देखता, अंदर लघु शिल्प तराशता 
महद से सूक्ष्म पर आना, शक्तियों को समाहित है करना। 
गूढ़-उद्देश्य निकट, कलाकृति में समस्त न्यौछावर करना 
उसे अपना जीवन समझता है तभी तो प्राण-प्रतिष्ठा करता। 

कवि भी नन्ही कलम से कागज़-पटल पर कुछ प्रयोग करता 
कदाचित मूर्तिकार से अल्प, क्योंकि बहुत स्पष्ट नहीं होता। 
पर शायद मूर्तिकार भी असमंजस-स्थिति से गुजरता होगा 
प्रक्रिया में ही उद्देश्य प्रखरता, बुद्धि-बल कार्यानुरूप देगा।  
  
पूर्ण-स्पष्ट तो कदापि न होता तो भी प्रयास किया जाता  
सब कुछ ठीक हो जाता, यदि सतत-प्रयत्न हृदय से होता। 
यहाँ कुछ भी नहीं व्यर्थ, है तो मन की निष्क्रियता मात्र  
खड़े होकर चलो, देखो, पाओगे कितने भरे पड़े आनंद। 

मस्तिष्क-शून्यता से ही, एक अद्भुत संसार निकलता 
सामने कोई ग्रंथ न होता, जिसे नक़ल किया जा सकता । 
यह स्वयं रचनाकार है, कलाकर्मी, चित्रकार, मूर्तिकार भी 
यहाँ उसका सीधा संबंध उसी परम से शाश्वत, अबाधित। 

यद्यपि वाणी मौन है, मन-मस्तिष्क खलबलाता है प्रचुर  
वह प्रेरित करता कलम को, कुछ हो जाए नवीन-मधुर। 
क्या वाणी का मौन अन्य क्रियाओं को भी बंद कर देगा 
अरे नहीं, वह तो पथ दर्शाता, कुछ अनुपम हेतु कलम द्वारा। 

शक्तियाँ यदि हैं सीमित, परस्पर आदान-प्रदान है संभव 
तो सत्य ही परस्पर हेतु स्व का त्याग एक सुभीता यत्न। 
यह है प्रज्ञा का मार्ग जो चहुँमुखी के लिए है समर्पित 
और नूतन विकास हेतु यथा-संभव शक्ति-पुँज प्रयोग। 

बहुत अधूरा, इतना बौना और विकास इतना कमतर 
संभावनाओं का अल्प प्रयोग, कार्य-परिणति की इच्छा न्यून। 
इस जीवन का इतना निम्न-निर्माण, अपना ही अल्प-उपयोग 
मानव को पूर्णता से भरने हेतु किंचित करने महान प्रयास। 

दम्भित या कहूँ स्वयं में डूबा, सोचता कि ज्ञान-साधना रत 
जबकि वस्तुतः सत्य, निमील-नेत्र भी पूर्ण  पाया खोल। 
अभी मात्र विकास के प्रथम चरण का है हुआ शुभारंभ  
और कदाचित वह तमाम नई संभावनाओं से देगा भर। 

वस्तु-सामग्री, स्थान, क्रिया-कारक की आवश्यकता यहीं 
मैं तो यहाँ बस प्रयोग के लिए निमित्त वस्तु स्थापित ही।   
जानता हूँ कि सब कुछ कि क्या, क्यों, कैसे सब हो रहा 
किञ्चित अतः शिशु भाँति स्वयं को अभिभावक को दिया। 

पता है कि ऊपर उछालेगा तो सहारे से लेगा भी पकड़
क्रिया चाहे अभी असह्य, पर आवश्यक पूर्ण-विकासार्थ। 
शारीरिक या मानसिक व्यायाम, करते समय दुखाता भी 
पर अंततः उत्तरोत्तर धारक को अधिक सक्षम बनाती ही। 

अतः पथ-बाधाओं से तो घबराने का कोई नहीं है प्रश्न 
पर परम के लिए दुर्गम-अलंघ्य मार्ग-गमन आवश्यक। 
उस उत्तरोत्तर आत्म-विकास की संभव सीमाऐं क्या 
इस अन्वेषण में स्वयं को समर्पण, कटिबद्ध है करना। 

मुझे स्व-विकास हेतु क्या -2 नवीन प्रयास करने हैं 
कोई सूची बनाओ और उद्देश्य गिनवाओं अपने। 
फिर क्या कार्य करना है, क्यों, कब, कहाँ  कैसे
किसकी सहायता वाँछित, कर्म-सम्पन्नता के लिए। 

उद्वेलित होना प्रथम अध्याय, स्थिति को सुधारने हेतु  
इस चरण बिना तो विकास-मंथन तो कतई न संभव।
पर स्थिति को आगामी प्रयास-कर्म हेतु प्रेरण-आवश्यक 
तब अनुभव होगा निरंतरता का प्रति-क्षण व प्रत्येक-श्वास। 

यह चिंतन बढ़ता जाता जितना मैं करता अग्र-प्रयास 
क्यों प्रश्न के उत्तर हेतु क्यों उद्योग रत नहीं यह मन?     
 क्या यह भी कदम है सार्थकता में करने हेतु प्रवेश 
यूँही न समय गँवाते, अपितु नचिकेता सम कुछ सक्षम। 

अथाह ज्ञान-पूर्ण पुस्तक सामने निष्ठ, और मैं नितांत अपढ़ 
कोई बताए कैसे पहुँचेगा उस अमूल्य का लाभ मुझ तक? 
माना कि प्रयास रत हूँ उसे देखने, समझने के लिए 
पर मात्र उठा-पटक या बिन समझे कुछ पृष्ठ लेता हूँ देख। 

मेरी चेष्टाओं के कोई मायने नहीं है यदि मैं शिक्षित नहीं 
स्वयं से तो पढ़ नहीं सकता क्योंकि अक्षर-ज्ञान है नहीं। 
अतः कोई गुरु, शिक्षक चाहिए जो करा दे सम्पर्क
स्वर-माला व वाक्यों का, बुद्धि से समझने में सक्षम। 

ऊसर विस्तृत भूमि पड़ी, चाहिए कोई कर्मठ कृषक 
बन सकती यह ऊर्वर, चाहिए उसमें श्रम, खाद व जल।  
असम धरातल को प्रथम ठीक करना, कंकड़-पत्थर बाहर 
कुछ नम मृदा लाओ और अपने क्षेत्र को करो दुरस्त। 

प्रस्तर यह निष्प्राण पड़ा, कोई शिल्पकार फिर इसे उठाए 
कुछ सोचकर भला इसे तराशें, मूर्ति इससे अद्भुत बनाऐं।   
  मेरी सोच की क्या सोच है इस तन-मन का निरूपण हेतु 
पर सर्वाधिक आवश्यक है पड़ना किन्हीं योग्य हाथों में। 

कलम पड़ी, कागज़ उपलब्ध, आकर कोई इसपर कुरेद जाए 
कुछ कालजयी लिख दे जिसमें माँ सरस्वती कुछ मुस्कुराऐं। 
वह चाहती ही कुछ सक्षम बनें उसके शिष्य, और महारथी 
वह तो प्रशिक्षण देना भी चाहती, पर स्वयं बनना होगा सारथी। 

यह रखा दिया और तेल उपलब्ध, बाती भी पड़ी है समीप 
चारों ओर गहन अँधियारा, मैं उसमें असमंजस हूँ तिष्ठ। 
माचिस भी हाथ में है किंचित, फिर चलाने की न समझ  
फिर किसी से पूछ ले भाई, कैसे प्रकाश आना है सम्भव।   

 करो कुछ प्रयास अनवरत, कुछ तो सहारा मिलेगा ही 
लोग देख रहे हैं तुम्हें सतत, अचम्भित आँखों से अपनी। 
 फिर संभव कि यह नया स्वरूप बहुतों की समझ न आए 
लेकिन सब तरह के प्राणी यहाँ, अपना काम करना है। 

कैनवस उपलब्ध, रंग-कूची संग में, व बाहर खुला गगन 
मन तो पास तुम्हारे ही और दृश्य देखने को मिलें नयन। 
फिर चित्रण कर सकते मन में, यह तो बहुत ही संभव 
उठाओ पेंसिल, उकेरों शक्लें कुछ, भर दो रंगों से प्राण। 

अनेक सम्भावनाऐं जीवन की, कुछ औरों भी बनाओ सक्षम 
कुछ सीखो यहीं से अविरल, अन्यों को भी दिखा दो राह। 
चलो दुर्बलता-निवारण को, उसका एक अर्थ जग-सहाय 
यही परस्पर अवलम्बन, आदान-प्रदान व मानवता कृतार्थ। 

पवन कुमार,
26 जुलाई, 2014 समय 21:48 रात्रि 
(मेरी डायरी दि० 17 अप्रैल, 2014 समय 9:23 प्रातः से)  

Saturday, 19 July 2014

जीवन चिन्तन

जीवन चिन्तन 
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आज फिर सिहराती है वही छपछपाहट-कुलबुलाहट 
और मैं स्व को पूर्ण अज्ञानी, असहज-बोझिल हूँ पाता। 

सहमा हूँ और जीवन का स्पंदन नहीं है 
बाहर और भीतर नीरवता का आलम है। 
मुझे सुनाई दे रही है चिड़ियों की चीं-चीं 
और बाहर मार्ग पर चल रहे वाहनों का शोर। 

चिड़ियों का चहकना यही शायद प्राणदायक 
अन्यथा मुझे बहुदा अजीवन सा लगता है। 
प्राणी जीते भी अप्राण सा ही निर्वाह करते 
और अपनी मुर्द शांति में ही सुबकते रहते। 

पर चिड़ियाँ हैं मन को पुलकित है करती 
गिलहरी गिट-गिट से ध्यान खींच ही लेती। 
झींगुर निज सतत साधना से प्रभावित करते 
नीरवता तोड़ते जीवन प्रतिभाषित हैं करते। 

पर क्या मैं बोझिलता से कभी बाहर न आ सकता 
हर क्षण मस्तिष्क में अपूर्णता ढोने का प्रहार। 
सोना तो अधिक नसीब में है नहीं शायद 
जागरण में भी है असहजता का ही साम्राज्य। 

देह-मन की इस रण-भूमि में, मौन युद्ध निज गतिमान 
यदा-कदा बाहर आ बोलता पर सुगबहाट से न अधिक। 
अंदर तो तड़पन है बहुत, जो घोर पीड़ा है देती 
और कैसे उलझनें सुलझें, इसी धुन में लगी रहती। 

जग के सब जन हैं जो स्वयं में ही व्यस्त 
अपने से ही न फुर्सत तो तेरा क्या सोचेंगे। 
वे भी लगे हैं अपने आंतरिक-बाह्य युद्धों में 
शायद तन्हा ही हैं इस विशाल मनुजागार में। 

जैसे सावन के अन्धे को सब हरा नज़र आता है 
मुझे भी शायद वैसे ही सब अपने जैसे हैं लगते। 
माना कुछों की स्थिति हो सकती कहीं सुखकारी 
पर अन्य व्यग्र इस समस्त बवंडर को समझने को। 

क्या है यह मस्तिष्क का भारीपन व देह-दुखन,   
चिकित्सीय आयाम या किसी गंभीर बदलाव का लक्षण। 
मैं तो नहीं रमन महर्षि या अरविन्द सा योगी 
फिर क्यों ये हिचकोले अंदर से हिलाए जाते हैं। 

जग जाता हूँ प्रायः निद्रा से, अपूर्णता के निदान हेतु
खोजने लगता हूँ कुछ पुस्तकों में उनका हल। 
हाँ उनमें अनेक हैं जो इस दौर से बखूबी गुजरें 
पर वे भी बेचारे ममसम पूर्णता न बखान सकें। 

वैद्य भी ऐसी औषधि या सूई इज़ाद न कर सकें 
हो जिससे एकाग्र-भाव व व्यर्ग मन का इलाज़।  
कुछ भोलों को नशा-सेवन सिखा देते हैं ठग 
पर सत्यता उन्हें पता कि चरम कहीं है ओर। 

मैं हूँ कि उस व्यसन को तो नहीं अपनाया 
पर सुनने में तो मात्र ठगने वाला ही पाया। 
अन्यों को अपंग, बोध-अक्षम बना, उल्लू कुछ साधते 
फिर चेतनता का ढोंग व निज वचनों से बरगलाते। 

मैं कहीं और चला गया गंतव्य से जो है मेरा स्व 
इस क्षय-विकास सिलसिले के अनवरत खेल। 
पर इस तरह के क्षणों में स्वयं को तन्हा हूँ पाता 
मस्तिष्क के कपाट खोलने में अक्षम हो जाता।  

काल-कवि व मानव धरा पर अल्पशः अवतरित हुऐं 
पर वे भी तो किसी प्रशिक्षण-अभ्यास से गुज़रे होंगें। 
क्या उनका चिंतन जिससे सीखे मंज़िल पहचानना 
रहे समरसता-धारक व अंतः से निज निखारते रहें। 

उन महामानवों के समक्ष कितना बौना हूँ मैं 
वे विशाल वृषभ व मैं वत्स अवयस्क-दुर्बल, परमुखापेक्षी।
कितना अंतर है दोनों की अंतः-बाह्य स्थितियों में 
बीज शायद एक लेकिन वर्तमान बहुत असम है। 

माना सम्भावना है इसके विशाल बनने की 
पर उसे कितने प्रयासों से गुजरना पड़ेगा। 
फिर फल देना या न है उस दात्री के हाथों 
सौभाग्यशाली हैं वे जिन पर कृपा हो जाए। 

माना विकास-नियम से सबका देह-वर्द्धन,  
पर क्या यह नियम क्या मन के लिए भी है ?
माना कुछ न कुछ तो होता रहता है अंदर 
पर नित-चेष्टा ही इसे परिष्कृत है करती। 
      
   जो बाहर वह अंदर नहीं और अंतः न इतना स्पष्ट
जब स्वयमेव अविदित, और कैसे ज्ञान-सक्षम? 
तो क्या है हर मनुज महासमुद्र स्वयं में 
  यह और बात कि वह कितना अनुभूत करता। 

इस महामानव-शहर में मुझे क्यों लाया गया 
ये मुझे झझकोरते, जगाते व दुत्कार लगाते। 
मुझे लेटे से बैठाते हैं, बैठे से खड़ा करते हैं
फिर चलने-दौड़ने को प्रेरित या कहूँ धका देते। 

शायद यह सामर्थ्य-दान, पर मुझमें है इच्छा अभाव  
  वरन क्यूँ न अध्यवसाय-रत, निज-कुंडलीय ज्ञान से। 
क्यों मूलाधार में ही बैठा हूँ इतने अनंत काल से 
और सहस्रधार परम चक्र स्थिति तो है अति-दूर। 

उन मध्य-क्रम वाले चक्रों से गुज़रना होगा 
निज चेष्टाओं से स्व प्रकाशित करना होगा। 
अपने को मनुज बनाना जो मनु नाम से है आया 
     जयशंकर प्रसाद की 'कामायनी' में है मधुर चित्रण।  

कहाँ फँस गया हूँ इस कुरुक्षेत्र के समर में 
मैं कोई न तो कोई योद्धा या सारथी ही हूँ। 
पद-दलित हो जाऊँगा किसी रथ-चक्र नीचे आकर 
और फिर रोऊँगा अपने दैव पर, क्यूँ आया यहाँ। 

माना मैं अबल प्राणी व दोयम प्राण-शक्ति 
फिर भी भेजा गया हूँ किसी उद्देश्य के लिए। 
शायद तुम्हें लक्ष्य न बताया उस नियंत्रक ने 
पर फिर वह निरुद्देश्य कुछ भी न करता। 

मत करो उसकी मंशा पर शक, ऐ बन्धु 
सोचो किस विधि, कर्म-सुघड़ बनना है। 
वह देगा तुम्हें समस्त उन्नति अवसर 
पर महारथी पद हेतु रथी से गुज़रना होगा। 

किस दृश्य-खोज में हो कि होगा चक्षु अभिराम 
  यह तो है सब ओर, बस खोलने होंगे नयन-द्वार। 
माना द्वार भारी व अनुपलब्ध वाँछित उपकरण 
     फिर बल भी नहीं व कोई सक्षम साथ भी नहीं।      

पर ऐसा न ये खुलेंगे ही नहीं, मन में दृढ़ विश्वास लो 
पार संभव है असहजता से, बस वाँछित तव सततता।  
बनो धीर मन-स्वामी व अनुभव करो स्व-विकास को 
जो तुम बनना चाहते, वह उसी से होकर निकलता है। 

विकास-यात्रा साथी ऐ मन, क्यूँ इतना चिन्तित 
जबकि तू जानता है यही सत्य जीवन। 
जीवन नाम नहीं है किसी मंज़िल का 
अपितु हर क्षण की गहन अनुभूति का। 

फिर यह कुरुक्षेत्र है विकास-स्थल 
तुम न हो रुग्ण और असहाय मानव। 
बस तुम्हारे खड़े होने की देर है मात्र 
समस्त जग तुम्हे मार्ग देगा अवश्य। 

यहाँ कोई  प्रतियोगी, सब स्व-व्यस्त 
सब निज धुन में, इस संगीत जगत में। 
न सुध उनको जब अपनी पथों की ही 
तुम हेतु क्यों स्वयं को कष्ट ही देंगे। 

बीज़-पादप व महावृक्ष में न कोई भेद 
     बीज़ में सम्भावना विस्तृत बनने की।     
पर कुछ सावधानियाँ हैं तुमसे वाँछित 
छितरना ना, खाए न जाओ व ऊर्वर भूमि न पाओ। 

मैं निज-धुन लुप्त, चित्रकार कलाकृति करता रहा 
विमान उड़ता-ध्वनित रहा, ट्रैक्टर रेंगता शोरगुल रहा। 
सूर्य निज पथ पर गतिमय, सब अपने धंधे में हैं व्यस्त 
रसोई के बर्तन टकरते रहें व चिड़िया गीत गाती रही। 

मेरा शरीर भी कई अवस्थाऐं बदलता रहा 
यह मन भी अपने मिजाज-बदलता रहा। 
मोबाईल में सतत प्रक्रिया मैसेज लेने की 
मेरे चाहे, अचाहे सब यूँ सतत चलते रहें। 

यदि निराशा तो असीम आशा-संभावना भी चहुँ ओर 
हाँ जन्म हो अतः-मंथन से, ये तभी चिर-स्थायी होंगी। 
बीच में यदा-कदा जैसा भी अल्प-महद हो स्पंदन 
   अमूल्य अनुभवों को अपने यूँ लिपिबद्ध करते जाना। 

सबल तुम्हारे साथ, अबल मुख ताक रहें 
संगी मुस्कुराते चेष्टाओं में, स्वजनों का सदा स्नेह।  

अतः बढे चलो। फिर मिलेंगे। 

पवन कुमार,
19 जुलाई, 2014 समय 20:49 सायं 
( मेरी डायरी 8 अप्रैल, 2014 समय 9:12 प्रातः से )

Thursday, 10 July 2014

कुछ संस्मरण शिलोंग

कुछ संस्मरण शिलोंग  
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कई दिन की कशमकश के बाद फिर हिम्मत करके कलम उठाई है। वास्तव में यह डायरी कई दिनों से या कहिए कि उषा और सौम्या के दिल्ली जाने के दिन से ही पास रखी मेज़ पर रख दी  गई थी।  वह दिन शुकवार था और अगले दो दिन छुट्टी के थे अतः यह सोचा था की काफ़ी समय मिलेगा कुछ लिखने के लिए, कुछ बतियाने के लिए। परन्तु शायद मैं भी यह मानने लगा हूँ कि हर चीज़ के लिए एक उपयुक्त समय होता है और वह चीज़ उसी के अनुरूप होती है। वास्तव में डायरी लिखने के विषय में तो मैं यह निश्चय से कह सकता हूँ क्योंकि मैं इसमें अनियमित रहा हूँ। यह शायद नहीं होता जब तक एक प्रबल इच्छा न हो और मैं बतियाने के लिए कुछ होते हुए भी उसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाता। 

फिर आज अब या फिर उन तमाम क्षणों में जब मैं अकेला होता हूँ, इस मेरे सिवाय इस दुनिया में कौन पास होता है? यह मैं ही तो हूँ जो इस शरीर के साथ जिए जा रहा हूँ और घड़ी की टिक-टिक के साथ इस ज़िन्दगी को उसके अंतिम मुकाम की ओर शनै-शनै आगे ले जा रहा हूँ। यह भी मैं ही हूँ जो कदाचित व्यर्थ के संवादों में उलझा रहता हूँ या फिर कई बार दूसरों के विषय में कुछ बुरा कहने में आनन्दित होता हूँ या फिर अपने मन के क्लेश या संशय को रोषपूर्ण शब्दों से या दूसरों के समक्ष प्रस्तुत करता हूँ या फिर मन ही मन में स्मरण करके स्वयं को व्यथित करता हूँ। या फिर तनिक अधिक चतुर बनकर केवल दूसरों के लिए नियमों का पालन कराने में अधिक आनन्दित होता हूँ। या फिर अपनी कमज़ोरी पहचान कर स्वयं को और फिर अन्यों को भी लाचार सा बर्दाश्त करता हूँ और चुपचाप चलता जाता हूँ। या फिर हिम्मत करके टोका-टोकी के द्वारा 'जब तक जीवन है -आशा है' के सिद्धान्त से चीज़ों को ठीक करने की कोशिश करता हूँ। यह कोशिश शायद ख़ुशी प्रदान करती है परन्तु इच्छा के अनुरूप फल न पाकर तनिक अवसाद भी अनुभूत होता है।

मैं अपने कार्यालय में मध्यम दर्ज़े का अफ़सर हूँ। कार्यालय में वाँछित स्टाफ़ से कहीं कम यहाँ आसीन हैं। इस अंचल में कार्य का भार अपने आकार से कहीं अधिक है और लगभग हर दिन एक या अधिक कार्य की अनुमति मिल ही जाती है।  क्षेत्र स्टाफ भी अपना पूरा ज़ोर लगाकर कार्यों को ठीक तथा समय से कराने में अधिकतर असमर्थ होता है परन्तु फिर भी उनके पास स्टाफ लगभग पूरा होता है क्योंकि लोग योजना शाखा में आसीन होने की अपेक्षा क्षेत्रो में आसीन होना ज्यादा पसंद करते हैं। चूँकि मेरे पास अधीक्षण इंजीनियर (योजना) के तीन में से दो इकाईयों का भार है, कार्य करवाना अत्यन्त कठिन हो जाता है और उस पर वरिष्ठ अधिकारियों का कार्यों के परिणाम शीघ्र-अति-शीघ्र प्रस्तुत करने का निर्देश, और मुश्किल बना देता है। इसके अलावा स्वयं भी जब बहुत अधिक कार्य अधूरे हों तो मन में क्षोभ सा होता है और स्वयं की कार्य-क्षमता पर यदा-कदा प्रश्न-चिन्ह सा लगा महसूस होता है।

उषा और मेरी प्यारी बेटी सौम्या 24 सितम्बर को नई दिल्ली से गुवाहटी आए थी और उनको लेकर मैं 30 तारीख को शिलोंग पहुँचा था। उसके बाद वे यहाँ पर लगभग एक महीना रहें और इसी 26 अक्तुबर को दीवाली के दिन में उनको 27 की सुबह राजधानी एक्सप्रेस में बैठाने गुवाहटी गया था। वह दिन दीवाली का था, गुवाहाटी में गेस्ट-हाउस (CPWD जू -नारंगी मार्ग) में रुके थे। वहीँ पर कॉलोनी में रह रहे श्री नीरज मिश्रा, अधीक्षक अभियंता (असम केंद्रीय परिमंडल-2), अनुराग गर्ग और निर्मल गोयल, जो वहां पर आए थे, के साथ दीवाली मनाई। मतलब कि सौम्या ने बच्चों के साथ पटाखे छुड़ाऐं और हमने खड़े होकर मज़ा लिया। इसके अलावा श्री अग्रवाल (सि० सि० विंग, आकाशवाणी) के सहायक अभियंता वहाँ पर आएं. वे मेरे साथ लोक नायक भवन में कनिष्ठ अभियंता थे और उन्होंने प्रोन्नति पा ली थी तब मुझे विभाग में नियुक्ति का लगभग 1 वर्ष हुआ था। मिश्रा जी का लड़का विजय जो पिछले दिनों किसी ज्वर से ग्रसित था, अब काफी स्वस्थ लग रहा था। अनुराग का लड़का केशो जो लगभग तीन वर्ष का है, काफी चपल और प्यारा लग रहा था। सौम्या भी दीवाली की ख़ुशी में काफी उत्साहित थी। वास्तव में उसकी ख़ुशी के लिए हमने 25 तारीख को ही यहाँ शिलोंग में दियें तथा मोमबत्तियों के अलावा थोड़ी मिठाई का प्रबंध किया था और आसपास के तथा कार्यालय के कुछ स्टाफ को घर बुलाया था। उस दिन यहाँ शिलोंग में मेघालय स्टूडेंट्स फेडरेशन ने बंद का आव्हान कर रखा था जिससे पूरी तरह से जनजीवन ठप्प था। केवल शाम को कुछ दुकानें खुली और पास नीचे से कुछ मिठाई और सौम्या के लिए कुछ पटाखे ख़रीदे क्योंकि वह दीवाली के दिन घर पर न रहने के कारण काफी दुखी थी अतः उसी क्षति-पूर्ति के लिए 25 को ही छोटा सा आयोजन कर लिए गया। उषा ने पकोड़े और चाय बनाई। पास की मिसेज बैद्य तथा काकोती ने इसमें मदद की। वास्तव में यहाँ पर पास में रहने वाले सचमुच बहुत अच्छे हैं।

जब उषा और सौम्या यहाँ थी तो पूरा दिन घर में लोगों की चहल-पहल रहती थी। उषा कुछ न कुछ सीखती है और दूसरों को भी सिखाती है। उदाहरण के लिए इस बार वह कई दिनों तक हमारे कार्यालय अधीक्षक श्री चन्द्र कुमार गुप्ता की बेटी से कढ़ाई तथा टेडी बीयर नुमा खिलोने बनाना सीखती रही।  पिछली बार गर्मियों में आई थी तो मि० तथा मिसेज बैद्य से नकली फूल तथा ग्लास पर पेंटिंग बनाना सीखती रही। वह गृह-कार्यों में दक्ष है और इस तरह के कार्यों में काफ़ी रूचि रखती है। अपने स्वभाव के कारण वह आसपास के लोगों में काफी प्रिय भी है। उसके विद्यालय की प्रिंसिपल उसे विशेष स्थान देती है।  

इस बार फिर कॉलोनी के निवासियों ने मुझे के० नि० लो० वि० दुर्गा पूजा कमेटी का सचिव मनोनीत किया था। पूजा की ठीक रूप से संपन्न कराने की जिम्मेवारी विशेष तौर से मेरी थी। अतः पूजा के लिए कई दिनों का समय मुझे लगाना पड़ा। उन दिनों मेरे परिवार के अलावा हमारे मु० अभियन्ता तथा अधीक्षण अभियंता का परिवार भी यहाँ आया हुआ था। कुल मिलाकर यह महीना पूजा, परिवार के साथ, छुट्टियाँ, कार्यालय के कार्य के साथ अच्छा व्यतीत हुआ। सौभाग्य से उषा का स्वास्थ्य ठीक रहा। इस बार उन्होंने अपने खान-पान का ध्यान रखा। उसका स्वास्थ्य मेरे लिए वरदान है। जब वह प्रसन्न होती है तो मैं कहीं ज्यादा प्रसन्न होता हूँ। सौम्या का समय भी खेलने, पढ़ने तथा इधर-उधर रातुल, शैली, नीलम तथा वैद्य, काकोती आंटियों के साथ समय बिताने में लगा। मुझे जब भी समय मिला, उसको पढ़ाया और कभी-2 उनके साथ बाजार वगैरा भी गया। इस बार कोई ज्यादा खरीददारी नहीं की गई लेकिन उषा ने सौम्या के लिए यहीं के सुनार से कानों की बालियाँ बनवाई।  उनको पहन कर वह बहुत सौम्या लग रही थी। 

अब पुनः लिखने की इच्छा लिए आज इस सफे को बंद  करता हूँ। 

अलविदा।  शुभ-रात्रि। 

पवन कुमार,
 10 जुलाई, 2014 समय 16 :11 सायं 
(मेरी शिलोंग डायरी 1 नवम्बर, 2000 समय 00:50 म० रा० से )     

    

Saturday, 5 July 2014

कुछ हिल्लोरें

कुछ हिल्लोरें 
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कुछ नए रंग की बात हो, जिंदगी में खुशहाली हो 
झूमें, गाऐं, नाचे सारे, मन में तान सुरीली हो। 

सभी का मन पुलकित हो, फाल्गुन की मस्त बहारों में 
एक दूजे को चाहे मन से, ना फिर कोई बेहाली हो। 

रंग-गुलाल अबीर यूँ फैले, सब तन-मन को सराबोर  करें 
और अपनी मस्ती में सबसे हँसी -ठिठोली हो। 

सब ओर आनंद और रस का, मधुमय साम्राज्य हो 
देश अपने में रहे सम्पन्नता, हर रोज यहाँ दीवाली हो। 

मन बड़ा बने और दूसरों को समझे, सोच बने बहुत व्यापक 
कर्त्तव्य का बोध हो, सबने मन में ऐसी ठानी हो। 

अच्छे नागरिक बनें यहाँ, अपना तन-मन देश के लिए 
सब अपने हैं मैं सबका हूँ, भाव ऐसे फ़ैलाने हों।  

मन का हो भला दृष्टिकोण, सब पक्षों से न्याय करें 
जाँचे-परखे करने से पहले, विवेक के संग फिर जाना हो। 

अच्छा लेखन, अच्छा अध्ययन और अच्छे में मन तल्लीन रहें 
बढ़ा कर अपने को जग में, सबको राह दिखानी हो।

अपनी अपेक्षाओं का आदर करें हम और उसमे सहयोग करें 
मन के भाव समझ कर ही, कुछ कहने की बारी हो। 

मस्ती का भाव रहे मन में, पुलकित औरों को भी करें 
नहीं रुकने का हो कोई आलम, बस आगे बढ़ने की ठानी हो। 

 चले-चलो तुम अपनी धुन में, न हो कोई अहंकार 
ज्ञान चक्षु खुल जाऐं मन के, परम में जुगत लगानी हो। 

पवन कुमार,
 5 जुलाई, 2014 समय 21:36 रात्रि 
(मेरी डायरी दि० 23 मार्च, 2014  समय 11:20 पूर्वाह्न से )

Thursday, 3 July 2014

विरह-स्मृति

विरह-स्मृति 
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 रात का सन्नाटा है, नींद भी नहीं आ रही है 
सर्दी का फिर आलम है, ऐसे में तू कहाँ है ? 

कितना अकेला हो जाता हूँ बिन तेरे 
जैसे लगता है शरीर से आत्मा निकल गई। 
साँसे तो फिर  चलते ही रहती हैं  
लेकिन जीने में जीवन का स्पन्दन कहाँ ?

महफ़िलें तो बहुत सजती हैं, पर अपने  लिए यह सुख कहाँ 
रूखा सा यह जीवन है, इसमें जीवन की हरियाली कहाँ ?
मैं तो शायद सूखे ठूँठ सा खड़ा हूँ 
पवन की हिलौरों की गुदगुदाहट का अहसास कहाँ ?

जब तू पास होती है तो लगता है जीवन यहीं है 
लेकिन अब तो यह अहसास भी नहीं है। 
जब तू अपनी बात कहती है मीठे अन्दाज़ से 
तो दिल को अंदर से चैन मिल जाता है। 

मैं फिर कवि भी नहीं कि अपने हृदय को प्रस्तुत कर दूँ 
लेकिन यह सत्य है कि बहुत उदास हो जाता है बिन तेरे। 
साँसों का चलना, घड़ी का टिक-टिक करना सब एक जैसा है 
जैसे समय बिताने के लिए ही कर्म किया जा रहा है। 

तुम्हारी सुनहली यादों में शायद खोना चाहता हूँ 
परन्तु वह डूब जाने की हिम्मत नहीं। 
तुमसे बतियाने को बहुत दिल करता है 
लेकिन वह हिम्मत और दिलेरी ही नहीं। 

मैं फिर क्या हूँ जो तेरा नाम भी ठीक से नहीं ले पाता हूँ 
 अपने और तुम्हारे रिश्ते की दृढ़ता को देख नहीं पाता हूँ। 
बस यूँ चले जा रहा हूँ मानो पैरों का कर्म करना है 
और मन में काव्यात्मकता की अनुभूति नहीं है। 

फिर क्या हूँ और क्या लिखे जा रहा हूँ 
कुछ बात भी है या सफे काले किए जा रहा हूँ। 
या फिर मन की बात को लिख नहीं पा रहा हूँ 
या सोने को बेताब दिमाग का बोझ ढोए जा रहा हूँ। 

मैं अभिन्नों को भी अपना कहने में हकला रहा हूँ 
और फिर उन्हीं की रिक्ति में रुदन कर रहा हूँ। 
कष्ट की पीड़ा-अहसास बहुत अंदर तक गया है 
 स्वयं में से अपने को ढूंढने का प्रयास कर रहा हूँ। 

संसार में सब कुछ है पर मैं पूर्ण  निश्चित नहीं हूँ 
अपने बारे में भी भ्रमित हूँ फिर दुनिया तो बहुत बड़ी है। 
उस पर तुमसे बिछुड़ने का गम है 
लेकिन मिलने की घड़ी अब ज्यादा दूर नहीं है। 

तेरे नाम से ही इस सफे को बंद करता हूँ 
आशा करता हूँ कलम कुछ अच्छी रचना शुरू कर देगी। 

पवन कुमार,
3 जुलाई, 2014 समय 23:18 रात्रि 
( मेरी शिलोंग डायरी दि० 16 नवम्बर, 2000 समय 00:03 म० रा० से )