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Tuesday, 28 July 2015

मेरा सामान

मेरा सामान 
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मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है 
कृपया उवाच करो सूची और उद्देश्य।  

थोड़ा सा सामान देकर भेजा इस जग में 
बहुत कुछ अपने पास रख लिया। 
क्या है तेरे मन की मंशा 
क्यों न मेरा परिचय कराता ?

मेरा क्या है निज, जो दत्त है वह भी पास तेरे  
तू ही जाने कितना अभी मेरी योग्यता में ? 
देगा किंचित देख सामर्थ्य व मन की प्रगाढ़ आकांक्षा 
लेकिन अभी तो खिलौने से जा रहा हूँ बहलाया।  

कितना योग्य और ग्राह्य, कितने हेतु सुपात्र 
तूने कितना आँका, परिणाम तो नहीं है विदित ? 
तू रहस्यमयी, मैं बुद्धि-शून्य, कैसे प्रवेश हो गुफ़ा अंध 
सब ओर साँसत, तम-अविवेक, तेरा प्रकाश भी अदर्शित। 

क्या वज़ूद -कैसे हो प्रयोग, नियम तो तूने बताए नहीं 
मार दिया धक्का बिन योग्य किए, यह तो कोई न्याय नहीं। 
माना किंचित प्रयासों से, किया स्व को अल्प-शिक्षित 
पर महद है पूर्ण ज्ञान व अनुभव, मुझसे तो दूर बहुत। 

माना प्रारम्भ स्थिति में, सभी शुरुआत करते निम्न  
तो क्या दर्जा बढाने का नहीं होता नियम ? 
सुयोग्य शिक्षक तो नज़र नहीं आता 
कोई बताता भी है तो पूर्ण समझ नहीं आता। 

समय बिता लिया, शिष्य को अनाड़ी दिया छोड़ 
शिष्य भी अज्ञानी - मूढ़ है, है अपने में मस्त। 
नहीं उसे निज अधो-स्थिति का ही ज्ञान 
धरा पर बोझ, अपने ढोये जा रहा। 

कितनी संभावनाऐं भरी इस मानव-शिशु में 
कम से कम उनका परिचय तो करा दे। 
बहुत दार्शनिकों को विचारता, पल्ले न पड़ता 
क्या मार्ग क्रमबद्ध ज्ञानार्जन का, कैसे विचार फलीभूत ?

   प्रबुद्ध तूने भेजे यहाँ, जिन्होंने छाप है छोड़ी 
मुझसे क्या शिकायत है मौला, जो तेरी अनुकम्पा नहीं। 
नहीं ज्ञात वह स्व-संचालित या तेरी रहमत-प्रेरणा 
पर कुछ तो सफ़ल समझने इस काल-चक्र, भूल-भलैया। 

माना बहुत विविधताऐं उनके मनन - मंतव्यों में 
फिर भी परिभाषित करने का किया यत्न।  
शायद न हो वह भी पूर्ण-ब्रह्म चिंतन 
तो भी पार जाने की जगी इच्छा, सामर्थ्य। 

कुछ स्वार्थ-कुवृत्ति आरूढ़, पर कारक भौगोलिक-सामाजिक स्थिति 
मानव चाहे मनन-स्थिति में ही हो, नहीं दूर होती प्रवृत्ति। 
कुछ निरत निज हित साधन को, सर्व-विकास को तिलांजलि 
नियम-कानून अनुरूप बना लेते, शक्ति-सम्पन्न प्रभावशाली। 

कुछ मनीषियों का चिंतन व अनुचर सहयोग 
जग में ऐसी व्यवस्था निर्माण जो हो उनके अनुरूप। 
फिर भी हैं बहुत निःस्वार्थी, चिंतन सर्वजन हिताय  
समाहित जिनमें सबको बढ़ाने का भाव। 

दर्शन की बहुत धाराऐं, परिभाषित अपने ढंग से 
बहुत बना दिए समूह इन्होंने, स्पर्धा हुई अनुचरों में। 
हर एक अपने को श्रेष्ठ मनवाने को उतावला 
सत्य आचरण देखा नहीं, व्यर्थ अभिमान-ग्रसित। 

क्या मानूँ यह जग है संचालित, 
स्व-चलायमान या कुछ योग्यों की युक्ति ? 
कौन हैं वे जो इसको नियम-कानून देते  
फिर चाहे न चाहे, सब उनमें ही बहे हैं। 

फिर कितने हैं परम आदर्श के प्रवाहक, 
उचित व्यवस्था हेतु करते यत्न ? 
सब समय व्यतीत करते जकड़नों में 
उचित जानकर भी प्रायः रहते भीक । 

स्व-यश और प्रभुओं का ही समर्थन   
बहुत आम जन को सहारा न मिलता। 
वे क्षुद्र - यथावत उचित, हम तो योग्य - गर्वित  
कैसा यह प्रयास स्व-हित साधन का,
जबकि प्रकृति-साधन सबके हित। 

अपनी ढफ़ली अपना राग, सब मुग्ध अपनी धुन 
चाहे मालूम हो या न, जीवन धकाने में व्यस्त।  
पर कुछ तो स्व-समूह उन्नति में प्रयासरत 
अपने मनीषी, शुभ-चिंतक, बुद्धि-तत्व से देते समर्थन। 

क्यों मानूँ चिंतकों का लेख, जब नहीं वह सार्वभौमिक 
सारे कायदे अपने हित में, स्तुति है स्व-नाम। 
क्या उन जैसा ही बनना चाहता या उद्देश्य महत्तर  
क्या बन सकता सबका हितकारी, आम-जन सेवक। 

कौन ये दार्शनिक और साध्य, क्या कुछ है गुणवत्ता भी  
या फिर रहते उसी प्रकार में, जिसमें यथा-स्थिति ही। 
कितने सुयत्न ही करते, जग को सुंदरतर घड़ने में 
और परिश्रम से उचित ज्ञान को ही बखानते। 

नहीं इच्छा फिर श्लाघा की, न ही शिष्य बनाने की 
जिसे उचित लगे साथ हो लें, फिर सूफियाना है तो यही।  
मैं किस श्रेणी का जन्तु, प्रभु जरा परिचय करा दो 
निकाल बाह्य बवाल दिखाओ, मेरी साध पूर्ण करो। 

क्या है अनुपम सम्भव, क्या है परमार्थ 
क्या है उच्च-स्थिति, जिसके ऊपर नहीं है पार।  
मैं सीखूँ वे पाठ जो वर्तमान स्थिति से अग्र 
अतएव उलाहना प्रथम पंक्ति से ही, इस रचना इंगित। 

मेरा सामान - मेरी संभावनाऐं, सब तो तेरे पास पड़ी 
यदि मुझमें छिपा भी तो, इसका मुझे ज्ञान नहीं। 
तुमसे गुज़ारिश, दो मेरा वह सामान लौटा 
माना सब तेरा, पर मैं भी कुछ प्रयोग चाहता। 

क्या हैं हदें, मैं भी तो जानूँ, कितना तू सकता दे 
बावरा बनाकर रख दिया, यह ना-इंसाफी है संतान से।  
विचरूँ यहाँ-वहाँ मूढ़ सम, न कभी ध्यान ही लगा 
रहमत की करता प्रतीक्षा, पर तुमको समय न मिला। 

मेरा अध्ययन कुछ बताता, पर चिंतन उससे अलग ही  
बहुत कुछ तो समझ न पाता, अतः विस्तार सीमित ही। 
इतना फैलाव - मम लघु आँचल, दोनों में न सामंजस्य  
कैसे हो विकास, इस परम तत्व को दो प्रयास। 

समय सीमित - ऊर्जा परिमाणित, उस पर चेष्टा अभाव  
कैसे हो बदलाव सार्थक दिशा में, न इसकी कोई दृष्टि। 
बढूँ चिंतन-मार्ग में प्रभु, तू बुद्धि निर्मल बना दे 
न बनने देना स्वार्थी, सम कुछ तथा-कथितों के,
इस जग को और सम बनाना। 

कर्त्तव्य-चिंतन, श्रम-आहुति, हर मनुज को लायक बनाना 
दूर कर विरोध, हो सर्व-विकास, परस्पर सहयोगी बनाना। 
मेरे विवेक का भी हो कुछ उपयोग, ऐसा तू शख़्स बनाना 
न रुकूँ पथ तेरे में ओ मौला, भौतिक तन से आगे ले जाना। 

तपा दूँ तन-मन, दे प्रेरणा, बना राहुल सांकृत्यायन सा यात्री 
वृतांत इंगित - महद प्रयास, वह स्तुत्य है निश्चय ही। 
न मात्र अनुभव किंतु मृदु-चिंतन, आलोचना सटीक-निर्भीक 
नज़रें पैनी, भाव सर्व-हितैषी, बाँटा ज्ञान विस्तृत-अर्जित। 

क्या उचित चिंतन-प्रेरणा से, कुछ निर्भीक हो सकूँगा 
होगा प्रयास कुछ में तो जीवन फूँकने का ? 
     माना पूर्व समर्थों को न तव विशेष आवश्यकता 
तो भी मनुज बहुतेरे विकास का मुख रहें ताक।  
  
पवन कुमार,
28 जुलाई, 2015 समय 23:54 म० रा० 
(मेरी डायरी दि० 28 जून, 2014 समय 10:25 से )

Saturday, 18 July 2015

परस्परता

परस्परता 
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विघ्नेश्वर, दुःख-भंजक, कष्ट-हर्ता, दीनदयाला, मसीहा 
पालक, उत्प्रेरक, गुरु, अवतार, ईश, मित्र व संबल-दीना। 

कष्ट हमारे रोज का अनुभव, दुःख होता जब क्षीण शक्ति 
आकस्मिक कुछ बवाल आ जाता, न ज्ञात कैसे हो मुक्ति ?
माना हर समय, सब पहलू हेतु तैयारी न की जा सकती 
तथापि आवश्यकता पर, सचेतता-आशा की जा सकती। 

समस्या महद, स्व-बल अल्प, परमुखापेक्षी बन हल ढूँढे 
विशेषज्ञ बैठे सहायतार्थ, बस सम्पर्क और शुल्क सूझे। 
सभी कहीं न कहीं बाधित, बहुदा अन्य बनते हैं सहाय 
बड़ा कारक - निदान, चेतन माँगे समय-ऊर्जा व उपाय। 

दिन-प्रतिदिन रोधक लेते परीक्षा, झझकोरते कि तुम हो क्या
कैसी अतिश्योक्ति, आत्म-मुग्धता, जग चैन से न बैठने देता। 
सर्व  झँझट ऊर्जा माँगते, शक्तिवान होना आवश्यक कदम, 
एक-2 श्वास शक्ति पर निर्भर, अतः चेष्टा है ही अत्युत्तम। 

हम कितने दूजों पर निर्भर, समय आने पर ही पता चलता 
हर समस्या का बड़ा पेंच, निदान सुदिशा-निर्देश माँगता। 
लोगों के पास जाओ, पक्ष समझाओ तो किञ्चित बात बनेगी 
जग न मानता मात्र पैरवी, वहाँ आपकी प्रतिबद्धता दिखेगी। 

भ्रांति, पथ-अदर्शित, चेष्टा खोखली, वीर भी बने क्षीण    
बंद द्वार, अंध-कक्ष, आक्रान्ता -भय, हैं जन्म-मरण प्रश्न। 
ऐसे में कोई ईश्वर, सहायक को ध्याऐ तो क्या आश्चर्य है 
माना एक-दूजे की जरूरत, कभी तुम्हें तो कभी हमें। 

क्या अस्तित्व, कुछ निजावलोकन व पर-सहायता अवश्य 
बड़ी शक्तियाँ, निदान कठिन, स्व-बल से नहीं है सम्भव। 
बहुदा नरों से याचना न सम्भव, या उनके बस में न लगता,
क्यों न माँगे बड़े दाता से, सबकी सुनता या हम देते सुना। 

वह तो हम मूक आत्मा की गूँज, कम से कम लेते हैं रो  
उससे जी हल्का हो जाता, आता है रोष के बाद होश। 
चिंतक-मन संभावनाऐं समक्ष लाता, प्रस्तुत विमल-यश 
मस्तिष्क सर्व-दिशा हाथ-पैर मारता, समाधानार्थ प्रयास। 

किञ्चित ईश अबलता प्रतीक न, चाहते जब होते कष्ट में 
देखते उसकी ओर मुँह उठा, क्षीणताओं को समक्ष रखते। 
ज्ञात तो न कितना होता समाधान, स्व-चेष्टा लाती कुछ रंग 
जीवन दाँव पर कुछ करना पड़ेगा, साँस सस्ते में न छूटत। 

दिगम्बर सब दिशा-त्राटक, स्व-अनुभूति समस्त से युग्म  
नहीं संकुचित वह स्वार्थों में, वृहत से आत्मसात, संगम। 
सब उपाय उपलब्ध निकट, जरूरत जांचने-साधने की 
विश्व-परमानुभूति में व्यस्त, समस्या है तो निदान भी। 

कहावत कि 'एक की दारू दो बतलाई, दो की चार दवाई,
दोनों हाथ पकड़ लिए कसकर, कुछ न पार बसाई' सुनाई 
विपत्ति हर जीव पर आती, श्रद्धा से कुछ समाधान-सच्चाई।  
राम पर विपत्ति लक्ष्मण मूर्छित, हनुमान सहायक लाए बूटी 
पांडव-दुर्दिन - कृष्ण सहाय, गीता अर्जुन को त्राणार्थ सुनाई। 

हम बन्दें पहचानते शनै-2, रंग बदनाम पर भी करते विश्वास  
कुछ लेते विवशता का अनुचित लाभ, हम रहते लोक-लाज। 
जग आपसी विश्वास पर चलता, कुछ तो निस्संदेह हैं समझते  
हम अंदर से कितने पवित्र, पैमाना इसका शील-व्यवहार है। 

सुख में समझते स्व को श्रेष्ठ, किंचित ईश्वर को भी ललकारते 
माना वह भी एक कल्पना, समाधान तो सदा आस-पास है। 
 चित्रांकन होता नेत्र खुलने से ही, दूर-विस्तृत से प्रेरणा लेने से 
दिग्गज विस्मित करते बल से, छोड़ों-निकलो झंझावतों से। 

बनो सबल, सुवाणी, संपर्क साधो, कहीं भी कोई आए काम 
आज उसके, कल वह तुम्हारा, औकात पता होनी चाहिए। 
आपसी-हित, कालिक सहायता, मैं बीज़ - वह फसल देती 
अपेक्षा-आदर, सामना दुर्भावना से, पलायन तो उचित नहीं। 

पवन कुमार,
18 जुलाई, 2015 सायं 18:19  
(मेरी डायरी 21 मई, 2015 समय 8:44 प्रातः से)


Wednesday, 1 July 2015

शब्द-रचनावली

शब्द-रचनावली 
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एक शब्द पकड़ लो, जीवन भर लो, उसमें ब्रह्माण्ड समाहित 
ज्ञान-चेष्टा होनी चाहिए, विरल-अनुपम तो निकला ही स्वयं। 

एक शब्द दे दिया, मन्त्र बता दिया, जितनी चाहे व्याख्या करो 
एक नाम सुमर लो, ध्यान में ले लो, जीवन काया-कल्प कर लो। 
एक बिंदु दिया, नज़र गड़ाओ, समस्त ऊर्जा तुम वहाँ समा दो 
पूर्णता दिख सकती वहाँ, यदि समस्त ज्ञान-बिंदु इंगित कर लो। 

योग, कुंग-फू, टाइको-वेंडो, मार्शल-आर्ट्स, सिखाए शक्ति केंद्रित 
जब सारा बल एक जगह होगा, निश्चित ही दबाव होगा अधिक।  
दबाव से वस्तु हिला करती, बदलती स्वरूप - अंदर तक कंपन 
भू-गर्भ की ऊष्मा, लावा बहिर्गम, रूप है दिखाता स्व प्रचण्ड। 

बहुत सुसुप्त अवस्था में हो, किसी को क्या पड़ी बल आजमाऐ 
कुंभकर्ण-निद्रा शयनित हो, वहाँ कर्मठ कलाकर्मी कृतियाँ रचें। 
जिन्होंने संचित किया स्वयं को, उनका निखरा आत्म सुभीता 
ऊर्जा-संग्रह एवं उचित प्रयोग, निश्चित ही दाता उपयोगिता। 

किया मस्तिष्क एकाग्र तो चिन्तन की सुरमयी लड़ियाँ फूटेंगी 
निकलेगा उन पलों से सर्वोत्तम, समस्त जीवन की ही कसौटी। 
हमें याद रहते सुघड़ता से बिताए पल, वे ही अपनी जमा-पूँजी 
विवेक से बुद्धिमता पनपेगी, चित्र बनेगा अनुपम, विरल ही। 

एक शब्द से पुराण-ग्रंथ लिख दिए, ज्ञानीजन निकाले अनेक अर्थ 
सब अपनी तरह से करें परिभाषित, बहुत गूढ़ लिए हुए भावार्थ। 
इतना तो उस शब्द-कर्ता ने भी न सोचा था, महद बनेंगे अध्याय 
मेलकॉम ग्लैडवेल की 'द टिप्पिंग प्वायंट' जैसा, जब चीजें होती वायरल। 

ईश्वर, ब्रह्म, अल्लाह, जीसस, जिहोवा, बुद्ध, कबीर सब विचार-उत्पत्ति 
आज सबको पता, सर्व-प्रचलित हैं, अंग बन गए हैं हमारी जिंदगी। 
मंदिर-मस्जिद, क़िला, विद्यालय, भवन-संसद, सब एक विचार-देन 
वह न होता तो ये भी न होते, हो सकता बदले में कुछ और लेन।

जितने अविष्कार, खोजें हुई, सबका प्रारम्भ था एक अल्प विचार
हाँ जुड़ाव होता गया मस्तिष्कों का, प्रगति हुई पूर्ण आदाय।
कहाँ से बनते ये महाकाव्य-ग्रन्थ, आकाश-पाताल छेदन यन्त्र
कौन समर्थ उन्हें सोच पाता, कौन बढ़ाता प्रयास अनवरत ?

कैसे चीजें सार्वजनिक हो जाती और दीर्घ-काल तक चलती
कैसे नव-तकनीकें आती जाती और पुरातन को बदलती ?
कैसे एक सूक्ष्म बीज़ का स्वरूप, हो जाता वृहद वट-वृक्ष
कितनी प्रक्रिया, सामग्री विकास हेतु, हैं अति-महत्त्वपूर्ण पक्ष।

कौन चमत्कारी बदलाव के, जो किंचित प्राकृतिक से भिन्न होते
विचार-मंथन से मानव समृद्ध है, उसने ही सब प्रयोग किए हैं।
माना प्रकृति में सब जीव-जन्तु, पादप, निर्जीव सब सक्रिय हैं
वे भी कारक हैं जग-स्वरूप बदलाव में और भूमिका महद है।

हम जानते मानवेतर जीव-जगत को भी, प्रकृति ने हैं दिए मस्तिष्क
वे करते प्रयोग स्व-योग्यता अनुसार, तमाम भाँति क्रियाऐं उपलब्ध।
जंगल में जाओ, देखो जीव-जंतु समन्वय, भोजन-श्रृंखला हेतु संघर्ष
आपस-क्रीड़ा, दुलार, परिवार बनाते, दूजों से बनाते विशेष संबंध।

औजार निर्माण-हुनर व बिल-गुफ़ा, खोखर-कोटर, नीड़-समझदारी
तुमको कोई जीव तुच्छ न लगेगा यदि उसकी पूर्ण क्रिया निहार ली।
एक वृक्ष के भोजन-तंत्र को समझने में ही पूर्ण जन्म बीत सकता है
मानव स्व-शरीर तंत्र से तो न पूर्ण ज्ञात, खुद को धीमान कहता है।

निर्जीव भी जो अचल है दिखता, इतना तो निर्जीव न होता
समस्त प्रक्रिया उस पर चलती रहती, सूक्ष्म रूप से हैं बदले सदा।
मानव समझता अजीव, पर उनके अंतः-बहिः कितने जीव पनपते
न समझे तो देखो नृत्य पर्वत, नदी, मेघ, भूमि, वायुमंडल, भूगर्भ आदि के।

मान लो 10000 वर्ष पूर्व से मानव-सभ्यता युग, पर पूर्व भी जग था चल
कितने जीव, पादप-वनस्पति, जलवायु, गुजरें काल-धरा के वक्ष-स्थल।
युक्ति, बुद्धि का खेल धरा पर, इसके जन्म समय से ही गतिमान
मनुज भी जुड़ा अति-पश्चात् तंत्र में, प्रकृति से अलग किए प्रयोग।

पर क्या कहें वर्तमान को स्वतः वा विशेष कारक प्रयोग कुछ
अगर वे भिन्न अवस्था होते, तो क्या जुदा होता वर्तमान स्वरूप ?
क्या कारक बनने-बनाने की प्रक्रिया सोची-समझी, या स्व-चालित
कितनी और संभावना थी भिन्न होने की, फिर कैसा होता प्रारूप ?

देखो मानव ने कुछ बुद्धि लगाकर अपनी संख्या वृद्धि कर ली
सर्व प्राकृतिक संसाधन अधिकृत, मानो अन्य नहीं सुत-पृथ्वी।
सागर, पहाड़, सरिता-ताल, अरण्य हटाने-बदलने का प्रयास
अनेकानेक बदलाव हुए हैं मौलिक स्वरूप से इस दौर मध्य।

हमने प्राकृतिक परिवेश त्याग, नूतन किंचित समृद्धि कर ली
मानव लुब्ध-प्रवृत्ति अति मारक, अन्य जीवन प्रगमन सोच ली।
माना अब मुख से न भी कहता, पर प्रकृति-परिवर्तन है दिशा
मैं अति प्रज्ञ-सबल-योग्य, जैसे चाहूँ-करूँ, मूढ़-सम धृष्टता।

कुछ औजार-अस्त्र कर पकड़ें, चढ़ बैठा माँ को करने रंजित
यदि माता अपढ़ - पुत्र शिक्षित, तो भी क्या बर्ताव सर्व-सम्मत ?
हम कृतघ्न यहीं से खाऐं, गुर्राऐं और महत्तम का करें विनाश
नहीं पूर्ण-ज्ञान सृष्टि जनक का, कुबुद्धि से जन्में संताप।

पर मानना पड़ेगा मानव चतुर है, समस्त चेष्टा में है स्वार्थ
खेत-सड़क, भवन-घर, कार्यालय-धंधे बनाए, सबका छीना हक़।
अब भी प्रयास बचे-खुचे का अतिक्रमण, विकास तरह से अपनी
तरु-पादप, जीव-जंतु विलुप्त हो रहें प्रतिदिन, पर किसे चिंता इनकी?

यह न होता, वह भी नही तो कुछ और होता
पर इतना अवश्य है कि वर्तमान तब आज जैसा न होता।
अगर नर बुद्धि निर्मल कर ले तो, अनेक जीवों का निर्वाह सम्भव
कुछ शिक्षित-समृद्ध होने का आशय, अन्यों का है नहीं पराभव।

पर आरम्भिक मनन 'एक शब्द' से था, जो है एक विचारोत्पत्ति
उसकी जगह कुछ और विषय होता तो अद्य-बोध होता अन्य ही।
क्या संभावना थी जो आज लिखा, वह फिर कदा फलीभूत होता
ऐसे ही कितने प्रयोग संभव, बस मनुज सोचता कुछ था कर सकता।

मम वर्तमान भी कुछ विशेष-पल एकत्रण, लेखनी माध्यम से इंगित
सब विद्वद्जन स्व को अपूर्ण कहते, क्योंकि पता न पूर्ण-विकसित।
काल-रूप हमें कैसे उजागर करेगा, कुछ भी कहा नहीं जा सकता
  पर किंचित हमारा मनन-प्रयास, न्यूनतम भरता एक संभावना।

यह शब्द-मनन क्यों जन्मता, सत्य या मात्र मानसिक कल्पना
जितने डूबें, उतने उलझे, प्रहेलिकाओं का न है हल मिला।
क्या वृक्षों को अंकुर-क्षिप्त करते समय, स्व-रूप की ही आकांक्षा
या फल-संतति एक प्राकृतिक प्रक्रिया, किसका क्या हो- न पता।

जीव का धरा-आगमन व सुचारू जीवन, है अति-संघर्ष विषय
उस जीव से क्या-2 उपजेगा, और भी जटिल है जिरह।
अन्यों की क्या कहें स्वांतः भी, मस्तिष्क सक्षम अनेक रंग
अंतः-बाह्य सब एक जैसे, पर संभावनाऐं निश्चित ही हैं अनंत।

हम भी शब्द के स्वर-व्यंजन, अनुस्वार-विसर्ग, उपसर्ग आदि
कितनी शक्यता महद रचने की, ज्ञान असाध्य न तो दुर्लभ ही।
आहुति हो इस मनन-यज्ञ में, चेष्टा उत्कृष्ट निर्माण हेतु करें
जीवन गति स्व भाँति, कुछ हटकर समझने का प्रयत्न करे।

एक शब्द नहीं तोता-रट्टा, अपितु संवाद महद व सदा संग
ज्ञान ज्योति प्रखर हो जाती, चीर डालती अन्तःकक्ष तम।
गुरु-मंत्र कुछ नहीं है पर, मनन युक्ति बढ़ाए संभावना
यावत् न तिष्ट अमृत न निर्गम, सब मिश्रित सा है अन्यथा।

मुझे न चाह किसी विशेष शब्द की, पर हों प्रयोग मति से सब
कितना मनन - लेखन जीवन में सम्भव, हों सब चेष्टा एकत्र।

पवन कुमार,
1 जुलाई, 2015 समय 18:56 सायं
(मेरी डायरी दि० 12 अप्रैल, 2015 समय 12:58 अपराह्न से)