खारा हूँ तो क्या हुआ
(समुद्र का आत्मकथन — विशालता, सहनशीलता और कर्तव्यबोध)
समुद्र अपनी विशालता, गहराई, खारेपन और निरंतर उपयोगिता के माध्यम से जीवन का सार्थक संदेश देता है। प्रकृति के संग उसका समन्वय, सहनशीलता और कर्तव्यनिष्ठा दर्शाते हैं कि किसी की एक कमी उसके समग्र मूल्य को निर्धारित नहीं करती। सच्ची महानता अपने गुणों, कर्मों और दूसरों के लिए उपयोगी बने रहने में निहित है।
समन्दर ने कहा—खारा हूँ तो क्या हुआ, मेघ बन
धरती को जीवन-जल देता हूँ,
मेरे एक दोष पर ही मत जाओ, कर्तव्य
निभाता हूँ, अनेक
जीवों को आश्रय देता हूँ।
मैं रत्नाकर हूँ, पर अपनी
मर्यादा में रहता हूँ, यद्यपि ज्वार-भाटे तो उठते रहते हैं,
उत्तुंग ऊर्मियाँ मेरे वक्ष पर खेलती, अथाह
गहराइयों में अनगिनत संसार बसते हैं।
अनेक वनस्पतियाँ एवं जीव मुझमें पलते हैं, सबने
जीवन के साधन खोज रखे हैं,
नदियों का मीठा जल मुझमें आ मिलता, वाष्प
बन जल देता हूँ,
लवण भीतर रह जाते।
पृथ्वी-सतह का लगभग इकहत्तर प्रतिशत भाग
मेरी अथाह जलराशि से आच्छादित है,
मेरियाना गर्त में गहराई करीब ग्यारह हजार मीटर, एवरेस्ट
की ऊँचाई से भी अधिक है।
सभी महासागर परस्पर जुड़े हैं, क्षेत्रों
के अनुसार बस अलग-अलग नाम रख दिए हैं,
शीतल-उष्ण धाराएँ मुझमें बहती हैं, गहराइयों
में प्रायः ठंडे जल के भंडार भरे हैं।
अन्य प्रकृति-कारकों से मेरा गहन समन्वय, सूर्यताप
से जल वाष्प बन उड़ता रहता है,
ऊपर उठकर धूलिकणों से मिल मेघ बनता, फिर
शीतल होकर मुझ पर भी बरसता है।
पवन बादलों को दूर देशों तक ले जाती है, मेरा
जल अनेक स्थलों की यात्रा करता है,
वसुधा को सींचकर नदियाँ फिर मुझमें आ मिलतीं, अनादि
काल से यह क्रम चलता है।
मैं प्रकृति का एक अंग हूँ, बस
अपना कर्तव्य निभाता हूँ, किसी
से शिकायत न करता,
कभी शांत, कभी चंचल रहता हूँ, पर
अपने स्वभाव और उपयोगिता से विमुख न होता।
इतना विशाल होकर भी सबसे जुड़ा हूँ, और
अकेला मेरा अस्तित्व अधूरा रह जाता है,
प्रकृति के सब अंग मिलकर जीवन सँवारते हैं, परस्पर
सहयोग ही संतुलन बनाता है।
अनेक लोग मुझे मलिन भी करते, उनके
अपशिष्ट सह लेता हूँ, पर मेरी सीमाएँ हैं,
विशालता का अर्थ यहाँ सकल सहना नहीं है, प्रकृति-संतुलन
की अपनी मर्यादाएँ हैं।
देखो, मेरे भीतर असंख्य जीवों का जीवन पलता
है, उनका
संरक्षण भी आवश्यक है,
हम प्रकृति से बहुत कुछ लेते हैं, उसे
सँभालना भी हमारा साझा उत्तरदायित्व है।
देखो, मेरी सतह पर लहरें उठती हैं, भीतर
भी धाराओं का निरंतर प्रवाह रहता है,
हाँ, बाहर से सब दिखाई नहीं देता, गहराइयों
में जीवों का अपना संसार रहता है।
जैसे मनुष्य के शांत मुख के पीछे भी भावों का
अथाह संसार समाया रहता है,
वैसे ही मेरी नीरव गहराइयों में अनदेखा विपुल
जीवन निरंतर गतिमान रहता है।
विशाल व्हेल और शार्क मुझमें विचरण करती हैं, असंख्य
अन्य जीव गतिमान हैं,
अनेक हिमखंड तैरते और पिघलते रहते हैं, समुद्री
बेड़े मेरे वक्ष पर आगे बढ़ते हैं।
अनेक मछली-प्रजातियाँ मुझमें आश्रय पाती, मछुआरे
अपनी आजीविका कमाते हैं,
कितने ही व्यवसाय मुझसे चलते हैं, यात्री-पर्यटक
मेरे तटों पर आनंद मनाते हैं।
छोटे-बड़े टापू मेरे विस्तार में उभरे हैं, हरियाली
और जीव-जगत के बड़े संसार हैं,
अनेक नगर मेरे किनारों पर बसे हैं, व्यापार
और यातायात के कितने ही मार्ग हैं।
मैं विशाल हूँ, पर मेरी वृहदता मात्र विस्तार में
नहीं, बस
निरंतर देते रहने में है,
खारा होकर भी सब जीवन-जल का स्रोत हूँ, सार्थकता
स्व-कर्तव्य निभाने में है।
प्रत्येक प्रकृति-अंग अपनी भूमिका निभाता, सबका
अस्तित्व परस्पर जुड़ा है हुआ,
किसी एक दोष से किसी का मूल्य न आँको, सबमें
कोई न कोई गुण छिपा हुआ।
काश! हम भी कुछ समुद्र-से उपयोगी बनें, अपने निष्ठापूर्वक
कर्तव्य निर्वाह करें,
अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए, गुणों
और कर्मों से जीवन को सार्थक करें।
सज्जन हमारी उपयोगिता पहचान ही लेंगे, सच्ची शाबासी
स्वतः मिल जाएगी,
हमारे कर्म ही हमारा परिचय देंगे, आत्म-मुग्धता
की आवश्यकता न रह जाएगी।
समुद्र-सी विशालता हमारे विचारों में, गहराई
भावों में, जीवन
में उदारता बनी रहे,
कर्मों से जग को कुछ तो दे सकें, यही
सार्थकता और सच्ची महानता बनी रहे।
नैतिक संदेश: महानता
दोषरहित होने में नहीं, अपनी सीमाओं के बावजूद कर्तव्य निभाने, उदार
बने रहने और दूसरों के जीवन में योगदान देने में है। कर्म ही हमारी सच्ची पहचान और
प्रशंसा का आधार हैं।
पवन कुमार,
8 अक्तुबर, 2026, वीरवार, समय 11:10 रात्रिकाल
(मेरी महेंद्रगढ़ (हरियाणा) डायरी दिनांक 1 अगस्त 2019, गुरुवार, प्रातः 9:22 बजे से)

Very mature thoughts, nicely put.👏👏
ReplyDeleteThe universal truth in the form of words. The words creating an amazing images.
ReplyDelete🙌
ReplyDeleteभरत शर्मा: Ati sundar
ReplyDeletePrasanna Bhalla : Waaah too good Sir 👏👏👏
ReplyDeleteSheo Prasad Singh : Very nice statement. The swabhav is eternal sashwat and never changes.
ReplyDelete🙏
Original views. Very nice
ReplyDeleteबेहतरीन अभिव्यक्ति है सागर की 🙏 उसकी विशालता अद्भुत है
ReplyDeleteसर
ReplyDeleteसर्वगुणसम्पन्न तो कोई भी नहीं होता
हालाँकि समुद्र अपने खारेपन की वजह से ही नमक देता है अर्थात् उसका खारापन भी जन उपयोगी है
बहुत ही अच्छाी सोच की अभिव्यक्ति प्रस्तुति !
पवन कुमार गुप्ता: भाई जी।
ReplyDeleteजीवंत चित्रण किया है आपने इस आत्मकथा में।
ढेर सारे डायरेक्ट इनडायरेक्ट रूपो का प्रयोग किया है।
साधुवाद।
💐💐🙏🙏
Anup Yadav : Good morning sir.
ReplyDeleteA well written journey by work (Karam) oriented person. Appreciable efforts sir. 🙏🙏
Very true
ReplyDeleteShaashi: सर, 🙏आपने बहुत सुंदर और प्रेरणादायक रचना की है। समुद्र के माध्यम से जीवन की गहरी सीख दी है कि किसी की कमियों से नहीं, बल्कि उसके गुणों और कर्मों से उसकी पहचान होनी चाहिए।
ReplyDeleteहमेशा की तरह शानदार अभिवायक्ति
ReplyDeleteविनोद कुमार: Excellent poetry bhai sahab. Really motivating and inspiring. Great. 💐🙏
ReplyDeleteNamaskar sir 🙏.The deep thoughts, emotions and feelings expressed through ocean due to one of it's demerit.Every time it teaches us to make consistent efforts and perseverance to keep moving ahead in life.It also teaches us how to dedicate and devote to others and also make their life sustainable and flourish.I'm profoundly influenced the way ocean always think about others and make them also comfortable to mingle as per the rules of nature.May Almighty always bless you for such great narration and correlation with great character of nature.thanks& regards 🙏🙏💐💐🌹🌹🌷🌷🌾🌾
ReplyDeleteRaju Prasad : Good morning Sir 🙏🙏. sorry sir for the late reply.I read your article.its really wonderful and incredible.thank you sir for sharing such articles which is always a deep source of motivation and inspiration in our life.stay blessed.regards💐💐🌷🌷
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