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Friday, 15 May 2020

विपुल परिचय

विपुल परिचय
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प्रतिदिन अनेकानेक घटित सर्वत्र, नर एक समुद्र-बूंद से भी अल्प 
हर पल अति महद निर्मित, कायनात के कितने क्षुद्र-कण हैं हम। 

कुछ पढ़ा-देखा, पृथ्वी व सूर्य की आयु बताई जाती ५ खरब वर्ष  
ब्रह्मांड-वय को बिगबैंग से १५ खरब वर्ष हुआ हैं मानते लगभग। 
कुछ समय पूर्व तक यूनिवर्स ही प्रचलन में, अब मल्टीवर्स चर्चा में
एक ब्रह्मांड परे भी अनेक अन्य हैं, मानव ज्ञान-पराकाष्टा से आगे।

बिगबैंग पूर्व भी  महा-गोलक में कुछ तो था, अज्ञात है कितनी वय
किसी महद प्रक्रिया चलते महाठोस होगा, बिखरा सा उससे पूर्व।
बिगबैंग द्रव्य से नक्षत्र-ग्रह-उल्का निर्माण में, बहु  आयाम निहित
    सौर-वृत्त में पृथ्वी एक क्षुद्र-ग्रह, जीव-मनुज विकास बड़ी पश्चाद।    

भारत में युग-महायुग-कल्प-महाकल्प आदि काल-अवधारणा विपुल
सत  १७.२८, द्वापर १२.९६, त्रेता ८.६४ व कलियुग ४.३२ लाख वर्ष।
सब मिल एक महायुग बनाते, जो बनें ४३.२ लाख वर्ष की दीर्घ काल
 १००० महायुग से एक कल्प या ब्रह्मा-दिवस व अवधि ४.३२ अरब वर्ष।
ब्रह्मा-सृष्टि आयु १०० कल्प-वर्ष या एक महाकल्प, होते ३११.०४ खरब
सृष्टि-स्थिति-लय महद विचार, महाप्रलय में विश्व संहार करते शिव। 

पुरा नर-बुद्धि भी नवीन से अल्प न विकसित, हाँ अनुमान करती थी यत्न
जितना समझा कह-लिख दिया, कुछ बाद वाले प्रतीतते अक्षरशः सत्य। 
अब विज्ञान-प्रयोग गूढ़-विवेचन हो रहें, अनेक पूर्व-रहस्य अन्वेषित-स्पष्ट 
नवीन नित समक्ष गोचर, प्रत्येक से परिचय की समय-ऊर्जा तो न है पर। 

हर पल विपुल निजी-बाह्य जग घटित, कैसे समुचित से परिचय संभव 
मेरी वय भी मध्यम हुई, गणना हिसाब से लगभग १९००० होंगे दिवस। 
इनमें अति-घटित हुआ, कम्प्यूटर मैमोरी की GB/TB में मापना कठिन
   नर कब इतना विकसित, हर विचार-वार्ता, दैनंदिन चर्या एकत्रण समर्थ।  

अनेक CCTV कैमरे लगें दुकान-कार्यालय, पर पूर्ण का मात्र अल्प अंश 
सघन उपकरण चाहिए संग्रहार्थ, फिर हुआ भी तो कितना प्रयोग संभव। 
यदि पूर्ण सचेत मनन-प्रक्रिया में तो भी, निकट विशेष घटनाऐं ही दर्शित 
 फिर स्मृति-विशेष अतिरिक्त तो अन्यान्य प्रतीत, कैसे सक्षम जग समस्त। 

अनेक चराचर खेल यहाँ, लोग अनेक विचार-मनन अभिव्यक्त कर रहें 
 क्या हम भी उन तथ्य-तहों तक जा सकते, वे स्वयं में पूर्णतया निखरे हैं।
वैसे किसे जरूरत अन्य-विषय सिर खपाने की, निजी ही कई असुलझे 
     ऐसे तमाम प्रसंग, कल का खाया तो आज न याद, नर स्वयं-भ्रमित है।      

हम अति अल्प हैं, यह पूर्ण कायनात समझने में तो नितांत असमर्थ 
चाहे जितने भी यत्न जन्मों तक, सीमाऐं हैं जाने की इसकी तहों तक। 
पर कमसमकम वे विषय तो चिन्हित हों, जो हमारी पहुँच में सकें आ
श्रम से कुछ सकारात्मक भाव, फिर खेद न कि प्रयास ही न किया। 

यह जीवन कुछ समझना पड़ेगा, तब कुछ पन्ने पलटने में सक्षम होंगे 
तभी निकट परिवेश उचित हो सकेगा, बगिया महकेगी, काम बनेंगे। 
चाहे महासूक्ष्म-बिंदु या नक्षत्र-विज्ञान, समझ से ही एक धारणा उचित 
पर बड़ा सोचने में न हो कोई निज कसर, सर्व-सीमाऐं स्वतः वर्धित। 


पवन कुमार,
१५ मई, २०२० शुक्रवार, समय ९:५५ बजे प्रातः 
(मेरी महेंद्रगढ़ डायरी दि० २४ अगस्त, २०१७ समय ९:१९ बजे प्रातः)       
     
  

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