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Friday, 22 March 2019

लेखन-संस्मरण

लेखन-संस्मरण 
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लेखन भी एक विचित्र विधा, बस बलात सा प्रारम्भ करना पड़ता 
कलम-कागद लेकर बैठ जाओ, क्या निकलेगा किसी को न पता। 

यह भी मंदता का शिकार होता, स्वतः तो न सक्रिय, करना पड़ता 
मस्तिष्क को क्रियाशीलता में जोड़ना, एकांत में ही कुछ बन पड़ता। 
बस हिम्मत करके एकनिष्ठ-प्रबुद्ध हो उकेरना ही कुछ कृति रचेगा 
जीवन प्रबलित हो जाता, प्रयास यह भी, श्रम कुछ तो फल लाएगा। 

क्या लिखना अभी तो न ज्ञात, बस कलम चल रही मन ने आज्ञा है दी 
यह चलेगी तभी तो जीवन चलेगा, लेखन से ही दिशा निर्धारित होती। 
लेखन बहुदा एक सुखद अहसास, पर कई कृतियों में संजीदा होते हम 
उत्पाद तो निज का ही होता, अनुभव-चिंतन-लेखन भिन्न-वर्णी होता पर। 

लेखन क्या है मात्र रिक्त-क्षणों का पाश, प्रयास-सदुपयोग हो महदार्थ
न कोई विशेष प्रतिद्वंद्विता दर्शित, जो समक्ष बस लिखता चला जाय। 
कोई गहन मनन तो न है, मस्तिष्क सदा समय तो एकसा न सक्रिय 
ज्ञान-विज्ञान तो एक और बात, बिन अनुकृति में तो ही होगा मौलिक। 

मौलिक तो चाहे अति-रुचिकर भी न हो, फिर भी श्लाघ्य, है स्व-प्रयास 
चिंतन तो अंतः से ही प्रस्फुटित, आरंभ-प्राथमिकताऐं प्रायः सामान्य। 
कैसा निखार-प्रभुत्व होगा निज-मनन का, कौन ज्ञान रश्मि निकलेगी 
अभी न कुछ अधिक सुहा रहा, किंचित सुग्म पथ मिलेगा चलने से ही। 

पथ तो ठीक, यह सुगम क्या संदर्भ में, शायद मन का उचितार्थ सुप्रबंधन 
मनीषियों ने अति-सचेत होकर लिखा, इतने पोथे ऊल-जुलूल न हैं सब। 
बैठे तो होंगे कुछ निश्चय करके, आशा निज-झझकोरने से निकले उत्तम  
सभी कुछ तो अत्यल्प से ही है प्रारंभ, गतिमानता से ही बात बनेगी कुछ। 

विचित्र भाव समक्ष आ रहें, तर्जनी में चोट लगने से लगी है बैंड-एड स्ट्रिप 
अंगुष्ठ-माध्यमिका व अन्यों की मदद से कलम पकड़ी है, पूर्ण-फलता न। 
जीवन निर्बाध सुख-आराम से बीत रहा, मस्तिष्क को न कोई विशेष कष्ट   
बस कार्यालय में तो कर्त्तव्य-निर्वाह की तीव्रता, अन्यथा कमोबेश आनंद। 

    २६.८.२०१६ को मेरा स्थानांतरण हुआ कार्यालय जयपुर मुख्य अभियंता   
अधी० अभि० (यो०) पद, परियोजना प्रबंधक हकेवि का अतिरिक्त भार। 
अभी मु० अभियंता से बात तो न हुई, पर यह कृष्ण महेश्वरी की जगह है
उनकी बदली निदेशक तौर पर अपर महानिदेशक कार्यालय मुंबई में। 

२ वर्ष हुए महेंद्रगढ़ में, ९ मास विश्वविद्यालय का अतिथि-गृह था आवास 
अब अगले समय जयपुर जाना होगा, यदि कृष्ण छोड़ते हैं निज पद-भार। 
हालाँकि महेंद्रगढ़ तो मेरे पास ही रहेगा, पर अभी कोई न विशेष काम 
पर एक वर्ष यूँ ही निकल जाऐगा, तब दिल्ली-आगमन का होगा काल।  

अभी तो न अधिक ज्ञात है, पर इतना तय कुछ बदलाव होगा अवश्य 
कें० विश्वविद्यालय से कुछ संबंध सुधरे, और कार्य की सहमति निकट। 
प्रगतिररत कार्य जल्द एक-दो मास में पूरे होंगे, इनको है भी निबटाना 
मदें, समय-वृद्धि, समापन प्रमाण, आदि कुछ न कुछ तो मांगेंगे ऊर्जा। 

प्रशासनिक खंड के निर्माण-कार्य चर्चा में है, जल्द पत्र-प्राप्ति आशा 
तब निविदाऐं आमंत्रित करनी होंगी, शर्तों में परिवर्तन करना होगा। 
भवन-नक्शें ग्राह्य विभाग को दिखाने होंगे, नव मदें भी योग किञ्चित  
ADG-स्वीकृति भी चाहिएगी, निविदा स्वीकृति पर कार्य शुरू संभव । 

कई मामले ग्राह्य विभाग संग, पर केलोनिवि का हित कार्य करने में ही 
कब तक कार्य छोड़ते रहेंगे, जब निर्माण-व्यापार में हो तो कार्य करो। 
मेरा महेंद्रगढ़ इतना वाम भी न रहेगा, यदि विभाग सुस्थिति में आ पाऐ 
भविष्य तो किसी को न ज्ञात, पर अभी अच्छा हो यही प्राथमिकता है। 

यदि जयपुर पदभार ग्रहण करता हूँ, तो भी महेंद्रगढ़ का दायित्व होगा
कभी-२ यहाँ रुकना होगा या जयपुर परि० भाँति वहीं से काम चलेगा। 
सप्ताह में १-२ दिवस तो चाहिएगा, दिल्ली-जयपुर मध्य में है महेंद्रगढ़ 
      सब अग्रिम-परिस्थितियों पर निर्भर होगा, बहुत चीजें होती स्वानुरूप।       

यहाँ का आवास छोड़ना होगा, बीच में आने हेतु होगा वैकल्पित प्रबंध  
जीवन अब खाना-बदोश सा रहेगा, क्योंकि ३ स्थलों पर रहेगा स्थापन। 
पर आवश्यक १ वर्ष और काट लूँ, आने के बाद फिर जल्द बदली होती 
वैसे भी विभाग दिल्ली न बुला रहा, कहीं दूर भेजता कष्टकर होता ही। 

कई बार जो कुछ होता उचित ही होता है, सब कुछ तो न अपने हाथ 
६ मास पूर्व बदली हेतु आवेदन किया था, एक विकल्प जयपुर भी था। 
तब जयपुर केंद्रीय परिमंडल हेतु था, आर एस राव दिल्ली हेतु उत्सुक 
पर अविचारित न अब वह अत्युत्सुक, अतः वर्तमान आदेश है उचित। 

जीवन तो है ऐसा ही पड़ाव कभी यहाँ तो कभी वहाँ, निबाहना पड़ेगा 
यहाँ अधी० अभियंता हेतु अत्यल्प भार, न उचित अनावश्यक बैठाना। 
अब कमसकम द्वि-स्थल भार से मस्तिष्क की कुशलता का होगा वर्धन 
जीवन में उपयुक्त दबाव होना जरूरी, अन्यथा उपयोग न होता संपूर्ण। 

दत्त कार्यानुरूप ही कर्मी मिलें, अन्यथा ग्राहक सोचता उस हेतु ही स्थित 
जैसे कार्य आऐंगे, और स्टाफ़ मिल जाएगा, उत्पादकता ही मुख्य विषय। 
वैसे आभास था कुछ अवश्यमेव बदलेगा, विभाग में है SEs की अल्पता 
अतः जयपुर अल्पाधिक अनुरूप ही है, भरपूर उपयोग न होता अन्यथा।  

यहाँ से सहा०अभि० माखन मीणा व अधी० पीसी कोली भारमुक्त हो गए 
दोनों अब अतिरिक्त द्वि-भार पर हैं, दोनों ने जयपुर में ज्वायन किया है। 
बस स्टाफ कार्य०अभि० (सि०) व (वै०), १  सहा०अभि० व उ०श्रे०लि० हैं 
मंडल कार्यालय अभी रहेंगे, किंचित जरूरत भी रहेगी और काम आऐंगे। 

जीवन यूँ ही तो आगे न बढ़ता, कुछ कार्य करने से ही तो श्लाघा मिलेगी 
रिक्त बैठे तो प्रतिभा को जंग लगता, आगे बढ़ने हेतु सामर्थ्य चाहिए ही। 
यदि घोड़े को न दौड़ाओ तो सुस्त हो जाएगा, बुद्धि पर बोझ न तो मूर्ख  
शरीर-श्रम से बढ़ती क्षमता, परिश्रम से प्रगति, प्रयास से प्रेरणा विशेष। 

कर्मवीर बन सिक्का जमा दो जहाँ हो, शेष समय को यादगार बना
स्मरण रहे कोई कर्मठ संपर्क में आया, इतना भी न मूल्य है सस्ता। 
विश्व तो श्रेष्ठों को विशेष सम्मान देता, रोने-बिलखने वाले दूरेव तिष्ठ 
अतः गुणवत्ता-सुधार निरंतर, सफलता-कदम चूम लोआगे बढ़कर। 


पवन कुमार,
२२ मार्च, २०१९ समय २२:३५ रात्रि 
(मेरी डायरी दि० २८ अगस्त, २०१६ समय १८:१६ सायं से) 

1 comment:

  1. Sunit Gupta : Sir it is so nice to read it. I wish you all the very best Sir.

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