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Monday, 2 September 2019

नवीन-भाव


नवीन-भाव 
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एक नवीन-भाव पल की आवश्यकता, स्थापन्न कागज-पटल 
लेखनी माध्यम, मन-विचार डायरी में, बहिर्गमन से विस्तृत। 

चलो आज नवीनता-वार्ता करते, माना सनातन को पुनरुक्त 
वे ही विचार पुनः-२ उदित, चाहे शब्द-लेखन में कुछ भिन्न। 
नव-साहचर्य से मन-उदय, अनुभव खोले प्रकटीकरण-राह 
बहुदा स्व ही लुप्त, निज उबासी-कयासों से न आते बाहर। 

सच है कि जग अति-विशाल, दर्शन-मनन एक सीमा-बद्ध 
मन-कंप्यूटर प्रोसेसर गति सीमित, अल्प ही काल-प्रकट। 
इकाई बायट प्रति सेकंड, लब्ध समय प्रयोग तो बड़ा संभव
निकट सुपर-कंप्यूटर पर प्रयोग न, कुल काम तो ही शून्य।  

अर्थ यदि गति कुछ कम भी, अधिक समय में बड़ी दूरी तय 
विश्व-कोष में बड़ी संख्या विवरण, पर कुछ से ही परिचय।  
चलेंगे तो दूरियाँ पटेगी, नव-अनुभव ग्रहण, मन-रवें सुदीप्त 
नवीनता स्व-स्थित, समय प्राप्त तो कागज पर भी उकेरित। 

खुले चक्षु-मन से दर्शन-मनन है, कार्यशाला-मोड की उत्कंठा
भ्रमण से नव पथ-स्थल दर्शन, प्रवास-संपर्क से नई-सूचना।   
हर जन पृथक स्थल से, भिन्न सूचना-पुञ्ज, क्यों न करें ही बात 
परस्परता से सघनता बढ़ेगी, जितना जुड़ेंगे उतने लाभान्वित। 

मानव-यात्रा कुछ वर्ष-यापन, कितना मनन-गति से बिताया समय 
एक मोटी पोथी बनते प्रक्रिया में, सभी कुछ तो प्रयोग पर निर्भर।  
कोल्हू-बैल भी गतिमान नेत्र-पट्टी बांधे, वृत्त-गिर्द  करता दूरी तय 
यहाँ नव दिशा-स्थलों से परिचय, अन्यथा तो अपने में ही सिकुड़। 

क्या पथ सुप्राप्ति का या तो बैठे रहें, कुछ पास आऐंगे ही परिचय भी 
यह निज-निर्भर, किनको कितनी अपेक्षा, कितना करते संपर्क ही। 
जलपुरुष निकट तृषित आऐंगे ही, यदि मृदु बर्ताव और भी सुभीता 
उसपर निर्भर कितना रूबरू, कुछ पूछकर सूचना-ज्ञान व लाभ। 

एक सूत्र टूटना पुनः उसे जोड़ना, निश्चित ही कुछ समय-ऊर्जा माँग 
एक द्रुम पूर्व-स्थिति में न गमित, हर पल बदलते रहते हैं मन-भाव। 
तथापि वृहत-ग्रंथ लिखे जाते, एक ही दिवस-निष्ठा से काम न बनता 
अपने को पुनः पथ पर स्थापन, कुछ विचित्रता भी पर काम चलेगा। 

विषय नवीनता मनन-दर्शन में, जो बहु आयाम-प्रतिभाऐं करें युग्म 
मति-कोष्टकों की भी स्मरण क्षमता, अनुपम-रमणीयता करें एकत्र। 
जीवन का तो घटित हो जाना सत्य, समृद्धि कितने उत्तमों से संयोग 
हाँ आज का नवीन भी प्राचीन हो जाएगा, तो भी सदा बढ़ें उस ओर। 

संपर्क-ज्ञान संग विस्मृत, सीमित स्मरण-क्षमता, सर्वस्व न समाहित 
कंप्यूटर की अति स्मरण-क्षमता जैसे 1TB, वह भी शनैः पड़ती कम। 
अनेक पुरानी फाइल-दस्तावेजों, चित्र हटाने पड़ते हेतु स्पेस-लब्धता 
अन्यथा शीघ्र-पूरित सब स्पेस, कितनी हार्ड-डिस्क रखें सब-सहेजना। 

पर समय-तकनीकों संग कंप्यूटर-प्रोसेसिंग क्षमता-मैमोरी भी वर्धन 
चाहे यकायक न दर्शित, नर का बौद्धिक-दैहिक विकास समय संग। 
माना न सम, मोबाईल-फोन, कंप्यूटरों की भिन्न क्षमताओं के मॉडल 
जितनी जरूरत, क्रय-शक्ति ले लो, रूचि-हैसियत अनुसार व्यवहार। 

मानवों में प्रज्ञान की क्या भिन्न अवस्थाऐं, या मात्र निजानुसार प्रयोग 
वैज्ञानिक व कमेरे की बौद्धिक-क्षमता सम, बस एक द्वारा सुप्रयोग। 
बचपन से देखते कुछ भिन्नता लोगों में, जैसे समझना-परिभाषा देना 
शुरू में अल्प, कालांतर में एक का  प्रयोग-त्याग, गतिमय है दूजा।  

यथा प्रयोग, तथा वर्धन, हाँ कभी अति-प्रयोग दुष्परिणाम भी गोचर  
वृतांत सब तरह के, पर निश्चित अप्रयोग से नितांत पड़ जाता ठप्प। 
कार्यशालाओं हेतु लोग यंत्र खरीद लेते, अप्रयोग से पुराने व व्यर्थ  
धन-साधन नष्ट, चाहे किञ्चित-प्रयोग, समुचित तो निश्चितेव श्लाघ्य। 

कोई न इतना निपुण बस जोड़े ही, पीछे मुड़कर भी न देखे संग्रह 
या देख-समझ सुरुचिपूर्ण सृजन, अपनी हर वस्तु की करता कद्र। 

निज-वस्तु संभाल स्व-जिम्मेवारी, हाँ कालांतर में उपयुक्तता घटित 
अमुक काल जैसा न सार्थक, प्रिय-अमूल्य, अब नव-संदर्भ जरूरत। 
फिर सृजनशीलता, नव-भाव संग्रहीता, मूढ़ से प्रवीण में रूपांतरण 
यह भी तुलनात्मक निज संदर्भ में, पूर्ण ज्ञान संदर्भों में अति-दोयम। 

कोई किसी विधा प्रवीण अन्य में अनाड़ी, पर अर्थ न कि मूढ़ है वह  
अर्थ यह भी संभव एक हर जगह न पारंगत, मन-देह की सीमा निज। 
पर न विरोध उन्नति हेतु, कमसकम जहाँ रूचि वहाँ हो प्रयास अधिक 
अन्य-विधा रूचि भी समृद्धि, तो भी पूर्ण का कुछ अंश ही दर्शन संभव। 

फिर अर्थ क्या है हम जैसे भी, कमसकम निकट का करें प्रयोग पूर्ण
आवश्यकता बढ़ेगी तो हाथ-पैर भी मारोगे, क्षमता हेतु पूर्ण तब यत्न। 
अन्य को भी समझा सकोगे -सुवृत्ति दान दो, वृहदता स्व में दर्शन  
जीवन-यंत्र प्राप्त अति कष्ट से, पूर्ण प्रयोग से करें सार्थकता सिद्ध। 

प्रथम-कक्षा छात्र को एक कायदा या शुरू-पाठों की ही आवश्यकता 
लेकिन प्रख्यात विद्वान-गृह तो बहु-विधाओं की पुस्तकों से होता भरा। 
अर्थ कि वह सब काल ऐसा न था, प्रथम श्रेणी से बढ़ पहुँचा यहाँ तक 
भली-भाँति ज्ञात वह अत्यल्प, अनेक ज्ञान-आयाम हैं यावत अस्पर्श। 

कौन मानव-स्वरूप हमारे गिर्द छितरित, सब भाँति के नमूने दर्शित 
सब शून्य से अनंतता के किसी सोपान -तल, कुछ चढ़ ऊपर तिष्ठ। 
ज्ञात अभी बड़ा कर्म अपूर्ण, ऊर्ध्व से ही दूर दर्शन - प्रेरणा मिलेगी 
इसका मूल उद्देश्य अंतः-दर्शन ही, अग्र-ऊर्ध्व बढ़े तो हो संतुष्टि। 

नवीनता सुमृदु भाव बहु-आयाम योगी, मन-चक्षु खोल जिज्ञासु बन
जितना संभव सृजनात्मक बनो, लब्ध काल में अधिकतम  संग्रह। 
प्रखरता आएगी, निज संग अनेकों में सकारात्मक परिवर्तन संभव
लक्ष्य दूर पर मन सुग्राह्य, पैरो में शक्ति, दृष्टि प्रखर, लाभेव अतः।  

आगे बढ़ो अनवरत, योग अनुभवों से, उत्तम तो जाएगा ही ठहर 
जिसकी जब जरूरत प्रयोग कर, धैर्य रखो, सबसे मित्रता-भाव। 


पवन कुमार,
२ सितंबर, समय ६:३२ सायं 
(मेरी डायरी दि० १६ व १७ दिसंबर, २०१६ समय ११ :२८ प्रातः से) 
   

2 comments:

  1. Anil Kumar Sharma: Great! A new introduction of yours. The post covers a wide variety. May be that it could be fragmented & Indexed. Gita message "कर्म करो और फल की चिंता मत करो" appears to be the gist of the post. An excellent expression. Tempted to look into other posts e.g. 'Kumar Sambhav' etc but require time.

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  2. Pawan Kumar:Thanks a lot Sir for reading, appreciation & inspiring. It is really great to hear good words from stalwarts like you. Regards.

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