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Monday, 30 September 2019

कलम-यात्रा

कलम-यात्रा 
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चिंतन-पूर्व भी चिंतन, एकजुट देह-आत्मा समर्पित महद-लक्ष्य 
समय-ऊर्जा भुक्त, पर यथाशीघ्र मंजिल-प्राप्ति हेतु हो तत्पर।  

मनन-विषय अहम प्रारंभ-नियम, पर यावत न तिष्ठ कुछ न निकस
एक चित्तसार, सुखासन-प्रकाश, देह-मन सहज, एकांत-निरुद्ध। 
अहं-त्याग, वृहद-संपर्क चित्ति, पठन-पाठन से भी बहु -एकाग्रता
मन पूर्ण-बल तत्काल संभव, जब एक यथोचित परिवेश मिलता। 

देखते ऊँट किस ओर बैठता, कहाँ-किस विषय मन की होगी यात्रा 
यही सखा-वाहन या पथ-प्रदर्शक, विस्मयों से चेतन-संपर्क कराता। 
कोई वजूद न यदि न पूर्ण-तत्पर, समय-ऊर्जा माँगती यात्रा न्यूनतम 
फिर थकन, मध्य-विश्राम, अग्रिम तैयारी, गंतव्य-अन्वेषण-संपर्क। 

सब चाहते सुखद-मनोहर, ज्ञानद-मधुर यात्रा, अग्रिम तो अल्प-ज्ञात 
न्यूनतम जोखिम भी जरूरी, उचित अपेक्षा, तैयारी बनाती सुयोग्य।
फिर यथा समझ तथैव दर्शन, जरूरी तो न सदा ही  रोचक-संपर्क
सब कुछ तो विश्व-थाती, न जानेंगे तो कैसे कुछ कर सकेंगे हित। 

पर यात्रा में भीषण-स्थल छोड़ते, गाइड रोचक-स्थल ही लाते प्रायः 
ज्ञान सर्वत्र पर मुख्य-स्थल संघनित, एकदा गमन से भी विषय ज्ञात।  
कथन-समझ सुलभता, संग्रहालय बनते, अधिकाधिक दर्शक-भ्रमण 
राजा-महाराजा, दरबारी-प्रजा की कथा, दर्शक भी रोमांचित होते। 

कौन आवास-गृह जाते गत-काल बाद, जब इतिहास से आए बाहर 
चाहे कितने ही निरंकुश-दुधर्ष, पर कुछ महत्त्वपूर्ण-चर्चित था नाम। 
महल-बावड़ी, अद्भुत पच्चीकारी उस नृप-निर्मित, सार्वजनिक अब
माना अनेक-सहयोग महद कृति में, नाम-गुणगान तो नेता का पर। 

दूर-देश पथिक हर सम-विषम से गुजरता, माना सुगमता तगाजा 
तथापि अरुचिकर आ ही जाएगा, आवश्यक न शुभ-संपर्क सदा।
सब दृष्टांत ही निज अल्प-विश्व खोलते, दूर-दर्शन न हो घर बैठे तो
सर्व-विश्व भिन्न-रसज्ञता हेतु उद्यमित, किसी दूर-यात्रा चल पड़ो। 

एक झलक हेतु ही तो सब अन्वेषण, कब दर्शन हों भविष्य-गर्भ में 
 छवि अनुभव परम-दृश्य की, सब मौन-भिन्न ढंगों से प्रयास करते। 
जीवन-सार संभव चरम-अनुभूति से, सब मध्य-यात्राऐं हेतु ही उस 
जितने अधिक दृश्य-अनुभव, सत्यमेव चरम भी उतना श्रेयस्कर। 

कथन देव का उत्तम ही वहन, पर क्या परिभाषा उत्तम-अधम की 
  कुछ तो निस्संदेह शोभनीय, कुछ भीषण-दुष्कर, दुराह-कष्टकारी। 
जहाँ सुखी जलवायु-भृत्ति वहाँ बहु-संख्या, विषम स्थल प्रायः निर्जन
सब प्राण-देह हेतु अल्प कष्ट चाहते, सुगम जीवन हो कयास बस। 

पर खोजी को भीड़-भाड़ में अरुचि, इच्छा दुर्गम कौशल-आत्मसात
निज देह-मन पर कई प्रयोग, कितना आगे बढ़ सकें, पूर्ण प्रयास। 
न अति-संतुष्टि मात्र दैनिक खान-पान में, आगे बढ़ो चूम लो गगन 
सब सुख-साधन-ऐश्वर्य तज, एक फकीर सम  जीने में न हिचक। 

सर्व-विश्व निज तो विक्षिप्त-वनवासी, भीषण-त्रस्तों से क्यों दूरी है 
कहीं न कुछ अपेक्षा कर दें, अंततः सब न्यूनतम सुविधा चाहते। 
  जरूरी तो न दुःखी ही, नर अल्प साधनों संग बहुकाल से जीता    
 प्रकृति-पुत्र, उस संग दिवस-रैन  रिश्ता, गुजर-बसर कर लेता। 

किंचित अंत्यजों से क्यूँ दुराव, इहभाव से कदापि न बड़ा-हित 
विश्व एक-स्रष्टा प्रारूप, महा-घटना उदित, समस्त तत्व निहित। 
कुछ को उत्तम-प्रयोग माने, कुछ अपशिष्ट, यह दृष्टिकोण-गत 
विवेकी ही उत्तम-अधम भेद-सक्षम, आम जन पूर्वाग्रह-ग्रसित। 

अभी विषय न सम-विषम, पर भाव नर वृहद-नजरिया अपनाए
सब स्वीकृत, निज-रूचि अनुरूप जिसे चाहें लें, पर घृणा न करें। 
ध्येय हो हर का समग्र-सम्मान, कैसे मिल-बैठकर बात सकें कर 
प्राण कठिन, प्राणी का बलानुरूप समायोजन, अतः न प्रतिवेदन। 

पर नर यात्री ही तो इस वृहद-सृष्टि में, जितना संभव उतना देख 
ज्ञानेन्द्रियों की सदैव स्वस्थता-संभाल से तो, देख सकोगे विराट। 
जीवन-पूर्णता तो अनुभव से ही  संभव, सार मिलेगा सुचिंतन से 
न घबराना कटु-अनुभवों से कभी, निज-काल में सशक्त करेंगे। 

कवि की क्या वर्तमान-चाह, समय कम पर सारांश तक न गमन 
एक शुरू-यात्रा तो पूर्ण हो, अनुभव लेखनी से निरूपण लें कर। 
मनोदित दार्शनिक भाव स्वतः ही उदित, पर कब लब्ध न ज्ञात 
पर इतना जरूरी चरम-अभिलाषा, कितना निखरे विधाता हाथ। 

मेरा मात्र प्रयोग मन-कलम से, कैसा परिणाम होगा भविष्य-गर्त 
न पूर्वाग्रह किसी भाँति का, यदि समय हो तो जितना चाहे चल। 
दृष्टि निस्संदेह प्रखर चाहिए, उसे देखना अभी वर्तमान क्षणों में 
मन भी दाँव-पेंच लगाता, कलम-माध्यम से कुछ उकेरन करे। 

जीवन चलना अति-दूरी, जिज्ञासा प्रगाढ़ मन-देह बनाए रखना 
कभी तंद्रित न हो जाना कर्त्तव्यों में, महद हेतु दीर्घ जगे रहना।
प्रतिबद्धता सघन-विस्तृत हो, सर्व-मनुजता में फूँक सकूँ प्राण 
सब विश्वास करें परस्पर, व्यर्थ-विवाद हटा राह में हो सार्थक। 

भौतिक-मनस भ्रमण बढ़ाओ, जब संभव निकलो अज्ञात तरफ 
संपर्कों से ही अंतः-कोष वर्धित, विकास के कई प्रदान अवसर। 
महाजन महद सक्षम अनुभव-संपर्कों से, विवेक सदा संगी रहा 
तभी जग में नाम, जन जुड़ना पसंद करते, रहें स्मरित दृष्टांत। 

मन-देह स्वास्थ्य अपनी जिम्मेवारी, सहेजना यत्न से सब अंग 
नित्य-व्यायाम आदि से सकुशल, सामंजस्यता न जाना भूल। 
समुचित अनुरक्षण व काम, सृजनता-गुणवत्ता-क्षमता वर्धन 
ध्यान रखना सामान का, जो भी उपलब्ध हो उपयोग-पूर्ण। 

कहाँ से चले कहाँ पहुँचे, कलम-यात्रा विचित्र-अदृश्य ओर 
मन बहु-आयाम समक्ष, गुह्य-अध्यायों से ही है सुपरिचय। 
मैं तो जीवन का दास, कहाँ-किस धाम जाना तुझे ही ज्ञात 
कुछ यात्रा-अनुभव, कयास-प्रयास, ओ मौला हो रहमत। 


पवन कुमार,
३० सितंबर, २०१९ समय ६:२३ प्रातः
(मेरी जयपुर डायरी २३ नवंबर, २०१६ समय ९:२२ प्रातः से)   

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